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*****प्रमिला मेढे****** 
महिला घर में, समाज में, कार्यस्थल में, धार्मिक, शैक्षिक, राजनीतिक संस्थानों में असुरक्षित है। स्थान, समय, रिश्ता, जाति, स्तर, इसका विवेक मानो आज लुप्त हुआ है। और गंभीर बात यह है कि अबोध बालक भी घरों में, शिक्षा संस्थानों में, समाज में असुरक्षित हैं। यह लज्जाजनक व चिंता की बात है। इसके खिलाफ कानून बनाने की आवश्यकता तो है ही, स्वयं पहल भी करनी होगी।
भूमि, पशु, पक्षी, वृक्ष, वनस्पति और सभी निर्मिति में देवत्व देखने वाले, हर महिला को देवी मां के रूप में देखनेवाले अपने भारतवर्ष में महिला सुरक्षा प्रश्न निर्माण होना, उसकी गंभीरता बढ़ती जाना, यह बहुत चिंता की एवं लज्जास्पद बात है और इस समस्या का समाधान प्राप्त करने हेतु नए कानून बनाने की आवश्यकता प्रतीत होना यह तो और गंभीर बात है।
दो साल पूर्व दिल्ली में जो ‘निर्भया कांड’ हुआ था उसके कारण यह विषय अधिक चर्चा में आया। उसके बाद तो मानो ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी आई है। हमारा जीवनविषयक दृष्टिकोण एवं वास्तविकता में गहरी खाई निर्माण हुई है जिससे हर संवेदनशील व्यक्ति की बेचैनी बढ़ी है।
असुरक्षितता के कारण
जो अपने देश की भावी आधारभूत पीढ़ी का निर्माण करती आई, जिसको हम मां मानते हैं ऐसी स्त्री, और इस देश की आधारभूत भावी पीढ़ी अर्थात् हजारों बालक आज किन कारणों से, प्रकारों से कितने असुरक्षित हैं इसका विचार करते हुए उसके उपाय के रूप में केवल कानून की भूमिका क्या है, क्या होनी चाहिए उससे अधिक महत्वपूर्ण बात है समाजमन में परिवर्तन लाने के साधन कौन से हैं, इसका सर्वंकष विचार होना आवश्यक है।
‘निर्भया’ दुर्घटना के पश्चात् महामहिम राष्ट्रपति जी से भेंट हुई तब उनका भी यह अभिप्राय था कि हम सभी को एकसाथ योजना बनाना आवश्यक है। इसके मूल कारण देखेंगे तो ध्यान में आता है- १. स्त्री-पुरुष संख्या के अनुपात में असंतुलन २. परिवार, शैक्षिक, सामाजिक, धार्मिक व्यवस्थाओं में स्वाभाविक संस्कार प्रदान प्रक्रिया में बाधा ३. भौतिक संस्कृति का तथा मद्य एवं नशीली दवाओं का प्रभाव ४. प्रचार माध्यमों में प्रस्तुत जीवन। राष्ट्रपति जी के ‘हम सभी’ का मतलब था व्यक्तिगत रूप में तथा परिवार, शैक्षिक, सामाजिक, धार्मिक संस्था/संगठन, शासन, प्रशासन, न्याय व्यवस्था एवं पारंपारिक तथा आधुनिक प्रचार माध्यम की भूमिका में सामंजस्य लाना। यह तो असंभव सा लगता है; परंतु असंभव को संभव बनाने में ही पुरुषार्थ है। अत: उस दिशा में प्रयत्न भी आवश्यक है।
परस्पर विश्वास यह हमारा बल
गंभीरता से विचार करने पर आज यह दिखाई देता है कि महिला घर में, समाज में, कार्यस्थल में, धार्मिक, शैक्षिक, राजनीतिक संस्थानों में असुरक्षित है। स्थान, समय, रिश्ता, जाति, स्तर, इसका विवेक मानो आज लुप्त हुआ है। और गंभीर बात यह है कि अबोध बालक भी घरों में, शिक्षा संस्थानों में, समाज में असुरक्षित हैं। साथ साथ यह भी बात सत्य है कि प्रसार माध्यमों के कारण कोई भी घटना विश्व के किसी भी कोने में तुरंत तो पहुंचती है परंतु कभी विकृत ढंग से भी। प्राय: प्रथम पृष्ठ पर या महत्वपूर्ण स्थान पर अथवा दृश्यचित्रों के माध्यमों से यह समाचार समाज के सामने आता है। ऐसा लगता है कि सारा समाज ही स्त्री की ओर विकृत दृष्टि से देख रहा है और दुनिया में एक भी पुरुष विश्वासार्ह नहीं है। परस्पर विश्वास यह हमारा बल था परंतु आज वैसा नहीं रहा तो सामाजिक तानेबानों पर विपरीत परिणाम दिखाई देता है।
बालकों की सुरक्षितता भी आज खतरे में है ऐसा चित्र प्रस्तुत हो रहा है। बालकों का अपहरण कर मुक्तता हेतु बड़ी राशि फिरौती में मांगना, उनका घरों में, विद्यालयों आदि स्थानों पर शारीरिक, मानसिक शोषण करने हेतु अमानवीय व्यवहार करना, भीख मांगने के बहाने मजबूरी से चोरी, जासूसी करवाना, आदि कई प्रकार उजागर हो रहे हैं। शिक्षा के मूलभूत अधिकार से, बालसुलभ इच्छाओं से वे वंचित रहते हैं। शारीरिक जबरदस्ती से उनका भावविश्व उखड़ जाता है। एक नाजुक कली खिलने से पूर्व ही मुरझा जाती है।
हमारी गाड़ी एक बार लाल बत्ती के कारण चौक में खड़ी थी। दो बहुत प्यारे दिखनेवाले बालक गाड़ी के पास खड़े करुण स्वर में भीख मांग रहे थे। उनसे कहा कि भीख मांगने से अच्छा है हमारे साथ चलो, छोटा मोटा काम करो। हम कपड़े, भोजन देंगे। स्कूल में भी पढ़ाएंगे। परंतु यह उनको रास नहीं आया। चेहरे पर भय, लाचारी, नाराजगी के भाव प्रकट हुए। समाज की दयाभावना का अनुचित लाभ लिया जा रहा है या मजबूरी है यह पता लगने से पूर्व ही बत्ती हरी हुई, गाड़ी चल पड़ी।
दादा की दादागिरी
रेल प्रवास में डिब्बे की सफाई करने हेतु पहले कई छोटे बालक आते थे। आजकल उनकी संख्या बहुत कम हुई। वे झाडू लगाते-कूड़ा कचरा उठाते। उनके कपड़े फटे हुए, चेहरे पर लाचारी का भाव होता था। मन में आता था कि अपने पास पर्याप्त भोजन है- खाने की कुछ टिकाऊ चीजें भी हैं, तो उनको दें-उनके भाई बहनों को भी कुछ खाने को मिलेगा। मैंने उनको कुछ देना चाहा। परंतु वे दो बालक खाने पीने की चीजें लेने को तैयार नहीं थे। उनको प्यार से, ममतायुक्त स्वरों से पूछा, ‘कुछ तो खा लो, कब खाना खाया था?’ उनकी आंखों में आंसू आ गए। एक ने बताया, ‘नहीं, मां जी, ये चीजें लेने के लिए हम स्वतंत्र नहीं हैं। इस गाड़ी में हमारा एक दादा है। उसको हमें निश्चित राशि देनी पडती है नही तो वह हमको पीटता है, गालियां देता है- भूखा भी रखता है। उसको चाहिए पैसे, भोजन नहीं। केवल आसुरी, शारीरिक आनंद। हमारे मां-बाप हमारी चिंता करने की परिस्थिति में नहीं है।’
शहर में घूमते समय ऐसा ध्यान में आया कि विशिष्ट चौराहों पर विशिष्ट समय भीख मांगने वाले विशिष्ट चेहरे दिखते हैं। उनको भी इसी प्रकार से खरीदा गया है। जो किशोरवयीन बालिकाएं थीं राहगीर उनसे कई प्रकार की हरकतें करते और पैसे देते। ये सभी किसी ने खरीदी हैं क्या? चौराहे पर पुलिस खड़ी होती है, इतने सारे लोग- वाहनवालों की बात छोड़ो-पैदल जानेवाले-चौराहें पर ऐसे ही खड़े रहनेवाले लोग होने के बावजूद भी ये सारी बातें होती रहती हैं।
शोषण के प्रकार

बालक एवं महिलाओं के शोषण का अर्थात् असुरक्षितता का और एक तरीका है। उनको जबरदस्ती से बेचना या जासूसी, तस्करी या आतंकवादी गतिविधियों में लगाना या ‘मानवी बम’ के रूप में उनका उपयोग करना। कभी कभी पुरुष अपनी पदोन्नति के लिए भी महिलाओं को दांव पर लगाते। राष्ट्रविघातक तत्व उनका अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन करते हैं। सरोगसी एवं लिव इन रिलेशनशिप, यह भी महिलाओं के लिए एक गंभीर चुनौती है। इस विषय में कानूनी संरक्षण नहीं है, अत: कई बार वे अपना जीवन समाप्त करती हैं।
ऐसे विविध प्रकारों से होनेवाले दुरुपयोग से उसकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, नैतिक सुरक्षितता दांव पर लगती है यह विदारक सत्य है। प्रारंभ में अनिच्छा से, कभी आर्थिक, शारीरिक या नवीनता के आकर्षण से, चलते चलते वह सहज स्वीकारने की मानसिकता भी बनती है क्या? यह गंभीर प्रश्न है।
यह भी विचारणीय है कि हमारे समाज में ऐसी गिरावट क्यों आई है? महिलाओं का सम्मान राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मानबिंदु था वह क्यों बदला?
कई बार तो हम उत्तर देते हैं कि देश पर विदेशी आक्रमण होते रहे-शक, हूण, अफगाण, इस्लाम, ईसाई। सभी में आसुरी आनंद तथा क्रूरता थी। हमारे मानबिंदुओं पर प्रहार कर अपमानित करना उनकी नीति रही। स्त्री केवल उपभोग की वस्तु मानने की उनकी मानसिकता थी। सारा विश्व हमारे उपभोग के लिए ही निर्माण हुआ है। हमारी ही विचारधारा सारे विश्व पर थोपना है तो इसकी संवाहिनी स्त्री-जिसको यहां ‘मां’ माना जाता है- को फुसलाना है। उपभोग लालसा निर्माण कर उसको परिवार से तोड़ने हेतु साम-दाम-दंड-भेद सारे उपाय करके अपनी संख्या बढाकर सत्ता प्राप्त करना यह उनकी धारणा थी। इसीलिए स्त्री पर अत्याचार करके अपमानित करना, प्रतिष्ठा भंग करना और साथ साथ उसको व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में भी उलझाने की, पारिवारिक दायित्व बोध से हटाने की योजना बन गई।
जब किसी बीमारी का फैलाव होता है तो कुछ लोग तुरंत प्रभावित होते हैं, कुछ थोड़ी देर के बाद और कुछ बिलकुल नहीं। उस व्यक्ति की प्रतिकार शक्ति पर यह निर्भर होता है- लगातार यह आक्रमण होता रहा तो वह प्रतिबंधक, प्रतिकार शक्ति भी दुर्बल होती है। वैसा ही हमारे समाज का हुआ। विविध प्रकार के आक्रमणों की वारंवारिता और तीव्रता, उनकी सोची-समझी योजना ये भी प्रभावी महत्वपूर्ण कारण है। वर्तमान दुरावस्था की जो बात बार बार सुनते हैं, देखते हैं वे गलत होने पर भी प्रभावी बन जाती है और धीरे धीरे जीवनविषयक धारणाओं में बदल होता है।
मनुष्य को केवल शरीर मानना और वह शरीर भी एक ही बार प्राप्त होता है इसलिए इस एक जन्म में ही शरीर को सब प्रकार के उपभोग साधन उपलब्ध कराना है। इस भौतिकताप्रधान ‘चार्वाक’ जीवनदर्शन का प्रभाव बढ़ा। निसर्ग के सारे घटक और वे भी पर्याप्त नहीं हैं ऐसा लगने के कारण स्त्री और बालक-समाज के ये दो घटक भी जन्मदिन, विवाह की वार्षिकी, मॉडेलिंग, बॉयफ्रेंड, कॉल गर्ल्स, चिअर गर्ल्स, बार बालिकाएं, सौंदर्य प्रतियोगिताएं, रेव पार्टी, वीक एंड पार्टी के शिकार हुए हैं। आज मैं बंगलुरू में हूं- ‘डेक्कन हेरॉल्ड’ में एक समाचार पढ़ रही हूं कि बंगलुरु के एक रेस्टारंट में सेंटल क्राइम ब्रांच ने छापा मार कर पंद्रह बालिकाओं को मुक्त किया। उनको बहुत कम कपड़ों में ग्राहकों की सेवा करने एवं नृत्य करने को मजबूर किया जाता था। उन पर पैसे भी फेंके जाते थे जो पूर्णत: कानून विरोधी है। आज कल ऐसे भी समाचार आते हैं कि बालकों पर ‘कामोत्तेजक हमला’ (‘सेक्शुअल अटैक’) किया जाता है या उनको चोरी भी करने की जबरदस्ती की जाती है, क्यों कि बाल अपराधियों को कम सजा होती है परंतु ऐसी गलत बातें बार बार दोहराने से वे बालक या वे युवतियां पेशेवर अपराधी बन जाती हैं। यह खतरा न समाज गंभीरता से लेता है न सुरक्षा विभाग-जो समाज का ही एक अंग है। किसी महिला बस कंडक्टर को बस से बाहर फेंका जाता है, तो न सहप्रवासी बस रोककर इस व्यक्ति को पुलिस के हवाले करते हैं, न रास्ते से जानेवाले लोग। वे सब मूकदर्शक होकर खड़े रहते हैं।
बहादूर लडकियां
परंतु पिछले सप्ताह ही रोहतक में बस में इस प्रकार की छेड़खानी करने वाले युवकों को दो युवतियों ने धैर्यपूर्वक पीटा। तब भी सहप्रवासी देखते रहे। किसी ने भी उन मनचलों को रोकने की या उन युवतियों को मदद करने की तत्परता नहीं दिखाई।
जानलेवा उदासीनता
समाज में अपराधी प्रवृत्ति बढ़ना एक अलग बात है परंतु अलिप्तता से उसकी कृति देखते रहना, उस बात को नहीं रोकना यह और भयावह बात है। स्वा. वी. सावरकर जी ने इसलिए व्यथित मन से पुस्तक लिखी है ‘मला काय त्याचं’ (मेरा क्या संबंध)। संपूर्ण अलिप्तता यहीं कारण है कि ‘निर्भया’ कांड की बार बार पुनरावृत्ति होना और समाज का नितांत संवेदनहीनता से वह देखते रहना। यहीं वह भारत है क्या जहां एक स्त्री के अपमान के कारण रामायण और महाभारत घटा। स्त्री को अपमानित करनेवाले अपराधियों को दंड दिया गया। यह भी नकार नहीं सकते कि आज वीरों का वह रक्त जिनकी नसों में है ऐसे समाजघटक अस्तित्वमान नहीं है। परंतु वे अकेले हैं या अनिर्णय की स्थिति में हैं। उनको सामूहिक रूप से सजग, सक्रिय बनना, बनाना आवश्यक है। केवल इतना ही नहीं तो यह समस्या या संकट संपूर्ण राष्ट्र को अपमानित करनेवाला है ऐसी तीव्र संवेदना व्यापकता से जगाने की आवश्यकता है।
रचनात्मक उपाय
‘निर्भया’ कांड होने पर हजारों युवक-युवतियां प्रतिक्रियां प्रकट करने हेतु स्वयंप्रेरणा से आगे आए, मूक मोर्चा निकाल कर हजारों मोमबत्तियां जलाते रहे। उसी समय कुछ नागरिकों ने एक प्रस्ताव दिया था कि केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। समाज में जिनके बारे में नितांत श्रद्धा और विश्वास है ऐसे सभी जननेता उन युवक-युवतियों को शपथ दें। ‘‘मैं स्वयं ऐसा घृणास्पद कृत्य नहीं करूंगा, मेरी उपस्थिति में होने नहीं दूंगा, हुआ तो प्रतिकार करूंगा, न्याय मिलते तक संघर्ष करूंगा।’’ पर ऐसा हुआ नहीं। गरम हवा ठंडी हुई। ऐसे प्रतिकार करनेवाले अकेले अकेले युवकों पर ही जानलेवा हमला हुआ। उनके पीछे कोई खड़ा नहीं हुआ या बुलंद आवाज सामूहिकता से नहीं उठाई।

महिलाओं की भूमिका
अबोध बालिकाओं की बात छोड़ दें, स्वयं महिलाओं को भी अपना आत्मबल बढ़ाकर स्वसंरक्षण की सिद्धता, कुशलता प्राप्त करना आवश्यक है। साथ साथ और अपनी महत्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी न कर उपलब्ध साधनों का विवेकपूर्ण उपयोग कर, उच्छृखंलता भी छोड़ना है। दिव्य संस्कारप्रदान का स्रोत बनना है।
हम सभी तेजस्वी भारत माता की संतान लाचार या मजबूर होकर गलत नहीं होने देंगे। जहां जहां सुजनता के, सामूहिकता के, देश और धर्म के प्रति कर्तव्य के संस्कार दिए जाते हैं वे सारे घटक इस संदर्भ में कृति योजना बनाए। पीड़ित व्यक्ति या बालक मेरी ही अपनी बेटी-बेटा है या पोता-पोती है, उस पर होनेवाला किसी भी प्रकार का अन्याय हम सहन नहीं करेंगे। अपनेपन की इस भावना के कारण उदासीनता, संवेदनहीनता का वातावरण दूर होगा। मेरे अपनों के हित के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं या कर सकता हूं यह मूलभूत संस्कार है। सब कुछ शासन, प्रशासन या कानून के सहारे बदल जाएगा यह मानना कहां तक ठीक है?
हम सब संवेदनशील बनें
फिर भी कानून का एक अलग महत्व है। कानून बनाने से भी महत्व की बात है कि कानून लागू करनेवाली व्यवस्थाएं जाग्रत रहें, सतर्क रहें, संवेदनशील रहें और न्याय्य कानून सख्ती से लागू करें। कानून का आज किसी को भय नहीं है। पैसे से या गैरकानूनी तरीके से न्याय खरीदा जाता है, ऐसा प्राय: दिखाई देता है। विविध उपक्रमों के लिए संस्थाओं को, राजनीतिक दलों को निधि उपलब्ध कराने वाले बलदंड लोगों का दबाव रह सकता है। और पारिवारिक, शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक सज्जन शक्ति अपने चिंतन में मग्न होने के कारण सक्रिय बनकर समर्थता से अपनी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं रहीं। धार्मिक संस्थान भी आज संशय के घेरे में हैं। तो क्या इसमें से रास्ता नहीं है? ऐसा तो हो ही नहीं सकता। हर राष्ट्रभक्त नागरिक के विवेक को एवं मातृशक्ति की परिवर्तन क्षमता को आव्हानात्मक आवाहन स्वीकार कर कानूनी जानकारी रखते हुए सभी समाज घटकों को संवेदनशील बनाना होगा। मध्यरात्रि के गहन अंधकार में ही सूर्योदय की आहट होती है यह सृष्टि का नियम सिद्ध करना है।

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