सभी कर्मों का फल हो जाता है अक्षय

सभी कर्मों का फल हो जाता है अक्षय, इसलिए यह तिथि कहलाती है, अक्षय तृतीया वैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया, आखातीज, या आखा तृतीया कहते हैं। इस दिन दिए हुए दान और किए हुए स्नान, होम, जप आदि का फल अनन्त होता है, अर्थात् सभी शुभ कर्म अक्षय हो जाते हैं। इसी से इसका नाम ‘अक्षय’ हुआ है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी  नाश या क्षय न हो अर्थात् जो सदैव स्थायी रहे। सत्यस्वरूप परमात्मा ही सदैव अक्षय और अखण्ड है। अक्षय तृतीया ईश्वरीय तिथि है क्योंकि इस दिन भगवान के तीन अवतार- नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम अवतार हए; इसलिए इस दिन उनकी जयन्ती मनायी जाती है।

नर-नारायण अवतार-

भगवान के चौबीस अवतारों में चौथा अवतार नर-नारायण का है। धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से भगवान नर-नारायण प्रकट हुए। भक्ति से ही भगवान मिलते हैं। भगवान का नर-नारायण अवतार तपस्यारूपी धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। वे आज भी बदरिकाश्रम में भगवदाराधन करते हुए विराजमान हैं।

हयग्रीव अवतार-

चौबीस अवतारों में सोलहवां अवतार हयग्रीव का है। मधु-कैटभ नाम के दैत्य ब्रह्माजी से वेदों को चुराकर रसातल में ले गए। ब्रह्माजी द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति करने पर भक्त और धर्म की रक्षा के लिए और अधर्म के नाश के लिए भगवान विष्णु हयग्रीव के रूप में प्रकट हुए और दैत्यों का वधकर उनसे वेदों की पुन: प्राप्ति की।

परशुराम अवतार-

भगवान परशुराम भगवान विष्णु के अठारहवें अवतार हैं। ये भगवान विष्णु के आवेशावतार माने गए हैं। जिस समय परशुरामजी का अवतार हुआ, उस समय पृथ्वी पर तामसी प्रवृत्ति वाले राजाओं की अधिकता थी। उन्हीं में से एक कार्तवीर्यार्जुन ने इनके पिता जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया, जिससे क्रुद्ध होकर इन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया और सारी पृथ्वी कश्यपजी को दान कर दी व स्वयं तपस्या करने चले गए।

भगवान शिव द्वारा दिए गए अमोघ परशु (फरसे) को धारण करने के कारण इनका नाम ‘परशुराम’ हुआ। अक्षय तृतीया को परशुरामजी का जन्मदिन होने के कारण इसे ‘परशुराम जयन्ती’ भी कहते हैं। परशुरामजी सात चिरंजीवियों में से एक हैं अत: इस दिन को ‘चिरंजीवी तिथि’ भी कहते हैं।

त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया से हुई थी इसलिए इस दिन को युगादितिथि भी कहते हैं। इस दिन ही बद्रीनाथधाम के पट खुलते हैं। अक्षय तृतीया को वृन्दावन में श्री बांकेबिहारीजी के चरणों के दर्शन साल में एक बार होते हैं।

अक्षय तृतीया स्वयंसिद्ध अभिजित् मुहुर्त है, इसलिए किसी मुहुर्त को न देखकर मांगलिक कार्य करने का दिन है।

अक्षय तृतीया बहुत ही पवित्र और उत्तम फल देने वाली तिथि है। अक्षय तृतीया में तृतीया तिथि, सोमवार और रोहिणी नक्षत्र ये तीनों हों तो यह योग बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए इस दिन सुख-समृद्धि और सफलता की कामना से नए वस्त्र, आभूषण और खरीदे और पहने जाते हैं। अक्षय तृतीया को गंगास्नान या समुद्र स्नान का विशेष महत्त्व है। इस दिन पितरों का पिंडदान और तर्पण तथा ब्राह्मण भोजन भी इस विश्वास से किया जाता है कि इसका फल अक्षय होगा।

अक्षय तृतीया पर पूजा-

इस दिन सूर्योदय के समय स्नान कर लक्ष्मी सहित भगवान विष्णु की पूजा कर, कथा सुनने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए दान करने से उसका पुण्य अक्षय फल देता है।

इस दिन भगवान (विष्णु, श्रीकृष्ण, श्रीराम) का षोडशोपचार पूजन करें। भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं। चंदन, रोली, इत्र  लगाकर सुन्दर पुष्पमाला पहनाएं। धूप, दीप आदि निवेदित करें।

मत्स्यपुराण के अनुसार ‘इस दिन अक्षत (बिना टूटे चावल) से भगवान विष्णु की पूजा करने से वे विशेष प्रसन्न होते हैं। इससे उपासक की संतान भी अक्षय बनी रहती है अर्थात् अकालमृत्यु नहीं होती है।’

भगवान विष्णु की पूजा में अक्षत का प्रयोग नहीं किया जाता है किन्तु इस दिन उनकी अक्षत से पूजा की जाती है ।

भगवान के तीनों अवतारों के लिए विशेष भोग-

इस दिन नर-नारायण जयन्ती होने से भगवान को सत्तू का भोग लगाएं।

परशुरामजी के लिए भगवान को ककड़ी का भोग लगाना चाहिए।

भगवान हयग्रीव के लिए भीगी हुई चने की दाल अर्पित करें।

अक्षय तृतीया को वस्तुओं के दान का बहुत महत्त्व है-

सत्तू, खरबूजा, तरबूजा, आम, ककड़ी, दही-चावल, गन्ने का रस व अन्य सभी रस, शर्बत, दूध और मावा की मिठाईयां, जल से भरा घड़ा, अन्न, शहद।

गर्मी में उपयोगी वस्तुएं जैसे- पंखे, जूता, छाता, सोना, भूमि आदि जो भी उत्तम पदार्थ हमें अच्छे लगें वह ब्राह्मणों को दान देना चाहिए।

इस दिन पार्वतीजी की पूजा का भी अत्यन्त पुण्य है। सभी मनोरथों की पूर्ति व सुख-सौभाग्य प्राप्ति के लिए  गौरीपूजा करके धर्मघट का दान करना चाहिए। धर्मघट के लिए एक मिट्टी का या धातु का कलश लेकर उसमें अन्न (गेहूं, चावल), जल (पानी की बोतल), पुष्प, कोई फल, तिल रखकर मन में ऐसा संकल्प करें- ‘मैं यह धर्मघट ब्रह्मा-विष्णु-शिव की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मण को दान कर रहा हूँ, इससे मेरे समस्त मनोरथ पूर्ण हों।’

इतनी पवित्र तिथि होने के कारण यह दिन क्षय हो जाने वाले कार्यों के स्थान पर अक्षय कार्यों- पुण्यकर्म, दान, होम-हवन, जप-तप, गंगास्नान, स्वाध्याय आदि करने का दिन है। अपनी अंतरात्मा में झांककर आत्मविश्लेषण करें और नकारात्मक कार्यों व विचारों का त्यागकर सकारात्मक कार्यों व विचारों को अपनाकर जीवन में दैवीय गुणों को अपनाने का प्रयास करें।

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