ठोकर लगी और मिल गए भगवान

ठोकर लगते ही उज्बेकिस्तान की शाख नोज उल्टे मुँह जमीन पर गिरते-गिरते बची, क्योंकि उसे उसकी सहपाठी याना, जो मास्को की रहने वाली थी, ने पकड़ कर संभाल लिया था। ‘‘जब भी हम इस पवित्र जगह पर आते हैं तो सीढ़ियों के इस टेढे़ मेढ़े पत्थर से हर किसी को चोट लगती है,’’ याना ने कहा, ‘‘आज इसको उखाड़ ही देते हैं।’’

उन्होंने ठोकर लगने वाले इस पत्थर को म्लेच्छ धर्मस्थल की सीढ़ियों से उखाड़ दिया था। वे उसे देखकर आश्चर्यचकित हुई, क्योंकि वह टूटी-फूटी किसी मूर्ति का नीचे का हिस्सा था और उस पर कुछ लिखा हुआ भी था। उन्होंने उस लिखावट की अपने मोबाइल से फोटो खींची और घर चली गई। वे अपने देश की प्राचीन संस्कृति पर अध्ययन कर रही थी। बहुत मशक्कत के बाद इंटरनेट के मदद से जब उन्होंने उस पत्थर की शिला को पढ़ा तो दंग रह गई,

वह गीता का श्लोक था:

अधर्माभिभवात्कृष्ण  प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ।।

हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। हे वार्ष्णेय (कृष्ण)! स्त्रियों के दूषित हो जाने से वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं।

‘‘शाख नोज कितनी अच्छी बात लिखी है, स्त्रियों के दूषित हो जाने से वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं। और आज तो सारी दुनिया में वर्णसंकर और दूषित लोग ही हैं।’’

‘‘लेकिन इस पत्थर पर इतनी ज्ञान की बात किसने लिखी?’’ याना ने पूछ लिया था?

‘‘पता नहीं।’’

फिर उन्होंने बड़े बुजुर्गों से यह बात जानने की कोशिश की कि धर्मस्थल की पैड़ियों के पत्थर के जीने में टूटी-फूटी मूर्तियाँ कहाँ से आई, तो किसी बुजुर्ग ने उन्होंने बताया कि सैकड़ों साल पहले मुहम्मद गौर और गजनवी हिन्दुस्तान से मंदिर लूटकर लाए थे और वहीं से ये पत्थर लाए गए थे। इनका अपमान करने के लिए मस्जिद की पौडियों में चिनवा दिया था।

उन दोनों ने विचार किया कि जब एक पत्थर पर इतने ज्ञान की बातें हैं, तो हिन्दुस्तान के लोग कितने ज्ञानी होंगे और वे दोनों ज्ञान की प्यास लिए भारत आ गई। यहाँ उन्होंने एक संत से वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन किया और उनकी आस्था वेदों के प्रति जाग उठी। पौराणिक धर्म स्थलों का भ्रमण करना भी उन्हें अच्छा लगता है। पता नहीं खंडहरों में क्या खोजती फिरती हैं। उजबेकिस्तान की शाख नोज ने वैदिक धर्म अंगीकार करने के बाद अपना नाम सुंदरी देवी रखा और मास्को की याना ने अपना नाम रखा है इंद्राणी देवीदास।

दोनों भगवान श्रीकृष्ण को महान योगी और वेदों का भाष्यकार मानती हैं, जबकि भारत में श्रीकृष्ण को भागवत का नायक माना जाता है। इंद्राणी देवीदास आजकल जर्मनी में रहकर वेदों पर अनुसंधान कर रही हैं। उनका मानना है कि हिटलर के समय जो भी अनुसंधान या आविष्कार जर्मनी में हुए वे प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन के बाद ही हुए थे।

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