जातिगत जनगणना कितनी सही?

विचारणीय यह भी है कि जब देश में वर्दीधारियों के नाम पट्टिका से जाति हटा दी गई है, वाहनों पर जाति-धर्म को प्रदर्शित करना अपराध है, तो जातिगत जनगणना कैसे युक्तिसंगत हो सकती है? जब सब कुछ जनसंख्या और आरक्षण आधारित तय होने लगेगा तो पारस्परिक सौहार्द्र, भाईचारा तथा शांति व्यवस्था भंग होगी। जिस जाति की संख्या कम होगी, उस जाति के लोग अधिकाधिक बच्चे पैदा करेंगे। सामाजिक ताना बाना छिन्न-भिन्न हो जाएगा। नियुक्ति और शिक्षा में प्रवेश केवल जाति देख कर किया जाएगा तो योग्यता के लिए समाज में कोई स्थान ही नहीं रहेगा इसलिए जातिगत जनगणना में देश का समग्र दृष्टिकोण ध्यान में रखना आवश्यक है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में प्रदेश की 10 पार्टियों ने जातिगत जनगणना करवाने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। इसके बाद देश में जातिगत जनगणना के पक्ष और विपक्ष में चर्चा और गरमा गई है। जातिगत जनगणना का समर्थन करने वाले मंडल आंदोलन से निकले दलों, इससे जुड़े समूहों और विशेषज्ञों के अपने तर्क हैं। वहीं इसका विरोध करने वाले लोग देश के सामाजिक ताने बाने में जातिगत दरारों के बढ़ने की आशंका के साथ ही इसे असंवैधानिक बता रहे हैं। उधर, मुसलमानों के ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज संगठन (एआईपीएमएच) ने भी बिहार सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के लिए मुस्लिम समुदायों को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग) के रूप में सूचीबद्ध करने की मांग रख दी है क्योंकि जनगणना में धार्मिक आधार पर मुसलमानों की गिनती की जाती है, लेकिन मुसलमानों में शामिल जातियों की गणना नहीं होती है। उनका नारा है, दलित पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान

जातिगत जनगणना पर घमासान

प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद राष्ट्रीय जनता दल और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि जनगणना में जब धर्म का लेखा-जोखा लिया ही जाता है, तो एक कॉलम बढ़ाकर जाति का भी विवरण लिया जा सकता है। इसके लिए अलग से खर्च भी नहीं होगा। दरअसल 20 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि भारत सरकार ने जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) के अलावा अन्य जाति आधारित आबादी की जनगणना नहीं कराने का फैसला किया है, जिसके बाद ही जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग तेज हुई।

तेजस्वी ने तो सीएम नीतीश कुमार को यहां तक पत्र लिख दिया कि यदि भारत सरकार अड़ियल रवैया अपनाते हुए जातिगत जनगणना नहीं कराती है, तो बिहार सरकार अपने संसाधन से बिहार में जातिगत जनगणना कराए। हिंदू पिछड़ेपन पर बल उस पत्र का शायद सबसे दिलचस्प पहलू था। तर्क दिया गया कि यदि जातिगत जनगणना नहीं कराई जाती है, तो पिछड़े/अति पिछड़े हिन्दुओं की आर्थिक व सामाजिक प्रगति का सही आकलन नहीं हो सकेगा और न ही हमारे पास समुचित नीतिगत उपाय मौजूद हैं। पसमांदा ने जातिगत जनगणना की इस एक तरफा और खुले रूप से हिंदू-केंद्रित राजनीतिक व्याख्या पर सवाल खड़े किए।

जातिगत सियासत से सफर

पूर्व सांसद और एआईपीएमएच के पूर्व अध्यक्ष अली अनवर अंसारी ने एक बयान जारी करके पिछड़ेपन को सांप्रदायिक रंग दिए जाने की आलोचना की। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जातिगत जनगणना कराए जाने की वकालत करते हुए कहा कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए। मोदी जी के पास संसदीय शक्ति है, उन्हें कानून बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ओबीसी का उप-वर्गीकरण भी ज़रूरी है।

जातिगत जनगणना पर फूंक-फूंक कर चल रही भाजपा इस मुद्दे का विरोध तो नहीं कर रही है, लेकिन खुलकर समर्थन करती भी नहीं दिख रही है।

नीतीश कुमार के साथ बिहार के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा रहे भाजपा नेता व मंत्री जनकराम ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो भी निर्णय लेंगे, वह सभी को स्वीकार होगा। हालांकि उन्होंने जातिवादी राजनीति करने वाले दलों पर परोक्ष निशाना भी साधा। साथ ही कहा कि कई नेता जाति एवं समुदाय के नाम पर अपना सियासी सफर आगे बढ़ाते हैं जबकि बाद में वे अपने ही परिवार के लोगों को आगे बढ़ाने में व्यस्त हो जाते हैं।

जनगणना वोट का गणित

1990 के दशक में जिस तरह से मंडल की राजनीति के चलते जातीय वैमनस्यता बढ़ गई थी और जातिगत प्रभुत्व वाले क्षेत्रीय दलों का उभार ही नहीं हुआ बल्कि कई दलों को सत्ता की मलाई भी मिल गई। इसके पश्चात् भाजपा ने एक रणनीति के तहत टुकड़ों में बंटी जातियों को हिंदुत्व-राष्ट्रवाद के नाम पर इकट्ठा किया। मंडल पर कमंडल अंततोगत्वा भारी पड़ा। वर्ष 2014 के आम चुनाव में प्रचंड जीत के साथ पिछड़े वर्ग के नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में भाजपा सफल रही। भाजपा को ओबीसी और दलित समुदाय का भरपूर समर्थन मिला, वह कई राज्यों की सत्ता पर भी काबिज हो गई।

 सरकार जानती है जनसंख्या

भारत में वर्ष 1931 के बाद से जातिगत जनगणना नहीं हुई है फिर भी जातियों की जनसंख्या का मोटा-मोटा आकलन सरकार के पास होता है। ब्रिटिश राज में 1881 से 1931 तक जातिगत जनगणना हुई थी लेकिन स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् भारत सरकार ने इसकी परंपरा समाप्त कर दी। साल 2011 में भी एक बार जातिगत जनगणना की मांग उठी थी, जिसके बारे में दावा किया गया था कि वह कई सारे विवादों का निस्तारण कर देगी लेकिन यह अलग-अलग आकलनों में साबित हो चुका है कि ओबीसी की आर्थिक-सामाजिक स्थिति इलाकों और राज्यों के आधार पर अलग हो जाती है। ऐसे में जातिगत जनगणना के आधार पर ओबीसी के लिए आरक्षण या कल्याणकारी योजनाओं का खाका खींचने की परिकल्पना त्रुटिपूर्ण है। नेताओं में भी जाति के नाम पर अपने राजनीतिक फायदे की चिंता ज्यादा दिखती है। बिहार में 15 साल तक लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की सरकार रही, तो क्या ओबीसी को वो सब मिल गया जो मिलना चाहिए था ?

भारतीय समाज लगभग 3000 जातियों और 25000 उपजातियों में बंटा हुआ है। यदि राज्य संसाधनों के वितरण के लिए जाति को एक मानदंड के रूप में उपयोग करने की योजना बना रहा है, तो यह नीति निर्माण में भ्रम और अराजकता पैदा कर सकता है। विभिन्न जातियों की वर्तमान सामाजिक और आर्थिक स्थितियों, गतिशीलता, दस्तावेज और समझे बिना लोकतांत्रिक अवसरों को वितरित करने की कोई भी नीति सबसे निचले समुदायों को कवर करने असफल रहेगी। यदि नीतीश कुमार सचमुच इस मुद्दे पर ईमानदार हैं, तो उन्हें मांग करनी चाहिए थी कि केंद्र सरकार साल 2011 के सामाजिक-आर्थिक व जातिगत जनगणना के जाति-आधारित जनसंख्या के आंकड़े प्रकाशित करे। इसपर तो नीतीश कुमार ने एक शब्द भी नहीं कहा।

बिहार में दलित गणना

इससे भी आगे जाकर उन्हें कर्नाटक (2015 जातिगत जनगणना) की भांति बिहार में जाति-जनगणना का आदेश देना चाहिए था। उन्हें तथ्य-प्रेरित, जाति-आधारित विकास और सकारात्मक भेदभाव प्रदत्त नीतियों का राज्य-स्तरीय मॉडल प्रस्तुत करते हुए केंद्र से उसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की मांग करनी चाहिए थी पर नीतीश ऐसा कभी करेंगे नहीं क्योंकि बिहार में जातिगत जनगणना के अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं। पहले से ही देश भर में कई आन्दोलन व्यापक ओबीसी या एससी कोटा में सब-कोटा देने की मांग उठा रहे हैं। बिहार में दलित ‘दलित’ व ‘महादलित’ में विभाजित हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में ‘माला’ और ‘मादिगा’ में विभाजित हैं। अलग-अलग राज्यों में संभावित रूप से सभी श्रेणियों के कोटा के आंकड़ों पर दबाव आएगा क्योंकि जनसंख्या में विभिन्न जातीय श्रेणियों का हिस्सा अलग-अलग है।

विचारणीय यह भी है कि जब देश में वर्दीधारियों के नाम पट्टिका से जाति हटा दी गई है, वाहनों पर जाति-धर्म को प्रदर्शित करना अपराध है, तो जातिगत जनगणना कैसे युक्तिसंगत हो सकती है? जब सब कुछ जनसंख्या और आरक्षण आधारित तय होने लगेगा तो पारस्परिक सौहार्द्र, भाईचारा तथा शांति व्यवस्था भंग होगी। जिस जाति की संख्या कम होगी, उस जाति के लोग अधिकाधिक बच्चे पैदा करेंगे। सामाजिक ताना बाना छिन्न-भिन्न हो जाएगा। नियुक्ति और शिक्षा में प्रवेश केवल जाति देख कर किया जाएगा तो योग्यता के लिए समाज में कोई स्थान ही नहीं रहेगा इसलिए जातिगत जनगणना में देश का समग्र दृष्टिकोण ध्यान में रखना आवश्यक है।

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