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अगर किसानों का आक्रोश शांत नहीं हुआ तो इसका असर अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों पर भी पड़ने के संकेत हैं। भाजपा सरकार को इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करने के साथ ही किसानों के हितों की चिंता करनी होगी तभी किसान खुश होगा और उसके सत्तासीन होने की भी उम्मीदें बढ़ जाएंगी।

मध्यप्रदेश में किसान हितैषी कहे जाने वाले मुख्यमंत्री व किसान पुत्र शिवराज सिंह चौहान ने भले ही किसानों को राहत देने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन हाल ही भडक़ी किसान आंदोलन की आग ने एक बात तो स्पष्ट कर दी है कि किसानों के लिए खेती लाभ का धंधा नहीं बन पा रही है और इससे यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी वादों में कहीं न कहीं किसानों का दर्द भी छुपा हुआ है। आपनी मांगों को लेकर किसानों द्वारा शुरू किए गए आंदोलन के पीछे जो भी ताकते हो पर एक बात तो तय है कि किसान आंदोलन की चिनगारी ने सरकार को संभलकर काम करने का सबक दे दिया है। पूरे दस दिन के आंदोलन में प्रदेशभर में किसानों का आक्रोश इस तरह सडक़ पर फूटा कि हाईवे पर कई वाहनोंं को आग लगा दी गई और इतना ही नहीं प्रशासन अधिकारी भी उनके गुस्से का कई जगह शिकार हुए। किसान संगठनों ने इस बार जो एकजुटता दिखाई उससे सरकार भी हिल गई। उधर विपक्षी दल कांग्रेस ने भी किसानों के समर्थन में सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहीं कारण है कि १० दिन तक प्रदेश में पूरी तरह किसान आंदोलन की आग भड़की रही। किसानों का गुस्सा शांत करने के लिए शिवराज सिंह चौहान को उपवास तक करना पड़ा। हालांकि उन्होंने दो ही दिन में अपना उपवास खत्म कर दिया और किसानों के बीच पहुंच गए।

मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन का दुखद पहलू यह रहा कि हिंसा को काबू करने के लिए पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में मंदसौर जिले के ५ व्यक्तियों को अपनी जान गंवानी पड़ी, इनमें से ४ युवकों का न तो खेती-बारी से कोई संबंध था न ही उन्हें फसल कर्ज माफी की जरूरत थी। चूंकि इन युवाओं की मृत्यु हो चुकी है इसलिए अब यह जानकारी मिलना असम्भव है कि ये युवक स्वेच्छा से हिंसक भीड़ का हिस्सा बने थे या किसी के बहकाने-फुसलाने में आकर उपद्रवी भीड़ में शामिल हुए थे।

मध्यप्रदेश में औपचारिक रूप से किसान आंदोलन २ जून को मंदसौर जिले से प्रारंभ हुआ तथा बाद में मालवा के कुछ अन्य जिलों से होता हुआ निमाड़ के जिलों तक फैल गया। मध्यप्रदेश के इन १० जिलों के किसानों की २० सूत्री मांगों में प्रमुख ३ मांगे ये थी- पहली, कर्ज माफी, दूसरी, सरकारी डेयरी दुग्ध उत्पादकों को सरकारी डेयरी से दूध के अधिक दाम तथा तीसरा, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू किया जाना।

मंदसौर जिले के किसानों के आक्रोश की एक वजह डोडा चूरा की बिक्री पर सरकार द्वारा दो साल पहले लगाया गया प्रतिबंध भी था जिससे वहां के किसान आमदनी के एक स्रोत से वंचित हो गए थे। मालवा में नोटबंदी की वजह से हुई तकलीफ भी उनके गुस्से का एक कारण था। पुलिस गोलीबारी में मारे गए युवकों के परिवार के सदस्यों के अनुरोध पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अपना अनशन समाप्त कर दिया है। उन्होंने घोषणा की है कि राज्य सरकार प्याज ८ रुपए प्रति किलो तथा समर्थन मूल्य पर मूंग ३० जून तक खरीदेगी। सरकार द्वारा १००० करोड़ रुपए का कृषि उपज मूल्य स्थिरीकरण फंड बनाया जाएगा।

किसानों की आत्महत्याओं का एक बड़ा कारण उनका भारी कर्ज के जाल में फंसना रहा है। उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत के नकदी फसल लेने वाले किसानों की आत्महत्या के प्रकरण अधिक रहे हैं। जब भी किसान आंदोलनरत होते हैं तो कर्ज माफी उनकी एक प्रमुख मांग होती है। किसी भी दल की सरकार हो वह किसानों से पूरी सहानुभूति रखती है किन्तु उसके लिए कर्जमाफी करना आसान नहीं होता है। राज्य सरकार के समक्ष समस्या यह होती है कि एफआरबीएम एक्ट के प्रावधानों के अनुसार बजट घाटा राज्य की जीएसडीपी का ३ फीसदी तक सीमित रखना पड़ता है। इस कारण राज्यों के लिए हजार करोड़ रुपए के दायित्व वाला कोई नया व्यय करना आसान नहीं रहता है। कर्जमाफी से मुद्रा स्फीति बढ़ने तथा सक्षम किसानों द्वारा जानबूझकर कर्ज अदा न करने की प्रवृत्ति पनपने की संभावना को देखते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल यूपी तथा महाराष्ट्र की सरकारों द्वारा कर्जमाफी के निर्णयों पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त कर चुके हैं।

किसान आंदोलन का दूसरा प्रमुख मुद्दा किसानों को उनकी उपज का लाभप्रद मूल्य मिलने से संबंधित है। किसान इसके लिए लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं। सरकार की कृषि मूल्य नीति समर्थन मूल्य के माध्यम से उत्पादक तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उपभोक्ता के हितों की रक्षा करती है। सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य उपज की लागत से कुछ अधिक होता है। वर्तमान में सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून के तहत संचालित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कार्डधारकों को रियायती कीमतों पर खाद्यान्न उपलब्ध करवाने के लिए हजारों करोड़ों रुपये की भारी भरकम सब्सिडी अपने बजट से वहन करनी पड़ती है। केन्द्र सरकार की वर्तमान वित्तीय स्थिति को देखते हुए उपज की लागत मूल्य से ५० प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य घोषित करना संभव नहीं दिखता। भारत के नीति आयोग ने पिछले दो सालों में किसानों की समस्याओं का गहराई से अध्ययन किया है तथा राष्ट्रीय स्तर पर समाधान उसी को खोजना है। इसलिए देशभर में इस प्रकार के आंदोलनों के फैलने के पहले ही उसे अविलम्ब इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। वैसे तो ४ अप्रैल को यूपी में कर्ज माफी की घोषणा के दूसरे ही दिन भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने महाराष्ट्र में भी किसानों की कर्जमाफी की मांग कर डाली थी किन्तु किसान आंदोलन की विधिवत शुरूआत किसान क्रांति मोर्चा की अगुवाई में १ जून से पश्चिम महाराष्ट्र के नासिक एवं अहमदनगर जिलों से हुई।

याद रहे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख में, सुप्रीम कोर्ट में उसके हलफनामे के बाद से औपचारिक रूप से भी कोई बदलाव नहीं आया है, फिर व्यवहार में बदलाव का तो सवाल ही कहां उठता है। जहां तक किसानों की कर्ज माफी का सवाल है, महाराष्ट्र की भाजपा सरकार की कर्ज माफी की घोषणा के बाद, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आधिकारिक रूप से बयान देकर यह साफ करना जरूरी समझा है कि कर्ज माफी के लिए राज्य, केंद्र सरकार से किसी मदद की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। इशारे साफ हैं।

सरकार की तीसरी सालगिरह के सरकारी और भाजपायी आयोजनों का पहला हफ्ता पूरा भी नहीं हुआ था कि भाजपा शासित राज्य मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र में किसान हड़ताल की अभूतपूर्व कार्रवाई शुरू हो चुकी थी। इस अनोखी कार्रवाई के हिस्से के तौर पर राज्यभर के किसान स्थानीय मंडियों से लेकर कस्बों तथा शहरों तक के लिए फल, सब्जी, दूध आदि अपनी पैदावारों की आपूर्ति खुद ही रोक रहे थे। विरोध स्वरूप किसान अपने फल-सब्जियों के ट्रकों से लेकर दूध के टैंकर तक, सड़कों पर बिखेर रहे थे। याद रहे कि स्वतंत्र रूप से लेकिन महाराष्ट्र के साथ ही साथ, मध्य प्रदेश के मालवा के इलाके में भी लगभग वैसा ही किसान उबाल सामने आया। यहां भी किसानों ने मंडियों के लिए अपनी पैदावार की सप्लाई रोकी और रास्ते जाम कर दिए। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश, दोनों में उठी ये किसान लहरें हालांकि सांगठनिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ी हुई नहीं थीं, फिर भी उनके बीच कुछ महत्वपूर्ण समानताएं व्यापक रूप से दर्ज की गई हैं। समग्रता में ये समानताएं इन दोनों ही विस्फोटों के, एक ही वृहत्तर कृषि संकट की अभिव्यक्तियां होने को तो दिखाती ही हैं, मौजूदा मुकाम पर इस संकट की कुछ ठोस विशिष्टताओं को भी दिखाती हैं।

अचरज की बात नहीं है कि मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने के फौरन बाद उठे इस किसान आंदोलन में, भाजपा के अपना उक्त चुनावी वादा पूरा करने की मांग सबसे प्रमुखता से उठी है। दूसरी प्रमुख मांग, जो किसानों को अपनी पैदवार का उचित दाम न मिलने की उक्त परिस्थिति के लगातार बने रहने का ही परिणाम है, संकट के मारे किसानों के कर्ज माफ किए जाने की ही है। खेती के अलाभकर होते जाने के नतीजे में किसान कर्ज के फंदे में फंसते जा रहे हैं। इस फंदे को काटने के लिए कर्ज माफी की मांग की जा रही है। यह दूसरी बात है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में किसानों के लिए कर्ज माफी का वादा कर, खुद मोदी की भाजपा ने इस मांग की सुलगती आग में घी डालने का काम किया था, जिसे योगी सरकार द्वारा आधी-अधूरी ही सही ऋण माफी की घोषणा ने और हवा दे दी।

किसानों की यह मांग सार्वजनिक बैंकों के डूबत कर्जों के बोझ के तले खुद डूब रहे होने की सच्चाइयों के सामने और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मध्यप्रदेश में अब किसान आंदोलन भले ही थम गया है लेकिन किसानों का आक्रोश शांत नहीं हुआ है। अगर किसानों का आक्रोश शांत नहीं हुआ तो इसका असर अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों पर भी पड़ने के संकेत राजनीतिक पंडित जाहिर कर रहे हैं। अब इसे भाजपा सरकार को भी चुनौती के रूप में स्वीकार करने के साथ ही किसानों के हितों की चिंता करनी होगी तभी किसान खुश होगा और उसके सत्तासीन होने की भी उम्मीदें बढ़ जाएगी।

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