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संविधान ने हमें हमारा सार्वभौमत्व प्रदान किया है। उसमें समता, स्वतंत्रता, जीने का अधिकार, कानून का राज, उपासना की स्वतंत्रता, स्त्री-पुरुष समानता इत्यादी हैं। इसका अर्थ और सामर्थ्य हमें समझना चाहिए। इसके लिए संविधान का वाचन, मनन, चिंतन करते रहना चाहिए।

संविधान ने हमें क्या दिया है? यह प्रश्न यदि किसी ऐसे व्यक्ति से पूछा जाए जिसे संविधान के विषय में ज्यादा कुछ पता नहीं है तो शायद उत्तर मिलेगा कि, इस संविधान ने हम पर केवल आरक्षण थोपा है, बाकी इस संविधान ने हमें कुछ नहीं दिया। सर्वसामान्य व्यक्ति की यह राय बिलकुल गलत है। यह सही भी हो तो भी उसकी राय ऐसी क्यों बनी? यह विचारणीय प्रश्न है। रोटी क्यों जली?, घोड़ा क्यों अड़ा, और पान क्यों सड़ गया? इन तीनों ही प्रश्नों का उत्तर एक ही है- अर्थात न घुमाने, न पलटने के कारण। इसी प्रकार संविधान के संबध में ऊपर जो उत्तर सुनने को मिलता है वह इसीलिए कि संविधान ने हमें क्या दिया है यह किसी को बताया नहीं गया, बताया नहीं जाता। जो कुछ बताया जाता है वह यह कि यह बाबासाहेब का संविधान है, इस संविधान ने हमें आरक्षण दिया है, इसको यदि हाथ लगाया तो याद रखना! इसलिए सर्वसामान्य व्यक्ति को लगता है कि संविधान ने तो आरक्षण दिया है।

संविधान और आरक्षण के संबध में मेरी पुस्तक ‘हम और हमारा संविधान’ में एक अलग अध्याय है। इसलिए इस विषय में यहां कुछ ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी जैसे-जैसे इस लेख का विस्तार होगा वैसे-वैसे और आवश्यक स्थान पर आरक्षण के बारे में अपनी राय प्रस्तुत करना ही होगा।

किसी भी देश का संविधान-चाहे वह अमेरिका का हो, कनाड़ा का हो या जापान का हो-उस देश के लिए एक काम अनिवार्य रूप से करता है। वह यह बताता है कि उस देश की राज्य व्यवस्था किस पध्दति की होगी, जनता किन कानूनों के अंतर्गत रहेगी, राज्य शासन किस कानून से चलेगा, जनता के मौलिक अधिकार कौनसे होंगे एवं उनकी रक्षा कैसे होगी। अपने देश का संविधान भी यही काम करता है। अन्य देश और अपने भारतवर्ष में बहुत अंतर है। हमारा देश बहुत प्राचीन है। इतिहासकार इसे दस हजार साल पुराना बताते हैं। अमेरिका सन् 1783 में सच्चे अर्थों में अस्तित्व में आया। कनाड़ा और आस्ट्रेलिया ये देश तो अमेरिका से उम्र में और भी छोटे हैं। जिस देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित हुई उस इंग्लैण्ड का इतिहास भी बारह सौ साल से अधिक का नहीं है।

भारत का इतिहास यद्यपि अतिप्राचीन है तब भी भारत एक राजनीतिक संस्था, जिसे राजनीति-शास्त्र में ‘स्टेट’ कहते हैं, के रूप में अस्तित्व में नहीं था। सम्राट अशोक का साम्राज्य इसका अपवाद है। भारतीय इतिहास में अनेक छोटे-छोटे राज्य थे, जोे आपस में समझदारी से या एक दूसरे से युध्द करते हुए अस्तित्व में थे। सभी प्रकार की राज्य वयवस्था हमारे देश में थी। कहीं गणराज्य थे तो कहीं राजशाही थी। राजशाही भी अमर्याद सत्ता की राजशाही नहीं थी। उस पर भी कई बंधन थे। भगवान गौतम बुध्द के काल में लिच्छवी, वैशाली, मगध, पांचाल इ. असंख्य राज्य थे। इन सब राज्यों को मिलाकर एक संघ बनाया जाए, या आज की भाषा में कहें तो संघराज्य बनाया जाए (जैसा कि अमेरिका एक संघराज्य याने फेडरल स्टेट है) ऐसा विचार तब किसी ने प्रकट नहीं किया। शायद तब इसकी किसी को आवश्यकता महसूस नहीं हुई। अमेरिका फेडरल इसलिए हुआ क्योंकि वह अमेरिका की आवश्यकता थी। इतिहास में भारत की वैसी कोई आवश्यकता नहीं थी।

छोटे-छोटे राज्य होने के बावजूद भारत एक राष्ट्र था। वह जैसा कल था, वैसा आज भी है और कल भी रहेगा। राष्ट्र बनने हेतु एक संस्कृति की आवश्यकता होती है जो सभी को बांध कर रख सके। पहले राज्य अलग-अलग थे परंतु सब की संस्कृति एक थी। जीवन मूल्यों की परंपरा एक थी। सामान्यत: सब के श्रध्दास्थान एक थे। भारत पूज्यभूमि है, यह भाव सबके मन में था। डॉ. बाबासाहेब अपनी ‘कास्ट इन इंडिया’ पुस्तक में लिखते हैं कि भारत में अनेक जातियां होने के बावजूद उनमें गहराई तक सांस्कृतिक एकता है। राजनीतिक एकता नहीं है; फिर भी सांस्कृतिक एकता वाला भारत विश्व का अनोखा देश है। यह इतिहास इसलिए समझना आवश्यक है क्योंकि बिना इसे समझे संविधान ने हमें क्या दिया है, इसका उत्तर नहीं मिलता।

हमारे संविधान ने सबसे पहले सब भारतीयों को एक राजनीतिक व्यवस्था प्रदान की। पुन: अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना हो तो हमें एक ‘स्टेट’ दिया। आज भारत में अनेक भाषाओं के राज्य हैं। परंतु ये राज्य महाभारत काल या गौतम बुध्द के काल या इस्लामी आक्रमण के काल के तरह स्वतंत्र, सार्वभौम एवं स्वत: की सेना रखने वाले राज्य नहीं हैं। वे राज्य व्यवस्था के खंड हैं। हम सब का राज्य एक ही है अर्थात भारत याने ‘इंडियन स्टेट’। भारत के सभी छोटे-छोटे राज्यों को इस संविधान द्वारा एक सार्वभौम सत्ता के अंतर्गत लाया गया। ऐसा यदि नहीं होता तो, अंग्रेजोें का राज आने के पूर्व या इस्लामी आक्रमण के काल में अनेक राज्यों में खंडित भारत की जो स्थिति थी वही स्थिति आज भी होती। क्या कहें कि आज जो भारत हमारे सामने है वह होता भी या नहीं भी? चीन उसे कब का निगल चुका होता। हमारे पड़ोसी तिब्बत को चीन ने सहजता से निगल लिया। इसलिए इस संविधान ने हमें सर्वप्रथम जो दिया वह है भारत नाम की एक राजनीतिक संरचना, जो सार्वभौम है और अविच्छेदनीय है अर्थात जिसके टुकडे नहीं किए जा सकते हैं।

कवि प्रदीप की रचना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी’ प्रसिद्ध है। कवि कहते हैं कि हिमालय पर लड़ने वालों में कोई सिख था तो कोई गुरखा, कोई मद्रासी था तो कोई मराठा परंतु जिनका रक्त गिरा वे सब भारतीय थे। इतिहास में थोड़ा पीछे जाए। चीन से युध्द सन् 1962 में हुआ। सन् 1761 में पानीपत का तीसरा युध्द हुआ। इस लड़ाई में एक लाख मराठा स्त्रियां विधवा हुईं।  इतिहासकारों का कहना है कि एक लाख मराठा वीर मृत्यु को प्राप्त हुए। परंतु उस समय कोई प्रदीप नहीं हुआ और न कोई अमर गीत ही लिखा गया। इस लड़ाई में न कोई सिख था, न राजपूत, न मद्रासी। सिर्फ थे तो मराठा। वे अपने देश, अपने धर्म के लिए लड़े; परंतु भारत के अन्य लोगों को नहीं लगा कि वे हमारे लिए शहीद हुए। 1962 में जो वीर गति को प्राप्त हुए, चाहे वे किसी भी प्रांत के क्यों न हो, वे भारतीय थे यह भावना निर्माण हुई। इस भावना के निर्माण होने के असंख्य कारण हैं। उनमें एक कारण हमारा संविधान है।

“हम सब भारतीय हैं” यह संकल्पना संविधान ने हमें दी है। मैं किसी भी प्रदेश में रहूं, मेरी भाषा कोई भी हो, मेरी रूढ़ी-परंपराएं अलग होंगी, परंतु इस सब के बावजूद मैं भारतीय हूं, यह भावना संविधान ने हमारे मन में निर्माण की। मैं सांस्कृतिक दृष्टि से एवं संस्कृति से भारतीय हूं यह भावना तो बहुत पुरानी है। परंतु मैं राजनीतिक दृष्टि से भी भारतीय हूं, भारत मेरा देश है, और मैं इस देश का नागरिक हूं यह भावना भी संविधान ने निर्माण की है। यूरोप में जिस प्रकार छोटे-छोटे देश हैं, वैसे देश के भी टुकडे हों, भारत का बाल्कनाइजेशन हो इसके लिए अनेक विदेशी शक्तियां भारत में और भारत के बाहर कार्य कर रही हैं, किंतु उन्हें बहुत सफलता नहीं मिल रही है। मिलने की संभावना भी नहीं है। इसके अनेक कारण हैं। उसमें एक मुख्य कारण हमारा संविधान है, जो इस मनोवृत्ति के विरुद्ध पर्वत जैसा खड़ा है। वह हमें विभाजित नहीं होने देगा।

भारत में हजारों जातियां हैं। वे एक दूसरे से अलग हैं।  सैंकड़ों उपासना पंथ हैं, उनके आराध्य अलग हैं। उनकी धार्मिक परंपराएं अलग हैं। परंतु, जाति एवं धर्म के आधार पर देश का विभाजन न हो इसकी व्यवस्था संविधान में की गई है। इस्लामी एवं अंग्रजों के आक्रमण के पूर्व भारत ऐसे ही विविध टुकड़ों में विभाजित था। उस विभाजन को दूर कर अंग्रेजों ने पूरे भारत के लिए एक शासन व्यवस्था कायम की और उसे उन्होंने  अपनी पद्धति से लागू किया। अंग्रेजों ने इस देश को क्रूरता से लूटा, अनेक गलत बातें कीं।  फिर भी, यह सच है कि उन्होंने संपूर्ण भारत को एक राजनीतिक व्यवस्था में बांधा। इसेे हम नकार नहीं सकते। भारत छोड़ते समय अंग्रेजों ने उसे अनेक टुकड़ों में बांटने का प्रयत्न किया। पकिस्तान का निर्माण किया। भारत की पांच सौ से अधिक रियासतों को स्वतंत्रता दी। उनमें से कुछ रियासतों ने तो स्वतंत्र एवं सार्वभौम रहने का विचार भी किया। परंतु, सरदार वल्लभाई पटेल ने अत्यंत कुशलता से इस सब रियासतों का भारत में विलय करा दिया। सब को राजनीतिक रूप से एक करने का काम हमारे संविधांन ने किया।

इस संविधान ने हमें सार्वभौमत्व दिया है। राज्य व्यवस्था के संदर्भ में सार्वभौमत्व सबसे महत्व का विषय होता है। राजशाही में राजा एवं राजघराना सार्वभौम होता है। राजा कहता है कि मैं परमेश्वर का अंश हूं और मेरे कायदे का उद्गम परमेश्वर से है। तानाशाही में तानाशाह सार्वभौम होता है। वह कहता है कि लोगों को क्या समझता है। लोगों का हित-अहित किसमें है यह केवल मैं जानता हूं। इसलिए  मैं कहूं वही कानून एवं उसका पालन सब को चुपचाप करना है। एक दलीय तानाशाही में दल के सर्वेसर्वा कहते हैं कि देश कैसे चलाना है यह केवल उस दल को ही पता है। सर्वसामान्य लोगों को उसमें कुछ नहीं समझता। इसलिए उस दल की सत्ता एवं उसका कार्यकारी मंडल ही सार्वभौम है। हमारे संविधान ने सार्वभौमत्व की इन कल्पनाओं को नकार दिया है। संविधान ने सार्वभौमत्व भारतीय जनता को दिया है। भारतीय जनता याने आप और मैं, मजदूर, कारखाने में काम करने वाले कर्मचारी, खेती करने वाले किसान, शाला में पढ़ाने वाले शिक्षक, रास्ते पर बैठ कर बिक्री करने वाले सामान्य विक्रेता- ऐसे सब सामान्य लोगों को यह सार्वभौमत्व दिया है।

सार्वभौमत्व का अर्थ क्या है? सार्वभौमत्व यानी अपार शक्ति, संभव-असंभव शक्ति, अपना निर्णय स्वयं करने की शक्ति, अपना भविष्य स्वयं बनाने की शक्ति, अपनी रक्षा, संवर्धन और विस्तार करने की शक्ति। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि, प्रत्येक जीव परमात्मा का अंश है। जिस प्रकार परमात्मा के पास अपार शक्ति होती है, ब्रह्मांड निर्माण करने की शक्ति होती है और उसे सुचारू रूप से चलाने की शक्ति होती है व शक्ति प्रत्येक जीव में होती है। इसलिए स्वयं को दुर्बल न समझें। मैं उस अपार शक्ति का अंश हूं और उस शक्ति की यदि मुझे पहचान हो जाए या वह शक्ति यदि मुझ में जागृत हो जाए तो मैं भी अपार काम कर सकता हूं। यह हुआ आध्यात्मिक विचार। यह आध्यात्मिक विचार हमें बताता है कि इस अपार शक्ति को यदि हमें जगाना है तो कर्मयोगी बनें, ज्ञानयोगी बनें, योग साधना करें, स्वतः को पहचानें। परंतु इस मार्ग से सामान्य व्यक्ति जाना नहीं चाहता। वह प्रवचन सुनता है, किताबे पढ़ता है और मैंने बहुत कुछ पढ़-सुन लिया है ऐसा उसे लगता है। वह वहीं रुकता है और फिर अपने सांसारिक कामों में व्यस्त हो जाता है।

संविधान का सार्वभौमत्व आध्यात्मिक सार्वभौमत्व नहीं है। वह भौतिक सार्वभौमत्व है। उसका उपयोग करना होता है। वह कैसे करना यह संविधान हमें बताता हैं। संविधान ने हमें बताया है कि हमारे शासन का चुनाव हमें ही करना है। वह चुनने की एक शक्ति हमारे हाथ में भी है। एक राजनीतिक अधिकार दिया है। यह अधिकार है मतदान का। हम पर शासन कौन करेगा? यह हमें ही तय करना है। किसी एक परिवार या दल को यह तय नहीं करना है। सार्वभौमत्व की यह अपार शक्ति हम प्रत्येक के साथ है। शक्ति वास्तव में क्या है, यह जिसे समझता है वही उसका सही तरीके से उपयोग करता है। उसका उपयोग समझदारी से किया तो वह शक्ति हमारे लिए लाभदायक होती है और यदि आंख मूंद कर उस शक्ति का उपयोग किया तो वही शक्ति हमारे लिए संकट बन सकती है। हम ही हमारे रक्षक, भक्षक और उद्धारकर्ता हैं। हमारे सार्वभौमत्व का यही अर्थ है।

कई बार ऐसा होता है कि राज्य व्यवस्था या राज्य कर रहे लोग हमें नापसंद होते हैं। ऐसे समय कोई महत्वाकांक्षी राजनेता उभरता है, जो लोगों की भावनाओं को अच्छी तरह समझता है। वह उन भावनाओं को उत्तेजित करता रहता है। अत्यंत भड़काऊ भाषण देता है। लोगों को वह सब पसंद आता है और लोग उसके पीछे लामबंद होने लगते हैं। वह कहता है कि मुझे सत्ता दो मैं आपका भला करूंगा। जनभावनाओं पर सवार होकर वह उसेे जिस दिशा में चाहिए उस दिशा में जनता को मोड़ता है। यह अत्यंत खतरनाक मार्ग है। अपना सार्वभौमत्व किसी के चरणों अर्पण करना पागलपन है। इस प्रकार का पागलनपन यदि किया तो इसाप नीति के घोड़े जैसी हमारी अवस्था होती है।

एक जंगल में बारहसिंघा एवं घोड़े में भयंकर लड़ाई होती है। घोड़ा बारहसिंघा का कुछ भी नुकसान नहीं कर पाता है। घोड़े के मन में विचार आता है कि इस बारहसिंघा को मजा चखाना चाहिए, उसे ठीक करना चाहिए। परंतु वह सोचता है कि मैं अकेला तो कुछ नहीं कर सकता, किसी की मदद लेनी पड़ेगी। इसलिए वह मनुष्य के पास आता है। उससे कहता है कि इस बारहसिंघे को ठीक करने के लिए क्या तुम मेरी सहायता करोगे? तुम ऐसे करो कि मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें बारहसिंघे तक ले जाता हूं। तुम उसे मार देना। मनुष्य कहता है, मैं जरूर करुंगा, परंतु उसके लिए मुझे तुम्हारी पीठ पर जीन कसनी पड़ेगी। तुम्हें लगाम बांधनी पड़ेगी, जिससे मैं जहां चाहूं उस तरफ तुम्हें मोड़ सकूं। घोड़ा यह स्वीकार कर लेता है। मनुष्य घोड़े की पीठ पर सवार होकर बारहसिंघे को मार डालता है। घोड़ा मनुष्य को कहता है कि मेरा काम हो गया, तुम अब मेरे पीठ से उतर जाओ। मनुष्य कहता है, अरे तू तो मेरे बहुत काम का है। मैं तुझे दाना-पानी दूंगा; परंतु तुम्हारी पीठ पर कसी जीन नहीं उतारूंगा। इस प्रकार हम सार्वभौम तो है, लेकिन हमें उस घोड़े के समान व्यवहार नहीं करना है। हमारा सार्वभौमत्व, हमारे मूलभूत अधिकार संविधान के भाग 3 में वर्णित है। उसमें समता, स्वतंत्रता, जीने का अधिकार, कानून का राज, उपासना की स्वतंत्रता, स्त्री-पुरुष समानता इत्यादी हैं। इसका अर्थ और सामर्थ्य हमें समझना चाहिए। इसके लिए संविधान का वाचन, मनन, चिंतन करते रहना चाहिए।

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