मुख्यमंत्री बदलना भाजपा की चुनावी रणनीति 

गुजरात भाजपा के राजनीतिक इतिहास की जांच करने पर यह स्पष्ट है कि चुनाव से डेढ़ साल पहले से ही भाजपा के नेता चुनावी रणनीति बनाने में लगे हैं और हर हाल में अगले साल आने वाले चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश कर रहे हैं। संक्षेप में व्यवहार्यता महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं।

उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह, तीर्थराज सिंह बाद में पुष्कर धामी, असम में सर्वानंद सोनोवाल के स्थान पर हेमंत बिस्वा शर्मा, कर्नाटक में येदियुरप्पा के स्थान पर बसवराज बोम्मई और गुजरात में रूपाणी के जाने के बाद उनके स्थान पर भूपेन्द्र पटेल ऐसे भाजपा ने पिछले एक साल में पांच मुख्यमंत्री बदले हैं। अभी और राज्यों में मुख्यमंत्री बदल जाते हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

जब मुख्यमंत्री विजय रूपाणी 11 सितम्बर की सुबह अहमदाबाद के सरदार धाम में सरदार भवन फेज-2 के उद्घाटन के लिए गए तो उन्होंने शायद कल्पना भी नहीं की होगी कि मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल का आज आखिरी दिन होगा। संयोग से उस वक्त सीएम रूपाणी के अलावा केंद्रीय कैबिनेट मंत्री मनसुखभाई मांडविया और पुरुषोत्तम भाई रुपाला, नितिनभाई पटेल, गोरधनभाई जडफिया, सी.आर. पाटिल और अन्य गणमान्य व्यक्ति इस कार्यक्रम में मौजूद थे। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद तुरन्त सीएम रुपाणी को आलाकमान का बुलावा आया। केंद्रीय संगठन मंत्री और गुजरात के प्रभारी की उपस्थिति में पार्टी मुख्यालय में एक तत्काल आपातकालीन बैठक आयोजित की गई। बैठक में नेतृत्व बदलने के निर्णय की घोषणा की गई और राज्यपाल के साथ बैठक के बाद रुपाणी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

घटनाओं का उपरोक्त क्रम नाटकीय लगता है लेकिन स्क्रिप्ट पहले से ही हाईकमान द्वारा तैयार की गई थी। विजय भाई को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र का मसौदा तैयार करने की पहल भी नहीं करनी पड़ी क्योंकि बयान भी तैयार किया गया था। पार्टी के एक अनुशासित कार्यकर्ता के रूप में सम्मान के साथ रूपाणी ने सीएम के पद से शालीनता से इस्तीफा दे दिया। विजय भाई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते समय कोई पछतावा नहीं दिखाया क्योंकि उन्हें शायद इस भाग्य के बारे में पता था। उन्हें आशंका थी कि फैसला देर-सबेर आएगा लेकिन साथ ही पार्टी ने उन्हे पांच साल का कार्यकाल दिया उसका संतोष भी था। राजनीति हमेशा अनिश्चितता से भरी होती है।

सीएम बनते ही लगी लॉटरी

आज से छह साल पहले विजय भाई को इस बात का अंदाजा नहीं था कि वे गुजरात के सीएम बनेंगे। राजकोट से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले विजय रूपाणी शहर के मेयर बनने में कामयाब रहे। उन्हें राज्यसभा का भी कार्यकाल मिला। वे संगठन के महासचिव रह चुके थे लेकिन एक बार सोमनाथ दादा से मिलने जाते समय संदेश आया कि चूंकि वजुभाई राज्यपाल के रूप में कर्नाटक गए हैं इसलिए उन्हें अपनी खाली सीट पर उपचुनाव में अपनी उम्मीदवारी दाखिल करनी है और इसके बाद जीत हासिल करनी है। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद वे प्रदेश अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री और एक ही वर्ष में उन्हें सीएम पद की लॉटरी लग गई।

उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में गुजरात भाजपा के राजनीतिक इतिहास की जांच करने पर यह स्पष्ट है कि चुनाव से डेढ़ साल पहले से ही भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेता चुनावी रणनीति बनाने में लगे हैं और हर हाल में अगले साल आने वाले चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश कर रहे हैं। संक्षेप में व्यवहार्यता महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं। केशुभाई पटेल भाजपा के गिने-चुने नेताओं में से एक थे बल्कि कहा जाए तो गुजरात भाजपा के वे जनक थे। संघ परिवार में उन्हें मोभी (सम्मानीय) माना जाता था। संक्षेप में सभी के मन में केशुभाई के प्रति आदर और सम्मान की भावना थी। हालांकि लगातार तीन वर्षों के सूखे, तूफान और भूकंप के बाद पार्टी के आंतरिक चुनावों में राजनीतिक क्षितिज पर जीत के संकेत नहीं दिखाई दिए, तब केशुभाई का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया था।

ढीली पकड़ पर बड़बड़ाया संगठन

केशुभाई के जाने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेन्द्र भाई मोदी के पास केवल एक साल बचा था। उन्होंने कहा कि वे एक टेस्ट मैच नहीं बल्कि एक वनडे खेलने आए थे। उनकी पारी 14 साल तक चली फिर उनकी उत्तराधिकारी आनंदी बहन को पाटीदार आंदोलन के कारण जाना पड़ा और विजय रुपाणी को सीएम पद मिला। पांच साल होने के बाद में कोरोना के कार्यकाल में सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी और प्रशासन पर ढीली पकड़ के नाम पर संगठन बड़बड़ाने लगा। खोडलधाम की बैठक में पाटीदार समाज के नेता नरेश पटेल ने दहाड़ते हुए कहा कि अगला मुख्यमंत्री पटेल होना चाहिए और अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दिया कि पटेल के पास आम आदमी पार्टी और कांग्रेस जैसे विकल्प भी हैं। कड़वा और लेउवा दोनों तरह के पटेल समाज को एक करने की बात भी हुई।

इन घटनाक्रमों के जवाब में ठाकोर, कोली और आदिवासी समुदायों ने अपने समुदाय का मुख्यमंत्री बनाने की मांग की। पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षण ने स्पष्ट रूप से नेतृत्व परिवर्तन का खुलासा किया। अकेले प्रदर्शन के मामले में विजय भाई रूपाणी शत-प्रतिशत सफलता का दावा कर सकते थे, क्योंकि भाजपा ने कोरोना की पहली लहर के बाद आठ विधानसभा उपचुनावों और छह महानगरों और सभी 32 जिला पंचायतों में 100 उपचुनाव जीते हैं, लेकिन केवल स्थानीय निकाय चुनाव के आधार पर मुख्यमंत्री पद टीका पाना संभव नहीं है। विधानसभा चुनाव में जातिवाद का बोलबाला है। गुजरात हो या उत्तर प्रदेश, भारत के सभी राज्यों में अंतत: चुनावी समीकरण जातिवाद और नेतृत्व परिवर्तन पर आधारित होते हैं।

बीजेपी को गंवानी पड़ी सत्ता

भारतीय जनता पार्टी विधानसभा चुनाव में कोई चांस नहीं लेना चाहती है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ चरम पर होने के बावजूद बीजेपी ने साल 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे गढ़ वाले राज्यों में सत्ता गंवाई थी। इन राज्यों के बाद कर्नाटक विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो बीजेपी का बहुमत कम तो हुआ, लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 फीसदी सीटें जीती और जबर्दस्त सफलता मिली। इसका मतलब यह है कि स्थानीय चुनाव, लोकसभा और विधानसभा सभी के काम करने के लिए अलग-अलग कारक हैं।

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 303 सीटें जीतकर अपना ही पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया था। इसके बाद कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-ए को खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला भी लिया। हालांकि झारखंड और दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। महाराष्ट्र में कम बहुमत से शिवसेना के साथ सरकार बनती लेकिन मुख्यमंत्री पद की लड़ाई के कारण महाराष्ट्र में भी सत्ता खो गई। खट्टर आज भाजपा के मुख्यमंत्री नहीं होते अगर चौटाला की क्षेत्रीय पार्टी ने उन्हें हरियाणा में समर्थन नहीं दिया होता। बिहार में भाजपा ने नीतीश कुमार के साथ सत्ता-साझाकरण सौदे में सत्ता हासिल की लेकिन एक मामूली अंतर हासिल किया जबकि पश्चिम बंगाल में लंबे संघर्ष के बाद हार का सामना करना पड़ा।

उपरोक्त घटनाक्रम को देखते हुए अगले साल पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। बीजेपी के लिए साल 2024 के लोकसभा चुनाव सेमीफाइनल की तरह ही होगा। भाजपा आलाकमान ने पिछले एक साल में तीन नए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह और तीर्थराज रावत के बाद उत्तराखंड में पुष्कर धामी को सत्ता सौंपी है। असम में सर्वानंद सोनोवाल की जगह हेमंत विश्व को लिया गया है जबकि कर्नाटक में येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को लिया गया है। भाजपा आलाकमान गुजरात विधानसभा चुनाव में कोई मौका गंवाना नहीं चाहता। यही वजह है कि विजय रूपाणी को विदाई देकर भूपेन्द्र पटेल को लिया गया है। आने वाले दिनों में यही सिलसिला जारी रहा तो हरियाणा या मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बदल जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। राजनीति में अंत में जो जीता वो सिकंदर को सबसे उपयुक्त सूत्र माना जाता है।

 

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