मूल को समझे बिना समाधान संभव नहीं

 

इस्लाम को मानने वाले अधिकांश लोग भयावह ग़रीबी व भुखमरी में जी लेंगें पर मज़हब का ज़िहादी जुनून और ज़िद पाले रहेंगें। वे लड़ते रहेंगें, तब तक, जब तक उनके कथित शरीयत का क़ानून लागू न हो जाए, जब तक दुनिया का अंतिम व्यक्ति भी इस्लाम क़बूल न कर ले! वे लड़ते रहेंगें, क्योंकि उनका विस्तारवादी-वर्चस्ववादी कट्टर इस्लामी चिंतन उन्हें लड़ने की दिशा में उत्प्रेरित करता है।

तालिबानी आतंक, क्रूरता एवं बर्बरता की कहानी नई नहीं है। अस्तित्व के प्रारंभिक वर्षों से ही निर्दोषों की हत्या, महिलाओं के उत्पीड़न, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के विध्वंस, गैर-मुस्लिमों के साथ अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार का उनका इतिहास रहा है। उनके काले कारनामों और क्रूरताओं पर पर्याप्त लेखन किया जा चुका है। उनके सामाजिक-राजनीतिक कारणों की गहन पड़ताल की जा चुकी है। विगत पांच दशकों से अफगानिस्तान में ज़ारी हिंसा एवं आतंक पर इसे या उसे ख़ूब दोषी ठहराया जा चुका है। तालिबानियों को मिलने वाले राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण एवं समर्थन पर भी अत्यधिक प्रकाश डाला जा चुका है। परंतु जिस बात पर विद्वत जगत और विश्व-समाज एकदम मौन साध जाता है, वह है तालिबान या तालिबान जैसी शक्तियों का इस्लाम से बीज-वृक्ष या वृक्ष-बीज का संबंध या नाता। हिंसा, कट्टरता, हठधर्मिता और गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा के बीज इस्लामिक विचारों में मूलतः समाविष्ट हैं। कुरान, हदीस और सीरा को मिलाकर शरीयत का क़ानून या इस्लाम का राज्य क़ायम करना तालिबान या किसी भी इस्लामिक सत्ता-संगठन का लक्ष्य या यों कहें कि स्वप्न होता है। शरीयत के क़ानून में 14 प्रतिशत कुरान, 70 प्रतिशत हदीस और 16 प्रतिशत सीरा है, सीरा और हदीस को मिलाकर ही सुन्ना बनता है, यानी पैगंबर मोहम्मद की जीवनी, उनके संघर्ष, उनके सिद्धांत आदि। मुख्य बात यह है कि तालिबान या किसी भी जिहादी सत्ता-संगठन की जब बात होती है तो उसे चंद भटके हुए अंध-कट्टर लोगों का समूह बताकर सतही-सरलीकृत आंकलन-विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है। उसमें यह तथ्य बड़ी चतुराई से छुपा लिया जाता है कि उस कट्टरता या मज़हबी अंधता के तत्त्व व कारण कुरान और सुन्ना में मूलतः सन्निहित रहे हैं। कट्टरता, पृथक पहचान, बलात मतांतरण, विस्तार एवं वर्चस्व की प्रवृत्ति, दारुल हरब से दारुल इस्लाम की दिशा में निरंतर प्रयत्न, नाना प्रकार के ज़िहाद, मज़हब के लिए अनेकानेक छल-प्रपंच आदि काफ़िर-कुफ़्र पर आधारित इस्लामी सिद्धांत या मान्यताओं के मूल में है। उनके भाईचारे में गैर-मुसलमानों के लिए रंच-मात्र स्थान नहीं है। न केवल ग़ैर-मुसलमानों के प्रति उनमें स्वाभाविक दुराव है, अपितु आपस में भी वे अधिक सच्चे, अधिक पक्के मुसलमान और इस्लामी प्रतीक-पहचान के सबसे बड़े प्रस्तोता-पैरोकार-प्रवर्त्तक को लेकर सदैव संघर्ष छेड़े रहते हैं। वे इस बात को लेकर 7वीं शताब्दी से लगातार आपस में ही लड़ते रहे हैं कि उनमें से इस्लाम का अधिक सच्चा योद्धा या मुजाहिद कौन है। और यही बात उनके अनुयायियों या मुरीदों में भी है। 72 से भी अधिक फ़िऱके और उनके बीच होने वाले सतत ख़ूनी संघर्ष इसकी गवाही देते हैं। एक पंथ, एक ग्रंथ, एक प्रतीक, एक पैगंबर के अलावा उनके यहां अन्य कोई स्वीकार नहीं है। उनका अल्लाह भी ऐकेश्वर का पर्याय नहीं है। वे कभी मानते ही नहीं कि उनकी मान्यता से इतर सत्य एवं ईश्वर का कोई भिन्न स्वरूप भी हो सकता है! संघर्ष का मूल कारण यही है। उनके भीतर से भी यदि कोई समूह या व्यक्ति दाएं-बाएं चला गया या कुछ भिन्न सोचने लगा तो वे उनके ख़ून के प्यासे हो जाते हैं। उनके विरुद्ध फ़तवे जारी किए जाने लगते हैं। भिन्न सोचने, भिन्न कहने की उन्हें बिलकुल आज्ञा नहीं है। उनका सारा चिंतन, सारा ज्ञान छठी-सातवीं शताब्दी में कही गई बात को सत्य एवं प्रामाणिक सिद्ध करने तक सीमित है। वे एक बिंदु पर ठहर से गए हैं। यह शोध का नहीं, अपितु मान्य विषय है कि मुसलमानों ने मुसलमानों का ख़ून सबसे अधिक बहाया है, लगातार बहाया है, पूरी दुनिया में बहाया है और आज भी वे सबसे अधिक अपनों का ही ख़ून बहा रहे हैं। जो अपनों का गला रेतने, ख़ून बहाने में संकोच नहीं करते, उनके लिए औरों के जान की क्या क़ीमत होगी? 7वीं शताब्दी से लेकर आज तक उनके हर हमले की प्रवृत्ति, प्रकृति एक जैसी रही है। सबके उद्देश्य व लक्ष्य एक रहे हैं। उन हमलों-आक्रमणों के परिणाम को लेकर भी उनमें कोई भ्रम नहीं रहा है और इसे अध्ययन कर देखा-जाना-समझा जा सकता है कि मुहम्मद बिन कासिम से लेकर मुल्ला उमर व मुल्ला बरादर तक हर इस्लामिक आक्रांता या आतंकी के स्वप्न, आदर्श, उद्देश्य, प्रकृति, प्रवृत्ति और ग़ैर-मुसलमानों के प्रति उनके दृष्टिकोण एक जैसे रहे या उनमें समय के साथ कोई परिवर्तन आया है? तथ्य और प्रमाण यही कहते हैं कि हर दूसरा ज़िहादी व इस्लामिक आक्रांता-सत्ता-संगठन पहले से अधिक क्रूर, हिंसक, आक्रामक एवं आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर अन्य मतावलंबियों एवं निरीह-निर्दोष-निःशस्त्र जनों पर हमलावर रहता है।

 

उल्लेखनीय है कि वे भले ही इस्लाम को लेकर आपस में लड़ते रहें हों, पर ’इस्लाम ख़तरे में है’ का नारा उनके अनुयायियों को सदैव आकर्षित एवं संगठित करता है। उसे लेकर वे शीघ्र आंदोलित हो उठते हैं। यह नारा लगाने वाला या आह्वान करने वाला भले ही उनके परिवेश-पृष्ठभूमि-संस्कृति से कोई नाता नहीं रखता हो, भले ही उनकी जीवन-शैली भिन्न हो, वाणी-व्यवहार भिन्न हो, पर वे अंततः उसी के साथ जाएंगें, जो शरीयत का कानून या इस्लाम का राज्य स्थापित करने का उन्हें स्वप्न और आदर्श देते हों। हमने इराक़-ईरान-कजाकिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-बांग्लादेश-सीरिया से लेकर मुस्तफ़ा कमाल पाशा के सेकुलर तुर्की तक में यही कहानी दुहराए जाते देखी और इन सबके बावजूद यदि हम सत्य को सत्य नहीं कह पा रहे तो या तो हम धूर्त हैं या कायर या शुतुरमुर्ग।

तालिबान इस्लाम का राज्य और शरीयत का क़ानून लागू करने के लिए अफगानिस्तान में गत तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय है। रूस और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश वहां से पलायन कर गए। स्वयं शांतिप्रिय अफ़गानी लोगों ने उनके समक्ष लगभग आत्मसमर्पण कर दिया। कुछ तो अपने परिजनों को छोड़कर भाग खड़े हुए। क्योंकि वे जानते हैं कि ज़िहादी कट्टरता लहू की तरह वहां के लोगों की रग़ों में उतारा गया है। इस्लाम को मानने वाले अधिकांश लोग भयावह ग़रीबी व भुखमरी में जी लेंगें पर मज़हब का ज़िहादी जुनून और ज़िद पाले रहेंगें। वे लड़ते रहेंगें, तब तक, जब तक उनके कथित शरीयत का क़ानून लागू न हो जाए, जब तक दुनिया का अंतिम व्यक्ति भी इस्लाम क़बूल न कर ले! वे लड़ते रहेंगें, क्योंकि उनका विस्तारवादी-वर्चस्ववादी कट्टर इस्लामी चिंतन उन्हें लड़ने की दिशा में उत्प्रेरित करता है। एक ही दिशा में सोचने के लिए प्रेरित-अनुकूलित कर उनकी स्वतंत्र चिंतन-मनन-विश्लेषण की चेतना कुंद कर दी गई है। मज़हबी तालीम के द्वारा बाल-वृद्ध-युवा, स्त्री-पुरुष सबमें ज़िहाद का यह ज़हरीला जुनून पैदा किया गया है, निरंतर किया जा रहा है। वे आजीवन ज़िहाद और जन्नत का सपना लिए काल्पनिक संशय-सनक के गहरे शिकार रहते हैं। अब ऐसों से भला कोई सभ्य समाज कब तक लड़ता रहेगा? कितने ऐसे विद्वान या छद्म धर्मनिरपेक्षता के स्वयंभू ठेकेदार होंगें जिन्होंने इस्लाम में व्याप्त कट्टरता के बीज-विचार को तालिबान जैसी ताक़तों की उत्पत्ति का मूल कारण माना या बताया? वे छिटपुट-तात्कालिक कारणों का उल्लेख कर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। वे जड़ को छोड़कर तने-पत्ते-शाखाओं का उपचार करते रहते हैं। क्या इससे समाधान मिल जाएगा? समस्या के मूल तक जाकर उसका उपचार किए बिना समाधान कदापि संभव नहीं।

तालिबान पर चर्चा छेड़ते समय उसके उद्गम-स्थल के बारे में भी कोई चर्चा नहीं होती। जबकि यह चिंता की बात है कि तालिबान का उद्गम-स्थल भारत का देवबंद है। न केवल तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर की पूरी शिक्षा-दीक्षा देवबंद में हुई, बल्कि 1866 में मोहम्मद कासिम और राशिद अहमद गानगोही ने उत्तरप्रदेश के देवबंद में जिस दारुल उलूम नामक मदरसे की स्थापना की थी, उसका उद्देश्य ही भारत में इस्लाम के शासन व राज्य की पुनर्स्थापना था और ध्यान रहे कि अफगानिस्तान के लगभग शत-प्रतिशत मदरसे देवबंदी विचारधारा को मानने वाले हैं। ‘तालिब’ शब्द जो ‘तलबा’ से निकला है, उसका अर्थ ही होता है ‘छात्र’ और अधिकांश तालिबानी लड़ाके इन्हीं देवबंदी मदरसों के छात्र हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ‘गजवा-ए-हिंद’ इस्लाम का पुराना सपना है। इसलिए यह भारत के सभी मत-मतांतर, पंथ-मज़हब के लोगों का उत्तरदायित्व बनता है कि वे तालिबान के उदय से सचेत व सावधान रहें, उसका महिमामंडन न करें और भारत के उदार व पंथनिरपेक्ष मुसलमानों का यह सबसे बड़ा दायित्व बनता है कि वे पुरज़ोर शब्दों में तालिबान-समर्थित इस्लाम का खंडन करते हुए इस्लाम की मनावीय व युगानुकूल छवि, व्याख्या व परिभाषा प्रस्तुत करें। इस्लाम के अंध एवं कट्टर स्वरूप का विरोध आज व्यक्ति या समुदाय का ही धर्म नहीं, अपितु मानव-धर्म बन गया है। उसमें युगानुकूल सुधार एवं परिवर्तन न केवल वर्तमान की सबसे बड़ी आवश्यकता है, बल्कि यह मनुष्यता के त्राण के लिए अनिवार्य है। यदि हम उदार, प्रगत, तार्किक, सहिष्णु व वैज्ञानिक विश्व एवं परिवेश चाहते हैं तो हमें इस्लामिक मत के मूल में व्याप्त संघर्ष व कट्टरता पर भी मुखर होना होगा, उसमें सुधार और परिवर्तन की मांग भी तेज़ करनी होगी। इस्लामिक जगत पृथक पहचान व भिन्न अस्मिता पर जैसा विश्वव्यापी विमर्श और आंदोलन छेड़े रहता है, क्या यह समयोचित नहीं होगा कि हिंसा-कलह-आतंक से पीड़ित विश्व-मानवता के त्राण के लिए वह सुधारवादी विमर्श और अभियान चलाए? मुस्लिम-समुदाय को तो इसलिए भी यह पहल करनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने इस हिंसा, कट्टरता, संघर्ष व आतंक की सर्वाधिक क़ीमत चुकाई है।

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