पौराणकिता से गूंथा पूर्वोत्तर भारत

पूर्वोत्तर के सभी प्रांत-असम, अरुणांचल, नागालैंंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय देश की जनता और राजनेताओं द्वारा सदा उपेक्षित रहे हैं। आज भी यह उपेक्षा कम नहीं हुई है। यहां के प्रांतों, नगरों के नामों तक से देश के पढ़े-लिखे लोग तक भी अपरिचित हैं, फिर यहां की भाषाओं, संस्कृतियों के बारे में वे कहां से जान पाते? भारत के लोगों के मन में यहां के प्रति कहां से आत्मीयता जगेगी? क्या यह भारतीय एकता की एक कमजोर कड़ी नहीं है?

देश के आम लोगों के मन में पूर्वोत्तर के बारे में एक नकारात्मक सोच है। भारत के मानचित्र में यह अलग-थलग-सा दिखायी देता है। देश की स्वतंत्रता के नाम पर 1947 में हुए विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान बनाते समय भौगोलिक स्थितियों का जरा भी ध्यान नहीं रखा गया। यह भाग देश से 22 कि.मी. की पट्टी मात्र से मुर्गी की गर्दन की तरह जुड़ा है। असम का निकटतम बंदरगाह चटगांव, जहां से 1900 ई. में शुरु किया गया तिनसुकिया तक का रेल मार्ग, हमारे हाथ से निकल गया। वह रेल पथ तिनसुकिया से दीमापुर, लामडिंग, हाफलोंग, करीमगंज होता बांग्लादेश के अखौरा, कोमिल्ला आदि गोकर चटगांव तक जाता था। बंटवारे के समय से ही हमारे नेता इस भूभाग को उपेक्षा की दृष्टि से देखते आये है। उन्हें तो देश की आधी-अधूरी जैसी भी मिले आजादी की जल्दबाजी थी, तभी तो पूर्वी बंगाल का उत्तरी भाग विभाजन की थाली में परोसते समय उन्होंने तनिक भी नहीं सोचा कि हमारे हिस्से में रहे पूर्वोत्तर के भविष्य का क्या होगा? इन प्रदेशों को बांग्लादेश, चीन (तिब्बत) और म्यांमार ने चारों तरफ से घेर रखा है।

इन प्रदेशों का उज्ज्वल अतीत रहा है। पूरा पूर्वोत्तर क्षेत्र पहले प्राग्ज्योतिष फिर कामरुप नाम से जाना जाता था। प्राग्ज्योतिष या कामरुप का रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, हरिवंश, विष्णु, वायु, अग्नि, मत्स्य, ब्रह्मांड, मार्कण्डेय आदि पुराणों में कई स्थानों पर उल्लेख है। कालिदास कृत रघुवंश में रघु के दिग्विजय प्रसंग में भी प्राग्ज्योतिष प्रदेश और इसकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर का उल्लेख मिलता है।

प्राग्ज्योतिष प्रदेश की राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान गुवाहाटी) में बैठकर ही ब्रह्मा ने नक्षत्रों और जगत की सृष्टि की थी। प्राग्ज्योतिषपुर नाम स्वयं में उक्त कथन का प्रमाण है। आप चाहें तो इसका आंग्ल अनुवाद कर लें – ‘प्री एस्ट्रॉलॉजिकल प्लेस’ यानी ज्योतिष ज्ञान के पूर्व का स्थल। आज भी गुवाहाटी में चित्रांचल पहाड़ी पर (चांदमारी क्षेत्र में) नवग्रह मंदिर स्थित है। सृष्टि के रचनाकाल संबंधी असम में रचित ‘कालिका पुराण’ का एक श्लोक इस प्रकार है –

अस्य मध्ये स्थितो ब्रह्मा प्राग् नक्षत्रम् ससर्ज ह:।
तत: प्राग्जोतिषारेव्यम् शक्रपुरी समा॥

रामायण-काल में भी यह नगर अस्तित्व में था। ‘तथा अमूर्त्तराजो धीरचक्रे प्राग्ज्योतिषपुरम्’ श्लोक में अमूर्त्तराजा का उल्लेख है जो विश्वामित्र के पितामह थे, इतना ही नहीं रामायण में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है –

तत्र प्राग्ज्योतिषंनाम जातरूपमयंपुरम्।
यस्मिन् वसतिदुष्टात्मा नरकोनामदानव:॥

इसी तरह यहाँ का नाम कामरुप पड़ने के बारे में कथा है कि घोर तपस्या में मग्न देवधिदेव महादेव की समाधि को येन-केन-प्रकारेण भंग करने के लिए कामदेव ने उन पर अपने कुसुम-धनुष से बारी-बारी अरविंद, अशोक, आम्र, नवमल्लिका और नीलोत्पल नामक पंच-बाण चलाये। इससे क्रोधित हो शंकर ने अपने तीसरे नेत्र से उसे भस्म कर दिया। उसकी पत्नी रति ने शिवाराधना की, तब उसे आदेश हुआ कि कामदेव की भस्मी लेकर प्राग्जोतिषपुर जाए। आखिर शिव-कृपा से उसे नहीं नया रुप मिला था, तब से यह क्षेत्र कामरुप कहलाने लगा। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथ ‘कालिका पुराण’ में इस प्रकार है –

शम्भुनेत्राग्निनिर्दग्ध: काम शम्भोरनुग्राहत्। तत्र रूपं यत: प्राण कामरूपं ततोभव्॥

सह्याद्री से परशुराम की अरुणाचल यात्रा

इसी पूर्वोत्तर के अरुणांचल स्थित परशुरामकुंड में परशुराम को अपने मातृहत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इसी जलधारा में परशुराम के हाथ से चिपका हुआ परशु छूटा था। उनकी पितृ-भक्ति भी बड़ी विकट थी, तभी तो अपने पिता जमदग्नि ऋषि के आदेश पर उन्होंने परशु से अपनी माता रेणुका का सिर काट डाला। रेणुका गंगा-स्नान करके लौट रही थीं, रास्ते में उन्होंने गन्धर्व चित्ररथ को स्वर्ग की अप्सराओं के साथ काम-क्रीड़ा करते, छिपकर देख लिया। उस क्रीड़ा को देखने में इतनी निमग्न हो गयी कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। जमदग्नि को अपने योगबल से पत्नी की करतूत का पता चला। उन्होंने अत्यंत क्रोधित हो पत्नी के उस अपराध के लिए मृत्युदंड देने की ठान ली। जमदग्नि ने पहले अपने अन्य पुत्रों को माता का शिरोच्छेद करने का आदेश दिया, जिसे किसी ने नहीं माना। अंत में परशुराम ने पिता के आदेश का पालन किया, किन्तु मातृ-हत्या के पाप से परशु उनके हाथ से चिपक गया। पुत्र की पितृ-भक्ति से प्रसन्न होकर पिता ने वर मांगने को कहा। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित कर देने की प्रार्थना की। माता को तो फिर से जीवन मिल गया, किन्तु परशुराम मातृ-हत्या से उद्वेलित और पश्चातापित थे। उन्होंने पिता को पूछा कि इस जघन्य पाप से कैसे मुक्ति मिलेगी? ऋषि जमदग्नि के निर्देशानुसार ही वे सह्याद्री (कोंकण) से चलकर इस ब्रह्मकुंड पर आये और लोहित-जल में स्नान करने पर उनके हाथ से चिपका परशु छूटा।
अरुणाचल के अंजाव जिले में ही कभी कलिता राज्य हुआ करता था। असम के मैदानी भाग में आज भी उनके वंशज रहते हैं। कलिताओं के बारे में परंपरागत रूप में कहा जाता है कि ये लोग क्षत्रिय हैं। परशुराम ने पृथ्वी से जब क्षत्रियों का विनाश करना प्रारंभ किया तब उनमें से कुछ अपने राज्यों से पलायन कर पूर्वोत्तर के इस क्षेत्र में आकर बस गये और यहां उन्होंने अपना कलिता साम्राज्य स्थापित किया। महापुरुष शंकरदेव के शिष्य ‘गोपाल आता’ ने अपने गुरु की गद्य में लिखी जीवनी में अपने जन्म स्थान कलिता देश का उल्लेख किया है।

अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों के उपायुक्त जैसे कई उच्च सरकारी पदों पर रहे जनजातीय लेखक डॉ. टी. लेगो अपनी पुस्तक ‘एन्सीयेंट एंड मेडियेवल हिस्ट्री ऑफ अरुणांचल’ में प्रभु कुठार के राजा दक्ष द्वारा किये गये महान बलिदान (यज्ञ) के बारे में भी लिखा है। लेखक के अनुसार प्रभु कुठार अरुणाचल के अंजाव जिले में वालोंग के आस-पास अनुमानित है। यह बात किसी और ने कही होती तो शायद मुझे विश्वास नहीं होता, किन्तु अब लगने लगा कि इदू मिश्मी जनजाति द्वारा मनाया जाने वाले ‘ताम्ला डू’ उत्सव जैसा ही कोई बृहद आयोजन दक्ष ने भी किया होगा।

पुराण कथाओं के साथ पुरातात्विक साक्ष्य खोजना बड़ा कठिन काम है। ये कथाएं इतनी प्राचीन हैं कि उनके प्रमाण जो ही कोई बृहद आयोजन दक्ष ने भी किया होगा।

पुराण कथाओं के साथ पुरातात्विक साक्ष्य खोजना बड़ा कठिन काम है। ये कथाएं इतनी प्राचीन हैं कि उनके प्रमाण जो रहे भी होंगे, वे अब विलुप्त हो गये। फिर भी अरुणांचल जैसे भूकंप प्रभावित प्रदेश में मिट्टी के तले दबे पड़े भग्नावशेषों का समय-समय पर मिलना भी इस बात का संकेत हैं। इस क्षेत्र न जाने मिनुतांग जैसे कितने ही गांव धरती के गर्भ में दबे होंगे। तेजू के पास हालीडूबा में मिला आयताकार 43.68 एकड़ में विस्तृत ‘मड फोर्ट’ (मिट्टी का किला) भी इस ओर ही इशारा करता है। इस किले के भीतर और बाहर चारों तरफ 20 फुट चौड़ी खाई खुदी हुई है। सुरक्षात्मक दृष्टि से यह अपने जमाने का बड़ा महत्त्वपूर्ण किला था। पुरतत्त्ववेत्ताओं ने इसे पन्द्रहवीं शताब्दी का निरुपित किया है।

इसी प्रकार ईस्ट कामेंग जिले के सिजूसा सर्किल में नक्स पर्वत पर मिले पुरातत्त्विक अवशेषों में पुराने प्रसाद के पाषाण निर्मित आधार-स्तंभ तथा अन्य साक्ष्य मिले हैंं। वैसे पौराणिक कथाओं के साथ लोगों में चला आ रहा जन-विश्वास भी कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं होती। मैंने अपनी पिछली परशुरामकुंड की यात्रा के समय भी सुना था कि दक्ष-यज्ञ यहां अरूणांचल में हुआ था। हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद भी यहीं के थे। उस समय तो मैंने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। इस बार डॉ.टी. लेगो की पुस्तक पढ़ी तो सोचने पर विवश हो गया। कोई इन्हें मिथक कहकर नकारने की भले चेष्टा करें किन्तु जगह-जगह मिलने वाले पुरातत्त्विक भग्नावशेषों को तो नहीं न नकारा जा सकता। इसके साथ ही अरुणांचल के जंगलों में जगह-जगह मिलनेवाले शिवलिंग भी इस बात का प्रमाण है कि यहां कभी शिव-पूजा का प्रचलन था। अरुणांचल के ही जीरो नामक शहर से सात-आठ कि.मी. दूर हापोली में पच्चीस फुट ऊंचा विशाल शिवलिंग अभी हाल ही में सन् 2004 में दबा मिला है।

पूर्वोत्तर के साथ महाभारतकालीन प्रगाढ़ संबंध

इस बात पर शायद कोई विश्वास न करे यदि पूर्वोत्तर की जनजातियों के बारे में यह तथ्य उजागर हो कि इनमें कई चन्द्रवंशी थे और इनकी कन्याओं के साथ महाभारत काल में द्वारका-हस्तिनापुर के राजपुरुषों ने अपने वैवाहिक संबंध बनाये थे। पौराणिक कथानुसार चन्द्रवंशी राजा पुरुरवा के वंशज नहुष के पुत्र ययाति का बुढ़ापा स्वीकार करने से उसके जिन चार पुत्रों यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु ने मना किया था, उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया गया। छोटा बेटा पुरु पिता के बुढ़ापे को स्वीकार कर अपना यौवन उसे देने के कारण पिता का उत्तराधिकारी बना। इसी पुरु के कुल में आगे चलकर कौरव-पांडव हुए।
निर्वासित द्रुह्यु ने पूर्व-दक्षिण दिसा में गंगासागर (बंगोपसागर) स्थित कपिलाश्रम क्षेत्र में आकर अपना राज्य स्थापित किया। उसके वंशज प्रतर्दन ने वहां से बढ़ते हुए ब्रह्मपुत्र और कपिली नदी क्षेत्र से आगे त्रिगर्त (वर्तमान त्रिपुरा) तक अपने राज्य का विस्तार किया। इसके बाद प्रतर्दन के कुल का चित्रायुध युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने इन्द्रप्रस्थ गया था। वहां उसे भेंट स्वरुप मिले श्वेत-छत्र की पूजा आज भी त्रिपुरा के राजघराने में एक निश्चित दिन होती बताते हैं। चित्रायुध युधिष्ठिर के राजसूय यत्र में सम्मिलित होने इंद्रप्रस्थ गया था। वहां उसे भेंट स्वरुप मिले श्वेत-छत्र की पूजा आज भी त्रिपुरा के राजघराने में एक निश्चित दिन होती बताते हैं। चित्रायुध के महाप्रतापी पौत्र त्रिपुर के नाम पर त्रिगर्त ही त्रिपुरा कहलाने लगा। इस प्राचीन त्रिपुरा राज्य के मूल निवासी भी किरातवंशी ही थे। बांग्लादेश के वर्तमान सिलहट (श्रीहट्ट) और चटगांव (चट्टग्राम) भी इसी राज्य के अन्तर्गत थे।

भीष्मक नगर की रुक्मिणी

श्रीकृष्ण का पूर्वोत्तर क्षेत्र में बार-बार आगमन हुआ। उनकी पटरानी रुक्मिणी यहां के वर्तमान सदिया के पास स्थित विदर्भ (आज के अरुणांचल में) के किरातवंशीय राजा भीष्मक की पुत्री थी। भीष्मक की राजधानी कुंडिल नगर कुंडिल नदी के तट पर बसी थी। भीष्मक के रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहू, रुक्मेश और रुक्ममाली नामक पांच पुत्र और एक कन्या रुक्मिणी थी। रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को मानसिक रुप से पति रुप में वरण कर लिया, जबकि बड़ा भाई रुक्मी उसका विवाह चेदि (वर्तमान तेजू : अरुणाचल का एक नगर) नरेश दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराने को उद्यत्त था। रुक्मिणी ने एक संदेशवाहक के संग श्रीकृष्ण को यहां आकर उसे ले जाने का निमंत्रण भेजा। इसे स्वीकार कर श्रीकृष्ण यहां आये और रुक्मिणी का हरण कर द्वारका ले गये। यह कथा श्रीमद्भावत, हरिवंश और विष्णु पुराण में भी वर्णित है।

अरुणांचल के तेजू शहर के बारे में डॉ.टी. लेगो अपनी पुस्तक ‘एन्सीयेंट एंड मेडियेवल हिस्ट्री ऑफ अरुणांचल’ में लिखते हैं कि तेजू में ही चेदी राज्य था। चेदी नरेश दमघोष के पुत्र शिशुपाल से विदर्भ के राजपुत्र रुक्मी ने अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह करना तय किया था। आज भी तेजू और रोइंग के पास स्थित विदर्भ के बिखरे पड़े अवशेषों में कोई साठ-सत्तर किलोमीटर की दूरी का ही अंतर मात्र है।

शिशुपाल श्रीकृष्ण की बुआ का बेटा था। श्रीकृष्ण के पिता का नाम वसुदेव और पितामह का नाम शूरसेन था। शूरसेन के पांच कन्याएं थीं – पृथा, श्रुतेदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। श्रीमद्भागवत के 9वें स्कन्ध के 24 वें अध्याय का 31वां श्लोक द्रष्टव्य है –

पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्ति: श्रुतश्रवा:।
राजाधिदेवी चैतेषां भगिन्य: पञ्चकन्यका:॥

शूरसेन ने अपनी प्रथम पुत्री पृथा को अपने मित्र कुन्तीभोज को गोद दिया जो पांडवों की माता कुंती के नाम से प्रसिद्ध हुई। चौथी पुत्री श्रुतश्रवा का विवाह चेदी नरेश दमघोष के साथ हुआ, जिनका पुत्र शिशुपाल था। इसका अर्थ यह हुआ कि श्रीकृष्ण-रुक्मिणी के विवाह से गुजरात के साथ पनपे संबंध के पहले से ही अरुणाचल का रक्त सम्बन्ध मध्य भारत से भी था। तेजू क्षेत्र में रहने वाले तावरा (दिगारु) मिश्मी जनजाति अपने आप को शिशुपाल का वंशज मानती हैं।

आज भी अरुणांचल की जनजाति ‘इदू मिश्मी’ अपना संबंध रुक्मिणी से मानते हैं। रुक्मिणी-हरण के समय रुक्मी ने अपनी सेना लेकर श्रीकृष्ण से युद्ध किया और पराजित हो गया। श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी के कहने पर अपने साले को जीवनदान तो दे दिया किन्तु सजा के रुप में उसके बाल काट उसे अध-मुंडा बना दिया। रुक्मी लज्जा से वापस नहीं लौटा, वहीं अलग राज्य स्थापित कर रहने लगा। उसी पौराणिक घटना के स्मृति स्वरुप इदि मिश्मी आज भी अपने बाल उसी तरीके से काटते हैं। इदू मिश्मियों को चुलिकाटा (बाल कटे) मिश्मी भी कहा जाता है। क्योंकि इस जनजाति के पुरुष कान के दो-तीन इंची ऊपर बाल काट कर अपना केश-विन्यास करते आये हैं।

कुछ लोगों की यह मान्यता है कि भीष्मक का राज्य महाराष्ट्र स्थित विदर्भ में रहा है, लेकिन सदिया के पूर्व में करीब 40 कि.मी. की दूरी पर कुंडिल नदी के किनारे बिखरे पड़े भग्नाविशेष भीष्मक के प्रागैतिहासिक नगर कुंडिल नगर की ऐतिहासिकता प्रमाणित करते हैं। इतना ही नहीं अरुणांचल के लोहित जिले की दिबांग घाटी के घने जंगलों में अंग्रेज कर्नल एस.एफ.हैनॉय ने सन् 1844 में भीष्मक के किले का पहली बार पता लगाया। राजा भीष्मक द्वारा वास्तु नियमों के अनुसार निर्मित यह किला लगभग बीस हजार वर्ग फुट में फैला है। किले के पूर्व, दक्षिण और पश्चिम की ओर 15 फुट ऊंची और 20 फुट चौड़ी दीवार, आज बीच-बीच में टूट गयी हैं। अब सन् 196 में हुए उत्खनन में ईंटों से 14.645 वर्ग फुट में फैले राजप्रासाद के भी अवशेष मिले हैं। इसमें तीन बड़े हॉल हैं। भीष्मक नगर तेजू (पौराणिक चेदी राज्य) से 80 कि.मी. दूर स्थित है। वैसे भीष्मक नगर रोइंग शहर से नजदीक है।

भीष्मक नगर से दस-बारह कि.मी. की दूरी पर स्थित ताम्रेश्वरी देवी के मन्दिर के बारे में विश्वास किया जाता है कि यहीं पर रुक्मिणी देवी-पूजा करने जाया करती थी। इस देवी को इदू मिश्मी जनजाति ‘केंचाइखाती गोंसानी’ कहते हैं। (असम में देवता को गोंसाई और देवी को गोंसानी कहा जाता है।) यह स्थान डिगारु नदी के दक्षिणी किनारे पर लगभग तीन किलोमीटर दूर घने जंगल के अन्दर पड़ता है। पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार यह मंदिर छठीं शताब्दी का बना हुआ है। इस इलाके में अत्यधिक पत्थरों के परिवेश के कारण बड़े वृक्ष कम ही मिलते हैं। विद्वानों का कहना है कि यह मंदिर पहले तांबे का बना हुआ था, जिससे इसे ताम्रेश्वरी देवी कहा जाने लगा। मंदिर के चारों तरफ बनी लंबी दीवारों के भग्नावशेषों को आज भी देखा जा सकता है। इनकी दीवारों में लगी ईंटें भीष्मक नगर में लगी ईंटों से साम्य रखती हैं। इसी आधार पर पुरातत्त्ववेत्ता इस मंदिर को राजा भीष्मक के समय का बताते हैं। पहले यहां के पुजारी इदू मिश्मी ही होते थे। बाद में देउरी जाति के लोग इसके पुजारी बने।

दिबांग घाटी के मिश्मी पहाड़ों पर मिले ‘रुक्मिणी नगर का किला’ के अवशेष भी इस पौराणिक कथा की सत्यता को प्रमाणित करते हैं। पहाड़ों पर निर्मित यह किला रोइंग के उत्तर में ‘चिदू’ और ‘चिमरी’ नामक गांवों के बीच में स्थित हैं। इसे मिश्मी ‘रुक्मिणी नटी’ कहते हैं। सन् 1950 में आये भयानक भूकंप में पूरा का पूरा चिदू गांव मिट्टी में धंस गया। भूकंप के पच्चीस-छब्बीस साल बाद हुए उत्खनन में ईंटों से बने दो कमरों के भग्नाविशेष मिले। एक कमरा 270 फुट लंबा और 108 फुट चौड़ा है तो दूसरा कमरा 129 फुट लंबा और 110 फुट चौड़ा है। इस संपूर्ण क्षेत्र में खुदाई करने पर ईंटें तथा मिट्टी के पात्र आज भी मिलते हैं। यहां मिले पात्रों में और भीष्मक नगर में पाये गये पात्रों में अद्भुत समानता है।

श्रीकृष्ण का पुन: प्राग्ज्योतिषपुर आगमन

प्राग्ज्योतिषपुर में शासन करने वाले महीरंग दानव के बाद इटकासुर, शंबरासुर, रत्नासुर और घटकासुर नामक चार और राजा हुए। घटकारसुर को मिथिला के राजा जनक के पौष्य पुत्र नरक ने मारकर वहां का राज्य अपने अधीन कर लिया। नरक विष्णु के वराहावतार के समय पृथ्वी का उद्धार करते समय दोनों के समागम से पैदा हुआ। भूमि-पुत्र होने के कारण वह भौमासुर भी कहलाया। उसका लालन-पालन जनक ने किया। नरक को विष्णु ने उसे अमरत्व प्रदान कर किरात राज्य प्राग्ज्योतिष का राजा बनाकर उसे सावधान किया कि यहां की अधिष्ठात्री कामाख्या देवी की जब तक तुम उपासना करते रहोगे तुम्हें कोई नहीं मार सकेगा। नरकासुर का विवाह राज्यकन्या मायादेवी से हुआ, जिसके गर्भ से भगदत्त नामक पुत्र हुआ। नरकासुर के स्वभाव में परिवर्तन आया और वह अत्याचारी बन गया। उसने अपनी ताकत के नशे में कामाख्या-पूजन भी बंद करा दिया। उसके अत्याचारों से त्रसित प्रजा को त्राण दिलाने के लिए आखिर श्रीकृष्ण ने द्वारका से आकर नरकासुर का वधकर सोलह हजार कन्याओं को उसके कारागर से न केवल छुड़ाया, अपितु उन्हें लोकलाज से बचाने और समाज में सम्मानित स्थान देने के लिए सभी से प्रतीकात्मक रुप में पाणिग्रहण भी किया।

श्रीकृष्ण ने नरकासुर के बेटे भगदत्त को प्राग्ज्योतिषपुर का राजा बनाया। आज भी गुवाहाटी स्थित ‘नककासुर पहाड़’ और नीलाचल स्थित कामाख्या मंदिर तक जानेवाला ‘नरकासुर मार्ग’ नरकासुर के नाम की याद दिलाते हैं।

श्रीकृष्ण का तीसरी बार प्राग्ज्योतिष आगमन

श्रीकृष्ण को रुक्मिणी से प्रद्युम्न नामक पुत्र हुआ। प्रद्युम्न का पुत्र अनिरुद्ध हुआ। अनिरुद्ध का शोणितपुर के राजा बाणासुर की पुत्री उषा से गंधर्व विवाह हुआ। इसका पता बाणासुर को लगा तो उसने उसे कारागार में डालकर उषा को अग्निगढ़ में बंदी बना दिया। अपने पौत्र को मुक्त कराने के लिए श्रीकृष्ण ने शोणितपुर आकर बाणासुर से युद्ध किया। बाणासुर की ओर से उसके आराध्यदेव महादेव शंकर को श्रीकृष्ण से युद्ध करना पड़ा। श्रीमद्भागवत में यह कथा हरि-हर युद्ध के नाम से वर्णित है। अंत में युद्ध का सुखद अंत हुआ। श्रीकृष्ण अपने पौत्र अनिरुद्ध का उषा से विवाह सम्मन्न कराकर उन्हें अपने साथ द्वारका ले गये।
शोणितपुर को ही आज तेजपुर कहते हैं, क्योंकि शोणित अर्थात रक्त को असमिया में ‘तेज’ कहते हैं। आज भी तेजपुर में उषा से संबंधित अग्निगढ़ के ध्वंसावशेष और बाणासुर के इष्टदेव शंकर का मंदिर विद्यमान है। इतना ही क्यों, बाणासुर के पौत्र भालुक की तेजपुर के पास स्थित राजधानी भालुकपुंग में उसके राज्य के भग्नावशेष भी मिलते हैं।

वशिष्ठ मुनि का प्राग्ज्योतिषपुर में देह-त्याग

वशिष्ठ का प्राग्जोतिषपुर में बार-बार आगमन हुआ। श्रीराम के परलोक गमन के बाद रघुकुल के राजपुरोहित के दायित्त्व से वे मुक्त हो गये। फिर उन्होंने भारतवर्ष के अनेक स्थलों का भ्रमण कर अपने आश्रम स्थापित किये। अपने भ्रमणकाल में संभवतः वे तिब्बत और उससे भी आगे चीन-मंगोलिया तक गये थे। क्योंकि तिब्बत के ‘रुद्र यामल’ और ‘ब्रह्म यामल’ तांत्रिक ग्रंथों में वशिष्ठ को तारा देवी का उपासक और तन्त्र-ज्ञाता लिखा गया है। तिब्बत के बौद्ध मत में महायान, हीनयान, वज्रयान और तंत्रयान सभी स्वीकृत हैं। वहां के बौद्ध विहारों के साथ ओत-प्रोत रुप से हिन्दू देव-देवियां जुड़ी हैं। बुद्ध की प्रतिमाओं के साथ असंख्य देवी-देवताओं काली, तारा, दुर्गा, भैरवी, सरस्वती आदि की मूर्तियां भी वहां हैं।

बौद्ध धर्म के महायान और हिंदू धर्म में बहुत-सी समानताएं हैं। केवल मां तारा ही नहीं, अपितु वहां प्रज्ञापारमिता और देवी सरस्वती भी पूजनीय हैं। हिन्दू धर्म में शिव की शक्ति काली, उमा या पार्वती की भांति बुद्ध की शक्ति मां तारा हैं। मां तारा को मुक्तिदायिनी संकटनाशिनी माना जाता है। तिब्बत में मां तारा के दो रुप हैं, एक हरा और दूसरा सफेद। हरे रंग की तारा के हाथ में नील कमल रहता है तो सफेद रंग की तारा के हाथ में सफेद पद्म फूल। वहां वीर मुद्रा में खड़ी, लाल वसनधारिणी, कमनीय देहा, सदाहास्यमयी, वरदात्री, ज्योतिर्मयी मां तारा की प्रार्थना के कुछ शब्द इस प्रकार हैं –

त्वम् ओम् वज्र:, नमो गुरुभ्य, नमो आर्यतारा मंडलेभ्य
ओम् आर्य तारा सपरिवारे नैवेद्यै प्रतिच्य हुम् स्वाहा।

तारातंत्र के अनुसार वशिष्ठ की तपस्या तारादेवी से संबद्ध है। इसलिए इसे ‘वशिष्ठाराधिता’ भी कहा जाता है। तारादेवी को कालिका पुराण में सती की दस महाविद्याओं में एक माना गया है। कामरूप में इसकी पूजा का विशेष विधान है। कामाख्या धाम स्थित तारा मंदिर और गुवाहाटी के उजान बाजार क्षेत्र के उग्रतारा मंदिर तथा गुवाहाटी के ही वशिष्ठाश्रम स्थित मंदिर में भी आद्यशक्ति, संपूर्ण ब्रह्मांड को गति-मति प्रदात्री, जगत प्रसवनि, परात्परा नाभिस्वरुपा इसी महामाया की पूजा होती है। कामरूप में शैव मत से शाक्त मत का प्रभाव अधिक बढ़ने के साथ वाममार्गी तांत्रिकों का वर्चस्व भी यहां बढ़ता गया और शैव एवं वैष्णव मन्दिरों के प्रसाद में भी सामिष भोग का समावेश हो गया।

कालिका पुराण में यह कथा भी है कि प्राग्ज्योतिषपुर के संध्याचल पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ तपस्या कर रहे थे। एक बार उन्हें कामाख्या दर्शन की कामना हुई किन्तु यहां के अधिपति नरकासुर ने इसमें उन्हें बाधा पहुंचाई। कुपित हो महर्षि ने उसे शाप दिया कि तुम्हारा प्राग्ज्योतिष राज्य श्रीविहीन हो जाएगा और कामाख्या यहां से अंतर्धान रह कर तुम्हारी मृत्यु के उपरांत ही फिर प्रकट होंगी –

त्वं यावज्जीविता पाप कामाख्यापि जगत् प्रभु:।
सर्वे परिकरै: सार्द्धमन्तर्द्धानाय गच्छतु॥

वशिष्ठ मुनि अपने जीवन के अंतिम प्रहर में द्वापर युग में फिर प्राग्जोतिषपुर आये थे। कलियुग के आरम्भ होने से पहले श्रीकृष्ण ने धरती से महाप्रयाण कर लिया था। कलि के प्रभाव से बचने के लिए श्रेष्ठ ऋषि-महर्षि भी पृथ्वी से अपने पंच-भौतिक शरीरों को त्याग अन्तर्धान होने लगे थे। अन्ततोगत्वा (वर्तमान गुवाहाटी स्थित) सन्ध्याचल पर वशिष्ठ मुनि ने भी अपना पार्थिव शरीर जहां त्यागा था, वह स्थान गुवाहाटी में स्थित वशिष्ठाश्रम कहलाता है॥

पूर्वोत्तर में कौरव-पाण्डवों के वैवाहिक सम्बन्ध

ययाति-पुत्र पुरु के ही वंशज कौरव-पाण्डव थे उनके पूर्वज द्रुह्यु की सन्तान त्रिपुरा में पहले से राज्य था। लाक्षागृह के अग्निकाण्ड से बचकर पंच पाण्डव अपनी माता कुन्ती के साथ यहां की नगाभूमि तक आये, जहां के अत्याचारी राजा हिडिम्ब का भीम ने वध किया। भीम के पराक्रम पर रीझकर हिडिम्ब की बहन हिडिम्बा ने उससे विवाह किया जिससे वीर पुत्र घटोत्कच का जन्म हुआ। माता के नाम पर घटोत्कच का नाम हैडिम्ब और हैडिम्बि भी था। घटोत्कच को उसके मामा के मारे जाने पर राजसिंहासन पर बिठाया गया। हैडिम्ब के वंश से चला राजकुल हैडम्बबर्मन कहलाया और उसकी राजधानी हिडिम्बापुर राजवंश के राजा अपने नाम के अन्त में ‘नारायण’ उपाधि लगाते थे। उनका शासन कछार में भी रहा। उस वंश की करीब एख सौ अस्सी पीढ़ियों की एक लम्बी वंशावली आज भी उपलब्ध है, जिसे ‘राजमाला’ कहा जाता है। हैडम्बबर्मन वंश का अन्तिम राजा गोविन्दचन्द्र नारायण था जिससे सन् 1832 में अंग्रेजों ने उसका राज्य छीन लिया।

अर्जुन के भी नगाभूमि की उलूपी और इरावती और मणिपुर नरेश चित्रवाहन की राजपुत्री चित्रांगदा से विवाह हुए। उसे इरावती से इरावत और चित्रांगदा से बभ्रुबाहन नामक पुत्र हुए। इसी प्रकार दुर्योधन का एक विवाह प्राग्जोतिष-नरेश भगदत्त की पुत्री भानुमति से तता दूसरा विवाह ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट पर बसे कुरुवा की लक्ष्मणा से भी हुआ था।

अब तक प्राग्जोतिष के सम्बन्ध हस्तिनापुर से प्रगाढ़ हो चुके थे। युधिष्ठिर द्वारा इन्द्रप्रस्थ में आयोजित राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होकर भगदत्त ने हाथी-दांत, गैंडे के चर्म से बने ढाल-खड्ग तथा पर्वतीय उपज से निर्मित अन्यान्य उपहार भेंट किये थे। महाभारत-युद्ध में भगदत्त अपनी जर्जर वृद्धावस्था के उपरान्त भी अपने जामाता दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने अपनी पीत-वर्णी विशाल किरात-वाहिनी और दस हजार हाथियों के साथ गये थे। महाभारत में पूर्वोत्तर प्रदेशों की जनजातियों का किरात कहकर उल्लेख मिलता है। ये पीत-वर्णी किरात और कोई नहीं यहां की जनजातियों के ही लोग थे। महाभारत में लिखा है, ये किरात देखने में अति सुन्दर और स्वर्णिम रंग की कायावाले हैं। इनके सिर पर केशों का नोकिला जूड़ा है। ये साहसी हैं। इनमें बाघ जैसी स्फूर्ति है।

युद्ध में भगदत्त के द्वारा अर्जुन पर छोड़ी गई शक्ति से उसकी रक्षा करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसे अपने ऊपर झेला था। आखिर तुमुल युद्ध के पश्चात भगदत्त ने अर्जुन के हाथों वीरगति पायी।

उसी महाभारत-युद्ध में भाग लेने यहां के एक और वीर बर्बरीक भी गये थे। वे नरकासुर के मंत्री मुर की पुत्री मौर्वी और घटोत्कच के पुत्र थे। नरकासुर के बाद उसका सेनापति मुर भी श्रीकृष्ण के हाथों युद्ध में मारा गया।तब उसकी पुत्री मौर्वी जिसे कामकंटकटा भी कहा जाता था,ने श्रीकृष्ण से युद्व किया। स्कन्द पुराण के अनुसार नीलाचलवासिनी कामाख्या देवी ने आकर उस युद्ध को रुकवाकर मौर्वी जैसी श्रेष्ठ वीरांगना का विवाह भीम-पुत्र घटोत्कच से कराने का प्रस्ताव श्रीकृष्ण के सामने रखा। उस विवाह के फलस्वरुप बर्बरीक का जन्म हुआ।

यदि बर्बरीक को युद्ध करने का अवतार मिल पाता तो क्या पता महाभारत का परिणाम कुछ और ही निकलता। बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से कहा था कि वे एक ही दिन में युद्ध जीत सकते हैं, लेकिन वे किसी पक्ष से युद्ध नहीं करेंगे। अन्त में जो पक्ष पराजित होगा उसकी ओर से लड़कर उसे विजयी बना देंगे। श्रीकृष्ण ने उनके संकल्प और असीम पराक्रम को परख कर दूसरे दिन ब्राह्मण वेश में जाकर उन्हें दान के लिए वचनबद्ध कर उनका शीश ही दान में मांग लिया। श्रीकृष्ण ने उनके शीश को जीवनदान देकर एक पर्वत पर स्थापित कर दिया और वरदान दिया कि कलियुग में उनकी ‘श्याम’ नाम से पूजा होगी। आज श्याम नाम से बर्बरीक के मन्दिर भारत में जगह-जगह हैं। इनका मुख्य मन्दिर राजस्थान के खाटु नामक गांव में हैं। मुंबई आदि बड़े महानगरों के में भी श्याम बाबा के मन्दिर हैं। असम में गुवाहाटी के अलावा जोरहाट, तिनसुकिया आदि शहरों में भी श्रद्धालुओं ने उनके नाम पर श्याम-मन्दिर बना रखे हैं।

महाभारत युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ का अश्व मणिपुर पहुंचा तो बभ्रुबाहन ने उसे पकड़ लिया। घोड़े को छुड़ाने के लिए उसके और अर्जुन के बीच युद्ध हुआ। वहां से यज्ञ-अश्व के जयन्तिया राज्य (वर्तमान मेघालय) में पहुंचने पर वहां की राजकुमारी प्रमीला ने उसे पकड़कर बांध लिया। जयन्तिया में तब भी आज की भांति मातृसत्तात्मक स्त्री-राज्य ही थी। आखिर प्रमीला से विवाह कर अर्जुन ने घोड़े को छुड़ाया। घोड़े के प्राग्जोतिषपुर पहुंचने पर भगदत्त के पुत्र वज्रदत्त ने उसे पकड़ा और अपने पिता-हन्ता अर्जुन से तीन दिनों तक घमासान युद्ध किया।

पूर्वोत्तर का कैरातज धर्म

योगिनी तन्त्र के अनुसार प्रथम शताब्दी में देवेश्वर नामक एक शूद्र राजा का कामरुप में राज्य था। उसी कालावधि में कामरुप के पश्चिम में धर्मपाल नामक एक क्षत्रिय राजा ने उत्तर भारत से आकर गुवाहाटी के पश्चिम में अपना राज्य स्थापित किया। वह अपने साथ कुछ उच्च वर्णीय लोगों को भी लेकर आया था। धर्मपाल के वंश के अन्ति राजा रामचन्द्र ने ब्रह्मपुत्र के मध्य स्थित माजुली द्वीप में अपना राज्य स्थापित किया। उसके आरिमत्त नामक पुत्र हुआ।

शिव के उपासक किरातों की चर्चा महाभारत में है। असम में लिखे गये योगिनी तन्त्र में इनके कैरातज धर्म को इस प्रकार परिभाषित किया गया है –

सर्व्वेशी योगिनीपीठे धर्म्म कैरातज: मत:॥
कामरुपे न संन्यास्तथा दीर्घ व्रतम् प्रिये।
न त्यजेत् सामिषम् देवी ब्रह्मचर्य्यामतम् न च॥
संसर्गात् पातकम् नैव स्त्रीधर्म्मे धर्म्ममाश्रयेत्।
न शुक्रदर्शनम् स्त्रीनाम् ताम्बूलाशा सदा भवेत्॥
हंस पारावतम् भक्ष्यम् कूर्म्मवराहमेव च।
कामरुपे परित्यागादुर्गतिस्तत्र सम्भवेत्॥

अर्थात् कामरुप का धर्म किरात जाति से जन्मा है। इसमें संन्यास विधि या दीर्घकालीन व्रतों का विधान नहीं है। कामरुप में मत्स्य-मांस की निषेधाज्ञा और ब्रह्मचर्य भी नहीं है। यहां संसर्ग दोष यानी जातिभेद भी नहीं है। स्त्री के ऋतुरक्षा धर्म को मान्यता है। यहां शुक्र-दर्शन की आवश्यकता नहीं यानी शुक्र के अस्त होने का विचार नहीं किया जाता है। यहां स्त्रियीं सदैव ताम्बूल खाती हैं। हंस, कबूतर, कछुवा, सूअर सभी यहां भक्ष्य हैं। कामरुप में इनके परित्याग से ही दुर्गति सम्भव है।
आज के बोड़ो और इसकी उपजातियां कछारी, डिमासा, कोच, लालूंग, गारो, राभा आदि की तरह हजारों वर्षों से पहाड़ों पर रहनेवाली खासी-जयन्तिया, कार्बी, नगा, मिजो (लुसाई), मिकिर आदि जनजातियां ही क्या पौराणिक किरात नहीं हैं? इनके बारे में पाश्चात्य विद्वानों ने कहा कि ये सब भी आर्यों की भांति भारत की बाहर से आये थे। क्या इसे ही सच मान लिया जाए? इनके बारे में किसी वेद-वेदान्त पुराण, शास्त्र, साहित्य यहां तक कि असम में लिखे गये कालिका पुराण या किसी जनश्रुति तक में इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

बोड़ो के बारे में असम में रहनेवाले अन्य प्रान्तीय लोग भी जब ठीक से नहीं जानते, तब देश के लोगों से तो अपेक्षा ही क्या रखी जा सकती है? असम की सम्पूर्ण जनजाति का 45ज्ञ् भाग ये बोड़ो हैं। ये असम के कोकराझार, नलबारी, शोणितपुर, कामरुप जिलों के अलावा दीमापुर व उत्तरी कछार के साथ ही त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, उत्तर बिहार, नेपाल के दक्षिणांचल में मेस आदि विभिन्न नामों से रहते हैं। असम में ही ये कछारी, डिमासा कछारी कहलाते हैं। समय और स्थानों के बदलाव के संग-संग इनके कुछ आचार-विचारों में भेद भी देखने को मिलते हैं।

ये सभी जनजातियां किसी-न-किसी रुप में शिव-पार्वती की आराधक रही हैं। बोड़ो में शिव की बाथौ बूढ़ा और पार्वती की बाथौ बूढ़ी के नाम से पूजा होती है। बाथौ का दूसरा अर्थ पंच तत्त्व भी है। बा माने पांच और थौ का अर्थ तत्त्व है। ये लोग पंच तत्त्वों के प्रतीक सिजू पौधे की पूजा करते हैं, जिसकी प्राकृतिक रुप से पांच शाखाएं ही होती हैं।

अरुणाचल में मिली प्राचीन गणपति-प्रतिमा

अरुणाचल के रोइंग शहर से करीब पन्द्रह किलोमीटर दूर सिरती लिंगी नामक इदू मिश्मी के सन्तरा बागान में कुछ साल पहले ही गणेश की विशाल प्रतिमा मिली थी। सिरती लिंगी ने वहां एक छोटा-सा मन्दिर बनवाया और गणेश-भक्त बन गया। तब से उसने आपोंग (स्थानीय शराब) पीना और मांसाहार भी छोड़ दिया है।

यह गणेश मूर्ति करीब पांच फुट ऊंची है। कहीं से खण्डित नहीं। इस इलाके में प्राय: मिट्टी के पात्र और कभी-कभी चिलमें भी मिलती रहती हैं। वैसे तेजू से लेकर रोइंग तक के विशाल क्षेत्रों की जहां-तहां खुदाई करने पर तरह-तरह के टूटे-फूटे मिट्टी के पात्र मिलते हैं। इन अवशेषों के बारे में पुरातत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि कुम्हार के चाक पर बने इस पात्रों की बनावट गंगा घाटी जैसी है जिससे लगता है कि वहां से आये लोगों ने दिबांग घाटी के बाशिन्दों को इन्हें बनाना सिखाया है। इन पात्रों को देखने से यह अनुमान लगाया जाता है कि आसपास के जंगलों में कभी साधु रहा करते थे। उनके द्वारा ही प्रयोग में लाये गये ये अवशेष हैं। किन्तु आज इन अवशेषों का पुरातात्त्विक महत्त्व है। इस ओर सरकार ने कोई ध्यान दिया या नहीं, नहीं कहा जा सकता।
पूर्वोत्तर भारत पौराणिक कथाओं से इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि सारी बातों को जानने के लिए बड़े अनुसंधान की जरुरत है। यहां जो कुछ भी लिखा गया है, वह तो केवल एख संकेत मात्र ही है। किन्तु यह खोज कौन करेगा? क्या सरकार से यह अपेक्षा की जा सकती है? कतहीं नहीं। हमारी तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकार को इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती। यह काम जिस व्यक्ति या संस्था, जो अपने गौरवशाली अतीत के प्रति आस्था रखती है, वही कर सकती है। सोचने की बात है कि उनके पास अपने कितने संसाधन हैं?

 

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