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जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन आना ही था। गठबंधन में शामिल महबूबा मुफ्ती की पीडीपी और भाजपा में वैचारिक धरातल पर अंतर्विरोध था। पीडीपी की संवेदनाएं जहां अलगाववादियों व आतंकवादियों के पक्ष में उमड़ती रहीं, वहीं भाजपा सूबे में अमनचैन की पक्षधर रही। राज्यपाल शासन से अब कुछ उम्मीदें बढ़ी हैं।

अंततः वही हुआ, जिसकी जम्मू-कश्मीर की सियासत में लंबे समय से आशंका बनी हुई थी। पीडीपी-भाजपा गठबंधन वाली महबूबा सरकार से भारतीय जनता पार्टी के हाथ खींच लेने के बाद जम्मू-कश्मीर आज एक बार फिर से उसी मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है, जहां यह 2014 में सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावों के परिणाम घोषित होने के बाद था। सूबे के विखंडित जनादेश ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी, जहां कोई भी दल अपने दम पर सरकार बनाने में अक्षम था। ऊपर से किसी तरह के गठबंधन के लिए वैचारिक तालमेल भी स्थापित नहीं हो पा रहा था।

चुनावी नतीजों के अनुसार घाटी की जनता ने पीडीपी और जम्मू संभाग में भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। दोनों क्षेत्रों की जनता चाहती थी कि राज्यपाल शासन या पुनः चुनाव जैसी स्थिति से बचने के लिए पीडीपी और भाजपा साथ मिलकर सरकार बना लें। धुर विरोधी विचारधाराओं वाले दो दलों के लिए इस राह पर साथ निकलने की कल्पना भी मुश्किल थी। हालांकि दो क्षेत्रों को भावनात्मक एवं प्रशासनिक तौर पर नजदीक लाने के लिए इस तरह का प्रयोग जरूरी था और आखिरकार दोनों के मिले-जुले प्रयासों से एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर पीडीपी-भाजपा गठबंधन वाली सरकार का गठन संभव हो सका। सरकार गठन के बाद के अनुभव भी तालमेलभरे नहीं रहे और कई मसलों पर वैचारिक टकराव की लंबी स्थिति के बाद भाजपा ने गठबंधन से हाथ खींच लिया।

अब जबकि कोई भी दल सरकार बनाने के लिए सक्षम एवं इच्छुक नहीं था, तो राज्य में एक बार फिर से राज्यपाल शासन के दरवाजे खुल गए। यहां शुरू में ही एक बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन के बजाय राज्यपाल शासन लागू होता है। आम तौर पर भारत के किसी भी राज्य में जब कोई भी दल सरकार बनाने में सक्षम नहीं होता या जनता द्वारा चुनी हुई सरकार संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने में विफल रहती है, तो उस स्थिति में अनुच्छेद-356 के तहत नई सरकार के गठन तक राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है। यहां जम्मू-कश्मीर का मामला थोड़ा अलग किस्म का है। राज्य के संविधान के अनुसार धारा-92 के अंतर्गत यहां राज्यपाल शासन लगाया जाता है।

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में राज्यपाल शासन लागू होने का यह कोई नया मामला नहीं है। वर्ष 1977 से लेकर अब तक आठ बार जम्मू-कश्मीर राज्यपाल शासन झेल चुका है। पिछले महज दस वर्षों की अवधि में ही सूबा चार बार राज्यपाल शासन की स्थिति से गुजर चुका है। राज्य में संविधान के प्रहरी के तौर पर नियुक्त राज्यपाल के हाथों में अब अगले छह माह के लिए राज्य की बागड़ोर रहेगी और जरूरत पड़ने पर इस मियाद को कुछ और समय के लिए बढ़ाया जा सकता है।

यहां से यह देखना दिलचस्प होगा कि संवैधानिक तौर पर चुनी हुई सरकार के गिरने के बाद राज्यपाल शासन के दौरान राज्य की प्रशासनिक दशा व दिशा किस तरह से प्रगति करती हैं। दरअसल पीडीपी-भाजपा गठबंधन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती कहें या विडबंना कि दोनों दलों में वैचारिक एवं नीतिगत धरातल पर बार-बार टकराव देखने को मिला। जहां पीडीपी की संवेदनाएं हमेशा आतंकियों एवं अलगाववादियों के लिए उमड़ती रहीं, वहीं संवैधानिक रास्तों पर बढ़ते हुए भाजपा समूचे सूबे में चैन-ओ-अमन सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत रही। यह कोई छिपा रहस्य नहीं है कि सूबे की सियासत में भाजपा को छोड़कर शेष प्रमुख दल और चेहरे हमेशा से ही इन राष्ट्रविरोधी तत्त्वों की पैरोकारी करते रहे हैं। इन दलों में कोई ऐसा सियासी चेहरा नजर नहीं आता, जिसने सूबे में शांति के इन दुश्मनों की कभी खुलकर निंदा तक की हो। अलगाववादियों और आतंकियों के प्रति सियासत के इसी स्नेह के कारण राज्य में कई सैन्य ऑपरेशन भी प्रभावित होते रहे हैं।

   अब राज्यपाल शासन में सियासी दखल के परे एक अच्छा अवसर है कि इन राष्ट्रविरोधी तत्त्वों के साथ पूरी सख्ती के साथ निपटा जाए। अल्पावधि के लिए ही सही, लेकिन राज्यपाल शासन के दौरान सेना के पास इनसे निपटने के लिए खुली छूट होगी। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि इन्हें खदड़ने में हमारी सेना हर तरह से सक्षम है। हालांकि जम्मू-कश्मीर में कानून का शासन और ‘धरती के स्वर्ग’ पर शांति बहाली के लिए अल्पावधि में किसी तरह के बड़े परिणामों की आशा नहीं की जानी चाहिए। कुछ समय के लिए राज्यपाल शासन एक समाधान साबित हो सकता है, लेकिन लंबे समय के बदलाव हेतु अब एक दूरगामी रणनीति पर कार्य करना होगा।

न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर भले ही भाजपा और पीडीपी ने जम्मू-कश्मीर में सरकार का गठन कर लिया, लेकिन वैचारिक टकराव बार-बार गठबंधन को छीलते रहे। महबूबा सरकार ने जब राज्य की पत्थरमार पलटन के करीब दस हजार आरोपियों के केस वापस ले लिए, तो गठबंधन का दूसरा साथी इस फैसले से सहज महसूस नहीं कर पा रहा था। पिछले चार वर्षों के कार्यकाल में जब-जब आतंकियों या अलगाववादियों के प्रति महबूबा ने उदारवादी नीति अपनाने की कोशिश की, तो शंकाएं बार-बार उभरती रहीं कि गठबंधन आज बिखरता है या कल। पिछले कुछ दिनों के दौरान जिस तरह से हत्याओं का दौर शुरू हुआ, जिसमें बुखारी और औरंगजेब की निर्मम ढंग से हत्या को अंजाम दिया जाता है, वह अंततः गठबंधन टूटने का एक बड़ा कारण बना।

रमज़ान के महीने में केंद्र ने अपनी ओर से एकपक्षीय युद्धविराम घोषित किया था; लेकिन यह भी चेतावनी दी थी कि यदि आतंकवादी कोई दुस्साहस करते हैं तो उनसे उसी तरह सख्ती से निपटा जाएगा। उस दौरान हुई घटनाएं साबित करती हैं कि केंद्र और सेना गाफिल नहीं रही। उन्होंने ईंट का जवाब पत्थर से दिया है।

कुछ लोगों का यह विचार हो सकता है कि सरकार को इस तरह का युद्धविराम नहीं करना चाहिए था; लेकिन सामरिक रणनीतियों से जो वाकिफ हैं वे मानते हैं कि इस तरह की पेशकश रणनीतिक कदम होता है। नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ने का यह छोटा-सा प्रयास होता है और लम्बे समय से चल रहे युद्ध में आम जनता की सहानुभूति पाने के लिए ऐसे कदम जरूरी होते हैं।

रमज़ान का महीना खत्म होते ही हिंदुओं की पवित्र अमरनाथ यात्रा शुरू हुई। अमरनाथ यात्रा हमेशा से ही आतंकियों के निशाने पर रही है। आतंकवादी ताक में हो सकते हैं, लेकिन अपने सुरक्षा बल भी चाकचौबंद हैं। युद्ध जब चल ही रहा है, तब कब क्या अनहोनी होगी, यह कौन बता सकता है? हां, बहुत सतर्कता रखनी होती है और हमारी सेना इसमें कहीं कम नहीं पड़ रही है, पूरी तरह मुस्तैद है। अब राज्य में राज्यपाल शासन चस्पां हो चुका है, तो काफी हद तक उम्मीद की जा सकती है कि सेना बिना किसी प्रभाव में कार्य करते हुए राज्य की आतंकी मंसूबों से सुरक्षा कर पाएगी।

राज्यपाल शासन तो अल्पावधि के लिए है। फिर भी इस शासन से यह उम्मीद अवश्य है कि वह राज्य को आतंकवाद से मुक्त कराने के लिए जमीन अवश्य तैयार करेगा; ताकि आनेवाली सरकार इसी कदम पर चलते हुए धरती के इस स्वर्ग को अमनचैन बहाल करेगी।

 

 

This Post Has One Comment

  1. वार्षिक सभासद होते हुए भी हिंदी विवेक मेरे घर नही मिल रहा है

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