दिप चूर्ण

‘रास्ते भर ज्योति के सुद़ृढ़, विश्वासपूर्ण वाक्य कानों में टकराते रहे- ‘मैं नारी को छले जाते रहने की परिपाटी को तोड़, इन्हें सबक सिखाकर ही रहूंगी, भाई साहब! ताकि इन्हें पता चले, झूठ बोलने का नतीजा क्या होता है। लेकिन कहानी यहां थोड़े खत्म होती है….”

“सा‘ब, आपसे कोई मिलने आए हैं।” दरवाजे पर पड़ी चिक में से मुंह अंदर घुसा चपरासी ने कहा तो मैंने बिना उस तरफ ध्यान दिए ही कह दिया- “अंदर भेज दो।” और थोड़ी देर बाद जिस व्यक्ति को अपने सामने देखा तो ऊपर से नीचे तक देखता ही रह गया। फिर यादों का जो बवंडर उठा तो विगत मेें खींच ले गया मुझे।

दफ्तर से लौटने पर पत्नी ने मेरे हाथ में एक पत्र थमाते हुए मुझे गांव जाकर ज्योति और प्रभाष को समझाने का प्रयास करने के लिए कहा था। पत्र को पढ़ते ही मैं भी बौखला उठा था और दफ्तर से अवकाश ले दूसरे ही दिन गांव पहुंच गया था। रास्ते भर राजेन्द्र के पत्र की सतीरें आंखों के आगे घूमती रही थीं : ‘अवकाश लेकर तुरंत आ जाओ, मित्र। मैं समझता हूं जितना मुझे चाहते हो तुम, उतना ही प्रभाष को भी और प्रभाष के जीवन को विखंडित होने से तुम ही बचा पाओगे।’ बचपन के संगी-साथी और मित्रों के मिलन के लोभ को संवरण कर पाना सम्भव नहीं होता अकसर। फिर राजेन्द्र और प्रभाष तो मेरे अभिन्न रहे हैं।

राजेन्द्र, प्रभाष और मैंने एक ही स्कूल में शिक्षा पाई थी। हम तीनों की घनिष्ठता तब और बढ़ गई थी जब तीनों ही पांचवीं, आठवीं और फिर दसवीं की बोर्ड की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी में पास होते जा रहे थे। जब से होश सम्भाला और स्कूल में पढ़ने जाना शुरू किया, संयोग से हम तीनों एक ही जगह बैठकर पढ़े और रहे भी साथ-ही-साथ।

इससे आगे की पढ़ाई के लिए घर-गांव से बाहर जाना पड़ा तीनों को, पर बाहर का वातावरण प्रभाष के प्रतिकूल रहा। फलत: उस वर्ष हम दोनों से पीछे ही नहीं रहा बल्कि परीक्षा भी उत्तीर्ण न कर पाया प्रभाष। धनी पिता का इकलौता पुत्र, फिर होस्टल का स्वच्छन्द वातावरण। धीरे-धीरे प्रभाष पढ़ाई में पिछड़ता गया और एक दिन मैं इंजीनियरिंग कर नौकरी पर चला आया तो राजेन्द्र गांव के पास ही एक फैक्टरी में प्रबंधक के पद पर नियुक्त हो गया।

अब मित्रों की कुशल-क्षेम जानने का माध्यम केवल पत्र रह गए थे। वे भी केवल राजेन्द्र द्वारा लिखे हुए पत्र। प्रभाष पत्र लिखने में हमेशा आलसी जीव रहा।

समय बीतता रहा। राजेन्द्र और मैं दोनों ही अपनी-अपनी गृहस्थी में रम गए थे। किन्तु प्रभाष अभी तक कुंआरा है। राजेन्द्र के पत्र सूचना देते रहते।  शादी वाले तो बहुत आ रहे हैं भैया पर… दहेज के नाम पर प्रभाष के पिताजी की जो मांगें हैं उन्हें पूरी करने वाला लड़के का पद, व्यवसाय भी तो देखेगा कुछ, कि नहीं।

वह दिन भी आ पहुंचा था। प्रभाष ने अपनी शादी का सुंदर-सा कार्ड, सुनहरे धागे में लपेटकर भेजा था मुझे। शादी में हुए खर्च और मिले दान-दहेज को देखकर मैं दंग रह गया था। इतना तो एक प्रथम श्रेणी अधिकारी को भी….। प्रभाष के भाग्य पर सुखद आश्चर्य से भर उठा मैं और तरस आया फूल-सी सुकुमारी प्रभाष की सुंदर पत्नी पर। क्या लड़की वालों ने प्रभाष के पिता के ये आलीशान भवन और धन-दौलत देखकर ही…।

शादी से पूर्व ही उसके पिता ने ऊपर की मंजिल पर मार्बल का एक विशेष कमरा बनवा दिया था जिसमें सभी सुख-सुविधाएं ऊपर ही जुटाई गई थीं। प्रथम रात्रि को, केवल उस कमरे में ही नहीं बल्कि नीचे से ऊपर, कमरे तक जाने के रास्ते में जीने की सीढ़ियों को भी गुलाब के ताजे फूलों से ढक दिया था प्रभाष ने। और ज्योति, उसकी पत्नी उन सुगंधित, सुंदर, ताजा गुलाब के फूलों पर पैर रखते हुए ऊपर कमरे में जाते समय कितनी इतराई होगी अपने भाग्य पर।

समय-समय पर प्राप्त राजेन्द्र के पत्रों में अब प्रभाष के दाम्पत्य-जीवन से सम्बंधी समाचार अधिक रहने लगे। कुछ पत्रों में प्रभाष और उसकी पत्नी के मध्य होने वाली तकरार की सूचना मिली। यों मैंने कोई नोटिस नहीं लिया। भला छोटी-मोटी तकरार किस पति-पत्नी के मध्य नहीं होती। एकरसता में भी कोई आनंद है क्या?

पर राजेन्द्र के उस पत्र ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया और रास्ते भर स्थिति का अनुमान लगाते हुए मैं बस-अड्डे पर उतर गया। जब से स्कूल के उद्दंड लड़कों ने कंडक्टरों के साथ मारपीट की है, बसें गांव से एक किलोमीटर पहले इस बस-अड्डे से ही वापस लौट जाती हैं। अत: एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद जब गांव पहुंचा तो संध्या हो चुकी थी। क्यों न राजेन्द्र और प्रभाष से मिलता ही चलूं! सोचकर राजेन्द्र के घर की ओर मुड़ गया। मुझे देखते ही उसकी बांछें खिल उठीं- “अरे, तुम कब आ गए, समीर?”

“अभी-अभी तो चला आ रहा हूं।”

“अच्छा।” “और क्या, तेरे पत्र को पाने के बाद भी रुका जा सकता था क्या?”

पत्र की बात सुन वह गम्भीर हो उठा और मेरे बैठ जाने के बाद खुद भी कुर्सी खींच, मेरे नजदीक आ गया।

“यार, ये प्रभाष की पत्नी ने तो कमाल कर दिया। सास-ससुर और पति को खूब खरी-खोटी सुना, अपने मायके चली गई अकेली ही।”

“क्या कह रहा है तू!” मैं आश्चर्यचकित रह गया।

“इसमें आश्चर्य की क्या बात है भला।” राजेन्द्र जैसे भोग्य स्थितियों से संतृप्त हो चला था। पहेली बुझाने के अंदाज में उसने बात जारी रखी, “और सुना समीर, मैंने तुम्हें पत्र लिखने में थोड़ी.. मेरा विचार है तुम भी कुछ नहीं कर पाओगे इसमें।”

“क्या मतलब?”

“मतलब ये कि प्रभाष के पिता ने जो किया वह मेरे और तुम्हारे सिद्धांतों के भी विरूद्ध है। उन्होंने लड़की वालों से धोखा किया है। एक खूबसूरत धोखा। और मेरे विचार से आज नारी न तो मैथिलीशरण गुप्त जी की ‘आंचल में दूध और आंखों में पानी’ वाली नारी रही है, न ही जयशंकर प्रसाद जी की केवल श्रद्धा और न सीधी-सादी गाय ही, जिसे अपनी मर्जी अनुसार चाहे जिस खूंटे से बांध दो। वह एक जीती-जागती सचेत प्राणी है जो अपना बुरा-भला सोचने में स्वयं समर्थ है।

उसके इस पहेलीनुमा भाषण पर मुझे खीज हो आई। और आश्चर्य भी। अत: उसकी कुर्सी के हत्थे पर अपनी कोहनी टिकाते हुए मैंने अनुनय की-  “भैया मेरे, कुछ साफ-साफ भी बताएगा या वैसे ही मुझे झक मारने को बुलाया था!” “प्रभाष के पिताजी ने लड़की वालों को क्लास वन ऑफीसर बताया था; जबकि वह अभी…. ” कहकर पटाक्षेप कर दिया राजेन्द्र ने। मेरे दिमाग में तुरंत ही पीछे की सारी घटनाएं घूम गयीं और विवाह में मिले इतने अधिक दान-दहेज का राज भी मेरी समझ में आ गया। दूसरे दिन ज्योति भाभी जी को समझाने का असफल प्रयास कर वापस लौट आया था मैं।

रास्ते भर ज्योति के सुद़ृढ़, विश्वासपूर्ण वाक्य कानों में टकराते रहे। ‘मैं नारी को छले जाते रहने की परिपाटी को तोड़, इन्हें सबक सिखाकर ही रहूंगी, भाई साहब! ताकि इन्हें पता चले, झूठ बोलने का नतीजा क्या होता है। माना कि इनके पिताजी पर धन की कोई कमी नहीं, अच्छा मकान है। पर अपने आप क्या चीज है मिस्टर प्रभाष? परजीवी पौधों की तरह दूसरों के सामने हाथ फैलाने वाले निरीह प्राणी ही है। मुझे ऐसा निरीह प्राणी नहीं चाहिए जो मेरी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपने पिता पर निर्भर हो।’

मन-ही-मन ज्योति के तर्कों की प्रशंसा किए बिना न रह पाया मैं। पर एक मित्र की गृहस्थी को इस तरह उजड़ते देख मन अशांत हो उठा।

दिनभर की भाग-दौड़, बसों के इंतजार और धक्के-मुक्कों से पस्त हो जब शाम को घर पहुंचा तो पत्नी के पहले ही प्रश्न- ‘क्या रहा?’ ने मस्तिष्क के तनाव को और बढ़ा दिया। पर, इस बेचारी का क्या दोष? सोचकर चुप रह गया मैं। पत्नी समझ गयी और अपनी भूल पर पर्दा डालने के लिए थोड़ा मुस्कुराते हुए रसोई में घुस गई। और जब रसोई से निकली तो पतीली में नमक डालकर गुनगुना किया पानी उसके हाथों में था। पानी को बाल्टी में पलट, तौलिया और साबुन उचित स्थान पर रख उसने अलमारी से निकालकर तह किया हुआ कुर्ता-पाजामा भी रख दिया।

कपड़े बदलकर, पत्नी के हाथ से कॉफी का प्याला ले मैं बाहर लॉन में बने झूले पर आकर बैठ गया। “बात बन नहीं पायी कुछ।” मेरा संक्षिप्त नकारात्मक उत्तर सुन वह चौंकी और दूसरे ही क्षण उसका चेहरा बुझ-सा गया। “क्या सोचने लगा, समीर? क्या मुझसे मिलकर प्रसन्नता नहीं हुई?” मेरे चेहरे पर अपनी नजरें जमाए हुए प्रभाष ने कहा तो मैं हकला गया।

“नहीं … न…हीं… ये बात नहीं, प्रभाष। मैं … मैं कुछ …. भाभी कहां है?”  “तेरे बंगले पर छोड़ आया हूं।” मुस्कुराते हुए प्रभाष ने तिरछी नजर से देखा, “अरे, घुमा-फिराकर क्यों जानना चाहता है! आश्चर्य हो रहा है न मुझे इस रूप (डे्रस) में देखकर? मैं बताता हूे। तुम्हारे चले जाने के बाद ज्योति ने मुझे बहुत लताड़ा और कहा कि अगर मुझे दुबारा पाना चाहते हो तो वही बनकर दिखाओ जो तुम्हारे पिताजी ने बताया था। इसके लिए मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा, लेकिन मनुष्य अगर ठान ले तो कोई कार्य मुश्किल नहीं। फिर ज्योति की प्रेरणा थी मेरे साथ तो। हर मनुष्य की उन्नति के पीछे किसी न किसी स्त्री का हाथ होता है न! क्येां? और उसी हाथ ने ये अशोक स्तम्भ लगवाया है तुम्हारे मित्र के।”

सुनिए, ये कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती। आज हमारे बीच अनेक ऐसे उदाहरण हैं जिनमें विवाह से पूर्व लड़के के पद और व्यवसाय को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया या फिर लड़की की शिक्षा और गुणों को अतिशयोक्ति रूप में पेश किया गया और बाद में इसी कारण उनका दाम्पत्य-जीवन नारकीय हो गया।

ज्योति और प्रभाष तो अपने बुद्धि-कौशल से पार पा गए; पर इनमें से कितने ज्योति और प्रभाष बन पाएंगे। और अगर नहीं बन पाए तो क्या उनके नारकीय जीवन को देख, आप प्रसन्नता का अनुभव कर पाएंगे?

 

 

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