समन्वय व समरसता का महाकुंभ

सिंधु दर्शन यात्रा इस वर्ष अपने 25 वर्ष पूर्ण कर रही है। अतः इसे सिंधु कुंभ के रूप में आयोजित किया जा रहा है। कोरोना को ध्यान में रखते हुए इस बार सिंधु कुंभ में कुछ विशेष व्यवस्थाएं भी होंगी। इन्हीं मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की है मु. रा. मं. के मार्गदर्शक तथा सिंधु दर्शन यात्रा के संस्थापक सदस्यों में से एक इन्द्रेश कुमार जी से। प्रस्तुत हैं उस चर्चा के प्रमुख अंश-

सिंधु दर्शन यात्रा कैसे शुरू हुई?

लद्दाख में प्रारंभ में कभी शैव मत सनातन था, फिर बौद्ध मत आया फिर धीरे धीरे वहां इस्लाम भी आया। इसके कारण कुछ मतभेद भी रहते थे, कट्टरता भी रहती थी। इसलिए 1994-95 में यह विचार प्रारंभ हुआ कि सिंधु नदी को केंद्रित करके एक यात्रा का प्रारंभ किया जाए। लद्दाख मुख्य धारा में आकर एक विकसित क्षेत्र बने, इस विचार को लेकर हमने 1997 में सिंधु उत्सव शुरू किया। उन्हीं दिनों सौभाग्य से भारत में केंद्र की सत्ता बदली और अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री पद पर आए। उन्हीं दिनों लालकृष्ण आडवाणी भारत के गृह मंत्री बने। वे सिंधी थे, इसलिए सिंधु नदी के प्रति उनका लगाव भी अधिक था। उनके मन में भी आया कि सिंधु केंद्रित कोई कार्यक्रम करके उसमें भागीदारी करके एक नये इतिहास को पुनः जीवित किया जाए। हम लोगों ने तरुण विजय जी और संघ अधिकारियों की सहायता से जब लालकृष्ण आडवाणी जी को संपर्क किया तब उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दी और कहा कि मैं इस प्रकल्प से सहमत हूं। यह सिंधु केंद्रित प्रकल्प भारत के गांव-गांव तक पहुंचे। विश्व के अंदर इसकी गूंज हो ताकी प्राचीन और श्रेष्ठ सभ्यता फिर से प्रकाश में आए और इसका प्रकाश चारो ओर मानवता को सुखद बनाने लगे।

जैसा कि आप ने कहा कि सन 1997 से यह शुरू हुई है जिसे अब लगभग दो दशक पूरे हो चुके है। उस समय से लेकर अभी तक इस यात्रा में क्या-क्या परिवर्तन हुए है?

यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व वहां जो राजनैतिक लोग थे, कांग्रेस के लोग थे, कुछ कट्टरपंथी लोग थे, उन्होंने एक प्रोपेगैंडा करना शुरू किया कि यह यात्रा बौद्धों को हिन्दू बनाने के लिए की जा रही है। इसलिए वहां के बौद्ध समाज में हलचल शुरु हो गयी और जिसमें कहा गया कि यह बौद्धौं को हिन्दू बनाने वाली यात्रा है। इसलिए वहां एक प्रस्ताव उठा कि सिंधु नदी के दो टैंकर पानी भरकर एक ग्यारह अशोक रोड और एक आरएसएस के झंडेवालान कार्यालय में भेज दिया जाए, जिससे वे लोग वहीं नहा लें। यात्रा के नाम पर लद्दाख आकर बौद्धों को हिन्दू बनाने का और बौद्ध मत को लुप्त करने का काम नहीं करने दिया जाएगा। उनकी इस गलतफहमी को दूर करने के लिए उनके साथ कई बैठकें हुईं जिसमें एक सौहार्द का वातावरण बना। फिर जब उनको यह पता लगा कि इससे आर्थिक विकास भी होगा, धर्मों में समन्वय, शांति और भाईचारे का वातावरण बनेगा तब वहां एक सर्व व्यापक समर्थन मुखर रूप से इस उत्सव के लिए बनने लगा। जब यह प्रश्न उठा कि सिंधु के किनारे उत्सव कहां मनाया जाए तो शेय गांव की भूमि उपयुक्त लगी। गांव के लोगों ने भी अपना समर्थन दिया।

सन 1997 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में यह यात्रा अपने स्वरूप को ग्रहण करने के लिए चल पड़ी। यह यात्रा जब चल रही थी, तो अकस्मात इस पर एक और राजनीतिक प्रहार हुआ। सन 2004 में सत्ता परिवर्तन हुआ और फिर से कांग्रेस की सरकार आयी। सरदार मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बनें। देश की कमान श्रीमती सोनिया गांधी के हाथ में थी उन्होंने इसे राजनीतिक नजरिए से देखा। यह आर्थिक विकास की, सामाजिक समरसता, एकता, एकात्मता की, धर्मों के अंदर तनाव, हिंसा और फसाद से मुक्ति की और धर्म समन्वय की यात्रा है, भारत और विदेशों से इसके पर्यटक बढ़ रहे है, इससे आर्थिक सम्पन्नता आ रही है, रोजगार और शिक्षा बढ़ रही है, इत्यादि बातों पर उनका ध्यान नहीं गया बाल्कि राजनीतिक द्वेष के कारण उन्होने सिंधु उत्सव का नाम बदलकर सिंघे के खबब यानी जहां से सिंधु निकलती है वहां का लोकल नाम था उसका नाम दिया। इस यात्रा को जो मदद दी जाती थी वह भी रोक दी गई। यह यात्रा धीरे-धीरे एक स्थानीय यात्रा बना दी गई। बौद्धों का सहयोग तो हमारे साथ था परंतु केंद्र और राज्य सरकार पूरी तरह से विद्वेष में जा चुकी थी। इसलिए यह तय किया गया कि इस यात्रा को बिना सरकारी खर्चे के पूरा किया जाएगा। पहली यात्रा भी 60 से 70 यात्रियों से शुरु हुई थी और फिर सन 2005 में 60-70 यात्रियों ने अपना खर्च स्वयं वहन करके यह यात्रा की। आज हजारों की संख्या में लोग इसमें शामिल होते हैं।

2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई तब यात्रा में क्या बदलाव हुए?

केंद्र में सरकार का परिवर्तन हुआ, राज्यों में भी परिवर्तन हुआ जिसके बाद यात्रा बढ़ती गई। लेकिन हमने यह निर्णय लिया कि सरकार स्वेच्छा से विचार कर यात्रा हेतु कुछ सहयोग करें तो करे लेकिन हम यात्रा को पूरी तरह से जन केंद्रित, यात्री केंद्रित ही रखेगें। यात्री अपने आने-जाने का, रहने-खाने का, वहां जो उत्सव का आयोजन होगा, उस पर जो खर्चे होंगे, वह यात्री ही करेगा। इसमें हमें एक बहुत बड़ी सफलता भी मिली। इसलिए 2014 तक यह यात्रा बहुत बड़ा स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। लद्दाख में लेह और कारगिल दो जिले हैं, उनमें विदेशी पर्यटन 4 गुना तक बढ़ा गया था जबकि भारतीय पर्यटन 15 से 20 गुना बढा था। लद्दाख को पर्यटन के कारण करोड़ों की आमदनी होने लगी। गांवों के लोगों को भी इससे सहारा मिला। उनके लोकल समान बिकने लगे, उनकी कृषि में बढ़ोतरी होने लगी, पर्यटन के कारण निवास की व्यवस्था करने के लिए होटेल इंडस्ट्री में तेजी से उछाल आया। वहां औषधि और लोकल फल की भी बिक्री बढ़ने लगी। इन सबके साथ साथ केंद्र सरकार का सकारात्मक रुख होने की वजह से अनेक प्रदेश सरकारों ने इन यात्रियों के लिए सुविधाएं घोषित करना शुरु किया। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र सरकार की तरफ से यात्रियों को 10 से 15 हजार की मदद की घोषणा कर दी गयी। लद्दाख के प्रशासन, केंद्रीय एजेंसियों और सेना का समर्थन भी इसमें जुड़ने लगा और लद्दाख की जनता में एक नया जोश आ गया। जब यह यात्रा कमजोर होने लगी तब लद्दाख के आर्थिक विकास पर चोट पहुंची थी, तब लद्दाख की जनता ने धर्म और भाषा से ऊपर उठकर इस यात्रा में सहभागी होने हेतु निवेदन किया था।

इस वर्ष की यात्रा कोरोना कालखंड में होने जा रही है, इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?

23वीं यात्रा तक तो कोरोना काल नहीं था। 24वीं यात्रा अर्थात 2020 की यात्रा कोरोना से प्रभावित हुई। इस वर्ष भी इसे जून में नहीं कर सके। जब यह दिखने लगा कि कोरोना का असर जुलाई-अगस्त में कम हो जाएगा तब हमने इसे एक छोटी यात्रा के रुप में सवा सौ डेढ़ सौ यात्री के साथ करने का निश्चत किया जिससे यात्रा का सातत्य बना रहे। हालांकि दो साल पहले हम यह तय कर चुके थे कि 25वें सिंधु उत्सव को हम सिंधु कुंभ के रूप में मनाएगें। इसे बड़ा और दो चरण में करेंगे ऐसा संकल्प किया गया था। चारो तरफ से लोग बहुत इच्छुक हैं आने के लिए और धीरे-धीरे वातावरण भी बन रहा है। अब 7 अगस्त से 11 अगस्त के बीच यह सिंधु कुंभ होगा। प्रशासन इसमें अच्छा काम कर रहा है, परंतु कुछ स्थानीय लोगों ने इस यात्रा को बिगाड़ने की भी योजना बनाई थी। लद्दाख की कांग्रेस पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस पार्टी, पीडीपी और कुछ कट्टरपंथी लोगों ने यह अफवाह फैलाई कि इस बार का कुंभ महामारी को ला सकता है। लेकिन लोगों को यह जल्द ही समझ आ गया कि यह विरोध लद्दाख के अहित में होगा, जनता के अहित में होगा, जनता के अंदर पनप रहे विश्वास के अहित में होगा। एलएसी और एलओसी की सीमा पर जो जवान खड़े हैं उनको भी इस संक्रमण काल में यात्रा से जो उत्साह मिलेगा उसमें कमी आयेगी। अत: एलएसी और एलओसी पर खड़े जवान का जज्बा बढे, लद्दाख में कोरोना महामारी की वजह से जो टूरिज्म कम हुआ है वह फिर से गति पकडे, लद्दाख गरीबी और बेरोजगारी की गर्त में न जाए और इसी के साथ-साथ सारा देश इस महामारी के दौर में लद्दाख के हर जन-जन के साथ खड़ा है, यह संदेश जाए इस दृष्टि से हमने तय किया कि बहुत विशाल रुप में न सही सामान्य रुप में ही सही लेकिन सिंधु कुंभ जरुर करेंगे।

इस कुंभ हेतु क्या विशेष इंतजाम किये गये हैं?

इस बार कुछ बातों पर विचार किया गया है। जो रेल मार्ग या सड़क मार्ग से आएंगें वे दिल्ली से चलेंगे। वे दिल्ली से जम्मू आयेंगे, जम्मू से श्रीनगर, श्रीनगर से कारगिल व लेह जायेगें। जबकि दूसरा बैच दिल्ली से सड़क मार्ग से चंडीगढ़, कुल्लू-मनाली से अटल टनल से होते हुए जाएगा। आरोग्य व्यवस्था हेतु जम्मू, श्रीनगर, कारगिल, चंडीगढ़ और लेह में लोगों को भेजना शुरु कर दिया गया है। यहां ऑक्सीजन, बेड, ऑक्सीमीटर और मेडिसिन की पूरी व्यवस्था की गई है। यहां पर ऐलोपेथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेद सभी की व्यवस्था भी की जायेगी। जिससे यात्रियों को यह विश्वास हो कि यहां यात्रा के दौरान उनकी पूरी देखभाल की जा रही है। महामारी को देखते हुए भोजन की व्यवस्था की जा रही है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा। इसके साथ-साथ सबको सूचना जा रही है कि कार्यक्रम के दौरान सभी को सोशल डिस्टेंसिंग सहित सभी कोरोना नियमों का पालन करना है। पानी का अधिक सेवन करें। कार्यक्रम में मास्क और सेनेटाइजर को साथ लाना ना भूले ताकि सभी सावधानियों के साथ कार्यक्रम को सफल बनाया जा सके।

इस कुंभ की क्या-क्या विशेषताएं हैं?

इस बार यह भी तय किया गया है कि यात्रा के दौरान सिंधु का जल हाथ में लेकर सभी यात्री यह संकल्प करेंगे कि कराची और लाहौर के बिना हिन्दुस्तान अधूरा है। पीओके, गिलगिट, बालटिस्तान हमारा था, इसलिए पाकिस्तान उसे खाली करे। वहां पर एक और संकल्प होगा कि कैलाश मानसरोवर चीन का नहीं है, हमारा है। जैसे 1929 में रावी का जल लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने संकल्प किया था पूर्ण स्वराज, अखंड भारत का वैसा ही सिंधु जल लेकर अखंड भारत, सीमाओं की सुरक्षा, खोई गयी जन जमीन वापस आये इसका संकल्प सभी यात्री करेंगे। यह इतिहास की बहुत ही महत्वपूर्ण घटना होगी। इसके साथ ही वहां एक चांदी का 10 ग्राम का सिक्का लांच किया गया। सिक्कों से देश का इतिहास जाना जाता है। सिंधु सभ्यता के सिक्को का अपना इतिहास है। यह चांदी का सिक्का यात्री खरीद सकेंगे। अपने घरों में पूजा के समय यह रख सकेंगे। इस सिक्के की वजह से सिंधु के इतिहास और भारत के इतिहास को जाना जायेगा। इस कुभ कार्यक्रम में हर दिन कुछ प्रवचन, धर्मों में समन्वय चर्चा, कुछ बौद्धिक जगत के कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया है। इस कार्यक्रम से लोगों को आनंद की अनुभूति होगी।

इस यात्रा को राष्ट्रीय जन यात्रा क्यों कहा जा रहा है?

इस यात्रा में जम्मू-कश्मीर व लद्दाख से लेकर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडू तक के लोग शामिल हो रहे हैं। गुजरात से लेकर असम, त्रिपुरा और मनिपुर तक के लोग आ रहे हैं। साधारणत: समाज में जो प्रमुख धर्म माने जाते है, पंथ-उपपंथ, मत माने जाते हैं, लगभग सभी इसमें शामिल होंगे। विदेशों से भी कुछ यात्री इसमें शामिल हो रहे है। इस कुंभ में जातियता, दलों और महज़बों का समन्वित रुप देखने को मिलेगा। यह कुंभ लाखों-करोड़ो में नहीं होगा परंतु इसकी विशेषता यह होगी कि जो भारत विश्व में इस बात के लिए जाना जाता है कि यहां सभी धर्मों, सभी जातियों और सभी भाषाओं का सिर्फ सम्मान ही नहीं है स्वीकार्यता भी है और उनका पालन पोषण भी है, ऐसी पूरी दुनिया के अंदर कोई दूसरी संस्कृति और देश नहीं है, उसका लघु रूप लद्दाख में पांच दिन के कुंभ में देखने को मिलेगा।

इस यात्रा के माध्यम से कौन सा संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है?

इस यात्रा से यह संदेश दिए जएंगे कि धर्मांतरण नहीं धर्मों का सम्मान हो, लव जिहाद के नाम पर बेटियां फंसाना-भगाना नहीं, नारी का सम्मान हो, जातियां रहें लेकिन जातिवाद नहीं हो। हम एक ईश्वर, एक धरती की संतान हैं, इसलिए छुआछूत पूरी तरह से खत्म हो। समन्वय, समरसता, समानता, एकता और एकात्मकता वाला समाज हो। लिंग भेद मुक्त समाज हो। एक संदेश और होगा कि खोया हुआ जन और जमीन हमें वापिस लेना है। साथ ही सिक्का चलाकर फिर से इतिहास में सिंधु नदी का एक प्रमाण भी जोड़ा जाएगा।

सिंधु कुंभ में लद्दाख की संस्कृति के दर्शन कैसे हो सकेगें?

सिंधु के किनारे कुछ कार्यक्रम होंगे, कुछ नगरी क्षेत्रों में और अलग इलाकों में कार्यक्रम होंगे। इनमें जो सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किये जायेंगे उसमें लद्दाख के स्थानीय कार्यक्रमों की भी प्रस्तुति होगी। उसमें विचार, वेशभूषा, गीत संगीत और खानपान भी आयेगा। इसमें प्रदर्शनी भी होगी जिसमें उनके तीर्थों और परंपराओं की झांकियां होगी। सिंधु के किनारे जो हवन अनुष्ठान होंगे उन अनुष्ठानों में बौद्ध धर्म के अनुसार भी अनुष्ठान रहेंगे। इस प्रकार से वहां पर अलग-अलग समय में अलग-अलग रूप में और वहां का परिवेश परिलक्षित होगा। इसी के साथ साथ जो वहां के बिक्री केंद्र भी होंगे। सभी यात्रियों को सूचना दी जा रही है कि आप पश्चिमी देशों की चीजों को खरीद लेते हैं, अगर स्थानीय वस्तुओं को खरीदेंगे तो आपका घर विशेष सुंदरत, खुशबदार होगा। इसलिए वहां की फल-फूल, सब्जियां, वहां के वस्त्र, कलात्मक वस्तुएं और साज-सज्जा की वस्तुएं, इन सभी के विक्री केंद्र बनेगें, जिससे लोग उसे खरीद सकेंगे और उनके बारे में जान सकेंगे।

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