भारत में आतंकवाद का पुनर्प्रवेश?

धारा 370 को खत्म हुए कुछ ही वर्ष हुए हैं। अत: यह समझ लेना बड़ी भूल होगी कि कश्मीर से आतंकवाद समाप्त हो गया है। अगर अफगानिस्तान में 20 वर्षों के बाद पुन: तालिबानी कब्जा कर सकते हैं तो भारत में कश्मीर या अन्य राज्यों में भी पुन: आतंकवादी गतिविधियां हो ही सकती हैं। बानगी हम कश्मीर में देख ही चुके हैं।

पिछले कुछ दिनों से कश्मीर में पुन: आतंकवादी गतिविधियां बढ़ गईं हैं। वहां पर हिंदुओं पर हमले बढ़ गए हैं, गैरकश्मीरी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। धारा 370 हटने के बाद से अब तक कश्मीर शांत था। मोदी सरकार के द्वारा किए जा रहे प्रतिबंधात्मक उपायों के कारण शांत रहना वहां के आतंकवादी गुटों मजबूरी थी, परंतु अब परिस्थिति बदल रही है। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे ने आतंकवादियों के मनोबल को फिर ऊंचा कर दिया है। कश्मीर को अशांत रखना और अंतत: उसे पाकिस्तान में शामिल करना यह तो पाकिस्तान के प्रमुख एजेंडों में से एक है ही और यह बात सर्वमान्य है कि पाकिस्तान और तालिबान दोनों समान मानसिकता से पोषित हैं। वैश्विक दबाव के चलते पाकिस्तान भले ही तालिबान से अपने ‘मधुर’ सम्बंधों को स्वीकार न करे, परंतु उनके नेताओं द्वारा दिए जाने वाले बयानों से यह जगजाहिर हो चुका है कि तालिबान का अफगानिस्तान पर शासन करना पाकिस्तान के लिए चारों उंगलियां घी में होने जैसा है। परंतु विश्व के लिए इनका दोस्ताना किसी भयानक संकट से कम नहीं है।

दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान ने यह भी कहा है कि वह टीटीपी अर्थात तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के कुछ समूहों से बात करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि टीटीपी के आतंकवादी अगर सरकार की शर्तें मानते हैं और हथियार छोड़ते हुए आत्मसमर्पण करते हैं, तो उन्हें माफ कर दिया जाएगा और उन्हें सामान्य नागरिकों की तरह जीवन जीने की अनुमति दी जाएगी। याद रहे टीटीपी वही आतंकवादी संगठन है जिसने 2014 में पेशावर के आर्मी स्कूल के मासूम बच्चों की हत्या कर दी थी। हालांकि टीटीपी ने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया है, परंतु ऐसे संगठन से पाकिस्तान के प्रधान मंत्री का बातचीत के लिए तैयार होना सामान्य नहीं लगता।

इसी टीटीपी के बारे में जब तालिबान के कुछ नेताओं से पूछा गया था कि क्या वे अब भी टीटीपी को आतंकी हमला करने के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल करने देंगे, तो उन नेताओं ने कहा कि टीटीपी से उनका कोई लेना-देना नहीं है और यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है, अत: इस पर फैसला पाकिस्तान की सरकार को करना है कि वह टीटीपी के साथ बात करे या न करे। जाहिर है, तालिबान के नेता झूठ बोल रहे थे, क्योंकि टीटीपी के साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे हैं।

वास्तव में तालिबान और टीटीपी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। टीटीपी के कई कमांडरों ने तालिबान के साथ मिलकर विदेशी ताकतों के विरुद्ध लडाई लडी है। तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के प्रति भी टीटीपी अपनी निष्ठा जता चुका है। और अब इसी टीटीपी को पाकिस्तान के प्रधान मंत्री बातचीत करने का प्रस्ताव दे रहे हैं। कोई भी सरकार आतंकवादियों पर भरोसा कैसे कर सकती है? और अगर कर रही है तो यह उस सरकार की नीयत पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।  आतंकवादी संगठन जब तक संगठन तक सीमित रहता है, तब तक उस पर नियंत्रण रखना कुछ सरल हो सकता है, परंतु जब यही संगठन किसी देश की सत्ता पर बैठ जाता है तो उससे लडने के लिए वैश्विक कई नियम कानून आडे आने लगते हैं। तालिबान के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। उसे मान्यता देने या न देने पर भी अभी विश्व के सभी देशों की सहमती नहीं हुई है। पाकिस्तान, चीन जैसे देश अपने स्वार्थ के चलते उसे मान्यता देने के पक्ष में हैं और विश्व की अन्य महाशक्तियां मान्यता देने के कारण होनेवाली हानि को समझते हुए उसे मान्यता नहीं दे रही हैं। हालांकि तालिबान पर इसका कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड रहा है। उसके क्रियाकलाप नियोजित तरीकों से आगे बढ़ रहे हैं। नियोजित तरीकों से कहने का कारण यह है कि बीस वर्षों के पश्चात भी अफगानिस्तान पर पुन: शासन करने की महत्वाकांक्षा को जीवित रखना, उसके अनुसार तैयारी करना और अवसर मिलते ही कब्जा कर लेना यह सब नियोजन का ही परिणाम है। ऐसे तालिबान को पाकिस्तान का परोक्ष किंतु पूर्ण समर्थन है।

इस खेल का एक और मोहरा चीन भी है। चीन का पाकिस्तान को समर्थन है और पाकिस्तान का तालिबान को। ये तीनों ही मिलकर भारत को आगे बढ़ने से रोकना चाहते हैं। तालिबान को अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए धन की आवश्यकता है। पूरा विश्व जानता है कि तालिबान को आर्थिक सहायता या तो उन देशों से मिलती है जिनसे उसके मैत्रीपूर्ण सम्बंध हैं, या जहरीले पदार्थों की तस्करी से या फिर जिन पर उसका कब्जा है उनसे कर वसूली करके। पाकिस्तान तो स्वयं पैसों के लिए चीन पर निर्भर है, ऐसे में तालिबान को धन की आपूर्ति कहां से हो रही होगी यह समझना अधिक कठिन नहीं है।

टीटीपी के आतंकवादी अगर सरकार की शर्तें मानते हैं और हथियार छोड़ते हुए आत्मसमर्पण करते हैं, तो उन्हें माफ कर दिया जाएगा और उन्हें सामान्य नागरिकों की तरह जीवन जीने की अनुमति दी जाएगी।

– इमरान खान

प्रधान मंत्री, पाकिस्तान

इस पूरी पृष्ठभूमि को अब भारत के दृष्टिकोण से देखें तो भारत में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ाने, भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में विघ्न डालने और भारत को अस्थिर रखने के लिए कौन-कौन सी ताकतें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कार्य कर रहीं हैं यह समझा जा सकता है। पाकिस्तान कभी भी भारत से सीधे युद्ध के बारे में सोच भी नहीं सकता अत: भारत में आतंकवादी गतिविधियां फिर से बढ़ाने के अलावा उसके पास और कोई मार्ग नहीं है। आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए वह तालिबान का प्रयोग कर सकता है और इन सब कार्यवाहियों के आर्थिक नियोजन के लिए चीन है ही। क्योंकि चीन भी एशिया महाद्वीप में भारत की शक्ति को अधिक बढ़ते हुए नहीं देख सकता। उसकी विस्तारवादी और एकाधिकार वाली नीतियों को यथार्थ में लाने के मार्ग में भारत सबसे बडा कांटा है। चीन जानता है कि अगर भारत अपने आंतरिक मामलों और सुरक्षा व्यवस्था में लगा रहा, तो वह आगे नहीं बढ़ पाएगा अत: वह पाकिस्तान और तालिबान को समर्थन जरूर देगा।

धारा 370 को खत्म हुए कुछ ही वर्ष हुए हैं। अत: यह समझ लेना बडी भूल होगी कि कश्मीर से आतंकवाद समाप्त हो गया है। अगर अफगानिस्तान में 20 वर्षों के बाद पुन: तालिबानी कब्जा कर सकते हैं तो भारत में कश्मीर या अन्य राज्यों में भी पुन: आतंकवादी गतिविधियां हो ही सकती हैं। बानगी हम कश्मीर में देख ही चुके हैं। भारतीय सेना और गुप्तचर संस्थाओं के चौकस बंदोबस्त के कारण बहुत बडी हानि नहीं हुई है, परंतु इतना काफी नहीं है। एशिया महाद्वीप के बाहर की बात करें तो अमेरिका किसी भी राष्ट्र की प्रगति के तब तक आडे नहीं आता जब तक वह अमेरिका को किसी भी प्रकार की चुनौती न देने लगे या फिर उस देश से अमेरिका के हितसम्बंध जुडे हों। भारत के प्रति भी अमेरिका का दृष्टिकोण उसके मतलब के हिसाब से बदलता रहता है। अमेरिका का रुख तालिबान के प्रति जितना कडा था, अब उतना कडा नहीं रहा है। भविष्य में अगर कहीं भारत अमेरिकी नीतियों के आडे आया तो वह भी तालिबान को मोहरा बनाकर उसे भारत के विरुद्ध उपयोग कर सकता है।

भविष्य में पाकिस्तान, तालिबान, चीन और अमेरिका इन सभी के इरादों को भांप कर भारत को आतंकवाद के विरुद्ध अपनी रणनीति तैयार करनी होगी, क्योंकि ऊंट किस करवट बैठेगा यह प्रश्न अभी भविष्य के गर्भ में है।

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