चिकित्सा क्षेत्र में हो उत्कृष्टता के प्रयास

हमें यह विश्लेषण करने की आवश्यकता है कि हम महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली जैसे कुछ राज्यों में कोरोना के द्वितीय चरण में एक टीम के रूप में कहां विफल हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप कोविड रोगियों और मौतों में वृद्धि हुई। ऐसे कई उदाहरण थे जहां इंजेक्शन, दवाओं, ऑक्सीजन की आवश्यकता और बिस्तर के अति आवश्यकता के कारण लोगों का शोषण किया गया। बहुत से लोगों ने अपनी छोटी सी जमा पूंजी भी खो दी है। दूसरे चरण में जो भी गलतियां हुई हैं, उससे तीसरे चरण में किसी भी अनहोनी से बचने के लिए हमें सबक सीखने की जरूरत है।

विश्व ने विशेष रूप से कोरोना के द्वितीय चरण के दौरान दहशत, भय, तनाव और हानि की स्थिति देखी है। यहां तक कि भारत को भी कोरोना के पहले चरण की तुलना में सबसे खराब समय का सामना करना पड़ा था। ऑक्सीजन की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि, आईसीयू बेड और कुछ दवाओं ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी, जिससे कई राज्य सरकारों के लिए गंभीर स्थिति को संभालना मुश्किल हो गया था।

मेरा इरादा किसी सरकार को दोष देने या उसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का नहीं है। हमें यह विश्लेषण करने की आवश्यकता है कि हम महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली जैसे कुछ राज्यों में कोरोना के द्वितीय चरण में एक टीम के रूप में कहां विफल हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप कोविड रोगियों और मौतों में वृद्धि हुई। ऐसे कई उदाहरण थे जहां इंजेक्शन, दवाओं, ऑक्सीजन की आवश्यकता और बिस्तर के अति आवश्यकता के कारण लोगों का शोषण किया गया। बहुत से लोगों ने अपनी छोटी सी जमा पूंजी भी खो दी है। दूसरे चरण में जो भी गलतियां हुई हैं, उससे तीसरे चरण में किसी भी अनहोनी से बचने के लिए हमें सबक सीखने की जरूरत है।

इन बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी

हालांकि भारत ने विकसित देशों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन हम इस कारण से खुश नहीं हो सकते। हमें अभी भी स्वास्थ्य, सामाजिक ताने-बाने और इसके प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए प्रभावी ढंग से काम करने की आवश्यकता है। हमें कुछ बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए जहां हम गलत हो गए और आने वाले चरणों में चीजों को आसान और बेहतर बनाने के लिए वास्तव में ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

महाराष्ट्र पहले और दूसरे चरण में प्रथम स्थान पर रहा है। महाराष्ट्र में अभी तक कुल मामले 6,3820,76 रहे और 134730 लोगों की मृत्यु हुई है। पहले चरण में मामलों की संख्या और दूसरे चरण के संबंध में दुनिया भर के विशेषज्ञों की गंभीर चेतावनी के आधार पर कार्रवाई करना बहुत आवश्यक था, जो धरातल पर नहीं हो सका।

केंद्र सरकार ने ऑक्सीजन संयंत्रों के लिए धन आवंटित किया था। क्या यह राज्य सरकार का कर्तव्य नहीं था कि वे केंद्रीय टीम की मदद से इसे हर जिले में लगवाकर कठिनाइयों को कम करें? इसके द्वारा हम मासूम मौतों और संबंधित चिकित्सा मुद्दों से बच सकते थे।

केंद्र सरकार पर दोषारोपण निरर्थक

यही दिल्ली सरकार के साथ भी हुआ। केंद्र सरकार पर दोषारोपण के बजाय, अगर वे सक्रिय रूप से काम करते, तो दिल्ली में स्थिति बेहतर हो सकती थी लेकिन उन्होंने केंद्र सरकार पर अपनी हर विफलता के लिए आरोप लगाकर दिल्लीवासियों को परेशानी में डाला और विज्ञापन पर पैसा खर्च कर, अपनी प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि के लिए अधिक प्रयास किए, जो उस समय अनावश्यक व असंवेदनशील प्रतीत हो रहे थे।

सिर्फ केंद्र सरकार पर दबाव बनाने और पीएम की खराब छवि बनाने के लिए ऑक्सीजन की अवास्तविक मांग पैदा करना गलत भावना थी। इसके परिणामस्वरूप पड़ोसी राज्यों में ऑक्सीजन की कमी हो गई, जिससे अधिक मौतें हुई हैं। ऑक्सीजन सांद्रक और आवश्यक दवाओं की कालाबाजारी बड़े पैमाने पर थी। हालांकि इसे रोकने के लिए धरातल पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं दिखी। कम से कम हमें अपने लोगों की भलाई के लिए राजनीति को अलग रखकर एकता दिखाने की जरूरत है।

अन्य राज्यों का विश्लेषण

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कोरोना के पहले चरण के दौरान वास्तव में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन दूसरे चरण के बाद अपर्याप्त व्यवस्थाओं और पूरी तैयारी ना होने के कारण वे दबाव में दिखाई पड़ रहे थे। केरल में अभी भी बहुत अधिक संख्या में कोरोना रोगी निकल रहे हैं। इसका एक कारण वोट बैंक की राजनीति व किसी एक धर्म विशेष को महत्व देना है। जब मामलों की संख्या बहुत अधिक थी, तो क्या बिना किसी प्रतिबंध के किसी धार्मिक उत्सव को मनाने की अनुमति देना महत्वपूर्ण था? केरल सरकार इतनी असंवेदनशील कैसे हो सकती है कि जब वे मुस्लिम नेताओं से चर्चा कर सकते थे तो उन्हें मना सकते थे। ऐसे में परिस्थिती काफी बेहतर हो सकती थी।

उत्तर प्रदेश में सबसे कम केस होने पर भी सरकार ने धार्मिक कांवड़ यात्रा की इजाजत नहीं दी।

महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली जैसे छोटे राज्यों में 24 करोड़ घनी आबादी वाले उत्तर प्रदेश राज्य होने के बाद भी बेहतर प्रबंधित कोविड स्थिति की तुलना में बाकी राज्यों में क्या गलत हुआ, इसका विश्लेषण होना जरूरी है। विशेषज्ञों को बिना किसी पूर्वाग्रह के अध्ययन और विश्लेषण करने और एक सुधार योजना बनाने की आवश्यकता है ताकि राज्य सरकारों के साथ केंद्र सरकार इस पर काम कर सके और प्रत्येक जिले में आवश्यक बुनियादी ढांचे और चिकित्सा सुविधाओं को संशोधित करने, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण और सामाजिक समन्वय के लिए आवश्यक कदम उठा सके। सामाजिक संगठनों और सरकारी एजेंसियों को महामारी या इसी तरह की किसी अन्य स्थिति के दौरान संज्ञान में काम करने के लिए उपयुक्त रचना बनाने की आवश्यकता है।

टीकाकरण का उड़ा मज़ाक

विपक्षी दलों और गैर भाजपा शासित राज्यों द्वारा केंद्र सरकार द्वारा टीकाकरण अभियान पर केंद्र सरकार की आलोचना करना एक तमाशा था। जब केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल को टीकाकरण अभियान राज्यों को सौंपा, तब एक भी राज्य अपने दम पर इस अभियान का प्रबंधन ठीक से नहीं कर सका। अंत में डेढ़ महीने बाद केंद्र सरकार को सभी राज्य सरकारों के अनुरोध के बाद अपने टीकाकरण अभियान अपने नियंत्रण में वापस लेना पड़ा।

सरकारों से अपेक्षित कार्य

स्थानीय स्तर पर ऑक्सीजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रत्येक जिले में ऑक्सीजन संयंत्र जल्द से जल्द लगवाए जाएं। इसे सख्ती से लागू करने में यूपी पहले ही काफी आगे है। पहले और दूसरे चरण में रोगियों की मात्रा के हिसाब से उचित परिवहन सुविधा और आवश्यक मात्रा में सिलेंडर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को यह सिखाया जाना चाहिए कि जिस तरह से वे लोगों को समाचार प्रस्तुत करते हैं, उसमें वास्तविक कहानियों का उल्लेख होना चाहिए। साथ ही लोगों में दहशत और भय पैदा हो ऐसी किसी भी चीज को दिखाना प्रतिबंधित हो।

चिकित्सा क्षेत्र में होने चाहिए बदलाव

हर सरकार को पता होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन मायने रखता है। चाहे कोई व्यक्ति अमीर हो या गरीब, काला हो या गोरा, चाहे वह किसी भी जाति और पंथ का हो। लोगों में घबराहट, भय, भ्रम, वित्तीय नुकसान, प्रमुख स्वास्थ्य मुद्दों, कुछ अपनों को खोने की कीमत पर और राजनेताओं को वोट हासिल करने के लिए ऐसी कठिन स्थिति का राजनीतिकरण करने पर ध्यान केंद्रित नहीं होना चाहिए। आशा है कि विवेक प्रबल होगा और राजकारण के बजाय समाज हित पर सरकारें ज्यादा ध्यान देंगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्ट ऑफ लिविंग, इस्कॉन, ईशा फाउंडेशन और कई मंदिर ट्रस्ट जैसे सामाजिक संगठनों का योगदान कल्पना से परे और बिना किसी पूर्वाग्रह के है। प्रत्येक राज्य सरकार को जमीनी कार्य को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इन संगठनों और ट्रस्टों के साथ आवश्यक कार्य योजनाएं बनानी चाहिए। जब हम अपनी स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब हमें चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है।

 

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