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उत्तर प्रदेश के इन लोकनाट्यों की चमक और आभा के कारण आज विश्व पटल पर हमारी एक विशेष पहचान है। ऐसे में हम सभी का यह कर्तव्य ही नहीं पूर्ण दायित्व है कि हम अपने इन अमूल्य लोकनाट्यों को संरक्षित कर प्रचार-प्रसार करते रहें।

उत्तर प्रदेश भारत का एक ऐसा राज्य है जहां कि सांस्कृतिक छटा अत्यंत लुभावनी है, यहां का सांस्कृतिक सौष्ठव अनूठा है। जनमानस के बीच एक दूसरे को बांधे रखने वाले यहां के पर्व-त्यौहार, मेले-तमाशों में प्रस्तुत किए जाने वाले लोकनाट्य अपने आप में एक विशेष स्थान रखते हैं।

लोकनाट्य लोकमानस के जीवन में रचा-बसा आडम्बर-विहीन मनोरंजन का स्वस्थ साधन है, जिसमें कृत्रिमता का नितांत अभाव व सीधे जनमानस को उद्वेलित करता हुआ समयानुकूल समाज को कुछ न कुछ शिक्षा देता है। सुविख्यात लोक साहित्यकार डॉ. सत्येंद्र ने विषय वस्तु के आधार पर लोकनाट्यों का जो विभाजन किया उनमें से अधिकतर उत्तर प्रदेश के लोकनाट्य के रूप में जाने जाते हैं :
१. धार्मिक, ऐतिहासिक व किवदंतियों पर आधारित राम लीला।
२. नृत्य प्रधान रासलीला।
३. नाट्य-हास्य प्रधान खोइया।
४. संगीत-प्रधान कथाबद्ध भगत, संगीत, नौटंकी आदि।
५. नाट्य वार्ता प्रधान प्रहसन नाटक।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख लोकनाट्यों को हम इस प्रकार समझ सकते हैं-

रामलीला :
रामलीला की शुरूआत कब और कैसे हुई? दुनिया में किसने किया था सबसे पहली रामलीला का मंचन? इसका कोई प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस बारे में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। रामलीला भारत में परम्परागत रूप से भगवान राम के चरित्र पर आधारित लोकनाट्य है, जिसका देश में अलग-अलग तरीकों और अलग-अलग भाषाओं में मंचन किया जाता है। रामलीला का मंचन विजयादशमी या दशहरा उत्सव पर किया जाता है।

रामलीला का इतिहास :
भारत में भी रामलीला के ऐतिहासिक मंचन का ईसा पूर्व का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। लेकिन १५०० ई में गोस्वामी तुलसीदास ने जब आम बोलचाल की भाषा ‘अवधी’ में भगवान राम के चरित्र को ‘श्री रामचरित मानस’ में चित्रित किया तो इस महाकाव्य के माध्यम से देशभर में- खासकर उत्तर भारत में- रामलीला का मंचन किया जाने लगा। माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। इतिहासविदों के मुताबिक देश में मंचीय रामलीला की शुरुआत १६वीं सदी के आरंभ में हुई थी। इससे पहले रामबारात और रुक्मिणी विवाह के शास्त्र आधारित मंचन ही हुआ करते थे। साल १७८३ में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने हर साल रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया।

भरत मुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में नाटक की उत्पत्ति के संदर्भ में लिखा गया है। ‘नाट्यशास्त्र’ की उत्पत्ति ५०० ईपू से १०० ई के बीच मानी जाती है। नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटकों- विशेष रूप से लोकनाट्य- के जरिए संदेश को प्रभावी रूप से जनसामान्य के पास पहुंचाया जा सकता है। भारत भर में गली-गली, गांव-गांव में होने वाली रामलीला को इसी लोकनाट्य रूपों की एक शैली के रूप में स्वीकारा गया है।

सब से पुरानी रामलीलाएं
काशी, चित्रकूट और अवध की रामलीला- माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। काशी में गंगा और गंगा के घाटों से दूर चित्रकूट मैदान में दुनिया की सब से पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन किया जाता है। माना जाता है कि ये रामलीला ५०० साल पहले शुरू हुई थी। ८० वर्ष से भी बड़ी उम्र में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में १६हवीं शताब्दी में रामचरित मानस लिखी थी।

मथुरा की रामलीला- मथुरा की रामलीला अत्यंत गौरवशाली एवं सिद्ध लीला है, अर्थात यह केवल रामलीला ही नहीं है वास्तव में यह एक धार्मिक अनुष्ठान है। मथुरा की रामलीला के बारे में यह सर्वविदित है कि यदि कोई भक्त इसको लगातार देखता है तो उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। मथुरा में पहली बार रामलीला का मंचन सन १८४० में सैनिक छावनी स्थापित हो जाने के बाद बिहार से आई रामलीला की मंडली द्वारा हुआ था। इस मंचन से मथुरा के कला प्रेमियों को एक प्रेरणा मिली और मथुरा के गऊघाट निवासी वाग्भट्ट जी द्वारा मथुरा शैली में यमुना किनारे गऊघाट पर पहली बार रामलीला का मंचन कराया गया जिसमें स्थानीय कलाकारों ने बढ़चढ़ कर सहभागिता की और यही क्रम युग के अनुरूप विकसित होता हुआ अनवरत चला आ रहा है।

वाग्भट्ट जी के बाद उस्ताद मनियां भट्ट जी तथा उनके बाद श्रीराधा कृष्ण वैद्य के नेतृत्व में रामलीला होती रही। उन्होंने ही इस रामलीला को तंत्र द्वारा सिद्ध किया जिससे लगातार पूरी रामलीला देखने वालों की अनेकानेक मनोकामनाएं पूर्ण होती रही हैं। यहां की रामलीला की एक विशेषता यह है कि ताड़का-वध, श्रीराम वनवास, भरत मनावन, वन की लीलाएं दिन में शहर के अनेक स्थलों पर आयोजित की जाती हैं तथा यही लीलाएं रात्रि में मंच पर होती हैं। केवट लीला यमुना किनारे गौघाट व स्वामीघाट पर सुसज्जित नाव पर होती है जो वास्तविकता का प्रतीक है। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व सीता जी को राज्याभिषेक के दिन असली सोने चांदी के आभूषण धारण कराए जाते हैं, तथा सभी कलाकारों को प्रति दिन शुद्ध देशी घी के भोजन कराए जाते हैं।

रासलीला
आज से लगभग पांच हजार दो सौ साठ वर्ष पूर्व आनंदकंद भगवान श्री कृष्ण ने अपनी आल्हादिनी शक्ति रस सम्राज्ञी श्रीराधा और ब्रज-गोपिकाओं के साथ मंडलाकार नृत्य किया था जिसे कालांतर में रास-नृत्य नाम दिया गया।
सबसे बड़ा रास महारास के नाम से सुप्रसिद्ध है जो भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की ज्योत्स्ना में कामदेव की चुनौती को स्वीकारते हुए वृंदावन में किया था। इस रास-नृत्य के समय गोपियों को अभिमान हो गया कि श्रीकृष्ण तो हमारे वश में हो गए हैं, उनके इस अभिमान को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण अंतर्धान हो गए। श्रीकृष्ण के यकायक रास-नृत्य से चले जाने के कारण श्रीराधा व अन्य गोपिकाएं उनके विरह में व्याकुल हो उठीं। उनके मन में उन लीलाओं की स्मृतियां उमड़ने-घुमड़ने लगीं जो श्रीकृष्ण ने समय-समय पर उनके साथ की थीं। श्रीकृष्ण द्वारा माखन-चोरी, चीर हरण, सांकरीखोर में मटकी फोड़ कर दूध-दही लूटने, गोवर्धन धारण, ऊखल-बंधन, पूतना-उद्धार, गौचारण, वंशी-चोरी, कालिया-दमन आदि लीलाओं को दुहराते हुए अनुकरण कर अभिनय करने लगीं। अंततः हे! कृष्ण, हे! कृष्ण का नमन करती हुई एक-एक कर बेसुध हो श्रीकृष्ण में मानसिक रूप से लीन हो गईं। गोपियों को प्रेम में लीन देख श्रीकॄष्ण पुनः प्रकट हुए तथा गोपियों को अभिमान से दूर रहने का ज्ञान देते हुए रास-नृत्य किया।

इसी परम्परा ने रासलीला को जन्म दिया जो अनवरत रासलीला के सामने हमारे समक्ष है।
रासलीला के दो चरण होते हैं:
१.मंगलाचरण व नित्य-रास।
२. लीलानुकरण

रास के वाद्य: रास में प्रयुक्त वाद्यों में हारमोनियम, सारंगी, सितार, तानपुरा, मृदंग, तबला, बांसुरी, मंजीरे, झांझ आदि।
रास में प्रयुक्त राग: गोपियों द्वारा गाये जाने वाले राग क्रमशः गुज्जरी, रामकली, गौरी, आसावरी, गुणकली, तोड़ी, बिलावल, मंगल गुज्जरी, बराटीका, देशबराटीका, मागधी, कौशिकी, पाली, ललित, पटमंजरी, सुभग, सिंदुरा आदि।
श्रीकृष्ण व गोपियों द्वारा गाये जाने वाले राग क्रमशः मल्हार, कर्नाटक, नट, साम केदार, कामोद, भैरव, गांधार, देशांग, बसंत, मालव आदि।
रासलीला के प्रदर्शन पहले बहुत छोटे स्तर पर होते थे किंतु अब विशाल मंच, वृहद पंडाल, फर्श के स्थान पर कुर्सियां-सोफे, उद्घाटन कार्यक्रम आदि के साथ आधुनिक परिप्रेक्ष्य में हर्षोल्लास पूर्वक देश विदेश में आयोजित होते हैं। रासलीला की व्यावसायिक मंडलियां होती हैं जो मानदेय पर रासलीला करती हैं।

खोइया:
उत्तर प्रदेश में ग्राम्य जीवन की एक सशक्त तथा उद्देश्यपूर्ण आदर्श शैली का लोकनाट्य है खोइया। गांव के सभी पुरुष विवाह के समय लड़के की बारात में चले जाते हैं तब रात्रि में पुरुष वेश धारणकर उन्हीं की भाषा-विन्यास के साथ घर व आसपास की महिलाएं मनोरंजन एवं सुरक्षा की दृष्टि से लोकरंजक बारात के दृश्यों को लेकर गीत-संगीत व नृत्य के साथ लोकनाट्य करती हैं। घर-परिवार के साथ-साथ पूरे गांव की सुरक्षा करते हुए मनोरंजन, आत्मा को प्रफुल्लित व आनंदित करने वाला प्रभावी मनोरंजन का आयोजन इस शैली की विशेषता तथा प्रधानता है। इस लोकनाट्य में किसी प्रकार के मंच की आवश्यकता नहीं होती। विवाह वाले घर से महिलाओं की एक टोली विवाह के गीतों को गाती-ढोलक बजाती, नृत्य करते हुए जगह जगह रुक रुक कर विवाह के दृश्यों को नाट्यरूप में प्रदर्शित करती हुई आगे बढ़ती जाती है। इस लोकनाट्य का पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचलन है तथा नारी का पुरुष चित्रण के साथ-साथ आंचलिक शब्दों में गाली शब्दों का हास-परिहास की दृष्टि से खुल कर प्रयोग किया जाता है जिससे से एक प्रकार के विशेष आनंद की अनुभूति की जाती है।

नौटंकी:
चुटीले सजीले और गठीले संगीतमय संवादों में गूंथी उत्तर भारत की लोकधर्मी परम्परा का प्रतिनिधित्व करती ऑपेरा शैली में निबद्ध ‘नौटंकी’ उत्तर भारत का प्रमुख लोकनाट्य है। नौटंकी, स्वांग या भगत न्यूनाधिक प्रकारान्त से मूल रूप से ब्रज क्षेत्र का लोकनाट्य है जिसमें गायन, वादन, नृत्य और अभिनय का समानुपाती समावेश रहता है। इसका उदय ब्रज की भगत गायन परम्परा से हुआ है।

वर्तमान में समय में भरत मुनि का नाट्यशास्त्र ही प्राचीनतम कृति मानी जाती है परन्तु निश्चय ही उससे पूर्व ऐसी अनेक नाट्य परंपराएं रही होंगी जिन्होंने भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की रचना में महत्वपूर्ण योगदान किया होगा। इनमें भगत का मंच भी पूर्ववर्ती नाट्य-परम्पराओं में से एक हो सकता है।

भगत, संगीत, स्वांग नौटंकी की ही पर्याय हैं जो लोक-संस्कृति से जुड़ी एक ऐसी सशक्त लोकनाट्य-विधा है, जिसमें राष्ट्रीय संगीतिका होने के सभी गुण विद्यमान हैं। अपने मौलिक स्वरूप को यथावत रखते हुए नौटंकी लंबे समय से अपने अस्तित्व को संरक्षित करने के लिए संघर्षरत है।
ऑपेरा शैली में निबद्ध यह लोकरंजनी विधा किसी समय में हिंदी-भाषी क्षेत्रों के ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरों-कस्बों तक इतनी अधिक लोकप्रिय थी कि नक्कारे की खनक के साथ नौटंकी की तीपदार स्वरलहरी जब रात के सन्नाटे को चीरती हुई जनमानस तक पहुंचती थी, तो दिन भर के श्रम की थकान एवं रात्रि के आराम की लालसा भी उन्हें नहीं रोक पाती थी। लोग नक्कारे की खनक से दिशा ज्ञान लेते हुए शब्दभेदी तीर की तरह जा पहुंचते थे नौटंकी देखने।

नौटंकी का उदय वास्तव में ब्रज के सुप्रसिध्द लोकनाट्य स्वांग से हुआ है और स्वांग का उदय भगत परम्परा की देन है। यहां यह भी जानना आवश्यक है कि नौटंकी, स्वांग, भगत क्या नौटंकी के ही पर्याय हैं अथवा इनमें कोई अंतर है?

वास्तविकता यह है कि भगत अत्यंत पुरानी लोकनाट्य विधा है जिसके प्रमाण इतिहास में मौजूद हैं। मुगल सम्राट अकबर के नव रत्न अबुल फजल ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति ‘आइने अकबरी’ में इसे उस समय की बेशकीमती लोकविधा माना है।
भगत, कीर्तन के समान है, परन्तु उसमें विभिन्न प्रकार की वेशभूषा धारण करके साधारण स्वांग प्रर्शन किया जाता है। ये अधिकतर रात्रि में आयोजित किए जाते हैं।
औरंगजेब के समकालीन शायर मौलाना गनीमत ने सन १६८५ में लिखित अपने ग्रंथ ‘नौरंगे इश्क’ में भगत नामक लोकनाट्य के अस्तित्व और व्यापकता का उल्लेख इस प्रकार किया है:-
‘आज शहर में अजीब किस्म के लोग आए हुए हैं जो एक नाज़ी के साथ नकल करते हैं और नग्मो-साज़ के साथ शोनदे दिखाते हैं। नाज़ और नक़ल के ये उस्ताद हैं, इनकी आवाज़ बेहद सुरीली एवं टीपदार है। हमारी भाषा में इन्हें ‘भगतबाज़ ’ कहते हैं। ये कभी मर्द, कभी औरत तो कभी बच्चे की नकल करते हैं। कभी परेशान संन्यासी बन जाते हैं।’

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय यह विधा ब्रज क्षेत्र में अपनी चरम सीमा पर थी। बाद में जब यह विधा हाथरस पहुंच तो वहां के डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ द स्कूल- वासुदेव वासम (जो ख्याल-लावनी के तुर्रा अखाड़े के उस्ताद थे) ने स्वांग नाम दिया और अखाड़ा स्थापित कर पहला स्वांग-‘श्याह-पोश ’ खेला। उनकी देखा-देखी हाथरस में कई अखाड़े और बने।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. रामनारायण अग्रवाल के अनुसार कानपुर, लखनऊ अर्थात पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे नौटंकी का नाम मिला; हाथरस, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी क्षेत्र में इसे संगीत और स्वांग के नाम से पहचान मिली; परन्तु मथुरा, वृंदावन, आगरा, भरतपुर, कामां में व्यावसायिक दलों द्वारा प्रस्तुति को नौटंकी तथा इसके अखाड़ों द्वारा प्रस्तुति को आज भी पूर्ववर्ती नाम ’भगत’ से ही जाना जाता है।

नौटंकी/भगत/सांगीत में शुद्ध शास्त्रीय रागों के साथ-साथ लोकधुनों का भी प्रयोग होता है। इसी प्रकार पिंगल-शास्त्र के छंदों के साथ साथ लोक छंदों का समावेश किया जाता है।

नौटंकी की दो शैलियां हैं – पहली हाथरसी और दूसरी कानपुरी। तुलनात्मक दृष्टि से कानपुरी नौटंकी में गायकी कोमल स्वरों में है और नाटकीयता अधिक है तो हाथरसी शैली में गायकी उत्तम कोटि की है, साथ ही नृत्य व अभिनय भी बेहद अच्छा है। इसी कारण कानपुरी नौटंकी हाथरसी शैली के सामने कभी नहीं ठहर पाई। प्रतिस्पर्धा के चलते कानपुर के श्रीकृष्ण पहलवान और त्रिमोहन लाल ने बड़े ही अजीबो-गरीब प्रयास किए। उन्होंने कोठों से तवायफों को मंच पर लाकर नौटंकी के बीच-बीच में मुजरे करने शुरू कर दिए, जिससे उच्च व मध्यमवर्गीय समाज से नौटंकी डोर होती चली गई। मंच पर नाचगाने की अधिकता बढ़ती गई, संयोजक भी आमदनी के लालच में नौटंकी के वास्तविक स्वरूप को इस अतिक्रमण से बचा नहीं पाए, फलस्वरूप कानपुर क्षेत्र में धीरे नौटंकी विलुप्त हो गई और स्थिति यह है कि वहां नौटंकी की एक भी मंडली शेष नहीं बची है, हालांकि सरकारी अनुदान व अन्य लाभ लेने की दृष्टि से कुछ लोगों ने केवल कागजों पर ही नौटंकी के नाम पर संस्थाएं बना रखीं हैं।

धरातल पर नौटंकी को केवल मथुरा और हाथरस में ही देखा जा सकता है जहां अभी भी व्यावसायिक मंडलियां मौजूद हैं और लगभग २०० परिवारों की रोजी-रोटी इसी लोकनाट्य की देन है।
इसके संरक्षण की मांग उठ रही है परन्तु जब सरकार अनुदान देती है तो केवल कागजों पर ही संस्थाएं चलाने वालों को देती है। उत्तर प्रदेश के लोकनाट्यों की विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने वाले कलाकारों व मंडली के मालिकों का विशेष योगदान है। जबकि इन्हें कोई सरकारी अनुदान व अन्य योजनाओं का लेशमात्र भी लाभ नहीं मिल पाता है।
उत्तर प्रदेश के इन लोकनाट्यों की चमक और आभा के कारण आज विश्व पटल पर हमारी एक विशेष पहचान है। ऐसे में हम सभी का यह कर्तव्य ही नहीं पूर्ण दायित्व है कि हम अपने इन अमूल्य लोकनाट्यों को संरक्षित कर प्रचार-प्रसार करते रहें।

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