मध्य भारत  भाजपा के लिए मशक्कत का मैदान

मध्य भारत के मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में भाजपा को बहुत अधिक मेहनत करनी होगी। सीटें थाली परोस कर सामने नहीं आने वाली।

इस बार पूरे देश में चुनावी माहौल असमंजस में है। हालांकि चुनावी सर्वेक्षण राजग गठबंधन को 279 सीटें देकर फिर से नरेंद्र मोदी की कुर्सी बरकरार रखने के संकेत दे रहे हैं। लेकिन पूरे हिंदी क्षेत्र में भाजपा की स्थिति मोदी का लोकप्रिय चेहरा सामने होने के बावजूद सुद़ृढ़ नहीं दिख रही है।

मध्यप्रदेश

मध्य-प्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशी चयन से लेकर चुनावी प्रचार में भी आगे दिख रही है। भाजपा बागी उम्मीदवारों से भी परेशान है। लगातार 15 साल सत्ता में रहने के बावजूद शिवराज सिंह सरकार ने अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की, इसलिए ज्यादातर कार्यकर्ता घर में बैठे  हैं। उनका उत्साह नदारद है। भाजपा सरकार में मंत्री रहे कई नेता जो कल तक भाग्यविधाता कहलाते थे, ऐसे पूर्व मंत्री और विधायक मैदान से गोल है। वर्तमान विधायक भी फिलहाल सक्रिय भूमिका में नहीं आए हैं। पार्टी के दिग्गज नेता और संगठन के प्रमुख कमोबेश आत्ममुग्ध हैं। यदि यह तंद्रा नहीं टूटी तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। क्योंकि कांग्रेस में मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया कमर कस कर चुनावी समर में उतर गए हैं। अब तक कांग्रेस की गुना और छिंदवाड़ा भाजपा के लिए अपराजेय सीटें बनी हुई थीं, लेकिन अब भोपाल सीट पर दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी यह जता रही है कि भविष्य में भाजपा के लिए कांग्रेस से यह सीट जीतना भी मुश्किल हो जाएगी।

प्रदेश में कुल 29 लोकसभा सीटें हैं। कांग्रेस ने सभी सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। लेकिन भाजपा इंदौर में प्रत्याशी नहीं दे पाई है। इस बार कमलनाथ, दिग्विजय और सिंधिया में बाहरी स्तर पर ठीक समन्वय दिख रहा है। कमलनाथ का संगठन में वर्चस्व बढ़ा है। वे अपनी दम पर 13 प्रत्याशियों को टिकट दिलाने में सफल रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले तक माना जाता था कि उनका प्रभाव छिंदवाड़ा, जबलपुर, शहडोल एवं मंडला तक ही सीमित है। किंतु अब वे लोकसभा चुनाव के टिकट वितरण में सब पर भारी पड़े हैं। हालांकि उन्होंने ग्वालियर-चंबल संभाग और मालवा-निमाड़ में ज्यादा दखल नहीं दिया।

अपनी विलक्षण कार्यशैली और समूचे प्रदेश में व्यापक व आत्मीय संबंधों के चलते टिकट वितरण में दिग्विजय सिंह का पलड़ा भारी रहा है। कमलनाथ के बाद सबसे ज्यादा उम्मीदवार दिग्गी राजा के ही हैं। दिग्विजय की संगठन में पकड़ का पता इस बात से चलता है कि उन्होंने न केवल अपने गृह जिले राजगढ़, बल्कि सिंधिया के गढ़ ग्वालियर-चंबल, बुंदेलखंड और मालवा में भी अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को टिकट दिलाए। ग्वालियर से सिंधिया अशोक सिंह को किसी भी सूरत में उम्मीदवार के रूप में नहीं देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें टिकट आखिरकार दिग्गी की अनुकंपा से मिल ही गया। इसी तरह भिंड से देवाशीष जरारिया, टीकमगढ़ से किरण अहिरवार और इंदौर से पंकज संघवी को टिकट दिलाने में कामयाब रहे। सिंधिया ने हस्तक्षेप तो कई लोकसभा सीटों पर किया, लेकिन उन्हें कामयाबी सिर्फ मुरैना से अपने शार्गिद रामनिवास रावत को टिकट दिलाने में ही मिली। ग्वालियर से अपनी पत्नी प्रियदर्शनी राजे सिंधिया को भी वे टिकट चाहते थे, किंतु सफलता नहीं मिली। सिंधिया मालवा में धार लोकसभा सीट से दिनेश गिरवाल को भी टिकट दिलाने में सफल रहे हैं। वहीं खजुराहो से कविता सिंह को टिकट दिलाने में भी उनकी भूमिका रही है।

भाजपा चुनाव तैयारियों को लेकर ‘एक बूथ, दस यूथ, मेरा बूथ सबसे मजबूत‘ का नारा दे रही थी। लेकिन यह नारा हवा-हवाई साबित हुआ। स्वयं पार्टी के नेता कह रहे हैं कि कांग्रेस को कमजोर आंक कर भाजपा अति आशावाद का शिकार हो गई है। नेताओं ने मान लिया है कि मोदी का चेहरा, अमित शाह का नेतृत्व और संघ की संघटनात्मक पकड़ जीत के लिए पर्याप्त हैं। बालाकोट पर की गई एयर स्ट्राइक ने भी नेताओं को भ्रमित कर इस मोहपाश में बांध दिया है कि अब तो जीत हमें परसी हुई थाली के रूप में मिल रही है। पार्टी ने हरेक सीट पर जातीय समीकरण के आधार पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की है। इससे लाभ कितना होगा यह तो 23 मई को ही पता चलेगा, लेकिन इस जातीय मूढ़ता ने कार्यकर्ता को नाराज भी किया है। यह नाराजी छिंदवाड़ा, राजगढ़, खजुराहो, सागर और गुना में स्पष्ट दिखाई दे रही है।

छत्तीसगढ़

मध्य-प्रदेश से विभाजित होकर नए राज्य के रूप में 19 साल पहले अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में 11 लोकसभा की सीटें हैं। यहां 32 प्रतिशत आदिवासी आबादी और 13 प्रतिशत अनुसूचित आबादी है। राज्य में 47 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग तथा 8 प्रतिशत अन्य जातियां हैं। इसलिए यहां टिकट वितरण को जाति का आधार बनाते हुए दोनों ही प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा ने उम्मीदवार उतारे हैं। बसपा ने भी जाति के आधार पर ही प्रत्याशियों का चयन किया है। इसके बावजूद यह कहना मुश्किल है कि चुनाव का एकमात्र आधार जाति ही रहेगा। यहां आदिवासी मतदाताओं की संख्या अधिक होने के कारण जाति व्यवस्था उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी नहीं है। इसलिए यहां केवल जाति जीत की शर्त नहीं होती है। हालांकि बहुजन समाज पार्टी जाती आधारित दल के रूप में विकसित होने की कोशिश में है। किंतु फिलहाल राज्य की राजनीति भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जरूर छत्तीसगढ़ का चुनावी दौरा करके जातीय मुद्दे का पत्ता फेंका है। मोदी ने अपने भाषण में कहा कि ‘सारे नामदार गालियां दे रहे हैं, मोदी को चोर कह रहे हैं। यहां का साहू समाज गुजरात में होता तो उन्हें मोदी कहते, राजस्थान में होता तो राठौर कहते, अब सोचीय कि छत्तीसगढ़ में रहने वाला साहू समाज क्या चोर है।‘

मोदी की सभा समाप्त होने के बाद पूरे राज्य में साहू समाज के बीच यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। इस राज्य में 14 फीसदी साहू समाज है, जो पिछड़े वर्ग में आता है। मोदी ने जाति का यह कार्ड राजनीतिक चतुराई के चलते खेला है। यदि कार्ड चल गया तो भाजपा को विधान सभा चुनाव जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा।

ओड़िशा

ओड़िशा में कुल 21 सीटेें हैं। 2014 के चुनाव में भाजपा को एक सीट पर सीट मिल गई थी। भाजपा को मिले वोट का प्रतिशत 21.50 रहा था। कांग्रेस को यहां एक भी लोकसभा सीट पर जीत नहीं मिली थी। इसके बाद 2017 में हुए जिला पंचायत व स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा ने बड़ी सफलता हासिल कर 31 प्रतिशत वोट प्राप्त करके बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक को कड़ी चुनौती पेश कर दी। भाजपा ने इस प्रदर्शन से कांग्रेस को तीसरे पायदान पर धकेल दिया। गोया, अब मुख्य मुकाबला बीजद और भाजपा के बीच ही सिमट गया है। अमित शाह के कुशल नेतृत्व के चलते यहां बीजद और कांग्रेस दोनों ही संकट में है। इन दलों के अनेक पूर्व मंत्री, विधायक और नेताओं ने भाजपा में शामिल होकर कांग्रेस और वीजद की बुनियाद ही हिला दी है। बीजद के राज्यसभा सांसद के बेटे ॠषभ नंदा भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। ओडिशा के पूर्व डीजीपी प्रकाश मिश्रा व पूर्व आईएएस अधिकारी अपराजिता सारंगी ने भाजपा में शामिल होकर भाजपा की पूरे राज्य में ताकत बढ़ा दी है। समुद्र तटीय इलाकों में तो भाजपा बहुत मजबूत दिख रही हैं। इससे लगता है कि नवीन पटनायक को अपनी स्थिति बहाल रखना मुश्किल होगी।

 

 

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