जयंती विशेष: लक्ष्मणराव इनामदार से नरेंद्र मोदी को क्यों है इतना लगाव?

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संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक उन्हें 'वकील साहब' के नाम से जानता था जबकि संघ के बाहर के लोग उन्हें लक्ष्मणराव इनामदार के नाम से जानते थे। वह बहुत ही सरल जीवन व्यतीत करते थे और पूरा जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया था, वैसे तो उन्होंने बहुत सारे स्वयंसेवकों…

संघ शिक्षा वर्ग 2021: स्वयंसेवकों व नये नियमों के तहत शुरु होगा संघ शिक्षा वर्ग

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Thiruvananthapuram: RSS activists taking out Path Sanchalan, a route march in the new uniform on the occasion of Vijay Dashami in Thiruvananthapuram on Sunday. PTI Photo (PTI10_9_2016_000230B)
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आचार्य चाणक्य ने कहा था कि, 'जिस देश में शांति के समय में जितना अधिक पसीना बहेगा युद्ध के समय उतना ही कम खून बहेगा' यह लाइन का अर्थ है कि मुसीबत आने से पहले उसके खिलाफ की तैयारी करके रखना चाहिए। परेशानी किसी भी रूप में हो सकती है लेकिन…

भारत में हिन्दू-मुस्लिम के पूर्वज एक – मोहन भागवत

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सरसंघचालक मोहन जी भागवत ने एक बार फिर हिन्दू व मुसलमानों को लेकर बयान दिया और कहा कि हिन्दू और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे और देश का हर नागरिक हिन्दू है। सरसंघचालक के इस बयान के बाद से राजनीति में उबाल आना तो आम बात है क्योंकि कुछ…

राष्ट्र निर्माण में वित्तीय संस्थानों की भूमिका

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निज़ी बैंक का मुख्य उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना है, जबकि सरकारी बैंकों का उद्देश्य सामाजिक सरोकारों को पूरा करते हुए मुनाफ़ा कमाना है। इसी वजह से देश में समावेशी विकास की संकल्पना को साकार किया जा रहा है। हालांकि, बीते 73 सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था काफ़ी मज़बूत हुई है।

बहन बेटियों की रक्षा का कवच बनना होगा

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आज फिर से जरूरत है उसी देश भक्ति और देश प्रेम की जिसमें आक्रोश था! गुस्सा था! गुलामी की जंजीरों को उखाड़ फेंकने का जज्बा था l हालांकि विद्रोह की आग तो 1857 से भड़कनी शुरू हो गई थी, और तमाम क्रांतिकारियों  ने आजादी के इस यज्ञ में अपने जीवन…

हार न मानने वाले भारतीय वैज्ञानिक

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अंग्रेजों के मन में भारतीय वैज्ञानिकों के प्रति उपेक्षा का भाव इतना अधिक गहरा था कि भारत की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत और आजादी के संघर्ष काल में जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय और सी.वी. रामन जैसे प्रतिभाशाली विज्ञानियों के वैज्ञानिक शोध व चिंतन को नकारने की उन्होंने पूरी कोशिश की। लेकिन प्रतिभा का दमन भला कब तक किया जा सकता है। ब्रिटिश शासन की उपेक्षा और तिरस्कार ने हमारे वैज्ञानिकों को और ज्यादा कठोर विज्ञान साधना करने को प्रेरित किया और फिर आगे चलकर उनके ज्ञान का लोहा पूरी दुनिया ने माना।

संकल्पशक्ति से होगा अखंड भारत का निर्माण

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जो राष्ट्र अपनी सीमाओं का विस्तार नहीं करता वह धीरे-धीरे सिमटता चला जाता है और अपने पतन को प्राप्त होता है. भारत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ इसलिए आज हम सिमट कर रह गए है. ऐसे समय में अखंड भारत की संकल्पना ही वह एकमात्र उर्जा शक्ति है…

स्वतंत्रता के 75 साल बाद भी भारतीयकरण शेष है

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आजादी के 7 दशकों के बाद भी देश के तंत्र का भारतीयकरण करना शेष है। स्वदेशी, स्वभाषा और स्वाभिमान किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के मुख्य स्तंभ होते हैं। जब तक इनके आधार पर हम अपना शासन तंत्र नहीं बदलते तब तक तो राज्य को सुराज्य में बदलना संभव नहीं होगा। जब तक भारत स्वदेश, स्वभाषा और स्वाभिमान के साथ उठकर विश्व के सामने खड़ा नहीं हो जाता, तब तक स्वतंत्रता प्राप्ति का अर्थ और लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

हम सब एक ही है ! – डॉ. मोहन जी भागवत

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डॉ. मोहन जी ने कहा, हिंदू- मुस्लिम एक हैं इसका कारण हमारी मातृभूमि एक है। पूजा- पद्धति अलग होने के कारण हमें अलग नहीं किया जा सकता। सभी भारतीयों का डीएनए एक है। भाषा, प्रदेश और अन्य विषमताओं को छोड़कर सभी भारतीयों को एक होकर भारत को विश्व गुरु बनाने का समय आ गया है। भारत विश्व गुरु बनने के बाद विश्व सुरक्षित होगा।

राष्ट्रनिर्माण का उत्तरदायित्व

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स्वतंत्रता का 75 वां वर्ष किसी देश के लिए महोत्सव का अवसर होने के साथ आत्मनिरीक्षण का भी समय होता है। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि दासता से मुक्ति संघर्ष हमें सही दिशा में काम करने के लिए अभिप्रेरित करेगा। भारत राष्ट्र के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह ध्यान…

भारत के राष्ट्रत्व का अनंत प्रवाह

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भारतीय दर्शन, भारत की राष्ट्र की अवधारणा अपने आप में समृद्ध और सम्पूर्ण है। इस प्रकार यह पुस्तक किसी भी राष्ट्र का भारतीय दर्शन समझाने वाले चिन्तक या जिज्ञासु के पुस्तकालय के लिए अत्यावश्यक है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि यह पुस्तक सभी विभूषित विद्वानों और तथाकथित विद्वानों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भेंट की जानी चाहिए, ताकि उनकी आंखों और मस्तिष्क में जमी धूल कुछ तो साफ़ हो।

समान नागरिक संहिता की अनिवार्यता

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भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि ‘समान नागरिक संहिता’ का मसौदा सर्वोत्तम परंपराओं पर आधारित है और आधुनिक समय के साथ उनका सामंजस्य स्थापित करता है। यहां लैंगिक समानता तब तक नहीं हो सकती, जब तक भारत समान नागरिक संहिता नहीं अपनाता, जो सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करता है। बिल्कुल ऐसी ही बात न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने हाल में मीणा याचिका की सुनवाई करते हुए कही है। उन्होंने कहा कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि के कानून सबके लिए समान होने चाहिए।

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