हिंदी विवेक : we work for better world...

गोपाल के पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न थी, फिर भी उसके पिता की इच्छा थी कि उसे पढ़ा-लिखा कर एक अच्छा इंसान बनाए। इसीलिए मां के स्वर्गवास के बाद भी उसके पिता ने उसकी कमी महसूस न होने दिया था। पर दुर्भाग्य से गोपाल के ऊपर मुसीबत का पडाड़ टूट पड़ा। उसकी पढ़ाई अभी पूरी भी न हो पायी थी कि पिता की छत्रछाया भी उसके सिर से उठ गई। गांव के चाचा-चाची प्रारम्भ में दो -तीन माह तक लोकलाज के भय से उसके प्रति दयाभाव दिखाते रहे, किन्तु धीरे-धीरे उन लोगों ने भी अपना रंग दिखाना शुरू का दिया। गोपाल को पढ़ाने-लिखाने की कौन कहे, उसे दो समय का भोजन देना भी उन्हें बोझ लगने लगा।

      चाचा-चाची के व्यवहार से दु:खी होकर गोपाल अपने भविष्य को लेकर चिंतित था। वह शहर चला आया। यहां उसे आशा की किरण दिखाई पड़ी और वह उसी राह चल पड़ा।

      अपने एक परिचित हमदर्द के सहयोग से गोपाल ने टेम्पो चलाना सीख लिया। अब वह रात में टेम्पो चलाता और दिन को विद्यालय जाता। इसी तरह अपने भविष्य को संवारने में वह लगा था कि एक शाम जब वह टेम्पो लिए शहर के चौक पर खड़ा था, एक सज्जन बड़ी हड़बड़ी में आए और उसके टेम्पो में बैठ कर बोले-जल्दी से रेलवे स्टेशन चलो, गाड़ी पकड़नी है। गोपाल उन्हें लेकर स्टेशन पहुंचा तो इलाहाबाद की ओर जाने वाली उनकी गा ्री प्लेटफार्म पर खड़ी थी। वह हड़बड़ी में टेम्पो में अपना बैग भूल गए।

      पहले तो गोपाल ने सोचा की सवारी को बैग की याद आने पर वापस अवश्य आएगी पर जब गाड़ी चली गई और घंटों वहीं इंतजार करने के बाद भी बैग लेने वह सज्जन नहीं आए तो निराश होकर उसने बैग खोल कर देखा तो उसकी आंखें खुली की खुली ही रह गईं। उसमें पूरे पचास हजार रुपये थे। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि क्या करें, तभी उसने एक डायरी निकाल कर देखा तो उसमें हिसाब-किताब के साथ पता भी लिखा था, जो इलाहाबाद का था।

      गोपाल बैग को टेम्पो में छुपाए रात भर सवारियां ढोता रहा। सुबह हुई तो टेम्पो को मालिक के यहां रख कर विद्यालय न जाकर रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा। गाड़ी पकड़ कर इलाहाबाद पहुंचा। डायरी पर लिखे पते को तलाशते हुए एक कोठी के सामने पहुंचा। बाहर नौकर मिला तो उससे पूछने पर पता चला कि यह सेठ का मकान है। गोपाल ने सेठ से मिलने की इच्छा जाहिर की तो नौकर उसे सेठ से मिलाने कोठी के अन्दर ले गया।

      सेठ को गोपाल का चेहरा तो याद नहीं था परन्तु अपना बैग उसके हाथ में देख कर उसे तुरंत पहचान गए। बैग को उससे लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो गोपाल ने स्वयं ही उन्हें थमाते हुए कहा-लीजिए, आप ही गाड़ी पकड़ने की जल्दी में मेरे टेम्पो में इसे छोड़ आए थे।

      बैग को सेठ ने तुरंत खोल कर देखा तो उसमें रखे पूरे पैसे सुरक्षित थे। सेठ की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने गोपाल की ओर पुरस्कार पांच हजार रुपये बढ़ाया तो वह पीछे हटते हुए बोला-सेठ जी, अगर मुझे आपसे कुछ लेना ही होता तो यह पैसा ही देने यहां तक क्यों आता?

      गोपाल की बातों से सेठ बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा-तुम चाहो तो मेरे यहां ड्राइवर की नौकरी कर सकते हो।

      सेठ की बातों के प्रत्युत्तर में गोपाल बोला-सेठ जी! पहले तो मैं कोई प्रतिदान स्वीकार करना नहीं चाहूंगा- दूसरे अगर मैं आपके यहां ड्राइवर की नौकरी स्वीकार कर लूंगा तो मुझे तुरंत पैसों का लाभ मिल सकता है, पर मैं जिस लक्ष्य के लिए टेम्पो चला रहा हूं वह पूरा न होगा। मैं अध्यापक बनना चाहता हूं। टेम्पो चलाने के साथ-साथ विद्यालय पढ़ने जाता हूं। गोपाल ने अपना लक्ष्य स्पष्ट किया तो सेठ ने कहा कि अगर पुरस्कार नहीं लेते तो मत लो, मगर मार्ग व्यय तो ले लो।

      ‘पुरस्कार की राशि किसी ऐसे बच्चे को दे दीजिए जो पैसों के अभाव में अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहा है।’ यह कह कर गोपाल वहां से चल पड़ा।

      गोपाल की बातों से सेठ बहुत प्रभावित हुए। वह सोचने लगे कि एक गरीब बालक होकर भी समाज के लिए त्याग करने को तत्पर है और एक मैं हूं कि इतना होने पर भी और बटोरने में ही लगा हूं। उन्होंने निर्णय लिया कि अब वह अपना खोया हुआ धन गरीब लोगों के सामाजिक उत्थान में लगायेंगे, व्यापार में नहीं।

      सेठ ने पचास हजार रुपये शहर की एक सामाजिक संस्था को इस शर्त पर दान के रूप दिया कि उसके ब्याज से गरीब बच्चों को बजीफे के रूप में आर्थिक सहायता दी जाय।

      एक ईमानदार लड़के की प्रेरणा से ही सही, अपने धन का सही उपयोग करने के निर्णय से सेठ की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।

 

 मो. ः ०९४१५०४५५८४

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu