महारानी दुर्गावती ने जब अकबर को दिया था लोहा, जबलपुर में आज भी होती है इस वीरांगना की पूजा

 

आज हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति बची है तो उसके लिए कुछ लोगों को अपना बलिदान देना पड़ा था जिसमें एक नाम महारानी दुर्गावती का भी है। महारानी ने अपने राज्य, देश और आत्मसम्मान के लिए शस्त्र धारण किया और अंतिम समय तक मुगलों से लड़ते हुए अमरत्व को प्राप्त हुई। रानी दुर्गावती गोंड के राजा दलपत शाह की पत्नी और कालिंजर के राजा कीर्ति सिंह की पुत्री थी। गोंड का राज्य बहुत दूर दूर तक फैला था लेकिन राजा दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद दुश्मनों की नजर गोंड पर पड़ने लगी। उस समय रानी दुर्गावती की संतान छोटी थी फिर भी महारानी ने गोंड का राज पाठ संभालना शुरु कर दिया। महारानी के शासनकाल में जनता सुखी रहने लगी क्योंकि रानी अपने सभी लोगों का बखूबी ध्यान रखती थी। 
 
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को दुर्गा अष्टमी के दिन कालिंजर किले में हुआ था इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। उस समय उनके पिता कीर्ति सिंह वहां के राजा थे। कालिंजर का किला अब उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पड़ता है। दुर्गावती के पिता एक बड़े राजा थे और उन्होंने कई लड़ाईयां भी लड़ी थी इसलिए दुर्गावती ने बचपन से ही शस्त्र चलाना सीख लिया था और राज घरानों के काम काज से अच्छी तरह परिचित हो चुकी थी। समय के साथ दुर्गावती विवाह के योग्य हुई तब गोंड के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह के साथ 1542 में उनका विवाह संपन्न हुआ। विवाह के करीब 3 साल बाद 1545 में शेरशाह सूरी ने कालिंजर गढ़ पर हमला बोल दिया लेकिन एक बारूद विस्फोट में उसकी मौत हो गयी।
इधर 1545 में ही रानी दुर्गावती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम वीरनारायण रखा गया। पुत्र वीरनारायण अभी 5 वर्ष के ही हुए थे कि उनके पिता व दुर्गावती के पति दलपत शाह की अचानक मृत्यु हो गयी जिससे पूरा राज्य शोक में डूब गया। रानी दुर्गावती अब पूरी तरह से टूट चुकी थी लेकिन उन्होंने हिम्मत दिखाई और अपने नाबालिग पुत्र वीरनारायण को राजगद्दी पर बैठा खुद राज करने लगी। महारानी अपने दो मुख्य सलाहकारों सेनापति आधार सिंह कायस्थ और मानसिंह ठाकुर के साथ मिलकर कर राज्य को तेजी से आगे बढ़ा रही थी। राज्य में जरूरी इमारतें, तालाब, सड़क और मंदिर बनाए गये। रानी ताल आज भी जबलपुर में प्रसिद्ध है जो महारानी के समय में बनाया गया था।
रानी दुर्गावती ने सन 1550 से 1564 तक सफलतापूर्वक राज किया और जनता भी महारानी के कार्यकाल में बहुत खुश थी लेकिन महिला शासक होने के नाते लोग उन्हें कमजोर समझने लगे। 1556 में मालवा के राजा बाज बहादुर ने रानी दुर्गावती के राज पर आक्रमण कर दिया। दरअसल बाज बहादुर को ऐसा लगा कि महिला राजा आसानी से हार मान लेगी लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ और महारानी दुर्गावती की सेना ने जमकर युद्ध किया अंत में बाज बहादुर को हार का सामना करना पड़ा। बाज बहादुर युद्ध हार गये और अपनी सेना लेकर वापस चले गये। इस युद्ध के बाद रानी की बहादुरी की चर्चा और अधिक होने लगी।
अब तक रानी दुर्गावती की बहादुरी की चर्चा अकबर तक पहुंच चुकी थी और अकबर भी रानी का राज्य जीतना चाहता था। अकबर ने रानी के यहां संदेशा भिजवाया कि वह बिना युद्ध अकबर को अपना राज्य सौंप दे लेकिन रानी दुर्गावती तैयार नहीं हुई और उन्होंने युद्ध की तैयारी शुरु कर दी। दोनों तरफ नदियों से घिरा नरई नाला में युद्ध चला जिसमें शुरुआत में रानी ने अकबर की सेना को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया लेकिन बाद में अकबर की सेना भारी पड़ने लगी। अकबर के पास विशाल सेना थी और आधुनिक हथियार थे जबकि रानी के पास सेना भी कम थी और हथियार भी पुरानी परंपरा वाले थे इसलिए अंत में युद्ध अकबर के पक्ष में जाने लगा। रानी ने अपना आत्मसम्मान बचाते हुए खुद की तलवार अपने ही पेट में घोंप ली और उनकी शत्रु के हाथ ना आने की कसम भी पूरी हो गयी। रानी दुर्गावती की समाधि स्थल मध्य प्रदेश के जबलपुर में है जहां आज भी लोग उन्हें श्रद्धांजली देने जाते हैं। 

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