समाज में एकत्व भाव का निर्माण ही है समाजिक समरसता

सामाजिक समरसता समाज के भीतर रहने वाले तमाम जन समुदायों के बीच एकत्व निर्माण की एक आदर्श स्थिति है, जिस समरस समाज की अवधारणा को प्रभु राम ने बताया जिसमें वे कहते है“ समाज का निर्माण व्यक्ति-व्यक्ति के भीतर परस्पर “एक होने” के भाव एवं समता, बंधुत्व के विचार पर ही होता है” । वही इसे डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर कहते है की “समाज का निर्माण समता एवं बंधुत्व भाव के निर्माण के आधार पर ही होता है”।  समाज को और परिभाषित करते हुए  गिन्सवर्ग कहते हैं “समाज केवल कुछ व्यक्तियों का किसी बाहरी आपत्ति से भयभीत होकर साथ होना मात्र नहीं है,बाढ से पीडित होकर गाँव का गाँव खड़ा होता है तो वह भी समाज नहीं है।

समाज के लिए जहाँ व्यक्ति एकत्रित होते हैं, वहाँ उनमें पारस्परिक सम्बन्ध अनिवार्य रूप से होने चाहिए”। इसी समाज को अगर समझा जाए तो समाज संस्कृत के दो शब्दों सम् और अज से मिलकर बना है । सम् का अर्थ इकट्ठा व अज का अर्थ एक साथ रहना। इस प्रकार एक साथ रहने वाले   समूह को समाज कहते है, यानि की समाज बन्धु भाव पर एकत्रित एक आदर्श स्थिति  है। ऐसे ही समाज में सब समरस भाव से रहते है सभी मनुष्य अपने जैसा सबको मान, सबके साथ अपने परिवार के सदस्य की भाँति ही व्यवहार करे यही तो है सामाजिक  समरसता है ।

महात्मा बुद्ध ने  सामाजिक समरसता को समझाया है । बुद्ध कहते है “जिस कारण मुझे दु:ख होता है, पीडा पहुँचती है, उसी कारण दूसरों को भी दु:ख होता है, किसी ने मुझे गाली दी तो मुझे दु:ख होता है। इसीलिए मुझे भी किसी को गाली नहीं देनी चाहिए। किसी ने मेरे घर पर चोरी की तो मुझे दु:ख होता है, तो मुझे भी कहीं चोरी नहीं करनी चाहिए। किसी ने झूठी गवाही देकर मुझे फसायाँ तो मुझे दु:ख होता है, मुझे भी यह काम किसी और के साथ नहीं करना चाहिए। जैसा मैं, वैसा अन्य, का यही अर्थ होता है”।  इसको अधिक सरल रूप में समझा जाए तो “जैसा मैं, वैसे अन्य”, इस भाव के आधार पर परस्पर व्यवहार होना इसी को समरसता कहते है।

समरसता व्यवहार में लाने के लिए इसके मूल हेतु को जीवन में उतारना होगा। अगर हम इसको अपने आचरण में आत्मसात् नही करते तो ये सारी बाते  बेकार सिद्ध होती है। जब मानव रचना एक ही तत्व से हुई है तो भेद किस बात का । अगर ये भेद है तो ये सेद्धांतिक  रूप से उचित नही है। हमें ये समझना होगा की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,उसकी सभी  आवश्यकताओं की पूर्ति समाज में  ही होती है,समाज में सभी एक दूसरे के प्रति पूरक भी है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी कहते है की “ मनुष्य सृष्टि का एकाकी और एकांगी प्राणी नहीं है वह अपने अस्तित्व से ही दुसरों के साथ जुडा है। परस्पर संलग्नता, परस्पर पूरकता, परस्परावलंबित्व यह तीन विषय समरस  व्यवहार के तीन पहलू होते हैं। हम परस्परावलंबी है, इसको समझना चाहिए।

अनाज का एक दाना भी व्यक्ति घर में निर्माण नहीं कर सकता, खुद का वस्त्र भी वह बुन नहीं सकता, ऐसे सैंकडों काम समाज के हजारों व्यक्ति करते रहते हैं,यही परस्परावलंबित्व है। इसे ध्यान में रखकर हमें परस्पर जीवन देना चाहिए, एक दुसरे के सूखो-दु:खों को बांट कर जीना चाहिए,एक जगह अधिक सुख है, और दूसरी जगह दुख ही दुख है। समाज में कैसे उस स्थिति का निर्माण हो जिसमें व्यक्तियो के व्यवहार उनके आचरण में समरस होने का भाव बीज रोपित हो सके और वह कैसे एक विशाल वृक्ष बने जिसमें वो जाति निम्न-उच्च का विचार,जाति आधारित ही विवाह, खान-पान निषेध, कही कही पर शमशान तक की भिन्नता ये सब समाप्त हो जाए। ऐसे सामाजिक प्रयास ही तो सामाजिक  समरसता का हेतु है। सामाजिक समरसता शब्द वैसे तो अपने अर्थों में बहुत प्राचीन है लेकिन फिर भी महाराष्ट्र में जिस समय दलित पेंथर आंदोलन चल रहा था उसी समय समाज में सभी मनुष्य सम्मान एवं अधिकार प्राप्त करे वो भी बिना किसी संघर्ष के इसको लेकर 70 के दशक में सामाजिक समरसता मंच को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ही कुछ स्वयंसेवकों के द्वारा बनाया गया जिसमें तृतीय सर-संघचालक बाला साहब देवरस जी एवं दत्तोपंत ठेंगडी जी की प्रेरणा निहित थी। वही मुंबई महानगर के तत्कालीन कार्यवाह रमेश पतंगे जी इसके मुख्य सूत्रधारों में एक थे जो स्वयं वंचित वर्ग से आते थे।

मंच का ध्येय था तो बस इतना की समाज में व्याप्त तमाम प्रकार की विषमता को समाज से निर्मूल कर एक सशक्त, वैभवपूर्ण एवं समता से युक्त राष्ट्र का निर्माण करना। जिस समाज रचना की सद इच्छा हमारे प्राचीन ऋषियों ने की थी जिसका  समय-समय पर सामाजिक प्रकटीकरण विभिन्न महापुरुषों के द्वारा होता रहा। महात्मा बुद्ध, आदि-शंकराचार्य से लेकर कबीर, रविदास, गुरु नानक, संत सरलादास, उत्तरपूर्व के शंकर देव, केरल के नारायण गुरु या आयंकली हो अथवा महाराष्ट्र के चोखेमेला, ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले, महादेव गोविन्द रानाडे एवं संत गाडगे, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अथवा पूज्ये बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर हो।

सामाजिक समरसता समाज के उन सभी भेदो को नकार देता है जिनके होने के कारण से समाज में विद्वेष पनपता है,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रत्येक कार्यकर्ता ने समता को अपने जीवन में व्यवहार का अंग सदैव ही माना इसी का परिणाम था की पूज्ये बाबा साहब अम्बेडकर एवं महात्मा गाँधी सभी ने संघ के शिविरों में जाने के निमंत्रण को स्वीकार किया। ये समता का ही विषय था की जब संघ के कुछ कार्यकर्ताओं ने राजनीतिक दल निर्माण की सोची तो 1980 में भारतीय जनता पार्टी के प्रथम स्थापना अधिवेशन स्थल का भूमि पूजन श्रीमान दत्ताभाई शिंदे ने किया जो अनुसूचित जाति वर्ग से आते थे। इतना ही नही जिस भूमि पर ये महाधिवेशन होना था उसका नाम ही “समता नगर” रखा गया।

भारतीय जनता पार्टी ने इसी मुंबई अधिवेशन में समतामूलक समाज निर्माण का संकल्प लिया जिसे पार्टी की नितियो में आसानी से देखा जा सकता है। सामाजिक समरसता का कार्य बस इस बिखरे समाज के भीतर एकत्व भाव का निर्माण करना है, इस एकत्व भाव की कमी के कारण हम वर्षों ग़ुलामी की ज़ंजीरो में जकड़े गये। क्या हम जानते है की मुट्ठी भर मुस्लिम लुटेरों ने भारत के इसी एकत्व भाव की कमी को देख भारत को लूट कर जाने के विचार  को त्याग यहाँ का शासक बनना स्वीकार किया। ये भी बड़ी शर्म की बात है की हम तो ग़ुलामों के भी ग़ुलाम बन  गए । वर्षों भारत पर ग़ुलाम वंश का शासन रहा, क्या ये सत्य  किसी से छुपा  है। हमारी  संगठित हिंदू शक्ति ने जहाँ  हमें दुनिया में विश्व गुरु के आसन पर बैठाया वही हमारा जातियों का विभाजन ने हमें वर्षों ग़ुलामी की काल कोठरी में धकेला है। इस लिए हम सभी ने मानव निर्मित  भेदो को भुला कर, समरस भारत के निर्माण हेतु कृत संकल्पित  हो  सभी को समान रुप  से अवसर मिले, संसाधन मिले इसकी और प्रयास करना है।  वही समाज के सम्पन्न वर्गों ने नीचे झुक कर  जो पीछे छूट गए उनका हाथ पकड़ आगे बढ़ाने  की आवश्यकता है ये ही है सामाजिक समरसता।

–  डॉ. प्रवेश कुमार

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