संघर्षों के बीच

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‘‘प्रकाश को बीच में आया देखकर मंगलसिंह समझ गए थे कि युद्ध का कमान अब पुरानी पीढ़ी से हट कर नई पीढ़ी पर आ गई है जो पुरानी पीढ़ी की स्थापित मान्यताओं को ज्यों-का-त्यों स्वीकारने को कभी तैयार नहीं होगी। बाजी भी हार चुके थे। इसलिए टकराव से अच्छा यही

रिश्ते की डोर

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सौरभ और गीता की बातें सुन शांति की आंखों में आंसू आ गए। दिल बोल उठा, जिनका खून का कोई रिश्ता नहीं, वह भी आज राखी के ‘रिश्ते की डोर’ से एक हो गए। ’’ प्रवासी पिता हीरामन अपने देश की माटी और संस्कृति की याद को अब तक भूल नहीं पाए थे

अनजान रिश्ते

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सीमा और प्रकाश का परिवार बरसों से शहर के एक ही मोहल्ले में रह रहा था। पर उन दोनों का एक दूसरे से सामना कभी नहीं हुआ। प्रकाश ने विश्वविद्यालय में जब उसी की कक्षा में प्रवेश लिया और ऐसे ही औपचारिक परिचय में अपने मोहल्ले का नाम बताया तो सीमा को आश्चर्य हुआ

खोया हुआ धन

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गोपाल के पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न थी, फिर भी उसके पिता की इच्छा थी कि उसे पढ़ा-लिखा कर एक अच्छा इंसान बनाए। इसीलिए मां के स्वर्गवास के बाद भी उसके पिता ने उसकी कमी महसूस न होने दिया था। पर दुर्भाग्य से गोपाल के ऊपर मुसीबत का पडाड़ टूट पड़ा। उसकी पढ़ाई अभी

सिफारिश बम

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पढ़ाई समाप्त करते ही मेरे सामने मुसीबतों का पहाड़ गिर पड़ेगा, काश! यह जानता तो शायद हर वर्ष परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए भागीरथ प्रयास न करता लेकिन, अब तो सिर ओखल में गिर ही पड़ा है, तो मूसल भी सहना ही पड़ेगा।

दुष्चक्र

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इसे शिवचरण का लड़कपन कहा जाये या उसकी देशभक्ति, जब वह मात्र पन्द्रह वर्ष की वय में तिरंगा लेकर बयालिस के आन्दोलन में कूद पड़ा था।

बटुकनाथ की विद्वता

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कहने को तो उपर्युक्त ग्रन्थ को लेखक ने एक संशयग्रस्त, किंकर्त्तव्यविमूढ़, जिज्ञासु की अनवरत चलने वाली आध्यात्मिक यात्रा कहा है, पर अपने विशाल भक्त समुदाय द्वारा अवतार-पुरुष माने जाने वाले श्री सत्य साई बाबा की गीता की व्याख्या को देश की पारम्परिक दिव्य संस्कृति के एक सार्थक अलंकार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

गृहस्थी

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कितनी भी जल्दी की जाय, आफिस पहुँचते में देर हो ही जाती है। घर से यदि जल्दी निकला जाय तो बस की प्रतीक्षा में समय बीत जाता है। आफिस नज़दीक होता तो यह परेशानी न होती। पैदल ही चला जाता। लेकिन रोज-बरोज दस किलोमीटर की पैदल यात्रा की जहमत उठायी भी तो नहीं जा सकती। पाँच किलोमीटर इधर से तो पाँच किलोमीटर उधर से।

मोह-भंग

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मंगरुवा और समय चाहे जहां रहे, लेकिन रात को खाने के समय थाली लेकर जरूर पहुंच जाता था। कौशल्या भी जानती थी इसलिए दो-चार रोटियां उसके लिए जरूर सिकवा देती।

जजिया

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अपने अधीनस्थ अधिकारियों की बात सुनकर शशांक का ईमानदारी से नौकरी करने का भ्रम टूट गया। वह उस दोराहे पर खड़ा था जहां एक रास्ता पारिवारिक मजबूरी में नौकरी पर कोई आंच न आने देने वाला था तो दूसरा विभाग की कार्य संस्कृति का अनुकरण करते हुए चीफ साहब को हर माह ‘जजिया’ देना था।

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