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सुप्रीम कोर्ट के इन वर्षों में कई विवादास्पद फैसलें आए हैं। कुछेक को भेदभावपूर्ण माना जाता है। जलिकुट्टु, सबरीमाला, दहीहांडी, दीवाली पर पटाखे पर पाबंदी आदि ऐसे फैसले हैं जिन्हें समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया। इससे निष्पक्ष न्याय-व्यवस्था पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।

सुप्रीम कोर्ट को देश का न्याय का सर्वोच्च मंदिर कहा जाता है। निचली अदालतों एवं हाईकोर्ट से न्याय नहीं मिलने पर सभी लोग सबसे बड़े न्याय के मंदिर (सुप्रीम न्यायालय) में न्याय की गुहार लगाते हैं। वहीं उनकी आखिरी उम्मीद होती है। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले एवं विविधता से भरे देश में यदि निष्पक्ष न्याय नहीं मिलेगा तो फिर न्यायालयीन व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न तो उठेंगे ही और उसे आलोचना का शिकार होना पड़ेगा। लोगों की आवाज को अवमानना के नाम पर नहीं रोका जा सकता। या तो देश में न्यायालयीन व्यवस्था व कार्यप्रणाली की समीक्षा करते हुए तत्काल सुधार करना होगा या फिर जनता के आक्रोश का सामना करना होगा।

अभिव्यक्ति के नाम पर देशविरोधी असामाजिक तत्व भारत तेरे टुकड़े होंगे… इंशा अल्ला, इंशा अल्ला, हम ले कर रहेंगे आजादी, कश्मीर में तिरंगा उठानेवाला कोई नहीं होगा, कहने वाले लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। तब देश आक्रोशित होता है और न्यायिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है।

राम मंदिर, जलिकट्टु, सबरीमला, दीवाली पर पटाखे चलाने, रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठ, कश्मीरी पंडित, दहीहांडी, महाकाल मंदिर, राफेल, लाऊड स्पीकर, गोहत्या व गोवंश हत्या बंदी आदि अनेक विवादित मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले सवालों के घेरे में आए हैं।

कश्मीरी पंडित और रोहिंग्या मामला

मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी से हिंदुओं को प्रताड़ित कर खदेड़ दिया गया। तब आजाद भारत में ही भारतीय सेना, पुलिस, प्रशासन एवं न्यायालय आदि सारी व्यवस्थाएं धरी की धरी रह गईं और अपने ही देश में कश्मीरी हिन्दू विस्थापित हो गए। बलात्कार, हत्या, मारकाट, लूटपाट, कत्लेआम आदि प्रताड़नाओं को झेलनेवाले कश्मीरी हिंदुओं ने जब कुछ ताकत जुटाकर न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की याचिका दायर की तो सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सुनवाई करने तक से साफ इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला पुराना हो गया है, सबूत जुटाने में मुश्किल होगी। जबकि यही सुप्रीम कोर्ट विदेशी रोहिंग्या मुसलमानों की दया याचिका स्वीकार कर लेता है और उस पर सुनवाई भी करता है लेकिन अपने ही देश के लोगों की सुनवाई नहीं करता। वहीं दूसरी ओर एक आतंकवादी की फांसी की सजा रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट आधी रात को भी चलता है लेकिन दशकों से आम जनता के ‘पेंडिंग केस’ की सुनवाई नहीं होती, उन्हें बस तारीख पर तारीख ही मिलती है।

दीपावली पर्व के दौरान पटाखों पर बैन

दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही अचानक सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश आता है और लोगों को पता चलता है कि पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वह भी केवल दीपावली के पर्व के दौरान ही यह प्रतिबंध मर्यादित होता है। क्रिसमस व न्यू ईयर के दौरान पटाखों पर कोई रोक नहीं होती। तब पटाखों से न तो शोर होता है और न ही उससे प्रदूषण होता है। सुप्रीम कोर्ट आदेश को लागू करने के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए कहता है कि उत्तर भारत में रात को और दक्षिण भारत में दिन में केवल 2 घण्टे ही आतिशबाजी कर सकते हैं। दिल्ली में केवल ग्रीन पटाखों का ही इस्तेमाल हो सकेगा। क्या सुप्रीम कोर्ट का उक्त आदेश तर्कसंगत – न्यायसंगत था? क्या उसे अमल में लाया जा सकता था? यदि अमल में नहीं लाया जा सकता तो कोर्ट ऐसे आदेश ही क्यों देता है जिससे उसकी अवमानना हो। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर तमाम सांसदों ने सवालिया निशान लगाया था; जो कि संवैधानिक व्यवस्था के लिए घातक है।

जलिकुट्टु पर प्रतिबंध

सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप खेले जानेवाले जलिकुट्टु पर प्रतिबंध लगाने से पूरे तमिलनाडु में आक्रोश फूट पड़ा और इसके खिलाफ फ़िल्म स्टार से लेकर राजनेताओं सहित जनता ने मोर्चा खोल दिया। चेन्नई के मरीना बीच पर लाखों की संख्या में जनसैलाब उमड़ पड़ा। सभी ने एक स्वर में जलिकुट्टु के समर्थन और प्रतिबंध के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की। जनता के आक्रोश व चौतरफा दबाव के चलते राज्य सरकार ने एक संवैधानिक अध्यादेश पास कर राज्य में फिर से खेल शुरू करने का मार्ग प्रशस्त किया। ज्ञात हो कि पशुओं के अधिकारों और उन्हें क्रूरता से बचाने के लिए काम करनेवाली अनेक संस्थाओं ने मिलकर याचिका दायर की थी। उनकी मांग के अनुरूप कोर्ट ने जलिकुट्टु पर प्रतिबंध लगाया था। लेकिन जनता ने सड़कों पर भारी विरोध प्रदर्शन कर कोर्ट के फैसलों को पलटने पर मजबूर कर दिया। इस पर जनता का कहना था कि इस खेल में पशुओं के साथ क्रूरता नहीं की जाती और न ही पशुओं की जान जाती है। जबकि बकरी ईद पर भेड़-बकरी आदि पशुओं की बड़ी ही निर्दयता व क्रूरता से कुर्बानी (हत्या) दी जाती है। क्या एक ही दिन में लाखों-करोड़ो की संख्या में पशुओं की हत्याएं न्यायालय और पशुओं के अधिकारों के लिए काम करनेवाली संस्थाओं को दिखाई नहीं देती? लोगों की मांग है कि न्यायालय को इन सभी पहलुओं पर ध्यान देकर ही निष्पक्ष निर्णय देना चाहिए।

सबरीमाला विवाद

वामपंथी नास्तिक, क्रिस्चियन एवं मुस्लिम महिलाओं ने मिलकर एक षड्यंत्र के तहत सबरीमाला मंदिर की पवित्रता, परंपरा, मान्यता व आस्था को चोट पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि सबरीमाला मंदिर में सभी वर्ग की महिलाओं को प्रवेश और पूजा-पाठ की इजाजत दी जाए। जबकि इन महिलाओं का आस्था, परंपरा और हिन्दू धर्म की मान्यताओं से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें तो केवल मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा और आस्था को खंडित करना था। वास्तविकता से कोसों दूर या फिर जानबूझकर करोड़ों हिंदुओं की जनभावना को दरकिनार कर सुप्रीम कोर्ट ने एकतरफा फैसला सुना दिया। मंदिर प्रशासन ने कई बार अपनी बात रखने की कोशिश की किंतु दलीलों को अनसुना कर दिया। जिसके विरोध में केरल की जनता और अधिकतर श्रद्धावान महिलाओं ने भी सड़क पर उतरकर अनेकों बार आंदोलन किया। मंदिर की परंपरा व पवित्रता भंग न हो, इसके लिए हजारों-लाखों लोगों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। लेकिन केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए मंदिर परिसर व उसके आसपास के क्षेत्र को युद्ध का मैदान बना दिया। सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर दिशा निर्देश देकर अपने आदेश की पूर्ति करा रहा था। इस पर सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और प्रशासन केवल हिंदुओं के धार्मिक मामलों में ही हस्तक्षेप करने का साहस कर पाते हैं, क्योंकि हिन्दू समाज सहनशील है। वहीं दूसरी ओर सबरीमाला की तर्ज पर मुस्लिम महिलाओं को सभी मस्जिदों में प्रवेश व नमाज अदा करने की बात आएगी तो यहीं सुप्रीम कोर्ट बगलें झांकने लगेगा। न्यायालय में याचिका दाखिल की गई थी कि मुस्लिम महिलाओं को भी पूजा अर्चना करने के लिए मस्जिदों में प्रवेश दिया जाए तब न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था।

मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतारने के आदेश पर नहीं हो रहा अमल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी धार्मिक स्थलों से अवैध लाउडस्पीकर को उतारने का आदेश पुलिस को दिया था। ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए सख्त कानून भी बनाया गया है। बावजूद इसके पुलिस ने मस्जिदों में लगे अवैध लाउडस्पीकर को न तो उतारा और न हीं ध्वनि प्रदुषण करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही की।

दहीहंडी विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने दहीहंडी की ऊंचाई 20 फुट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, ऐसा आदेश दिया था और इसके साथ ही नाबालिग बच्चों (बाल गोविंदाओं) के मटकी फोड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। बाल गोविंदा किसी दुर्घटना का शिकार न हो इसके लिए यह रोक लगाई गई थी। इस पर भी खूब बवाल मचा था। इस फैसले की आलोचना करते हुए प्रतिक्रियाएं आई थीं कि ताजिया के जुलूस के दौरान पूरे देश भर में छोटे-छोटे बच्चों का खूनी मातम सुप्रीम कोर्ट को दिखाई नहीं देता, जो सरेआम बीच सड़क पर खून से लथपथ दिखाई देते हैं।

इसके अलावा बीते कई दशकों से लंबित अयोध्या राम मंदिर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के लिए भी गले की हड्डी बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की तारीख पर तारीख वाली लेटलतीफी कार्रवाई से लोग ऊब गए हैं और न्यायालयीन प्रक्रिया पर तंज कस रहे हैं। लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो महीने भर के अंदर केस सुलझा लेती है और न चाहे तो 70 वर्षों में भी केस नहीं सुलझता। उदाहरण के रूप में चीफ जस्टिस पर लगे यौन शोषण का मामला और राष्ट्रीय महत्व का मामला राम मंदिर। इस पर भी सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई पर सभी नजर गढ़ाए हुए हैं।

अक्सर यह कहा जाता है कि, बेंच फिक्सिंग, अविश्वास का वातावरण, कोलेजियम विवाद, फोरम शॉपिंग के आरोपों, धौंस दिखाने की कोशिशों, मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिशों, बिचौलियों का दखल, आदि भ्रष्टाचारी गतिविधियों में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट सहित पूरी न्यायालय व्यवस्था आकंठ डूबी हुई है। कहते हैं अदालतों में दलालों का प्रभाव सबसे ज्यादा है और दखल बना रहता है। इन्हीं प्रमुख कारणों के चलते सरकार और सुप्रीम कोर्ट में टकराव की स्थिति भी देखने में आ रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इन सारी समस्याओं से निपट पाएगा और निष्पक्ष भेदभाव रहित न्याय समान रूप से जनता को मिलेगा? सुप्रीम कोर्ट के सामने यह यक्षप्रश्न बना हुआ है।

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