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जब ‘ नेशन फर्स्ट ’ का भाव सभी देशवासियों के मन में जागृत हो जाएगा, जब राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कृतज्ञता जागृत हो जाएगी तो उससे जुड़ी सभी बातों के लिए मन में अपने आप ही श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाएगा। फिर राष्ट्रगान चाहे सिनेमा हॉल में बजे या कहीं और, सभी लोग उसके सम्मान खड़े होंगे ही।

जन गण मन ! जो जनगण का मन है वह हमारा राष्ट्रगान है। जिसकी धुन कानों पर पड़ते ही मन पुलकित और शरीर रोमहर्षित हो जाए, वह हमारा राष्ट्रगान है। जिसकी धुन कानों पर पड़ते ही देशभक्त खड़े रहने को मजबूर हो जाएं, वह हमारा राष्ट्रगान है। पर इस मजबूरी के लिए देशभक्ति होना आवश्यक है। अगर मन में राष्ट्रभक्ति होगी तो ही राष्ट्रगान सुन कर मन पुलकित होगा, तो ही शरीर रोमहर्षित होगा।

आज राष्ट्रगान के सम्बंध में मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि सिनेमा घरों में शो शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाना आवश्यक नहीं है। सिनेमा घरों में राष्ट्रगान बजाए जाने के पीछे वजह यह थी कि वहां सभी लोग अपना पंथ, जाति भूल कर आते हैं। ऐसे लोगों के मन में राष्ट्रभक्ति के भाव का संचार करने के लिए सिनेमा घरों में राष्ट्रगान बजाने को आवश्यक किया गया था। परंतु मूल मुद्दा यह है कि सिनेमा घरों में आने वाले ये लोग क्या राष्ट्रभक्ति का भाव लेकर आते हैं ? और सिनेमा देखने के बाद क्या उनमें राष्ट्रभाव कायम रहता है ? नहीं। वहां लोग मनोरंजन के लिए आते हैं। कई बार तो राष्ट्रगान के ठीक बाद ऐसे भद्दे और भड़काऊ विज्ञापन या फिल्में होती हैं, जिनसे राष्ट्रगान के ५२ सेकेंड में चढ़ी राष्ट्रभक्ति कुछ पलों में उतर जाए। ऐसे में वहां राष्ट्रगान का बजना औचित्यपूर्ण नहीं लगता।

मूलत : जब राष्ट्रगान लिखा गया तथा पहली बार कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे गाया गया तब समाज में राष्ट्रभक्ति का ज्वार था। देश गुलाम था तथा आजादी के लिए अंगे्रजों से जूझ रहा था। उस समय इसकी धुन कानों पर पड़ते ही लोग एक जगह पर खड़े नहीं रहते थे बल्कि और अधिक आवेश के साथ अंगे्रजों का विरोध करते थे। परंतु अब समय बदल चुका है। आज देश में जितनी भी पीढियां ‘ खड़े ’ रहने की स्थिति में हैं उनमें से ९५ % का जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ है। वे राष्ट्रगान के सम्मान में तब तक खड़े नहीं होंगे जब तक उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत नहीं होगी, और भावना जगाने का कार्य कभी भी सख्ती करके नहीं होता।

एक बार की बात है, एक नास्तिक आदमी का कोई भी काम नहीं बन रहा था तो लोगों ने उससे कहा कि तुम भगवान को नहीं मानते इसलिए तुम्हारा काम नहीं बन रहा है। तुम कम से कम २ बार पूजा आदि किया करो। उसने भी सोचा कि चलो जब सारे उपाय कर लिए तो ये भी कर लें। वह बाजार से कृष्ण की मूर्ति और पूजा का सामान ले आया। कई दिनों तक दिन में २ बार दिया, अगरबत्ती जलाई पर काम नहीं हुआ। उसने सोचा पत्थर की मूरत के सामने सिर झुकाने से कुछ नहीं होगा। परंतु उसे दिए से रोशनी और अगरबत्ती सुगंध तो मिल ही रही थी। इसलिए उसने भगवान की मूरत को रुमाल से ढंक दिया जिससे उसे रोशनी और सुगंध न मिले। फिर उसने जैसे ही दिया और अगरबत्ती जलाई, उसके सामने कृष्ण प्रगट हुए और उससे वर मांगने को कहा। उसने पूछा जब मैं आपके सामने दिया अगरबत्ती जला रहा था, तब तो आपने दर्शन नहीं दिए पर जब मैंने आपके ऊपर कपड़ा डाल दिया तो आप कैसे प्रगट हो गए ? तब भगवान ने उससे कहा कि इतने दिनों तक तुम मुझे पत्थर समझ कर मेरी पूजा का दिखावा कर रहे थे, मेरे अस्तित्व को नकार रहे थे। परंतु आज जब तुमने यह सोचा कि दिए की रोशनी और अगरबत्ती की सुगंध मुझ तक ना पहुंचे तो अनायास ही तुमने मेरे अस्तित्व को स्वीकार कर लिया। अब तुम्हारे मन में मेरे लिए भाव उत्पन्न होंगे, श्रद्धा उत्पन्न होगी, जो कि किसी दूसरे व्यक्ति के कहने मात्र से नहीं हो सकती थी।

कहानी यहां लिखने का उद्देश्य यह है कि जिस तरह किसी दूसरे व्यक्ति के कहने से किसी के मन में भगवान के प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती उसी प्रकार अगर मन में राष्ट्रभक्ति नहीं है तो राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत का सम्मान भी नहीं उत्पन्न नहीं होगा।

हमारे यहां राष्ट्रभक्ति का उफान १५ अगस्त, २६ जनवरी, क्रिकेट के वर्ल्ड कप जीतने या पाकिस्तान को हराने के बाद दिखाई देता है। इन दिनों में कुछ नारे लगाकर, तिरंगा फहराकर, उसके सामने राष्ट्रगान गाकर हम अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय कराते हैं। हमने अपनी राष्ट्रभक्ति को इतना संकुचित कर रखा है कि उसकी विस्तृत चर्चा तो क्या विचार करना भी हमें आवश्यक नहीं लगता। देश की सीमा पर तैनात सैनिकों पर यह जिम्मेदारी सौंप कर हम आराम से अपनी दिनचर्या में लगे रहते हैं। क्या शत्रु से अपने देश की रक्षा करना ही मात्र ही राष्ट्रभक्ति है ? नहीं। यह देश मेरा है और इसकी प्रगति के लिए आवश्यक सभी काम करना भी राष्ट्रभक्ति है। स्वदेशी वस्तुओं का अधिकतम उपयोग करना भी राष्ट्रभक्ति है। अपनी संस्कृति, परंपराओं का जतन करना भी राष्ट्रभक्ति है। आने वाली पीढी को अपने राष्ट्र के गौरवपूर्ण इतिहास, महापुरुष तथा आक्रांताओं के बारे में सही – सही जानकारी देना भी राष्ट्रभक्ति है।

राष्ट्रभक्ति का अर्थ उस राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना है, जिसके बल पर हमारा अस्तित्व कायम है। जिस तरह ईश् ‍ वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हम प्रार्थना करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हम राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान गाते हैं।

पिछले दिनों कुछ मुस्लिम धर्माबलंबियों के तथाकथित नेताओं ने कहा था कि उनका मजहब अल्लाह के अलावा अन्य किसी की इबादत करने की इजाजत नहीं देता। इसलिए न तो मदरसों में राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान होगा, न ही वे लोग वंदे मातरम कहेंगे और न ही सिनेमाघरों में जब राष्ट्रगान बजाया जाता है तब वे खड़े होंगे, तो क्या ये लोग अपने माता – पिता या मदरसों में पढ़ाने वाले अपने शिक्षकों के प्रति भी कृतज्ञता का भाव नहीं रखते ? क्या अपने से बड़े व्यक्ति के सम्मान में खड़े नहीं होते ? अगर इन दोनों का जवाब ना है तो ऐसे लोगों से राष्ट्रभक्ति की उम्मीद करना व्यर्थ है। परंतु जिस किसी के भी मन में इन दो प्रश् ‍ नों के उत्तर हां है, उसके मन में निश् ‍ चित रूप से राष्ट्रभक्ति होगी ही।

राष्ट्रभक्ति की इस भावना को अन्य संस्कारों की तरह ही बचपन से ही संस्कार के रूप में दिए जाने की आवश्यकता है। नियमित रूप से उसे दोहराने की आवश्यकता है। जब ‘ नेशन फर्स्ट ’ का भाव सभी देशवासियों के मन में जागृत हो जाएगा, जब राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कृतज्ञता जागृत हो जाएगी तो उससे जुड़ी सभी बातों के लिए मन में अपने आप ही श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाएगा। और फिर राष्ट्रगान चाहे सिनेमा हॉल में बजे या कहीं और सभी लोग उसके सम्मान खड़े होंगे ही।

मोबा . ९५९४९६१८४९

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