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इंट्रो : चुनावी वर्ष के ठीक पूर्व अंतिम बजट में मोदी सरकार ने चुनावी हानि लाभ की चिंता किए बिना, अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ता, तीव्र आर्थिक विकास की दर, वित्तीय अनुशासन तथा समाज के अधिसंख्य निर्धन एवं अक्षम वर्ग के कल्याण का बजट प्रस्तुत कर २०१९ के चुनावों के प्रति अपनी पूर्ण आश् ‍ वस्ति एंव आत्मविश् ‍ वास का भी स्पष्ट संकेत दे दिया है।

 

पं.दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि ११ फरवरी के पूर्व, प्रस्तुत भारत सरकार का २०१८ का यह बजट सही अर्थों में उनके आर्थिक दर्शन तथा नीतियों के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि है। इस बजट में विकास के सब से नीचे स्तर पर रह रहे व्यक्ति के विकास हेतु अंत्योदय, देश के अन्नदाता किसान की ऋणमुक्त आत्मनिर्भरता, प्रत्येक सक्षम हाथ को रोजगार, स्वरोजगार द्वारा औद्योगिक विकेन्द्रीकरण तथा समाज के अक्षम हो चुके सम्मानित वरिष्ठ नागरिक वर्ग के लिए निर्धारित आय तथा सम्मानपूर्ण जीवन यापन की व्यवस्था इस बजट के द्वारा की गई है जो कि पं. दीनदयाल जी के नीतियों के पूर्णतया अनुरूप है। 
 
मोदी जी ने जहां गत वर्ष देश की राजनीति में सब से अधिक महत्वपूर्ण व सर्वाधिक जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश सहित ६ राज्यों की विधान सभाओं के चुनावों के ठीक पहले नोटबंदी का दांव खेल कर आम जनता के धैर्य की परीक्षा ली थी वहीं सीधे तौर पर जनता को भी यह संकेत दे दिया था कि वे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था के विरूद्ध निर्णायक लड़ाई छेड़ने में पूर्णतः सक्षम है। उसी प्रकार २०१९ के संसदीय चुनावों के पूर्व अपनी सरकार के वर्तमान कार्यकाल के अंतिम बजट- २०१८ को पूर्व-सरकारों की परम्परागत लोक-लुभावन घोषणाओं की शैली से हट कर, कुछ कड़े निर्णय के साथ प्रस्तुत कर उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि देश के संतुलित विकास के लिए सभी वर्गों को अपनी क्षमतानुसार वित्तीय अनुशासन में रहना होगा।
 
१६० लाख रूपये करोड़ की वार्षिक जीडीपी वाली विश्व की ७वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था के अब तक के रिकार्ड सब से बड़े आकार २४ लाख करोड़ रूपये के वार्षिक बजट २०१८ में ऐसा कुछ नहीं है जिसे चुनाव पूर्व वोटरों को लालच देने वाला बजट कहा जाए। मध्यम आय वर्ग जो हमेशा ऐसे मौके पर आय कर में छूट के लिए लालायित रहता है उसको निराश करने वाला बजट है। निजी आय कर प्रदाताओं की श्रेणी में वेतनभोगी वर्ग के योगदान को सराहते हुए कर योग्य आय में रू. ४०,०००/- की मानक कटौती का प्रावधान किया गया है जिससे आय कर दर की श्रेणी के अनुसार लगभग रू. २००० से १२,००० तक की आय कर छूट प्राप्त होगी परंतु आय कर की दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। संकेत साफ है कि यह वर्ग जहां मंहगाई दर आधारित १० वर्षीय वेतन पुनरीक्षण द्वारा अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने हेतु लड़ाई को उद्यत रहता है, वहीं अब उसे राष्ट्र के आर्थिक विकास में उसी के अनुरूप अपने योगदान को बढ़ाने हेतु भी तत्पर रहना होगा। वर्तमान में, भारत का आय कर दर/जीडीपी अनुपात घाना के बाद विश्व में सब से कम १६.६ प्रतिशत मात्र है। जबकि ब्रिटेन में ३२.९ प्रतिशत तथा ब्राजील जैसे छोटे देश में ३५.६ प्रतिशत है।
 
इस बजट के द्वारा लगभग ब्रिटिश काल से चली आ रही ग्रामीण निर्धनता, जो कि वंशानुगत ऋणग्रस्तता में परिवर्तित होकर कृषक को अकाल कलवित करने लगी है, के मूल पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। विभिन्न उपज के मूल्यों की एक मकड़जाल चक्रीय प्रवृत्ति होती है। एक बाजार काल में जिस कृषि उपज के मूल्य लाभप्रद प्राप्त होते हैं, व्यापारी उस उपज का आयात तथा किसान अगले फसल चक्र में अधिक भूमि पर उस फसल को बोने लगते हैं। परिणामस्वरूप अगले मूल्य चक्र में पूर्ति अधिक होने कारण उसका बाजार मूल्य कम हो जाता है। कभी कभी किसान का लागत मूल्य भी नहीं निकल पाता है। राजनीति इस स्थिति का लाभ लेकर प्रदर्शन तथा ऋणमाफी आंदोलन की राह दिखा देती है। ऐसी हालत में बजट २०१८ द्वारा किसानों को उनकी फसल लागत के १.५ गुना न्यूनतम समर्थित मूल्य की घोषणा तथा उस मूल्य पर सरकारी खरीद की गारंटी देने से कृषि एक लाभकर व्यवसाय में परिवर्तित होगी तथा किसान क्रमशः अपनी परम्परागत ऋणग्रस्तता से छुटकारा पा सकेगा। इसके अतिरिक्त कृषि हेतु वित्तीय संस्थागत ऋण उपलब्धता गत वर्ष की रू. १० लाख करोड़ से बढ़ा कर रू. ११ लाख करोड़ कर दी गई है। पशु पालन तथा मछली पालन उद्योग के लिए २ नए कोष, शीघ्र नष्ट होने वाली शाक फसलों यथा आलू, प्याज व टमाटर की कीमतों में होने वाली पूर्तिकालीन गिरावट की स्थिरता हेतु नई ‘आपरेशन ग्रीन’ योजना, कृषि सिंचाई योजना, फूड प्रोसेसिंग इकाइयों तथा बांस प्रसंस्करित कुटीर उद्योगों आदि के लिए रू. ४००० करोड़ की अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। रू. १०० करोड़ तक के सालाना उत्पादन वाली कृषि उपज प्रसंस्करण करने वाली इकाइयों द्वारा अर्जित १०० प्रतिशत लाभ को आय कर परिधि से बाहर रख कर, इनमें कृषि उपज की मांग प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है।
 
महिला स्वसहायता समूहों के लिए गत वर्ष के रू. ४२,५०० करोड़ के स्थान पर रू. ७५,००० करोड़ तथा रू. १० लाख तक के प्रति इकाई ऋण की प्र.मं. मुद्रा योजना के अंतर्गत ३ लाख करोड़ के ऋणों का प्रावधान किया गया है। इससे स्वरोजगार के अवसरों में पर्याप्त वृद्धि होगी। अवस्थापनात्मक ढांचे के विकास के लिए सड़कों, रेलवे, वायु यातायात व अन्य क्षेत्रों में गत वर्ष की रू.४.९१ लाख करोड़ की अपेक्षा विनियोजन की सीमा ५.९७ लाख करोड़ रूपये कर दी गई है जिससे अकुशल व अर्द्धकुशल रोजगार के अवसरों में पर्याप्त वृद्धि होगी। रू. २५० करोड़ तक के वार्षिक टर्नओवर वाली लघु औद्योगिक इकाइयों पर आय कर की दर ३० प्रतिशत से घटा कर २५ प्रतिशत कर दी गई है। जिससे इन्हें उत्पादन बढ़ा कर रोजगार के नए अवसर सृजित करने में सुविधा होगी। विदेशी मोबाइल फोन, टी वी व उनके पुर्जों के आयात पर आयात शुल्क १५ प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया है जिससे कि भारतीय कम्पनियों द्वारा निर्मित मोबाइल व इलैक्ट्रोनिक सामान की मांग बढ़ने से घरेलू कम्पनियों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी।
 
बजट २०१८ में, समाज के गरीब वर्ग, वरिष्ठ नागरिकों व महिलाओं के प्रति सर्वाधिक उदारता दिखाई गई है। अपने विभिन्न निर्णयों से विश्व रिकार्ड बनाने की श्रृंखला में मोदी सरकार ने ‘आयुष्मान भव’ की एक विशाल एवं भारत की लगभग ५०-६० करोड़ निर्धन आबादी के १० करोड़ परिवारों की स्वास्थ्य रक्षा योजना के अंतर्गत प्रति परिवार रू. ५ लाख का स्वास्थ्य बीमा कराने की घेाषणा की है। इस योजना पर लगभग रू. ११,००० करोड़ व्यय होगा जिसमें राज्य सरकारों की भी भागीदारी होगी। ६० वर्ष की आयु पार कर चुके वरिष्ठ नागरिकों की ‘वय वंदना योजना’ के अंतर्गत ८ प्रतिशत प्रति वर्ष की निर्धारित वार्षिक दर पर सुनिश्चित मासिक आय हेतु विनियोजन सीमा बढ़ा कर रू. १५ लाख कर दी गई है। महिला कर्मियों को ई.पी.एफ. में उनके ८ प्रतिशत की सहभागिता के विपरीत उनके सेवायोजक द्वारा १२ प्रतिशत का अंशदान प्रदान किया जाएगा। इसके अतिरिक्त वरिष्ठ नागरिकों के मेडीकल बीमा प्रीमियम पर रू. ५०,००० तक की छूट आय कर से प्रदान की गई है। सार्वजनिक बैंकों तथा बीमा कम्पनीज से प्राप्त रू.१०,००० के स्थान पर, रू.५०,००० तक के ब्याज पर आय कर से छूट प्रदान की गई है। उज्ज्वला योजना के अंतर्गत प्रदूषणमुक्त रसोई घर हेतु ८ करोड़, निर्धन परिवारों को निःशुल्क गैस कनेक्शन देने का प्रावधान किया गया है। गंभीर बीमारियों के इलाज की स्थिति में वरिष्ठ नागरिकों को रू. १ लाख तक के व्यय को आय कर मुक्त कर दिया गया है।
 
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता हेतु अर्थव्यवस्था को अनुशासनबद्ध करने का प्रयास किया गया है। जी.डी.पी. पर वित्तीय घाटे की अनुमानित दर ३.५ प्रतिशत को घटा कर ३.३ प्रतिशत पर रखने का लक्ष्य रखा गया है। विगत नोटबंदी तथा उसके पूर्व किए गए प्रयासों से मंहगाई दर लगभग ३.५ प्रतिशत की दर पर पहुंच गई जिस कारण उद्योगों में पूंजी नियोजन के प्रति रूझान कम होता प्रतीत हुआ। गत वर्ष जी.डी.पी. में ६.३ प्रतिशत वृद्धि के विपरीत इस वर्ष ८ प्रतिशत तथा निर्यातों में १५ प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ७वें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के कारण उपभोक्ता आय में वृद्धि से मांग में भी वृद्धि होगी। मध्यम, लघु तथा सीमांत उद्योगों व स्वरोजगार इकाइयों की लाभदेयता हेतु भी प्रयास किए जा रहे हैं। इन सब तथा कृषि लागत के १.५ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य के परिणामस्वरूप स्थानीय बाजार में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक ४.५ प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। आर्थिक विकास की संतुलित गतिशीलता के लिए इस प्रकार की मूल्य वृद्धि स्वीकार करना आवश्यक है। अर्थव्यवस्था के सभी पक्षों को इस हेतु वित्तीय अनुशासन में रहना आवश्यक है।
 
दीन-दयालु समाज कल्याण योजनाओं पर बढ़ते हुए व्यय की व्यवस्था हेतु अधिक राजस्व की आवश्यकता है। नोटबंदी व जी.एस.टी. के लागू होने के परिणामस्वरूप कर अनुशासन स्थापित हो रहा है तथा कर राजस्व में २५ प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना है। शेयर बाजार में मूल्यों के उतार-चढ़ाव के कारण वास्तविक निवेश में तो कोई वृद्धि होती नहीं है पर इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भी सोने-चांदी, रियल एस्टेट तथा उपभेाक्ता वस्तुओं के थोक मूल्यों पर पड़ता है। अतः रू. १ लाख तक की छूट देकर, दीर्घकालीन पूंजीगत लाभों पर १० प्रतिशत का कर लगा दिया गया है। रू. ८०,००० करोड़ की व्यवस्था सार्वजनिक क्षेत्र की सम्पत्ति के विनिवेश के द्वारा एकत्र किए जाने का लक्ष्य है। ‘वय वंदना योजना’ में जमा राशि की सीमा रू. १५ लाख तक बढ़ाए जाने से भी सरकारी जमा बढ़ने की आशा है। साधारण बीमा क्षेत्र की ३ सरकारी कम्पनियों का विलय कर जहां अनावश्यक गैर उत्पादक व्यय में कमी की जाएगी वहीं निजी क्षेत्र की बीमा कम्पनियों से प्रतियोगी क्षमता बढ़ने के कारण उपभोक्ताओं द्वारा इनमें अधिक निवेश की संभावना बढ़ेगी।
 
वित्तीय अनुशासन पूर्ण सुधारों की श्रृंखला में प्रस्तुत इस बजट के द्वारा सरकार ने अपने राजधर्म का पूर्ण निर्वाह करने का संकल्प स्पष्ट कर दिया है। अथर्ववेद में कहा गया है-‘‘या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टा अभिचस्कन्द वंदनेव वृक्षम्। अन्यत्रास्मत् सवितस्तामितोधाः हिरष्यहस्तो वसु नो रराणः॥‘अर्थात् हिरण्यहस्त ईश्वर समान वितरण करते हैं। जो धन किसी के पास अप्रयुक्त हो उसे उन लोगों के पास पहुंचाना अभीष्ट है, जहां लोगों को उसकी आवश्यकता है। मनुस्मृति में भी राजधर्म की व्यवस्था में कहा गया है कि -‘‘अलब्धमिच्छेत दण्डेन, लब्धं रक्षेतवेक्ष्या। रक्षितं वर्धयेदंवृद्धयां, वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्।’’ (मनुस्मृृति-५/१०९) अर्थात् राज्य का कर्तव्य है कि वह उन्हें जिन्होंने छल तथा अनुचित तरीकों द्वारा ऐसे धन को प्राप्त किया है जो उनके लिए उपलब्ध था (चोरी, बिना श्रम के या कर चोरी, जमा खोरी) को दण्डित कर, नैतिक तथा विधिक रीति से धनोपार्जन को प्रोत्साहित करें। इस प्रकार लब्धधन की रक्षा, रक्षित धन की वृद्धि एवं उचित पात्रों (प्रजाजन) के कल्याण हेतु धन का पुनर्नियोजन करें।
 
एक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भ लेखक श्री प्रशांत मिश्र की अति सटीक टिप्पणी उल्लिखित करने का लोभ संवरण नहंी कर पा रहा हूं, ‘‘किसानों को कीमत की गारंटी मिले, सिर पर पक्की छत हो, बिजली हो, खाने को अनाज हो, पास के शहर तक जाने की सड़क मिले, इलाज की ५ लाख तक की गारंटी हो तो सिर उठा कर चलना आसान ही नहीं आदत भी हो जाती है।’’ स्पष्ट है कि चुनावी वर्ष के ठीक पूर्व अंतिम बजट में मोदी सरकार ने चुनावी हानि लाभ की चिंता किए बिना, अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ता, तीव्र आर्थिक विकास की दर, वित्तीय अनुशासन तथा समाज के अधिसंख्य निर्धन एवं अक्षम वर्ग के कल्याण का बजट प्रस्तुत कर २०१९ के चुनावों के प्रति अपनी पूर्ण आश्वस्ति एंव आत्मविश्वास का भी स्पष्ट संकेत दे दिया है।

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