मानव मात्र के आराध्य दाशरथि राम

भारत ऋषि-मुनियों का देश है। ऋषियों की प्रज्ञा मानवता के संविधान वेद के मन्त्रों का प्रत्यक्ष दर्शन किया करती थी- ऋषय मंत्रद्रष्टार:। उन ऋषियों ने ही भारतभूमि को देवभूमि, यज्ञभूमि, योगभूमि, त्यागभूमि, आर्यभूमि के रूप में कीर्ति प्रदान की है। इस भूमि में उन्होंने जीवन की सम्पूर्णता के, जीवन के सौन्दर्य के दर्शन किये थे।

ऋषियों की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों मे एक हुए-महर्षि वाल्मीकि। उन्होंने देखा कि वेद के सौ-सौ मंत्रों के दर्शन करने वाले शतर्ची ऋषियों में एक मंत्र के दृष्टा कश्यप भी विराजमान हैं। कम कहा; पर बहुत कहा-‘सौ सुनार की एक लुहार की।’ वाल्मीकि ने कश्यप की परम्परा को निभाने का निश्चय किया इसलिए कश्यप-गोत्रिय कहे जाने लगे।

उन्होंने सुना था कि इतिहास और पुराण से वेद का ससुपबृंहण किया जाना चाहिए- इतिहासपुराणाभ्यां वेदं ससुपवृंहयेत्। वेद को जीवन में प्रत्यक्षीकृत करने की उनकी चाह ने उनको आदि कवि बना दिया। वेदाभ्यास के प्रसंग में इन्होंने पढ़ा-

‘‘वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं आदित्यवर्णं तमस: परस्तात्।

नमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय॥’’

(यजुर्वेद 31/18)

अर्थात् मैं इस आदित्य वर्ण के, अन्धकार से परे, महान् पुरुष को जानता हूं। उसी को जानकर मृत्यु को पार किया जा सकता है। अयन के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है।

इस मंत्र ने वाल्मीकि के मन में दो जिज्ञासाएं जगाईं। उन्हें जिज्ञासा थी-महापुरुष कौन है? तथा दूसरी-अयन और उसका मार्ग कैसे खोजा जाए? इन जिज्ञासाओं ने वाल्मीकि को विशुद्ध विज्ञान-स्वरूप बना दिया। गोस्वामी तुलसीदास ने वाल्मीकि की इसी रूप में वन्दना की है-

‘‘सीता-राम गुणग्राम-पुण्यारण्यविहारिणौ।

वन्दे विशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वर-कपीश्वरौ॥’’

वाल्मीकि ने जीवन का रहस्य खोजते हुए नारद की प्रेरणा से लोकविश्रुत राम को खोजा और रामायण (राम-अयन) संज्ञक महाकाव्य रच डाला।

राम वाल्मीकि की खोज का परिणाम हैं। उनके राम इस धरती को स्वर्ग बनाने के लिए प्रकट हुए थे। जिज्ञासा जितनी बड़ी थी, उतनी ही बड़ी खोज थी। राम के जीवन की उदात्तता को देखकर आधुनिक कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था-

‘‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,

कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।’’

स्वयं वाल्मीकि ने कहा- ‘रामो सत्यैव नापर:’ अर्थात् राम स्वयं सत्य ही हैं, कोई और नहीं। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘‘रामाभिधानो हरि:’’ अर्थात्  ‘राम नाम वाले हरि’ कहा। तुलसीदास ने तो राम के मुख की मञ्जुल छवि की भी वन्दना की है, जो राज्यतिलक का समाचार सुनकर भी प्रसन्नता को प्राप्त नहीं हुई और वनवास के समाचार सुनकर भी म्लान नहीं हुई-

‘‘प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवास दु:खत:।

मुखाम्बुज श्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा॥’’

जगत् और जड़ की आत्मा सूर्य की भास्वरता को देखकर वेद ने उसे महापुरुष के गुणों का निर्धारक माना था। वाल्मीकि ने सूर्यवंश में उत्पन्न दशरथपुत्र राम को महापुरुष के रूप में देखा, परखा और वर्ण्य-विषय बनाया। उनका नारद से प्रश्न था-इस समय लोक में गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, दृढ़व्रत्, चरित्र-युक्त, सर्वभूतहितकारक, विद्वान्, समर्थ, अद्वितीय प्रियदर्शन, आत्मवान्, जितक्रोध, प्रकाशमान्, अनसूयक और युद्ध में क्रुद्ध होने पर देवों को डराने वाला कौन है? ये सब वाल्मीकि के मन में बैठे हुए महापुरुष के गुण थे। नारद ने उनकी जिज्ञासा का उत्तर देते हुए कहा-लोकश्रुति के अनुसार इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राम इन गुणों से विभुषित हैं।

वाल्मीकि ने जितने गुणों की कल्पना की थी उससे भी अधिक गुण गिनाये थे नारद ने। राम नियतात्मा, महान् शक्तिशाली, प्रकाशमान्, धृतिमान्, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान्, नीतिमान्, वाक्कुशल, श्रीमान्, शत्रु विनाशक, वृषभ स्कन्ध, महाबाहु, कम्बुग्रीव, महाहुन, सुदृढ़ वक्ष:स्थल वाले, महान् धनुर्धर, गूढ़-विजेता, शत्रुञ्जय, आजानुबाहु; सु-शिर, सु-ललाट, सु-विक्रम, सबसे समान व्यवहार करने वाले, समविभक्ताङ्ग, स्नेहयुक्त वर्ण वाले, प्रतापवान्, पीनवक्ष:स्थल, विशालाक्ष, लक्ष्मीवान् और शुभ लक्षण सम्पन्न थे। वाल्मीकि ने अपनी खोज के परिणाम के रूप में राम को प्रस्तुत किया। इनमें से एक गुण भी मानवता का आदर्श बन सकता है। राम तो गुणों के समुच्च थे। उनको धर्म का साक्षात् रूप माना जाता है।

वाल्मीकि को बताया गया कि राम धर्मज्ञ हैं, सत्यसंध हैं और प्रजा के हित में लगे हुए हैं। यशस्वी, ज्ञान सम्पन्न, पवित्र, जितेन्द्रिय और समाधिमान् हैं-

‘‘धर्मज्ञ: सत्यसन्धश्च, प्रजानां च हिते रत:।

यशस्वी ज्ञान सम्पन्न: शुचिर्वश्य: समाधिमान्॥’’

वे प्रजापति के समान श्रीमान् हैं, धाता के समान शत्रुविनाशक हैं। जीवलोक के रक्षक और धर्म के रक्षक हैं। अपने स्वयं के धर्म और आत्मीयजन के रक्षक हैं। वेद-वेदांग के तत्त्वज्ञ हैं और धनुर्वेद में निष्ठावान् हैं-

‘‘प्रजापतिसम: श्रीमान् धाता रिपुनिषूदन:।

रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता॥

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठित:॥’’

यही नहीं, यह भी बताया गया-

‘‘सर्वशास्त्रार्थ तत्त्वज्ञ: स्मृतिमान्, प्रतिभावान्।

सर्वलोकप्रिय: साधुरदीनात्मा विचक्षण:॥

सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्रं इव सिन्धुभि:॥

आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:॥

स च सर्वगुणोयेत: कौसल्यानन्दवर्धन:॥’’

सर्वगुण सम्पन्न राम को आदर्श बनना था मानव जाति का। मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता भी सिद्ध की जानी थी। इसीलिए उपमाओं की झड़ी लगाकर कहा गया-

‘‘समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव।

विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शन:॥

कालाग्नि सदृश: क्रोधे, क्षमया पृथिवी सम:।

धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवायर:॥’’

राम का यह सर्वातिशायी रूप वाल्मीकि और परवर्ती अनेक कवियों के लिए वर्णन का विषय ही नहीं बना, जन-जन के लिए प्रेरणा का स्त्रोत भी बन गया। उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया।

इस समय मानवता का संक्रान्ति काल चल रहा है। मनुष्य और मनुष्य में दूरियां बढ़ गई हैं। मनुष्य की पहचान ही लुप्त होती चली जा रही है। ऐसे समय में आवश्यक हो गया है कि राम के चरित्र को समझाया जाय और उनके गुणों को जीवन में उतारकर मनुष्य और मनुष्यता की नई पहचान बनाई जाय।

युग-युग में राम को इसी उद्देश्य से पुकारा गया है। कहा गया है-‘‘राघवो करुण: रस:।’’ व्यक्ति-व्यक्ति का उद्धार करने में समर्थ सर्वातिशायी करुणा का उद्रेक राम में हुआ था। उन्होंने कहकर किसी को कुछ नहीं सिखाया। करके, स्वयं आदर्श रूप प्रस्तुत करके जीवन की शिक्षा दी है। इसलिए वे जीवन के संविधान वेद के साकार रूप भी है। कामना यही की जा सकती है कि युग-युग में किसी-न-किसी गुण के साथ राम धरा पर अवतारित होकर मानवता का उद्धार करते रहें। वे गुणसागर हैं और गुणों का विकास अपने भीतर चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य के आराध्य हैं।

 

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