बोनसाई हो जाना रावण का..

कस्बे के बच्चे उदास हैं। बच्चों की उदासी मुझसे देखी नहीं जाती। उनकी उदासी की वजह जाननी चाही तो उन्होंने कहा, अंकल इस बार दशहरे पर रावण  देखने भी नहीं जा पाएंगे। वर्चुअल क्लास की तरह ही वर्चुअल ही रावण दहन देखना पड़ेगा। जिन्दगी में थोड़ा-बहुत असली भी तो होना चाहिए कि नहीं अंकल? मैंने बच्चों को समझाने की कोशिश की बेटा वो भी कहां असली रावण होता है, जिसे हम हर साल जलाते हैं। वह पुतला ही तो होता है। असली तो यहां-वहां घूमते रहते हैं मगर यह बात उनके लिए ज्यादा बड़ी थी क्योंकि बच्चों की खुशियां तो छोटी-छोटी होती हैं। कुछ छोटे-छोटे बच्चे तो रावण न बनने की खबर सुनकर ठुनक ठुनक भी करने लगे थे। उनके लिए तो रावण एक खिलौना भर है, जिसका जलना एक उत्सव है। जब बच्चे ही उदास हो, तो काहे का त्यौहार, कैसे उत्सव और कहां के मेले? सरकार हुजूर ने भी बीच का रास्ता निकाला और बच्चों की खुशी के लिए रावण दहन को मंजूरी दे दी। इस शर्त के साथ कि रावण का कद कम कर दिया जाए। कस्बे की रावण समितियां भी थोड़ी खुश हुईं कि चलो आधा दुधा चन्दा तो मिल ही जाएगा। हमारा कस्बा उत्सवजीवी है। यहां पहले एक दशहरा मैदान था, जहां इकलौता विशालकाय रावण बनता था। साल दर साल बढ़ते कद के साथ जो एक समिति के कब्जे में ही होता था। इस रावण का बढ़ता कद कस्बे के दूसरे हिस्से के नेताओं को अखर रहा था। उन्होंने कस्बे का दूसरा दशानन पैदा किया, वो भी उतना ही बड़ा और उससे भी ऊंचा फिर क्या हुआ शहर बढ़ता गया। जैसे-जैसे नेता बढ़ते गए रावण भी बढ़ते गए। हर पार्टी का अपना रावण हर नेता का अपना निजी रावण।

दशहरा मैदान तो आज भी इकलौता वही है। बस दशमुख के सिरों की तरह रावणों का बढ़ना जारी रहा। वो तो भला हो कोरोना का जिसने गणपति जी तो बैठने दिए, देवी जी की घटस्थापना भी करवा दी लेकिन रावण के कद पर सीलिंग एक्ट लागू कर दिया। पहले कस्बे में कोई 101 फुट का रावण बनाता, दूसरा 111, तीसरा 121 तो चौथा 151। हालांकि कोई इसका कद कैसे नापता रावण के कद को तो कोई नाप भी नहीं सकता है। आज हालत यह है कि मुख्य रावण ही 21 फुट पर अटक गया है, तो दूसरे ग्रुप वाले ने भी अपने रावण को छोटा करते हुए मात्र 11 फुटिया कर दिया है। बच्चे इसलिए भी उदास हैं कि क्या रावण भी इत्ते छोटे-छोटे होते हैं इन्हें हम कैसे देख पाएंगे? इत्ते छोटे रावण तो हम गली में ही बना डालते हैं। ऐसे छोटे से रावण में पटाखे कैसे भरेंगे। अब बच्चों को कैसे समझाएं कि यह ’बोनसाई युग’ है। बरगद, पीपल, नीम जैसे बड़े और घने वृक्ष भी बोनसाई बन गमलों में उगने लगे हैं, तो रावण भी बोनसाई हो जाए तो क्या हर्ज? अरे, जब आदमी ही आदमी के कद का न रहे और ओछा हो जाए तो आदमी के बनाए रावण के पुतले की क्या बिसात? वैसे सच यह भी है कि सिर्फ बच्चे ही उदास नहीं हैं। नवरात्रि में गरबे न होने के कारण कई असली रावण, दुर्योधन, दुशासन भी मुंह लटकाए घूम रहे हैं। कोरोना के चलते इनके रसीद कट्टे और कट्टे सारे बेकार हो गए हैं। बच्चे तो 11-21 फूट के रावण में भी खुश हो लेंगे पर इन बड़े बड़े रावणों की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी? इनका सवाल भी वाजिब है कि जब महंगाई, भ्रष्टाचार, दुराचार, व्यभिचार बढ़ रहे हो तो खाली रावण के पुतले को छोटा करने से क्या हो जाएगा?

 

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