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कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे सी.बी.एस.ई, आई. सी. एस ई, आई.बी. समेत तमाम माध्यमों के विद्यालयों और गैर सरकारी महाविद्यालयों की खेती के बीच एक यक्ष प्रश्न देश भर के बुद्धिजीवियों के दिल में लगातार बना हुआ है कि वर्तमान शिक्षा पद्धति देश समाज और नौनिहालों के लिए कितनी उपजाऊ साबित हो रही है? बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मकता से भी आगे बढ़कर घोर निराशा के अंधकारमय पथ की ओर ले जाता है। विद्यार्थियों की बजाय परीक्षार्थियों की यांत्रिक फौज तैयार हो रही है जो कि देश के लिए एक खतरनाक संकेत है।

 

वर्तमान शिक्षा पद्धति में बच्चों को पैसे की अंधी दौड़ में लगने की ट्रेनिंग दी जा रही है। भावना, मनुष्यता, प्रेम, सौहार्द्र और देशप्रेम जैसी बातें गौण हो चुकी हैं। किशोर वर्ग दिन ब दिन अविनीत होता जा रहा है जो कि आगे चलकर पूरे समाज और देश को घुन की तरह छलनी करके रख देगा। वर्तमान सरकारों, समाज और माता-पिता को इस महामारी का काट निकालने की महती आवश्यकता है।

यदि हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमारे देश में शिक्षा की बड़ी समृद्ध परंपरा रही है। राजा-महाराजाओं तक के पुत्र गुरुकुल के आश्रम में सामान्य विद्यार्थियों की ही भांति शिक्षा ग्रहण करते थे। इस प्रकार वे चौबीसों घण्टे अपने गुरुवृंदों की छत्रछाया में रहने के कारण सुशील और नम्र होने की शिक्षा पाते थे। सामान्य और गरीब परिवारों के विद्यार्थियों के साथ शिक्षा ग्रहण करने की वजह से उन्हें समाज की विषमताओं, गरीबी, जीवन पद्धति और भूगोल की समुचित जानकारी प्राप्त होती थी जो कि राजमहल में उन्हें जीवन पर्यंत नहीं प्राप्त हो सकती थी। इतना ही नहीं, यहां उन्हें अपने भविष्य के राजकीय कार्य के लिए योग्य और निपुण सहायकों को चुनने का मौका मिलता था। इन सहायकों की खासियत यह होती थी कि वे राजा के सहयोगी की अपेक्षा मित्र ज्यादा होते थे इसलिए निडर होकर राजा को उसकी गलतियों के प्रति सजग करते थे ताकि राजा के प्रति लोगों के दिलों में प्रेम बना रहे। सामान्य तरीकों से चुने गए कर्मचारी राजा की डर की वजह से कई बार सही बात कहने में असमर्थ होते थे। साथ ही आम लोगों के बीच से उठकर अच्छे और कुशल लोगों को बड़े पदों पर जाने का मौका मिल जाता था। ऐसे लोग आम जन की भलाई के लिए ज्यादा कार्य कर पाते थे क्योकि उन्हें लोगों की समस्याओं का भान होता था।

कमोबेश यह स्थिति स्वतंत्रता के दो दशकों के बाद तक रही, पर सत्तर और अस्सी के दशक में गैर सरकारी और अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों के निरंतर खुलते रहने की वजह से अमीर वर्ग, गरीब और मध्यम वर्गों से दूर होने लगा। यहां तक तो फिर भी गनीमत थी पर उदारीकरण की आंधी और देश में अभियांत्रिकी के नव प्रवेश ने समाज के साथ ही देश की शिक्षा व्यवस्था की थी चूलें हिलाकर रख दी। आज यह स्थिति हो चुकी है कि समाज की ही तरह शिक्षा व्यवस्था थी अति उच्चअंग्रेजीदां, उच्च अग्रेजीदां, मध्यम और निम्न वर्ग में विभक्त हो गई है। एक माध्यम का पढ़ा-लिखा व्यक्ति दूसरे माध्यम को घृणा और जलन की नजर से देख रहा है। सामान्य अथार्ंे में निम्न वर्ग की उच्च वर्ग के प्रति जलन है ही, उच्च वर्ग के अवसाद की स्थिति में होने पर अपने से निम्न वर्ग को ज्यादा सुखी समझता है। पर वास्तविकता कुछ और है। समाज का निम्न वर्ग भी धन की अंधी दौड़ में लग गया है। संतोष का नितांत अभाव हो चुका है। मनुष्य बनने की बजाय पैसा कमाने की मशीन बन रहे हैं।

इन समस्त समस्याओं के मूल में है, गुरु शिष्य के बीच आत्मीयता का नितांत सूखापन। गुरु और शिष्य के बीच का स्नेह, विश्वास और प्रेम का सोता न केवल सूख चुका है बल्कि उसमें लालच, परायापन और अविनीतता की गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। गुरु के लिए शिष्य आजीविका का साधन मात्र है। और शिष्य की नजर में गुरु की औकात केवल एक वेतनभोगी कर्मचारी की रह गई है। जो उसके धनाढ्य पिता द्वारा दिए जाने वाले धन के बदले में पुस्तकीय ज्ञान उपलब्ध कराता है। श्रद्धा की तो बात ही छोड़िए सम्मान भी गौण हो चुका है। रही सही कसर इलेक्ट्रॉनिक शिक्षा पद्धति और कम्यूटर ने पूरी कर दी। ‘गुगल मामा’ के पास पचासों पी़ढियो का संचित ज्ञान है, जो कि एक क्लिक मात्र में सामने हाजिर है। अलादिन के चिराग से निकले जिन्न की ही तरह हाथ बांधे हुए। विद्यार्थी (स्पष्टत: कहूं तो ‘पाठक’) को अब गुरु की आवश्यकता नहीं रह गई है। किताबों की गंध पराई हो चुकी है। पहले लोग अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए श्रेष्ठ, स्वाध्यायी और चरित्रवान गुरु खोजते थे। गुरु को विद्यार्थी और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान था। वे एक बच्चे को शिक्षित करने की बजाय देश का मुस्तकबिल संवारने का भाव रखते थे। अपने विद्यार्थियों के अंदर सफल और प्रसिद्ध होने की शिक्षा देने से पहले अच्छा इंसान होने का जटिल गुर सिखाते थे ताकि वह नन्हा फूल कामयाबी की मीनार पर खड़ा होने के बाद डगमगाने न पाए क्योंकि सफलता भले ही सीढ़ियां चढ़कर पाई जाए पर पतन की सुरंग अभिलम्ब होती है।

आज का गुरु मानवीय की अपेक्षा यांत्रिक अधिक हो चुका है। इसलिए वर्तमान और आगामी पीढ़ी पूर्णतया यांत्रिकीकरण की चपेट में है। ट्रेन की भीड़, बस की रेलमपेल, और सड़क की कंधा छीलती भीड़ के बीच कभी-कभी लगता है कि हम जिंदा रोबोटों से घिरे हुए हैं, संवेदनाहीन, मुस्कानविहीन, सपाट चेहरों वाले रोबोट जो कि बाकी अन्य रोबोटों की ही तरह सिस्टम बिगड़ने पर आस-पास के लोगों और संपत्ति को क्षति तो पहुंचा सकते हैं पर आंसू पोंछने में पूर्णतया असमर्थ क्योंकि उनकी मानवीय संवेदनाएं मरती जा रही हैं।

प्रख्यात पुस्तक ‘रिच डैड पुअर डैड‘ के लेखक रॉबर्ट टी कियोसाकी विश्व की शिक्षा व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए कहते हैं कि, ‘वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था केवल क्लर्क और अन्य कर्मचारी पैदा कर रही है।‘ यह बात पूर्णतः सत्य है। वर्तमान शिक्षा पद्धति प्रगति के सोपानों, मानवता और चारित्रिक उत्थान से कोसों दूर है। दुनिया भर के बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों में (सरकारी विद्यालयों की बात इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि हमारे देश की सरकारी शिक्षा- व्यवस्था पूर्णतया मृतप्राय हो चुकी है। आम जनता के टैक्स का एक बड़ा हिस्सा भकोसने वाले इस सफेद हाथी की आगे की राह अत्यंत दुष्कर है। नौकरशाही इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि वह लाखों करोड़ का धंधा बन चुके गैर सरकारी संकाय के हितों की रक्षा के लिए इसे पूरी तरह समाप्त करने पर अमादा है। प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापकों को मिड डे मील खिलाने और और ग्राम प्रधानों -नगगरसेवकों से तालमेल बिठाने में ही झुरझुरी छूट जाती है। शिक्षा के लिए समय ही नहीं बचता। यदि बचे भी तो गरीबी की रेखा के अतिशय नीचे रहने वालों के बच्चे पढ़ें या न पढ़ें, क्या फर्क पड़ता है।) डोनेशन, फीस, गणवेश और तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर हजारों-लाखों की लूट होती है पर शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है। यहां झाड़-पोंछ और पॉलिस करके चमचमाता, अशुद्ध और व्याकरण विहीन अंग्रेजी बोलने वाला युवा पैदा किया जाता है जो कि बड़े-बड़े संस्थानों का विक्रय बढ़ाने के लिए सड़कें नाप सके।

पिछले पचास सालों में देश की शिक्षा का उर्ध्व पतन होते रहने के बावजूद ज्यादातर केंद्र और राज्य सरकारों ने इसके मानक की गुणवत्ता की वृद्धि का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया है। पूंजीवाद की अंधी दौड़ में हमारे देश के राजनेता सामाजिक समरसता का ढोल तो पीटते रहे पर उसे बढ़ाने की दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया। देते तो उन्हें पता चलता कि शिक्षा का अनियमित वितरण समरसता की राह में सबसे बड़ी बाधक है और देश की गुणवत्ता विहीन शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव की नितांत आवश्यकता है पर ठोस कदम उठाने की बजाय बहाने ही बनते रहे।

उत्तर प्रदेश और बिहार में तो बकायदा नकल कराने के ठेके लिए जाते हैं। देशभर में लगभग एक तिहाई बच्चे अपनी मातृभाषा में फेल होते हैं। सोशल मीडिया पर तमाम वीडियो वायरल होते रहते हैं जिनमें सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों को सौ तक गिनती नहीं आती। उन्हें देश के प्रधानमंत्री और अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री तक के नाम नहीं पता। कुछ दिनों पहले एक फोटो वायरल हुई थी जहां किसी विद्यालय में अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की तस्वीर लगाई गई थी। यह अज्ञानता, प्रशासनिक लापरवाही, बौद्धिक पतन की पराकाष्ठा है।

परंतु इतना सब तुरंत नहीं हो गया है। इस पराभव में कई दशकों की निष्क्रियता का हाथ रहा है। जाहिर सी बात है कि एकाएक रामराज्य नहीं आ जाएगा। परंतु कोशिश तुरंत शुरू करनी होगी। इस गुरु पुर्णिमा पर हम सबको एक शपथ लेनी होगी ताकि देश की शिक्षा को उर्ध्वगामी किया जा सके। सर्वग्राही, सर्वसुलभ और लगभग नि:शुल्क शिक्षा के मौलिक अधिकार की प्राप्ति हेतु देश के बहुसंख्यक जन समूह को स्व कर्तव्य समझ नींव की ईंट बनने का सुकार्य करना होगा। सवाल हमारी आने वाली पीढ़ी और चातुर्दिक सुबल समर्थ विरासत के संरक्षण का है। हमें नए प्रयास नहीं करने हैं बल्कि पूर्व की गति, जो कि अब अवरुद्ध हो गई है, को ही अनवरत प्रवाहमान करने की आवश्यकता है ताकि चाणक्य, वाल्मीकि, द्रोणाचार्य, वशिष्ठ, अगस्त्य, कबीर, समर्थ गुरु रामदास जैसे सुकीर्तिवान गुरुओं की परंपरा को पुनर्जीवित कर देश को एक बार फिर विश्वगुरु बनाया जा सके क्योंकि इस सम्पूर्ण विश्व के नैतिक संक्रमण काल में दुनिया भर के बुद्धिजीवियों की चातक दृष्टि पूरब की ओर लगी हुई है।

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