देश के दो प्रधानमंत्री के अहम की कहानी

नरेंद्र दामोदर दास मोदी देश के 15वें प्रधानमंत्री हैं जबकि इंदिरा गांधी देश की 4 चौथी प्रधानमंत्री थी। इन दोनों ही लोगों में एक समानता यह थी इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान बड़े और साहसी फैसले लिए थे। हालांकि दोनों लोगों के कार्यकाल में यह फर्क हैं कि जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी तब कांग्रेस बहुत मजबूत थी और विपक्ष बहुत कमजोर था इसलिए उन्हें फैसले लेने में शायद आसानी थी जबकि पीएम मोदी का विपक्ष मजबूत है और कई राजनीतिक कारणों से विरोध भी बहुत अधिक हो रहा है। हाल में हुए किसान आंदोलन इस बात का उदाहरण है कि मोदी सरकार का एक षडयंत्र के तहत विरोध किया जा रहा है। किसान बिल किसी भी रूप में किसानों के अहित में नहीं थे लेकिन सरकार और किसानों के बीच दर्जनों बैठकों के बाद भी इसका हल नहीं निकाला जा सका या फिर यह भी कह सकते हैं कि तथाकथित किसान नेताओं की तरफ से इसका हल जानबूझकर नहीं निकाला गया। अगर इसका हल निकल जाता तो फिर सरकार को घेरने का मुद्दा खत्म हो जाता। 
 
प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में जितने भी बिल पास हुए वह सभी खास थे। किसान बिल भी उसमें से एक था लेकिन किसान नेताओं की जिद के आगे सरकार को झुकना पड़ा। सरकार के झुकने की सिर्फ एक ही वजह थी कि वह किसी भी हाल में देश में शांति चाहती थी वरना सरकार बल के प्रभाव से किसानों का आंदोलन खत्म कर सकती थी। किसान बिल वापस लेने के बाद सभी जगह इस बात की चर्चा हो रही है कि आखिर मोदी सरकार ने करीब एक साल बाद यह बिल वापस क्यों लिया? कुछ लोग इसे आगामी विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं जबकि कुछ लोग मोदी सरकार के बैकफुट को भी एक बड़ा कदम बता रहे हैं लेकिन हम सिर्फ यहां यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि एक प्रधानमंत्री ने देश की शांति को बनाए रखने के लिए सरकार के फैसले को वापस ले लिया। किसान आंदोलन के नाम पर राष्ट्र विरोधी लोग इसका फायदा उठा सकते थे और आगामी समय में देश की अस्मिता को नुकसान भी पहुंचा सकते थे इसलिए सरकार की तरफ से इस तरह का फैसला लिया गया।
 
25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में आपातकाल की घोषणा हुई थी जो 21 महीने तक देश में लागू थी। आपातकाल के दौरान देश को बहुत नुकसान हुआ था और तमाम राष्ट्रप्रेमी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था या फिर यह भी कह सकते हैं कि उन नेताओं को पहले जेल में डाला गया जो कांग्रेस सरकार का विरोध कर रहे थे। आपातकाल लगाने को लेकर जो कहानी है वह यह है कि इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से चुनाव में जीत के बाद भी पराजित किया गया और 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गयी। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद इंदिरा गांधी के अहम को ठेस पहुंच गयी और उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के आदेश पर पूरे देश में राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया। इस घटना के बाद यह पता चलता है कि कैसे एक प्रधानमंत्री ने अपने अहम के लिए पूरे देश को अंधेरे में धकेल दिया था जबकि वर्तमान में पीएम मोदी ने खुद के अहम को मारते हुए देशहित में फैसला लिया और किसानों के आगे खुद को झुका दिया। 
सरकारें आएंगी जाएंगी, पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी मगर यह देश रहना चाहिए। देश हमेशा से सर्वोपरि होना चाहिए और यह बात बहुत पहले पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने कही भी थी और उनकी ही पार्टी के पीएम नरेंद्र मोदी ने यह बात फिर से साबित भी कर दिया। किसानों के सामने सरकार का झुकना कोई मजबूरी नहीं थी सरकार इसे दूसरे तरीके से भी निपट सकती थी और बल प्रयोग कर पूरे आंदोलन को खत्म भी कर सकती थी यह सभी फैसले देशहित में नहीं होते और किसानों पर अत्याचार के रूप में इतिहास में दर्ज हो जाते इसलिए पीएम मोदी ने किसान बिल को वापस ले लिया। 

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