बाल गंधर्व का अंदाजे-बयां क्या करें

उन्नसवीं सदी के मध्य काल संगीत नाटकों का काल माना जाता है। मराठी रंगमंच ने बाल गंधर्व के रूप में ऐसा कलाकार दिया जिसका जादू आज भी कम नहीं हुआ है। उनकी स्त्री भूमिकाएं इतनी सजीव हुआ करती थीं कि महिलाओं में उन्हीं की शैली फैशन बन जाती थी। हाल में उन पर मराठी में एक फिल्म भी बनी है।

‘नाट्य संगीत’ महाराष्ट्र की सांस रही है। नाटक केवल गद्य नहीं होते थे, संगीत नाटक हुआ करते थे। यह संगीत नाटक आम जनता की खास पसंद होते थे। मराठी रंगमंच के महान कलाकार बाल गंधर्व का जन्म शायद रंगमंच के लिए समर्पित होने के लिए ही था। बाल गंधर्व का मूल नाम था नारायण श्रीपाद राजहंस। ‘बाल गंधर्व’ यह उपाधि लोकमान्य गंगाधर तिलक ने एक नाट्य समारोह में उन्हें दी थी। उनका जन्म सांगली जिले के सीमावर्ती गांव नागठाणे-पालूस में हुआ। बाल गंधर्व स्त्री किरादर के लिए प्रसिद्ध थे। उस जमाने में महिलाएं रंगमंच पर नहीं जाती थीं, यह उनके लिए वर्जित था। लेकिन बाल गंधर्व ने स्त्री किरदारों को बड़ी उंचाइयों तक पहुंचा दिया। स्त्रियों के अनेक रूप को उन्होंने बखूबी निभाया। स्त्री किरदार के रूप में रंगमंच पर उनकी हलचलें इतनी स्वाभाविक दिखती थीं कि यदि पता न हो तो कोई यह न जान पाए कि वह स्त्री वेष में पुरुष है।

उनकी रंगमंच की शुरुआत किर्लोस्कर संगीत मंडली के साथ हुई। फिर 1905 में यह कंपनी नानासाहेब जोगलेकर तथा मुजुमदार चलाते थे। इनमें गोविंदराव टेंबे, गंगेश आदि सहयोगी जल्दी ही कंपनी छोड़ कर चले गए। बाल गंधर्व अकेले ही इस कंपनी का भार उठाते रहे। बाल गंधर्व के गुरु श्री भास्कर बुआ बखले, नाटक का संगीत संभालते थे। इसलिए नाट्य सांगितिक रचनाओं को बखलेजी ने ही रचा था। नाटक में संगीत का स्थान महत्वपूर्ण तो था ही, परंतु बाल गंधर्व की सहज, सुंदर अभिव्यक्ति तथा आवाज में इतनी मिस्री थी कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। सभी रचनाएं शास्त्रीय संगीत से सराबोर होती थीं। बाल गंधर्व को शास्त्रीय संगीत की विधिवत् शिक्षा बखलेजी देते थे, इसलिए नाट्य संगीत की परंपरा अमीर होती गयी।

रंगमंच के किसी शहंशाह की तरह बाल गंधर्व का जीवन बीता है। वे लोगों के दिलों पर राज करते थे, जन मानस का भरपूर प्रेम उनकी तकदीर में लिखा था। मराठी के प्रसिद्ध लेखक श्री पु.ल. देशपांडे कहा करते थे कि बाल गंधर्व एक ऐसा जादू का पेड़ है जो मराठी श्रोताओं के मन में किसी हरसिंगार की तरह फूला-फला है, जिसकी महक मराठी नाट्य संगीत के रूप में चार दशक तक छाई रही। बाल गंधर्व नाटक मंडली 1916 में बनी थी। यह पूरा काल नाट्य संगीत का स्वर्णीम काल कहा जाता है। संगीत सौभद्र, शाकुंतल, मानापमान, संशय कल्लोल, शारदा, मूक नायक, स्वयंवर, विद्याहरण, एकच प्याला, मृच्छकटिक, इन नाटकों को अपार प्रसिद्धि मिली। घर-घर में इन नाटकों की चर्चा होती थी। लोग इतने प्रभावित थे कि उनके स्त्री किरदार के रूप में देखकर अचंभित हो जाते थे।

बाल गंधर्व ने करीब 25 नाटकों में काम किया। नाटक विशेषत: संगीत नाटक हुआ करते थे। यह संगीत आम जनता की खास पसंद हुआ करता था। उनकी नाटक कंपनी में उस जमाने की सुप्रसिद्ध गायिका गौहर कर्नाटकी का प्रवेश 1937 में हुआ। गौहर के कंपनी में प्रवेश से बाल गंधर्व के भाई श्री बाबूराव राजहंस काफी खफा थे। क्योंकि, धीरे-धीरे कंपनी में गौहर का विशेष स्थान बनता गया था। बाद में 1951 में उन्होंने गौहर कर्नाटकी से विवाह कर लिया। (पहली पत्नी का देहांत 1940 में ही हो गया था।)

उन्होंने अपने जीवन में न सिर्फ नयी-नयी रचनाओं का सृजन किया, बल्कि उनमें विस्मयकारी, अनूठी खूबियां भी आ गयी थीं। रचना छोटी होती थी, पर अपनी अभिव्यक्ति के कारण एक महल खड़ा कर देते थे। ऐसे अनेक मर्मस्पर्शी उदाहरण हैं। संगीत ही उनकी जाति थी और स्वर ही उनका गोत्र। वे रचनाओं के सृजन पक्ष का यथसंभव विस्तार किया करते थे। इसमें श्रोताओं को सम्मोहित कर लेने की खूबी छिपी होती थी। लोग मुग्ध हो जाते थे, संवेदनशील हो जाते थे। बाल गंधर्व सुरीले गायक थे। मराठी रंगमंच पर उनके अनेक राग प्रसिद्ध हुए जैसे- खमाज, बागेश्री, तिलककामोद, पहाड़ी, यमन देशाकर आदि। रंगमच की सुंदरता की तरफ भी उनका विशेष ध्यान हुआ करता था। फूलों को परदों पर विशेष वातावरण के लिए निर्मित किया जाता था। नाटक के लिए राजा‡ महराजाओं के महलों से कीमती साड़ियां (मराठी शालू) मंगाई जाती थीं।

मा. कृष्णराव ने भी उन्हेें सहयोग दिया है। प्रसिद्ध लेखक राम गणेश गड़करी, खाडिलकर, कोल्हटकर ये सभी नाटक लिखा करते थे। बगीचे, महल, रास्ते जैसे दृश्य परदों पर बनाते थे,ताकि प्रसंग विशेष की पार्श्वभूमि का एहसास हो सके। शास्त्रीय संगीत के ग्वालियर, किराना, जयपुर तथा आगरा घरानों से वे काफी प्रभावित थे। ‘अमृतांची गोपाला’, ‘मानसका’, ‘जोहारमाय बाप’ ये सभी रचनाएं इन घरानों की गायकी से प्रभावित थीं। मानापमान नाटक की प्रस्तुति के समय उनकी बेटी का देहांत हो गया था, फिर भी दर्शक‡ श्रोता निराश न हो इसलिए पहला प्रयोग उन्होंने होने दिया। ऋषि कन्या, शाकुंतल राजकन्या, भामिनी, इंदिरा काकू, सिंधू ये सभी किरदार उन्होंने बड़ी सफलता से निभाए। 1933 से हिंदी फिल्मों का दौर चल पड़ा था। ‘एकनाथ’ तथा ‘धर्मात्मा’ फिल्मों में उन्होंने काम जरूर किया, परंतु वे रंगमंच से ही सही संतुष्टि पाते थे। फिल्मों में काम करना उनके मन को नहीं भाया।

उनकी नौ गजी महाराष्टीयन साड़ी पहनने की एक स्टाइल बन गयी थी। औरतें उसे देखकर वैसे ही साड़ी पहनने की कोशिश करती थीं। उनके देखने का ढंग, मंद-मंद मुस्कुराने की कला, आंखों के हाव-भाव, उठने-बैठने की शैली आम महिलाओं का फैशन बन गयी। मराठी के मूर्धन्य साहित्याकार आचार्य अन्ने बाल गंधर्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। वे कहा करते थे, स्त्री के किरदार की सार्थक और सुंदर प्रस्तुति पहले कभी भी नहीं देखी थी। मराठी साहित्यकार श्री कोल्हटकर कहा करते थे, बाल गंधर्व, शिवाजी महाराज तथा बाल गंगाधर तिलक ये तीन हस्तियां जादू के मंत्र का काम करती थीं। संगीत सूर्य श्री केशवराव भोसले के साथ संयुक्त ‘मानापमान’ में उन्होंने रंगमंच को प्रसिद्धि की बुलंदी पर पहुंचा दिया। रातभर ये नाटक चलते थे। 1910 से 1930 तक का काल नाट्य संगीत का स्वर्ण काल कहा जाता है, जिसका पूरा श्रेय बाल गंधर्व को दिया जाता है। मराठी नाट्य संगीत, शास्त्रीय संगीत की धरती पर फूला फला है, इसमें दो राय नहीं। उनके अभिनय में किरदार की जीवंत उपस्थिति महसूस होती थी। करुणा, प्रेम वात्सल्य, अभिमान, नैराश्य इन सभी रसों को वे बड़ी सहजता से अपने चेहरे पर लाते थे। शास्त्रीय संगीत से स्पंदित इन किरदारों के जरिए महाराष्ट्रीयन परंपरा के प्रति सांस्कृतिक समझ तथा गहरी आत्मीयता उन्होंने लोगों में पैदा की। ऐसा लगता था मानो नाटकीय किरदार न हो कर वे स्वंय भामिनी या सिंधू हो गए हैं। अभिनय की अभिव्यक्ति सहज होती थी। यह उनकी सृजनशीलता का महत्वपूर्ण पक्ष है।

रंगमंच पर प्रवेश से पहले वे नारायण राजहंस होते थे, लेकिन जैसे ही रंगमंच पर कदम रखते थे वे बाल गंधर्व हो जाया करते थे। वे रंगमंच पर प्रवेश करते ही उस किरदार में खो जाते थे। जनता उनके अभिनय में छिपी गहरी बात, चेहरे के हाव-भाव से अनेक अछूते पहलुओं को उद्घाटित होते देखती थी। उनके किरदार के रूप में पहने सुंदर गहने आम लोगों में बड़ी जल्दी प्रचलित हो जाया करते थे। बाल गंधर्व के बालों की स्टाइल देखकर, औरतें उनकी नकल करने लगी थीं। फूलों की वेणी या फिर जूड़े की देखादेखी होती थी और रातोंरात प्रसिद्ध हो जाती थीं। उनकी अदाएं बड़ी जल्दी सार्वजनिक हो जाती थीं।

बाल गंधर्व ने भारतीय, खासकर महाराष्ट्रीयन संस्कृति को समृद्ध किया है। उन्हें 1955 सन में राष्ट्रपति पुरस्कार से तथा 1961 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

उनके नाट्य संगीत की रिकार्ड खूब बिकती थीं। नाटक को रंगमंच पर देखते हुए संगीत को ‘वन्स मोर’ अक्सर मिलता था। बाल गंधर्व ऐसे अमर और अद्वितीय गायक थे जो किरदार से एकाकर होकर स्वरों से आत्मीयता साधते थे। कल्पनाशीलता की असीम शक्ति उनमें सहज थी। उनके गाए नाट्यगीत लोग आज भी बड़ चाव से सुनते हैं। उनके कुछ प्रसिद्ध नाट्य गीतों में ‘मला मदन भासे हा’ तथा ‘खरा तो प्रेम’ या फिर ‘पांडु नृपति’ आदि अनेक रचनाएं हैं। नाटकों की अवध इन सुंदरतम रचनाओं के कारण बढ़ती थी। सुबह तक वही संगीत का आलम बना रहता था। रचनाएं बंंधी हुई नहीं थीं, कलाकार गायक बन जाता था। भूमिका को निभाते हुए वे गायन के सौंदर्य में खो जाते थे….रचनाओं को जहां मुकम्मल हो वहां से विस्तारित करते थे। नि:संदेह वे उन रचनाओं की अलौकिकता को समझते थे। इसीलिए उन्हें विस्तारित करने की कला में गंधर्व माहिर थे।

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