जानें हिन्दी दिवस का इतिहास

देश में सबसे अधिक हिन्दी बोलने वालों की संख्या है और उत्तर भारत के अधिकतर राज्य की यह प्रमुख भाषा है हालांकि इस भाषा का इस्तेमाल देश के उन राज्यों में भी होता है जहाँ हिन्दी भाषी नहीं है या फिर कम हैं। हिन्दी भाषा को देश के अलग अलग शहरों तक पहुंचाने में हिन्दी फिल्मों का भी अहम योगदान रहा है। फिल्मों की चाहत लोगों को हिन्दी सीखने पर मजबूर कर देती है। हिन्दी का वह भाषा है जहां हर काम के लिए एक शब्द बना है जबकि वर्तमान में प्रचलित अंग्रेजी की यह सबसे बड़ी कमी है कि वह एक ही अक्षर से कई काम लेती है और यह सीखने वालों के लिए बहुत ही मुश्किल होता है। हिन्दी का प्रचार प्रसार गांधी जी ने भी बहुत किया था और उन्होंने इसे राष्ट्रभाषा बनाने पर भी बहुत जोर दिया था। 
 

देश में हर वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है और इस दिन लोगों को इस भाषा के प्रति जागरूक किया जाता है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस हिन्दी दिवस की शुरुआत की थी। दरअसल 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को अंग्रेजी के साथ देश की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया गया था जिसके बाद नेहरू ने इसे हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया। इसके बाद कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हिन्दी को विश्व स्तर पर ले गए और 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में घोषित कर दिया। हिन्दी दिवस के मौके पर कुछ लोगों को सम्मानित किया जाता है जो इस क्षेत्र में काम करते हैं ऐसे लोगों को सरकार की तरफ से राजभाषा कीर्ति और राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। 
 
विश्व की भाषाओं पर नजर डालें तो सबसे अधिक चीनी भाषा बोलने वालों की संख्या है, दूसरे नंबर पर अंग्रेजी का कब्जा है जबकि तीसरे नंबर पर हिन्दी बोलने वालों की संख्या है। चीन विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है और वहां सभी तरह के व्यवहार के लिए सिर्फ चीनी भाषा का इस्तेमाल होता है जबकि तमाम अंग्रेजी देश हैं जो इंग्लिश को प्राथमिकता देते है इसलिए वह दूसरे स्थान पर है। भारत, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान सहित कुल करीब 25 देशों में हिन्दी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है और इसे बोलने वालों की कुल संख्या करीब 80 करोड़ हैं। भारत में हिन्दी भाषा को तेजी से कम किया जा रहा है जबकि अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता दी जा रही है। सभी को इस बात का भ्रम है कि अंग्रेजी पढ़ने से अच्छी नौकरी मिलती है और विदेश जाने का भी मौका मिलता है इसलिए माता-पिता अपने बच्चों को कॉन्वेंट में भेजने पर जोर देते है हालांकि इस बात में सच्चाई है कि बदलते स्वरूप में अंग्रेजी की मांग बढ़ी है लेकिन उसके लिए हिन्दी से दूरी बनाना भी ठीक नहीं है हिन्दी भाषा संस्कृत की संवाहक है और इसमें संस्कार भी निहित है ऐसे में हिन्दी का ज्ञान भी बहुत जरूरी है। 
हिन्दी बोलने वालों की संख्या भले ही अधिक हो लेकिन हिंदुस्तान में ही हिन्दी का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है और यहां हिन्दी बोलने वालों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। अपने ही देश में हिन्दी बोलने में लोगों को शर्म आती है जबकि अंग्रेजी लोग बड़े ही गर्व से बोलते हैं। सन 1965 को अंग्रेजी को राजभाषा के तौर पर हटाने का सरकार की तरफ से प्रयास किया गया था लेकिन वह सफल नहीं रहा और विरोध शुरु हो गया। अंग्रेजी भाषा को हटाने को लेकर विरोध इतना बढ़ा की तमिलनाडु में दंगे भड़क गये और इसमें कई लोगों की मौत हो गई जिसके बाद सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया। भारत में आधिकारिक भाषा हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं। 

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