सस्यवेद : भारतीय कृषि विज्ञान

कुछ प्राचीन कृषि ग्रन्थ —
कृषि पराशर (पराशर)
कृषि संग्रह
पराशर तंत्र
वृक्षायुर्वेद (सुरपाल)
कृषिगीता (मलयालम में, रचनाकार : परशुराम)
नुश्क दर फन्नी फलहत (फारसी में, दारा शिकोह)
कश्यपीयकृषिसूक्ति (कश्यप)
विश्ववल्लभ (चक्रपाणि मिश्र)
लोकोपकार (कन्नड में, रचनाकार: चावुन्दाराया)
उपवनविनोद (सारंगधर)
ऋषियों ने कृषि को हमारी आत्म निर्भरता के लिए बेहद जरुरी बताया है। उन्होंने कृषिकार्य को बढ़ावा देने का भरसक प्रयास ही नहीं किया बल्कि स्वयं कृषि भी की। आश्रमों के आसपास के क्षेत्र को कृषि के लिए उपयोगी बनाया। ये ‘क्षेत्र’ ही ‘खेत’ कहे गए। मिट्टी की प्रकृति काे पहले जाना गया…।
इस खेत की उपज-निपज के रूप में जो कुछ बीज पाये वे परिश्रम की धन्यता के फलस्वरूप धान या धान्य कहे गये। ये धन्य करने वाले बीज आज तक भारतीयों के प्रत्येक अनुष्ठान व कर्मकांड के लिए सजने वाले थाल में शोभित होते हैं। चावल अक्षत रूप में है तो यव के जौ या जव के नाम से जाना जाता है। रसरूप गुड़ के साथ धनिया तो पहला प्रसाद ही स्वीकारा गया है। ऋषिधान्य सांवा है जो शायद पहले पहल आहार के योग्य बना और जिसकी पहचान महिलाओं ने पहले की क्योंकि वे आज भी ऋषिपंचमी पर उसकी पूजा करती हैं।
इन खेतों के कार्यों से जो कुछ अनुभव अर्जित हुआ, वह सस्यवेद के प्रणयन का आधार बना। यह ज्ञान संग्रह से अधिक वितरण के योग्य माना गया। इसीलिये जो कुछ ज्ञान हासिल हुआ, उसे सीखा भी गया तो लिखा भी। सस्यवेद के इस प्रचार को दानकृत्य की तरह स्वीकार किया गया।
‘कृत्यकल्पतरु’ में सस्यवेद के दान की महत्ता लिखी गई है। विधान पारिजात, राज निर्देश, अमात्य कर्म, वर्ण कर्मावली आदि में भी विषय व्याप्ति है। पराशर का जोर कृषि के लिए मौसम के अध्ययन पर रहा तो काश्यप ने जल की उपलब्धि वाले इलाकों में खेती के उपाय करने को कहा। शाश्वत मुनि ने भूमिगत स्रोतों की खोज के लिए उचित लक्षणों को ‘दकार्गल’ नाम से प्रचारित किया। काश्यप ने पेड़ों की शाखाओं को भी द्रुमोत्पादन क्षेत्र के रूप में स्वीकारा और कलम लगाने के प्रयोग किए। कोविदार ऐसे ही बना… है न रोचक सस्यवेद की परंपराएं।
ऐसे उपाय लोक के गलि़यारे में बहुत हैं। आपको भी कुछ तो याद होंगे ही… पारंपरिक बातों, विशेष कर देशी खाद की बातें तो याद होंगी ही। इन सब बातों पर आधारित सस्यवेद का हाल ही चौखंबा ग्रंथमाला में प्रकाशन हुआ है। एक लुप्त ग्रंथ पर यह पहली बार काम हुआ है।
– श्री कृष्ण जुगनू

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