अनुदान बहुत हुआ अब श्रमदान करें

महाराष्ट्र के वर्तमान मा. राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री भी रह चुके हैं। उत्तराखंड के गठन से उनकी सक्रीय राजनीति में अहम भूमिका रही है। उन्होंने उत्तराखंड के विकास के लिए कई योजनाएं बनाईं थीं। अब 21 वर्षों के उपरांत प्रदेश की प्रगति के संदर्भ में उन्होंने हिंदी विवेक से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके कुछ प्रमुख अंश-

उत्तराखंड की स्थापना से यहां की राजनीति में आप सक्रिय रहे हैं। 21 वर्षों के बाद आपको क्या परिवर्तन दिखाई दे रहा है?

उत्तराखंड में जिसको भौतिक प्रगति बहुत हो चुकी है। बहुत कम गांव बचे होंगे जहां पर सीधे मोटर गाड़ी न जाती हो। प्रधान मंत्री ग्राम सडक योजना के अंतर्गत प्रत्येक गांव को सड़क मार्ग से जोड़ा गया है और सुलभ यातायात की सेवाएं प्रदान की गईं हैं और मूलभूत सुविधाओं के साथ ही विकास परियोजनाओं को भी गति दी जा रही है। वर्तमान समय में ऐसे बहुत कम गांव रह गए होंगे, जहां पर इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है, अधिकांश गांवों में इंटरनेट की सुविधा पहुंच चुकी है। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक जाने के लिए पहले जहां 4 से 5 घंटे लगत थे, अब वहां डेढ़ घंटे में पहुंच सकते हैं। चार धाम की यात्रा में आवागमन की सुविधा की दृष्टि से जो चार लेन सड़क का निर्माण होना वहां के लोगों के लिए एक प्रकार से नया जीवन है। बरसात के मौसम में भूस्खलन की खबर आती है, व्यवधान आता है। लेकिन अगले 2 -3 साल बाद जब सब कुछ ठीक हो जाएगा, तब पहाड़ से मैदानी क्षेत्रों में आना भी इतना सरल हो जाएगा, जिसकी कल्पना आज से 20 साल पहले कोई नहीं कर सकता था। 20 साल पहले कुमाऊ, गढ़वाल और पंतनगर विश्वविद्यालय के अलावा कोई विश्वविद्यालय नहीं था। आज कई सरकारी और प्राइवेट विश्वविद्यालय खुल गए हैं। प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक सुधार हुआ है और शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है। जहां तक मेडिकल का सवाल है, जब यह राज्य बना उस समय केवल एक मेडिकल कॉलेज था, इसके अलावा कोई अन्य कॉलेज ही नहीं था। आज कई मेडिकल कॉलेज बन चुके है। एम्स का निर्माण हुआ है। चिकित्सा के क्षेत्र में भी राज्य में अच्छी प्रगति हुई है।  गांव में खासकर महिलाओं की चिकित्सा के लिए असुविधा होती है इसलिए अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। मैं यह नहीं कहता कि सब कुछ अच्छा हो गया है पर जिस ढंग से इस ओर ध्यान दिया गया है वह प्रशंसनीय एवं सराहनीय है।

भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखंड अन्य राज्यों से बहुत अलग है। इन परिस्थितिओं के क्या गुण और दोष हैं?

हर क्षेत्र की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं। पहाड़ी एवं मैदानी भागों की अपनी संस्कृति और सभ्यता है। इसका ऐतिहासिक महत्व है। यहां के लोग कठिनाइयों से जूझते हैं इसलिए उनका हृदय हिमालय की तरह विशाल होता है। उत्तराखंड के प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा को देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते है। पूरे देश के लोग उत्तराखंड और हिमालय आने की इच्छा रखते है। यहीं पर चारों धाम हैं, गंगोत्री, यमुनोत्री आदि पवित्र नदियां है। मुझे तो यहां पर कण-कण में दिव्य गुणों का भंडार दिखाई देता है। शायद इसलिए ही लोग इसे देवभूमि कहते हैं।

आपकी दृष्टि से किसी भी राज्य के विकास के मापदंड क्या होते हैं और उत्तराखंड विकास के उन मापदंडों के अनुरूप कहां बैठता है?

देखिये विकास के मापदंड आजकल लोग दो तरह से सोचते है। एक तो मूलभूत सुविधाएं जैसे कि सड़क, यातायात आदि। उत्तराखंड बनने के पहले वहां पर नाममात्र के उद्योग थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने जब 2002 में उत्तराखंड का दौरा किया, उन्होंने तब राज्य के विकास के लिए औद्योगिक पकेज भी दिया। जिसके चलते राज्य के प्रमुख शहरों के विकास में गति आई। हरिद्वार हो, देहरादून हो इन जैसे शहरों में देश की लगभग सभी बड़ी कम्पनियां स्थापित हुईं। इससे राज्य की प्रगति में बढ़ोत्तरी हुई। उत्तराखंड औद्योगिक जगत के नक्शे पर आ गया। उसके पहले तो उत्तराखंड केवल धार्मिक एवं पर्यटन के नक़्शे पर था। उस लिहाज से तो बहुत अच्छी प्रगति हुई है। विकास के जो अन्य मापदंड हैं उसमें स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों का समावेश है, उसमें भी राज्य अच्छी प्रगति कर रहा है। मुझे लगता है कि समय के साथ उत्तराखंड सभी क्षेत्रों में विकास के मापदंडों पर खरा उतरेगा।

राजनीतिक अस्थिरता का राज्य के विकास पर किस प्रकार विपरीत परिणाम होता है?

राजनीतिक अस्थिरता नहीं होनी चाहिए, यह बिलकुल सही है। लेकिन कई बार परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं, क्योंकि ये नया राज्य है। इस तरह की नई-नई चीजें होती हैं। नए और छोटे राज्य के नए निर्माण से कुछ समस्याएं होती हैं, राजनितिक अस्थिरता आती है लेकिन मुझे लगता है कि एक दिन आएगा जब उत्तराखंड में भी स्थिरता आएगी। लोगों का रुझान भी इस ओर बढ़ता जा रहा है। आदमी फिसलने से ही कुछ सीखता है, जैसे कभी बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो कुछ समय बाद सब ठीक हो जाता है उसी तरह धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा।

आपने अपने मुख्य मंत्रीत्व के कार्यकाल में उत्तराखंड के विकास का खाका किस तरह तैयार किया था?

मैं यहां मुख्य मंत्री बनने के लिए नहीं आया था, मैं तो संघ का एक स्वयंसेवक हूं। अनेक वरिष्ठ जनों के आदेश एवं आग्रह से मैं भाजपा में आया। हमारे पास विजन था उसके माध्यम से हमने शुरुआत की थी। हमने पहले सोचा था कि उर्जा प्रदेश बनाये। 10 साल से हिरेन डैम का काम चल रहा था लेकिन इसमें सफलता नहीं मिल रही थी। लेकिन बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने एक प्रोजेक्ट पर स्वयं ध्यान दिया। उसे आवश्यक सहायता प्रदान कर पूर्ण करवाया। आज उसी से 1400 मेगावाट बिजली प्राप्त हो रही है। अगर सभी पर्वतीय प्रदेशों पर इस प्रकार की योजनाएं चलाएं तो आज बिजली की समस्या काफी हद तक ठीक हो सकती है। उसी तरह पर्यटन से सम्बंधित भी कई योजनाएं बनाई थीं। जैसे अभी नितिन गडकरी केवल रास्ते ही नहीं बनवा रहे हैं उसके आस-पास सभी आवश्यक सुविधाएं भी दे रहे हैं, उसी तरह हमने भी सोचा था, परंतु सभी कार्य पूर्ण नहीं हो सके।

उत्तराखंड के पर्यावरण और संस्कृति को नुकसान पहुंचाए बिना वहां किन-किन उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है?

पर्यावरण को नुकसान बिलकुल नहीं होगा ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उस नुकसान की भरपाई जरूर होनी चाहिए। जैसे आप अगर उद्योगों को लगाने के लिए एक जगह से पेड काटते हैं तो दूसरी जगह अगर जमीन खाली पडी है तो वहां पेड लगा दीजिए। प्रकृति का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

उत्तराखंड और मुंबई को जोड़नेवाली एक कड़ी है उद्योग और दूसरे हैं आप। आप उद्योग से सम्बंधित लोगों से उत्तराखंड के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

अभी कोविड-19 के कारण यहां के उद्योगपतियों से अधिक बात नहीं हो पाई है। अब धीरे-धीरे सब खुल रहा है, और जब से उत्तराखंड में आर्थिक पैकेज देने का ऐलसन किया गया है तब से कई उद्योगपतियों ने अपना रुख उत्तराखंड की ओर किया है। मुझे आशा है कि वहां नए प्रकल्प शुरू होंगे।

पलायन वहां की प्रमुख समस्या है। पलायन को रोकने के लिए क्या प्रयास करने आवश्यक हैं?

अभी वहां पर्यटन, कृषि, लघु-कुटीर उद्योग आदि जो चल रहे हैं, उनकी ओर काफी ध्यान दिया जा रहा है। कोविड-19 के बाद जो मानव संसाधन शहरों से गांवों की ओर लौटा था, उसे वहीं रोकने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। उत्तराखंड के लोग आपको कई जगहों पर, यूरोप, अमेरिका के जैसे कई देशों में, भारत में कई बडे-बडे पदों पर मिल जाएंगे। मेरे विचार से तो पलायन यह शब्द ऐसे ही गढ़ दिया गया है। इसका नकारात्मक रूप से नहीं देखना चाहिए। उत्तराखंड से अधिक पलायन तो केरल में है, पंजाब में है। पर वहां के लोगों के लिए तो कोई नहीं कहता कि पलायन है।

उत्तराखंड राज्य की मौलिक विशेषताएं अध्यात्म एवं पर्यटन से जुड़ी है। उत्तराखंड की यह मौलिक विशेषताएं उत्तराखंड राज्य के विकास में किस प्रकार कारगर हो सकती है?

अध्यात्म उत्तराखंड की प्रमुख विशेषता है। इसकी पूर्ति राजनीति से नहीं हो सकती। अध्यात्म से जुड़े हुए महान लोग ही यह कर सकते हैं, हां! इस पूंजी को जन-जन तक पहुंचाने  में राजनीति का उपयोग हो सकता है। राजा काल का कारण है, यह हमारी धारणा है। तो स्वाभाविक है हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारा कार्य भी आध्यात्मिकता के आधार पर हो। प्रदेश के हित में जो आवश्यक है वह सभी निरपेक्ष भाव से हमें करना है। अध्यात्म से जुड़ा हुआ भाव राजनीतिज्ञों और जनता दोनों के मन में जागृत होना चाहिए।  यह भूमि शंकराचार्य की है, यह भूमि सैकड़ों संत महंतों की है। इस कारण ही यहां पर विश्व भर से श्रद्धालु आते हैं। हमारी इस पूंजी को हम दुनिया के सामने सही ढंग से प्रस्तुत कर सकें,  यहां पर विश्व भर से पर्यटक आएं और हमारी भूमि में मन: शांति प्राप्त करें। पर्यटन के लिए व्यक्ति आता है तो वह मौज मस्ती का भाव लेकर आता है। तीर्थाटन का भाव लेकर जब कोई आता है तो वह अध्यात्मिक भाव होता है। इन दोनों भावों का आनंद देने के लिए जो विकास आवश्यक  है, वह उत्तराखंड राज्य में होना चाहिए।

आपको महाराष्ट्र और उत्तराखंड की संस्कृति में कौन सी समान विशेषताएं प्रतीत होती है?

मुझे संपूर्ण भारतवर्ष में जहां-जहां मैं जाता हूं वहां उत्तराखंड दिखाई देता है। मैं संघ का स्वयंसेवक हूं। महाराष्ट्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण हुआ है। इस कारण मुझे महाराष्ट्र के प्रति ज्यादा लगाव है। उत्तराखंड के पहाड़ के लोग सरल होते हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी मुझे सरल स्वभाव के महसूस होते हैं। महाराष्ट्र में शहरों को छोड़कर गांव की ओर जब हम बढ़ते हैं, तो वहां के लोगों में वही सरलता वाला भाव महसूस होता है। गडचिरोली से  लेकर पालघर तक महाराष्ट्र में जहां प्रवास करता हूं वहां मुझे बड़ी अपनत्व के साथ स्वीकार किया जाता है। धोती, कुर्ता और टोपी यह मेरा सामान्य सा पहनावा ग्रामीण लोगों को अपना सा लगता है। उत्तराखंड में पहाड हैं, महाराष्ट्र भी पहाड़ों का प्रवेश है। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, तो महाराष्ट्र संतों की भूमि है। बिना संतों के देव हो ही नहीं सकते। उत्तराखंड और महाराष्ट्र के बोलचाल में आने वाले शब्दों में अनेक जगह पर मुझे समानता दिखाई देती है।

उत्तराखंड के विकास के लिए उत्तराखंड के लोगों से आप किस प्रकार से अपेक्षा रखते हैं?

भारत की स्वतंत्रता के बाद एक प्रकार की प्रवृत्ति सभी प्रदेशों के लोगों में पली है, जो भी कुछ  करेगी वह सरकार करेगी, हमारा काम सिर्फ वोट देना है। उसके बाद सरकार के सर पर चढ़ बैठो और उससे सब काम करवा लो। इस वातावरण से हमें बाहर निकलना है। हम किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े हों लेकिन प्रदेश के विकास के लिए हमें साथ मिलकर विचार करना चाहिए। अनुदान बहुत हो गया, अब हमें श्रमदान करना चाहिए। प्रदेश के विकास के लिए जनता और राजनेताओं को  साथ मिलकर विशेष प्रयास करने चाहिए ऐसा मुझे लगता है।

उत्तराखंड के गांव को आत्मनिर्भर गांव बनाने हेतु कौन से प्रयास होने आवश्यक है?

आदर्श गांव की संकल्पना में शहरों से जोड़ने वाली सड़कें आती है,  स्कूल, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल और अन्य महत्वपूर्ण बातें जो जनहित में महत्वपूर्ण है वह सारी बातें आती हैं। वर्तमान में यह सभी बातें उत्तराखंड राज्य के ग्राम-ग्राम तक पहुंची हैं। अपने ग्राम का विकास करने हेतु स्वच्छता अभियान, वन बचाओ अभियान, आग से वनों की सुरक्षा, गांव में गोधन बढ़ाने की बातें जैसे विभिन्न विषयों पर ग्राम वासियों ने जागृत होना अत्यंत आवश्यक है।

विश्व का आध्यात्मिक केंद्र उत्तराखंड बने इस प्रकार की सदिच्छा प्रधानमंत्री जी ने व्यक्ति की है। उसकी पूर्ति के लिए कौन से प्रयास होना आवश्यक है?

प्रधान मंत्री ने आदिकाल से चली आ रही उत्तराखंड की परंपरा को उत्तराखंडवासियों के सामने पुनः रखा है। वे स्वयं उत्तराखंड के पुण्यत्व का अनुभव कर चुके हैं। इसी कारण उन्हें लगता है कि यह भूमि विश्व का आध्यात्मिक केंद्र बनना चाहिए।

विकसित भारत के लिए विकसित उत्तराखंड होना आवश्यक है। भारत के विकास के लिए उत्तराखंड का योगदान किस प्रकार से प्राप्त होगा?

उत्तराखंड हर दृष्टि से देश के विकास के लिए योगदान दे रहा है। साहित्यकार कवि, वैज्ञानिक, कलाकार, आध्यात्मिक विभूतियां जैसे अगणित लोगों का योगदान भारत देश के विकास के लिए मिला है। सीमा की रक्षा से लेकर सरकार के उच्च अधिकारियों तक उत्तराखंड के नागरिक अपना योगदान देते हुए आपको नजर आते हैं। भारत देश के विकास के लिए सभी क्षेत्रों से उत्तराखंड का सक्रिय योगदान पहले भी था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा।

 

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