अप्रतिम शौर्य की जनगाथा- आल्हा

‘आल्हा’ अथवा ‘आल्हखण्ड’ बारहवीं शताब्दी में रचित दो बनाफर राजपूत वीरों आल्हा और ऊदल की वीरता का महाकाव्य है। इस महाकाव्य के रचइता जगनायक या जगनिक महोबा के चंदेल राजा परमाल के दरबारी कवि एवं दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज के प्रसिद्ध दरबारी कवि चंदबरदाई के समकालीन थे। जगनिक का ‘आल्हखण्ड’ उनके समकालीन चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ और परवर्ती कवियों की काव्य वीरगाथाओं से इस मायने में भिन्न है कि अन्य वीरगाथायें जहां आश्रयदाता सम्राटों की वीरता के गुणगान स्वरूप लिखी गयी हैं, वहीं आल्हखण्ड में परमाल राजा के दो वीर सिपहसालारों आल्हा और ऊदल नामक दो भाइयों के शौर्य का वर्णन किया गया है।

आल्हा और ऊदल के पिता देशराज और चाचा बच्छराज बड़े बलिष्ठ और वीर योद्धा थे। जो राजा परमाल के दरबार में नियुक्त थे। देशराज और बच्छराज दोनों भाइयों ने अत्यन्त बलवान गूजर स्त्रियों से विवाह किया था। प्रसिद्ध है कि देशराज और बच्छराज जंगल में शिकार खेलने गये थे वहां उन्होंने दो विशालकाय जंगली भैसों को लड़ते देखा। भयानक ढंग से लड़ते-लड़ते दोनों भैंसे बहुत घायल हो गये थे, किन्तु एक-दूसरे से हार मानने को तैयार न थें। दोनों बार-बार पीछे हटते और फिर दौड़कर एक-दूसरे को टक्करें मारकर लहूलुहान कर रहे थें। लड़ते हुए भैंसों की यह हालत देखकर वहां उपस्थित एक युवा गूजर स्त्री ने परस्पर गुत्थमगुत्था दोनों भैंसों की सींगें पकड़कर अलग कर दिया। उस स्त्री के बल, साहस एवं रूप पर मोहित होकर देशराज ने उससे तथा उसकी दूसरी बहन से बच्छराज ने यह सोचकर विवाह कर लिया कि उन वीर बालाओं से उत्पन्न सन्तानें भी बहुत वीर होंगी। आल्हा और ऊदल उसी गूजर पत्नी से उत्पन्न देशराज के पुत्र थे। बच्छराज के भी दो पुत्र मलखान और सुलखान हुए। कलिंगा राय ने षड्यन्त्र पूर्वक देशराज और बच्छराज की नृशंस तरीके से हत्या करवा दी थी, जिसका बदला लेने हेतु कलिंगा और उसके साथी राजाओं से आल्हा और ऊदल द्वारा लड़ी गई लड़ाइयों का वर्णन आल्हखण्ड की प्रमुख कथा है, जो संक्षेप में इस प्रकार है-

महोबा के राजा बासुदेव परिहार जाति के ठाकुर थे। उनकी कुशला, अगमा, तिलका व मल्हना नाम की चार बेटियां और माहिल नाम का बेटा था। बेटियों की विवाह योग्य उम्र होने पर राजा बासुदेव ने अपने मंत्रियों को उनके लिए सुयोग्य वर तलाश करने का आदेश दिया। मंत्रियों की सलाह पर सबसे बड़ी बेटी कुशला मांडव के राजा जम्बे, दूसरी बेटी अगमा दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान, तीसरी बेटी तिलका कन्नौज नरेश रतीभान (राजा जयचंद के भाई) और चौथी बेटी मल्हना चंदेरी के शासक राजा परमाल को ब्याही गईं। बासुदेव के बेटे माहिल का चाल-चलन कुछ ठीक नहीं था। अत: जब राजा परमाल मल्हना को विवाहोपरान्त विदा कराकर चलने लगे मल्हना ने उनसे अनुरोध किया कि वे उसे महोबा से न ले जायें। उसका भाई माहिल महोबा के राज्य को नष्ट कर देगा। परमाल मल्हना की बात मानकर महोबा में रुक गये, तो साले माहिल से उनकी अनबन हो गई। माहिल को राज्य से बेदखल कर निकाल दिया गया, तो वे उरई में जाकर बस गये। माहिल और राजा परमाल में दुश्मनी और गहरी हो गई। माहिल स्वयं को परमाल से लड़ने में अशक्त पाता था। अत: अपनी दूसरी बहन अगमा के पति पृथ्वीराज के कान भरता रहता था और परमाल के ऊपर चढ़ाई करके महोबा राज्य का प्रसिद्ध और कीमती नौलखाहार छीन लेने के लिए उकसाता रहता था।

कलिंगा जो माहिल की सबसे बड़ी बहन कुशला का बेटा और माहिल का भांजा था, अपने मामा माहिल की ही भांति धूर्त एवं धोखेबाज था। एक बार कलिंगा गंगा स्नान हेतु बिठूर गया, तो उसकी बहन बिजया ने उससे बिठूर के गंगा मेले से नौलखाहार लाने की फरमाइश कर डाली। कलिंगा मेले में नौलखाहा ढूंढ रहा था तभी उसकी भेंट मामा माहिल से हो गई। माहिल ने कलिंगा कों बताया कि नौलखाहार बिठूर में नहीं मिलेगा, वह तो महोबा में ही मिलेगा। यदि उसे अपने प्रिय बहन की नौलखाहार की इच्छा पूरी करनी हो, तो महोबा पर चढ़ाई करके नौलखाहार लूट कर लाना पड़ेगा। माहिल की बातों में आकर कलिंगा ने महोबा पर चढ़ाई कर दी। महोबा पर आक्रमण की बात जानकर मल्हना ने देशराज और बच्छराज को कलिंगा से महोबा को बचाने हेतु यह कहकर बुला भेजा कि ‘माता से बढ़कर मातृभूमि है, राखो धरम महोबे क्यार।’ देशराज और बच्छराज ने वीरतापूर्वक लड़कर कलिंगा को युद्ध में बुरी तरह परास्त कर दिया। कलिंगा को अपनी हार लिखकर स्वीकार करनी पड़ी। कलिंगा के मंत्री ने कलिंगा को समझाया कि मौका मिलने पर पुन: चढ़ाई करेंगे और हार के अपमान का बदला ले लेंगे।

कुछ दिन बाद कलिंगा ने भादों के महीने में धोखेबाजी से रात को सोते हुए देशराज और बच्छराज को बंधवा लिया और उनके गांव दशहरि पुरवा को लुटवा लिया। लूटपाट में उसे उस समय का विख्यात घोड़ा पपीहा, हाथी पचसावद, लाखा पातुर (नर्तकी) और नौलखाहार मिला। देशराज और बच्छराज को कलिंगा अपने राज्य मांडवगढ़ ले गया जहां दोनों को पत्थर के कोल्हू में पेरवाकर मार डाला।

इस घटना के समय ऊदल मां के गर्भ में थे। आल्हा की उम्र छह वर्ष और मलखान चार साल के थे। जब ऊदल का जन्म हुआ तो मांडवगढ़ और दिल्ली में अनेक अपशकुनी घटनाएं होने लगीं। पंडितों ने विचारकर बताया कि यह महोबा में जन्म लेने वाले बालक (ऊदल) के कारण है। यह बालक मांडवगढ़ और दिल्ली राज्यों के लिए अत्यन्त अशुभ है, क्योंकि उग्र स्वभाव वाला वह बालक अत्यन्त बलवान होगा और किसी का मान नहीं रखेगा। पृथ्वीराज ने डरकर माहिल से उस बालक को मरवा डालने को कहा। माहिल ने महोबा आकर ऊदल की माता द्यावलि को बहला-फुसलाकर नवजात ऊदल के निकृष्ट ग्रहों का वास्ता देते हुए मरवा देने के लिए राजी कर लिया। ऊदल की माता ने ऊदल को सागर में फेंक देने का हुक्म दे दिया। एक बांदिन (नौकरानी) ने यह बात जाकर मल्हना को बता दी कि द्यावलि के जो लड़का हुआ है उसे उसने सागर में फिंकवां दिया है। मल्हना ने बांदिन से कहा कि वह बालक को मरने न दे और महल में ले आये। बांदिन ने ऊदल को मल्हना के पास पहुंचा दिया। बालक को देखकर मल्हना और उसके पति परमाल बहुत खुश हुए। परमाल ने बालक के नामकरण और नक्षत्र विचार हेतु प्रसिद्ध ज्योतिषी पंडित चूड़ामणि को बुलवाया। पंडित चूड़ामणि ने बालक के जन्म नक्षत्रों की प्रशंसा की और बताया कि बालक ने विलक्षण ग्रहों के जन्म लिया है, जिसमें अन्य कोई बालक नहीं जन्मा है। उन्होंने बालक की छठी कराने और छठी में ढाल तथा तलवार की पूजा करने का परामर्श दिया। मल्हना के कहने पर ऊदल को छठी में शेरनी का दूध पिलाया गया जिससे उनका एक नाम ‘बघ ऊदल’ भी पड़ गया। ऊदल जब मात्र बारह वर्ष के थे उन्होंने भाई आल्हा के साथ मांडवगढ़ पर चढ़ाई करके कलिंगा को उसी तरह मार डाला जैसे कलिंगा ने उनके पिता देशराज और चाचा बच्छराज को मारा था। तब से उनकी वीरता प्रसिद्ध हो गई और वे राजा परमाल के यहां रहने लगे। आल्हा-ऊदल ने मांडवगढ़ की लड़ाई में रक्षाबंधन के दिन शाम को विजय प्राप्त की थी। रक्षाबंधन के बाद दो दिन तक बुन्देलखण्ड में इस विजय का उत्सव मनाया गया। कालान्तर में इस विषय के नायक आल्हा और ऊदल के यशोगान के रूप में बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन के बाद के मेलों में आल्हा गायन की परम्परा पड़ी, जो अब तक चलती आ रही है।
आल्हखण्ड एक विशाल ग्रन्थ है जिसकी मूल पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं है। इसमें कुल बावन लड़ाइयों का वर्णन है। आल्हा गायकों, जिन्हें अल्हैत कहा जाता है, ने इस विशालग्रन्थ को मौखिक परम्परा से जीवित रखा है। सन् 1865 ई. में चार्ल्स ईलियन ने आल्हखण्ड के विभिन्न मौखिक संस्मरणों को एकत्र कर 23 खण्डों में लिपिबद्ध कराया, जिसका प्रथम मुद्रित संस्करण सन् 1871 ई. में आ सका। किन्तु आज न तो यह मुद्रित संस्करण सुलभ है और न आल्हा गायकों ने अपने गायन में इसे अपनाया ही। आल्हा आज भी अपनी मौखिक परम्परा से ही जीवित है। बुन्देली, बघेली, अवधी, कनौजी और भोजपुरी क्षेत्रों, जहां आल्हा गायन अधिक प्रचलन में है, के गायकों ने अपने गायन में अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषा के रंग को सुरक्षित रखा है। सामान्य आल्हा प्रेमी पाठकों के लिए करौली, कानपुर के कुंअर अमोल सिंह भदौरिया द्वारा चौबीस खण्डों में लिखित आल्हा की मुद्रित प्रति उपलब्ध है।

आल्हागायन के कार्यक्रम विशेष रूप से बरसात के मौसम में होते हैं। आल्हा में वर्णित सभी लड़ाइयां अथवा प्रसंग रोचक हैं, फिर भी श्रोताओं में मांड़वगढ़ लड़ाई-बाप का बदला, तीरथ सागर, नदी बेतवा, मछलाहरण, सुरजाहरण, जगनायक का ब्याह और रेतागढ़ की लड़ाई जैसे प्रसंग अधिक लोकप्रिय हैं और बार-बार सुने जाते हैं। आल्हा गायकों में श्री बच्चा सिंह (बुन्देलखण्ड), श्री बल्ला सिंह (मथुरा), श्री गया प्रसाद पाण्डेय (प्रतापगढ़) और श्री लल्लू बाजपेई (नारायण खेड़ा, उन्नाव) ने विशेष ख्याति अर्जित की है। श्री लल्लू बाजपेई के आल्हा गायन से प्रभावित होकर पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी ने उन्हें ‘आल्हा सम्राट’ की उपाधि प्रदान की थी। सन् 2002 ई. में इफ्को फांउडेशन, दिल्ली के निदेशक श्री उदयशंकर अवस्थी ने उन्नाव, उ. प्र. में श्री लल्लू बाजपेई की अध्यक्षता में आल्हा अकादमी की स्थापना की है। आल्हा अकादमी के सौजन्य से आल्हा की उपलब्ध प्राचीन पुस्तकों का संकलन किया गया है तथा आल्हा गायन में प्रशिक्षण का कार्य भी प्रारम्भ किया गया है। आल्हा गायन की परम्परा को जीवित रखते हुए श्री राजकुमार पाण्डे, रामरस पाण्डे (रायबरेली), जयशंकर मिश्र (लालगंज) तथा जगदीश नारायण दीक्षित जैसे आल्हा गायकों ने इस क्षेत्र में प्रदेश का नाम कमाया है। श्री लल्लू बाजपेई द्वारा प्रशिक्षत महिला गायिका कु. शीलू सिंह राजपूत ने भी आल्हा गायन में कदम रखा है और बहुत अच्छा आल्हा गायन कर रही हैं।

आल्हा प्रमुख रूप से वीर रस का काव्य है, जिसमें शृंगार और करुण रस सहयोगी रसों के रूप में अपनी छटायें बिखेरते हैं। जनकाव्य होने और ग्रामीण जनता द्वारा अधिक पसन्द किये जाने के कारण इसकी भाषा अत्यन्त सरल और ग्रामीण शब्दावली से भरपूर, क्षेत्रानुसार अपनी माटी की सुगन्ध लिए हुए है। वीरता के बखान में अतिशयोक्ति का प्रचुर प्रयोग हुआ है। अल्हैत आल्हा गायन के समय सामन्तकालीन रणबांकुरों की वेशभूषा और ढाल-तलवार धारण किये होते हैं। अल्हैतों के उच्च स्वर में गायन व वादकों की संगत से वीरता का ऐसा समां बंधता है कि श्रोताओं के अंग फड़कने लगते हैं। ऐसी भी लोकमान्यता है कि कौरवों व पांडवों का कलयुग में पुनर्जन्म हुआ तथा आल्हा में वर्णित लड़ाइयां पुन: जन्में कौरवों-पांडवों द्वारा लड़ी गई हैं। इस मान्यता में पृथ्वीराज को दुर्योधन, आल्हा को युधिष्ठिर, ऊदल को अर्जुन, लाखन को नकुल, मलखान को भीम, माहिल को शकुनि तथा कलिंगा को दु:शासन माना जाता है। सत्यता कुछ भी हो, पर आल्हा में सामन्तकालीन राजाओं द्वारा छलकपट और षड्यन्त्र पूर्वक दूसरों की जर जोरू जमीन के अपहरण हेतु लड़ते-झगड़ते रहने का इतिहास सुरक्षित है। यह भी कि अपनी मातृभूमि व आत्मसम्मान की रक्षा हेतु भारतीय रणबांकुरे अपना बलिदान देते रहे हैं। इतिहास के गर्त में समा गई ये लड़ाइयां अब आल्हा के रूप में लोकरंजन का माध्यम बन गई हैं।

आपकी प्रतिक्रिया...