विरासत के आधार पर स्वतंत्र भारत का विकास

भारत अपनी स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। स्वतंत्रता दिवस भारत की यात्रा का वह पडाव है जहां से फिर एक बार भारतीयों को अपनी किस्मत खुद लिखने का मौका मिला था। फिर अपने राष्ट्र को अपने तरीके से चलाने और विकसित करने का मौका मिला था। आज जब हम पीछे मुडकर देखते हैं तो हमें यह ज्ञात होता है कि हमें जो मौका मिला था उसका सदुपयोग हम पूरी तरह से नहीं कर सके।

इस 75वें वर्ष में यह आंकलन करना आवश्यक लगता कि विकास का सही अर्थ क्या है। सही मायनों में विकास के मापदंड क्या होने चाहिए। विकास के उस शिखर तक पहुंचने का सही मार्ग कौन सा हो। विकास करते समय हमारा पर्यावरण, हमारा सामाजिक ताना-बाना, हमारे नैतिक मूल्य, हमारी परंपराएं किसी भी तरह से बाधित न हों। इन सभी मुद्दों पर गौर करें तो एक बात ध्यान में आती है कि हमने लगभग इन सभी बातों से समझौता कर लिया है या इन बातों को दरकिनार कर हम केवल नकल करने में लगे हैं।

हम जानते हैं कि पूरे विश्व की विकास की संकल्पना भौतिकता और स्वार्थ आधारित रही है। इसलिए वे यही सोचते हैं कि स्वयं को आगे बढ़ाने के लिए दूसरों को पीछे धकेलना या उन्हें गिराना आवश्यक होता है। इसी स्वार्थपूर्ति के लिए एक देश ने दूसरे देश पर आक्रमण किए, उन्हें अपना गुलाम बनाया और अपना साम्राज्य बढ़ाया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां जितने भी आक्रमणकारी आए उन्होंने भारत को हर सम्भव तरीके से लूटने की कोशिश की लेकिन वे लोग भारत की जडों को खोखला नहीं कर सके। केवल अंगे्रज ही ऐसे थे, जिन्होंने हमारी सांस्कृतिक जडों को खोखला करने का काम किया था, क्योंकि वे जानते थे कि वृक्ष को कमजोर करने के लिए उसकी जड को खोखला करना चाहिए। उनके द्वारा हमारे मस्तिष्क में भरी गई तथाकथित विकास की संकल्पना की पैठ इतनी गहरी है कि पीढियां गुजर जाने के बाद भी हम उससे उबर नहीं पाए हैं।

आज भी सामान्य जनमानस धनी होने, सुविधासम्पन्न होने, अस्त्र-शस्त्रों से लैस राष्ट्र को ही विकासित राष्ट्र मानता है। परंतु जो विकसित राष्ट्र हैं क्या वे सुखी हैं? क्या वहां का हर नागरिक खुश है? यह प्रश्न अगर वहां के नागरिकों से किया जाएगा तो अधिकांश लोगों का उत्तर नकारात्मक होगा। जबकि हमारे पडोसी देश भूटान के लोग सारी भौतिक सुख सुविधाओं के अभाव में भी अधिक खुश और सुखी दिखाई देते हैं। अत: राष्ट्र के रूप में एक बार पुन: यह विचार किया जाना आवश्यक है कि भौतिकतावादी अंधी दौड में दौडते हुए विकास करना है या भारत की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत जिसमें सबके सुख की कामना करते हुए सबके एक साथ विकास की कल्पना की गई है, उस विरासत के आधार पर विकास करना है।

पिछले 75 वर्षों में हमने पहली तरह से विकास करने की कोशिश की परंतु उस कोशिश में हम विकास भी नहीं कर पाए और अपनी जडों से भी उखड गए। यह बात धीरे-धीरे लोगों की समझ में आ रही है। मैकाले की शिक्षा पद्धति से शिक्षा प्राप्त करना हो, आदर्श ग्रामीण/स्वदेशी अर्थव्यवस्था को छोडकर विदेशी मॉडल को अपनाना हो या अपनी संस्कारित वैज्ञानिक समाज व्यवस्था को भुलाना हो, हमने विगत 75 वर्षों में यह सब करके देख लिया है और उसका परिणाम भी देख लिया।

जर्मनी, जापान यहां तक कि इजराइल जैसा छोटा सा देश आज अगर प्रगति कर रहा है तो इसलिए कि उन्होंने अपनी भाषा में अपनी सभ्यता और संस्कृति के आधार पर अपने विकास की राह का निर्माण किया है। भारत को भी अब अपने वैभवपूर्ण इतिहास,  संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने के आधार पर विकास की नई राह बनानी होगी। इस राह में शिक्षा स्वभाषा में हो, उद्योग स्वदेशी हों, शहरों के साथ-साथ ग्राम विकास की संकल्पना भी हो। लोगों में अपने राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान हो। ऐसा भारत जिसमें अपने समाज के अनुकूल व्यवस्था निर्माण होगी, अपने समाज की आवश्यकता को पहचानकर उत्पादों का निर्माण किया जाएगा, मौसम और ॠतुओं के आधार पर खाद्यान्न तथा फसलों का उत्पादन किया जाएगा, लोग अपने अधिकारों के साथ-साथ स्वकर्तव्यों को ध्यान में रखकर कार्य करेंगे तथा सबसे प्रमुख बात यहां केवल अपने विकास की नहीं सभी के विकास की कल्पना होगी।

यह कोई दिवास्वप्न नहीं है। अगर 2014 में गार्डिनर यह लिख सकता है कि भारत से अब अंग्रेजी शासन पूर्ण रूप से खत्म हो चुका है, इसका अर्थ यह है कि बाहर के लोग यह समझ चुके हैं कि अब भारतीय लोग दासत्व की मानसिकता से बाहर आ गए हैं, अब बस हमें यही सिद्ध करना है। विकास की ओर मार्गक्रमण करते हुए हमें यह सावधानी भी रखनी होगी कि हमारी जिन कमजोरियों के कारण लोग हम पर शासन कर पाए वे कमजोरियां हममें दुबारा न पनपें। आज भी भारतीय समाज को विभाजित करने के प्रयास निरंतर होते रहते हैं। कभी जाति के आधार पर कभी आर्थिक परिस्थिति के आधार पर तो कभी विचारों के आधार पर। इन प्रयासों को विफल करने के लिए प्रत्येक भारतीय को सचेत रहना होगा। तभी हम विचारों की लडाई जीत सकेंगे और विभाजन के प्रयत्नों को विफल कर सकेंगे।

स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में अगर हर भारतीय यह निश्चय कर ले कि वह अपनी हर कृति के केंद्र में अपने राष्ट्र को रखेगा, उस कृति का परिणाम अगर राष्ट्रहित में नहीं है तो वह कृति नहीं करेगा तो भारत को विकसित और सुखी राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।

 

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