जलवायु परिवर्तन पर अतिवादी विचारों से बाहर आने की जरूरत

ब्रिटेन के ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्रसंघ के पर्यावरण सम्मेलन या काॅप 26 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेता भाग ले रहे हैं । सबकी नजर यहां नेताओं के भाषणों तथा होने वाले निर्णयों पर होगी । पिछले कम से कम 40 वर्षों से पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन संपूर्ण विश्व की चिंता के केंद्र में है। इसी तरह पिछले करीब डेढ़ दशक से धरती के बढ़ते तापमान को सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। जब भी जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होता है, सारे विषय गहन चर्चा में आते हैं। 6 वर्ष पहले पेरिस में आयोजित सम्मेलन में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि भारत के बगैर हम विश्व की पर्यावरण चुनौतियों तो क्या किसी चुनौती का सामना नहीं कर सकते हैं। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की प्रभावी स्थिति को देखते हुए यह वक्तव्य बिल्कुल स्वभाविक था और ज्यादातर प्रमुख देशों की सोच बदली नहीं होगी।

भारत ने सम्मेलन के पूर्व बताया भी है कि विश्व में सबसे ज्यादा प्रदूषण पैदा करने वाले देशों की तुलना में भारत का राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान यानी एनडीसी ज्यादा प्रगतिशील है।भारत 2030 तक हरित ऊर्जा क्षमता बढ़ाकर 450 गीगावॉट करने की ओर अग्रसर है और इस समय 100 गीगावॉट से ज्यादा नवीनीकृत ऊर्जा क्षमता स्थापित हो चुकी है।भारत में कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है उसका करीब 60% प्राप्त किया जा चुका है और आने वाले वर्षों में वह हो जाएगा। वास्तव में भारत हर स्तर पर वर्तमान मानकों के अनुरूप अपने उर्जा प्रयोग को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की ओर तीव्र गति में आगे बढ़ रहा है। पेट्रोल और डीजल का उपयोग कम करके इलेक्ट्रिक वाहन, जनरेटर, मोटर आदि के साथ इथेनॉल के उत्पादन और प्रयोग का अग्रणी देश बनने के लक्ष्य से काम हो रहा है। इसमें हम जितना आगे बढ़ेंगे पर्यावरण संरक्षण में हमारा योगदान उतना ही अधिक होगा। इसमें भारत पूरे आत्मविश्वास से मुखर होकर अपनी बातें रख सकने की स्थिति में है। सर्वाधिक प्रदूषण पैदा करने वाला चीन न खुलकर बयान देता है और न ही लगता है कि उसे विश्व कल्याण की चिंता है। यही देशों की संस्कृतियों में अंतर है। 

जलवायु परिवर्तन या इससे जुड़ी धरती के तापमान बढ़ने आदि पहलुओं पर अलग दृष्टिकोण से भी विचार करने की आवश्यकता है।जरा सोचिए ,चार दशकों से प्रदूषण से बिगड़ते पर्यावरण, जलवायु में होते परिवर्तन आदि की जो भी भयावह तस्वीरें पेश की गई उनसे विश्व समुदाय सहमा रहा है। ऐसा नहीं है कि इसके दुष्परिणाम नहीं आए। किंतु जिस रूप में प्रस्तुत किया गया वैसा कभी नहीं हुआ। वह भी उस स्थिति में जब दुनिया भर में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बाद भवनों, सड़कों सहित आधारभूत संरचनाओं के बेतहाशा निर्माण में प्रकृति प्रदत्त सामग्रियों का अंधाधुंध प्रयोग हुआ है। इस दौरान वाहनों की संख्या अकल्पनीय रूप से बहुगुणित हुई है। फ्रिज और एयर कंडीशन जो कभी बड़े शहरों में भी गिने-चुने घरों में दिखता था वह आम हो चुका है। उससे ओजोन लेयर में छेद की बात भी की जा रही थी। इसी तरह सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन के लिए नदियों पर बनते बांध को पर्यावरण का सबसे बड़ा खलनायक बनाकर प्रस्तुत किया गया। विश्व भर में बड़े बड़े संगठन, एनजीओ खड़े हुए, संघर्ष किया बांधों के निर्माण में बाधाएं डालीं…।

नदियों पर बांध से जो स्वाभाविक समस्याएं बहाव की निरंतरता, निर्मलता पर पड़ती है ,गाद उत्पन्न होती हैं वह सब है लेकिन जैसी तस्वीरें पिछले तीन दशकों में पेश की गई वैसा कुछ नहीं हुआ। इन बातों को सामने रखने से कोई यह न मान ले कि मैं पर्यावरण समस्याओं और चुनौतियों को गलत साबित कर रहा हूं। इसका अर्थ केवल इतना ही है कि जो समस्याएं और चुनौतियां जितनी हो सकती हैं उनको उतना ही बड़ा मानकर व्यवहार किया जाए तथा उसके दूसरे पहलुओं को भी देखा जाए। बड़े बांधों से समस्याएं उत्पन्न हुई हैं तो इससे बिजली पैदा हुई है तथा दूरस्थ सूखे क्षेत्रों तक पानी उपलब्ध कराने में भी सफलता मिली है। गुजरात में ही बहुत बड़े क्षेत्र में पानी के लिए हाहाकार था जिसे सरदार सरोवर बांध ने दूर किया। इसी तरह लाखो एकड़ भूमि को सिंचाई के लिए जल मिला है। दक्षिण भारत में कई बांधों ने लोगों को नया जीवन भी दिया है। इन सबको मिलाकर न जाने कितने लाख लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ है। 

अगर अनुभव से लगा है कि पनबिजली की जगह दूसरे तरीके से ऊर्जा प्राप्त किया जा सकता है तथा नदियों को छेड़ने की आवश्यकता नहीं तो उसे व्यवहार में लाने में समस्या नहीं है। एक समय था जब विशेषज्ञ ही भारत में बिजली स्वावलंबन के लिए पनबिजली का सुझाव देते थे। धीरे-धीरे इसका विरोध होने लगा। विडंबना यह कि विरोध करने वाले व्यवहारिक सार्थक विकल्प भी नहीं दे रहे थे।

जो लोग बिल्कुल भौतिक – सुविधाओं से रहित प्रकृति के साथ बगैर किसी तरह के छेड़छाड़ का जीवन जीते हैं या जी सकते हैं उनकी बात समझ में भी आती है लेकिन जिनको 24 घंटे बिजली चाहिए ,जाने -आने के लिए अच्छी सड़कें, अच्छे वाहन,  अच्छे घर ,अच्छे कपड़े ,नल से शुद्ध जल सहित संसार की सारी सुविधाएं चाहिए तो फिर उन्हें सोचना पड़ेगा कि यह सब हवा में छूमंतर से नहीं प्राप्त हो जाएगा। पक्के घर के लिए ईंट चाहिए तो मिट्टी खोदकर उसे जलाना होगा। सीमेंट चाहिए तो चूना पत्थर पहाड़ से या खुदाई से लेना पड़ेगा। छड़ चाहिए तो लौह-अयस्क निकालना पड़ेगा। यही बात अन्य चीजों के साथ भी लागू होती है। इसमें किसी भी देश का नेता चाहे जितना क्रांतिकारी भाषण दे दे,  जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने तथा विकास के वर्तमान अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आगे बढ़ने के लिए उसे इन्हीं रास्तों पर चलना होगा। रास्ता क्या है? 

इसमें रास्ता यही है कि चाहे संयुक्त राष्ट्रसंघ हो या पर्यावरण संबंधी अन्य अंतरराष्ट्रीय -राष्ट्रीय संस्थाएं,प्रमुख देशों की सरकारें सबको व्यवहारिक धरातल पर आकर विचार करना होगा। दुर्भाग्य से समझते सभी हैं लेकिन खुलकर बात करने का साहस कोई नहीं करता। आज राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई नेता यस तर्क दे किवर्षों से पर्यावरण असंतुलन के कारण विभीषिका और प्रलय की जो बातें सुनते रहे हैं वैसा हुआ नहीं तो उसे वर्तमान मीडिया ही नहींयहे संस्थाएं और देश ही खलनायक बना देंखे। जिस तरह पाश्चात्य देशों की नकल में पूरा विश्व भोगवाद की अंधी दौड़ से अपना ही अकल्याण करता चला गया वैसे ही पर्यावरण को लेकर पश्चिम से ही आई अतिवादी विचारों से हम कहीं ज्यादा समस्याएं पैदा कर चुके हैं। यह व्यवहारिक के साथ-साथ मानसिक भी है।

राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय एनजीओवादी पर्यावरण विशेषज्ञों तथा पर्यावरण क्रांतिकारी एक्टिविस्टों से उनके पुराने तथाकथित अध्ययनों, निष्कर्षों आंकड़ों, आकलनो को सामने रखकर पूछा तो जाना चाहिए कि जो कुछ आपने कहा या बताया वह सब क्यों नहीं हुआ? भारत मूलतः जीवन को नश्वर मान न्यूनतम उपयोगकर्ता स्वामी के रूप में संयमित और संतुलित व्यवहार का समाज रहा है। प्रकृति के सम्मान और सहकार का भाव और व्यवहार यहां सहज रूप में विद्यमान रहा है। हमारे ऋषियों ने वृक्ष और जल को महत्व देते हुए कहा  वृक्षाद् वर्षति पर्जन्यः परिज्ञान सम्भवः । अर्थात वृक्ष जल है ,जल अन्न है और अन्न जीवन है। सुनने में यह सामान्य बात लगती है लेकिन लाखों वर्ष पूर्व इस प्रकार की प्रकृति के साथ सहकार की चेतना से समस्त सृष्टि के संरक्षण सहज रूप से होता था। हालांकि ऐसा नहीं था कि तब पेड़ काटे नहीं जाते थे, पशुओं की हत्या नहीं होती थी युद्ध नहीं होते थे ,सड़कें, मकान नहीं बनते थे। प्राचीन इतिहास में ही गगनचुंबी इमारत,,अच्छी सड़कों, कल – कारखानों आदि के विवरण पढ़ते हैं तो वे शून्य षे पैदा हुए नहीं। अगर तब भी जलापूर्ति की व्यवस्थाएं थी, व्यक्ति एक से दूसरी जगह जाते थे, सामग्रियां पहुंचाई जाती थी तो इन सबके लिए साधन भी होंगे ,सड़के भी होंगी ,और उनके विवरण उपलब्ध हैं। तब और आज की शायद तुलना नहीं हो सकती क्योंकि न किसी ने उन सभ्यताओं को देखा है और न उनके वर्तमान मानकों के अनुरूप मान्य सबूत उपलब्ध हैं।

 पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ जैसे शब्द को भी नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। प्राचीन भारत को अगर हम महानतम सभ्यता मानते हैं तो यह सोचना पड़ेगा कि नदियों का पृथ्वी पर आगमन को लेकर ग्रंथों में जो बातें हैं वो क्या हैं? गंगा के बारे में कहा जाता है कि महाराज भगीरथ ने अपने पितरों को ताड़ने के लिए धरती पर लाया। धरती पर हिमालय से लाया गया तो कुछ व्यवस्थायें की गई होंगी। गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा का विस्तार कैसे हुआ इसकी भी कथा है। कहने का तात्पर्य है कि हर युग में मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार प्रकृति का उपयोग करता रहा है ,करता रहेगा और इसी तरह चक्र चलेगा। हां भोग संयम जरूरी है। आत्मसंयम अपरिहार्य है तथा यह मनुष्य जीवन के नैसर्गिक स्वरूप को समझने तथा उसके अनुरूप अपनी सुख सुविधा तथा लक्ष्य निर्धारित करने से संभव होगा। रास्ता यही है कि हम प्रकृति के अंधाधुंध और राक्षसी शोषण  की जगह ध्यान रखें कि एक सीमा से ज्यादा इनका उपयोग न हो तथा प्रदूषण पैदा करने वाले साधनों विकल्प की ओर जितना संभव हो आगे बढ़ा जाए।

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