दुनिया में भारत और हिन्दू धर्म का बजा डंका

हिंदुत्व की बात शुरू होते ही सबसे पहले जिस सन्यासी का नाम याद आता है वो नाम अधिकांश लोगों के लिए स्वामी विवेकानंद का होगा। उन्हें ख़ास तौर पर उनके “शिकागो व्याख्यान” के लिए याद किया जाता है।  ये जो सर्व धर्म सम्मलेन हो रहा था, वो शिकागो के एक वकील चार्ल्स कैर्रोल बोन्नी ने 1889 में शुरू किया था। ये कोलंबस के अमेरिका के खोज के 1893 में 500 वर्ष होने के उपलक्ष्य में होने वाले उत्सवों के पूर्व में शुरू किया गया था। आश्चर्यजनक रूप इसे कोलंबस के आने की वर्षगाँठ मनाने के लिए शुरू किया गया था, जो मुख्यतः स्थानीय लोगों को गुलाम बनाने और सोना लूटने आया था। उसका “सर्व धर्म समभाव” से क्या लेना देना था, ये हमें मालूम नहीं।

इस सर्व धर्म संसद में जॉन हेनरी बर्रोव्स ने कहा था कि एक इसाई और अमीर, अमेरिका जैसा देश ही ऐसा कोई आयोजन कर सकता था। ये वो दौर था जब इसाई लोग दूसरे मजहब के लोगों की गुलामों की तरह खरीद-बिक्री चोरी-छुपे जारी रखे हुए थे। हाँ, बड़ी-बड़ी घोषणाओं और दस्तावेजों के तौर पर जरूर उन्हें “सर्व धर्म सम्मेलनों” की बात शुरू करने के लिए श्रेय दिया जा सकता है। स्वामी विवेकानंद ने इस सम्मलेन में एक से ज्यादा भाषण दिए थे। उन्हें अपने पहले भाषण की शुरुआत “अमेरिका के मेरे बहनों और भाइयों…” से शुरू करने के लिए जाना जाता है। उनके बाकी के भाषण उतने प्रसिद्ध नहीं।

हो सकता है कि आप सोचें कि जहाँ 11 सितम्बर 1893 में जहाँ स्वामी विवेकानंद ने अपना भाषण दिया था, वो जगह अब कैसी है? शिकागो आर्ट इंस्टिट्यूट की सीढ़ियों पर अभी वो 473 शब्द चमकते हैं जो उन्होंने कभी सवा सौ साल से भी पहले कहे थे!

शिकागो_धर्मसभा ….जहाँ सभी विद्वान् दुनिया भर के चोटी के विद्वानों, वैज्ञानिकों और चिंतकों की उक्तियों के साथ अपने उद्बोधन दे रहे थे वहीं जब आप स्वामी विवेकानंद द्वारा उस धर्म-सम्मेलन में दिए गये भाषण को पढ़ेंगे तो आपको दिखेगा कि अपने पूरे भाषण में उन्होंने किसी आधुनिक वैज्ञानिक, आधुनिक चिंतन का जिक्र नहीं किया, किसी पश्चिम के बड़े विद्वान्, किसी मानवतावादी, किसी नारी-मुक्ति का लट्ठ भांजने वाले का भी जिक्र नहीं किया, मज़े की बात ये भी है कि जिनके प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद वहां बोल रहे थे वो उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस उन अर्थों में अनपढ़ थे जिन अर्थों में आज साक्षरता को लिया जाता है. वहां सवामी जी जितना बोले वो केवल वही था जो हमारे बचपन में हमारी दादी-नानी और माँ हमें किस्से-कहानियों के रूप में सुनाती थी यानि राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर की कहानियां और हमारे उपनिषदों और पुराणों से ली गई बातें.

क्या पढ़ा था रामकृष्ण परमहंस ने और क्या कह रहे थे वहां विवेकानंद , केवल वही जिसे मिथक कहकर प्रगतिशील लोग खिल्ली उड़ाते हैं, वहीँ  जिसकी प्रमाणिकता को लेकर हम खुद शंकित रहते हैं और वही जिसे गप्प कहकर हमारे पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया गया पर इन्हीं बातों को शिकागो धर्मसभा में रखने वाले विवेकानंद को सबसे अधिक तालियाँ मिली, बेपनाह प्यार मिला और सारी दुनिया में भारत और हिन्दू धर्म का डंका बज गया.

अपने ग्रन्थ, अपनी विरासत, अपने पूर्वज और अपने अतीत पर गर्व कीजिये. आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा के साथ-साथ अपने बच्चों को राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर की कहानियाँ सुनाइए..उपनिषद, रामायण, महाभारत और पुराणों की बातें बताइए फिर देखिए उसकी मानसिक चेतना और उत्थान किस स्तर तक  पहुँचता है.

ये घटना विश्व-विख्यात ‘शिकागो धर्म सम्मलेन’ के बाद का है जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे.  एक बार किसी रेलवे स्टेशन से उतरने के दौरान एक नीग्रो कुली जल्दी से उनके पास आया है हाथ मिलाकर कहने लगा- बधाई हो ! मुझे बड़ी ख़ुशी है कि मेरी जाति का एक व्यक्ति इतना सम्मानित किया गया है. इस देश के सारे नीग्रो लोगों को आप पर गर्व है. स्वामी जी ने बड़े उत्साह से उससे हाथ मिलाया और कहा- धन्यवाद बंधु, धन्यवाद बंधु. उन्होंने वहां किसी को भी ये जाहिर न होने दिया कि वो कोई नीग्रो नहीं बल्कि भारतवासी हैं.

कई बार उन्हें अमेरिकी होटलों  में नीग्रो होने के संदेह में घुसने नहीं दिया गया तब भी उन्होंने नहीं कहा कि वो नीग्रो नहीं हैं. उनके किसी अमेरिकी शिष्य ने इन घटनाओं पर उनसे पूछा कि आपने उन्हें बताया क्यूँ नहीं बताया कि आप नीग्रो नहीं हैं? स्वामी जी का जबाब था, किसी दूसरे की कीमत पर क्या बड़ा बनना. इस हेतू मैं धरती पर नहीं आया. उन्होंने आगे कहा, ये नीग्रो भी इन्सान है जिनके रंग के कारण अमेरिकी उनसे घृणा करते हैं, अगर वो नीग्रो मुझे नीग्रो समझते हैं तो मेरे लिए ये गर्व की बात है क्योंकि अगर इससे उनमें स्वाभिमान भाव जागृत होता है तो मेरा उद्देश्य सफल हो जाता है.

इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में स्थित एक देश है जो करीब सत्रह हज़ार द्वीपों का समूह है. इस देश में आज दुनिया की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी निवास करती है. भारत की तरह ही यह देश भी तकरीबन साढ़े तीन सौ साल से अधिक समय तक डचों के अधीन थी, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसे डचों से आजादी मिली. डचों से आजादी के लिये इण्डोनेशियाई लोगों के संघर्ष के दौरान एक बड़ी रोचक घटना हुई. इंडोनेशिया के कई द्वीपों को आजादी मिल गई थी पर एक द्वीप पर डच अपना कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं थे. डचों का कहना था कि इंडोनेशिया इस बात का कोई प्रमाण नहीं दे पाया है कि यह द्वीप कभी उसका हिस्सा रहा है, इसलिये हम उसे छोड़ नहीं सकते. जब डचों के तरफ से ये बात उठी तो इंडोनेशिया यह मामला लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ चला गया. संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इंडोनेशिया को सबूत पेश करने को कहा तो इंडो लोग अपने यहाँ की प्रचलित रामकथा के दस्तावेज लेकर वहां पहुँच गये और कहा कि जब सीता माता की खोज करने के लिये वानरराज सुग्रीव ने हर दिशा में अपने दूत भेजे थे तो उनके कुछ दूत माता की खोज करते-करते हमारे इस द्वीप तक भी पहुंचे थे पर चूँकि वानरराज का आदेश था कि माता का खोज न कर सकने वाले वापस लौट कर नहीं आ सकते तो जो दूत यहाँ इस द्वीप पर आये थे वो यहीं बस गए और उनकी ही संताने इन द्वीपों पर आज आबाद है और हम उनके वंशज है. बाद में उन्हीं दस्तावेजों को मान्यता देते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने वो द्वीप इंडोनेशिया को सौंप दिया.

इसका अर्थ ये है कि हिन्दू संस्कृति के चिन्ह विश्व के हर भूभाग में मिलते हैं और इन चिन्हों में साम्यता ये है कि श्रीराम इसमें हर जगह हैं. भारत के सुदुर पूर्व में बसे जावा, सुमात्रा, मलेशिया और इंडोनेशिया हो या दक्षिण में बसा श्रीलंका या फिर चीन, मंगोलिया या फिर मध्य-पूर्व के देशों के साथ-साथ अरब-प्रायद्वीप के देश, राम नाम और रामकथा का व्याप किसी न किसी रूप में हर जगह है. अमेरिका और योरोप की माया, इंका या आयर सभ्यताओं में भी राम हैं तो मिश्री लोककथायें भी राम और रामकथा से भरी पड़ी हैं. इटली, तुर्की, साइप्रस और न जिनके कितने देश हैं जहाँ राम-कथा आज भी किसी न किसी रूप में सुनी और सुनाई जाती है.

भारतीय संस्कृति के विश्व-संचार का सबसे बड़ा कारण राम हैं. राम विष्णु के ऐसे प्रथम अवतार थे जिनके जीवन-वृत को कलम-बद्ध किया गया ताकि दुनिया उनके इस धराधाम को छोड़ने के बाद भी उनके द्वारा स्थापित आदर्शों से विरत न हो और मानव-जीवन, समाज-जीवन और राष्ट्र-जीवन के हरेक पहलू पर दिशा-दर्शन देने वाला ग्रन्थ मानव-जाति के पास उपलब्ध रहे. इसलिये हरेक ने अपने समाज को राम से जोड़े रखा.

आज दुनिया के देशों में भारत को बुद्ध का देश तो कहा जाता है पर राम का देश कहने से लोग बचते हैं. दलील है कि बुद्ध दुनिया के देशों को भारत से जोड़ने का माध्यम हैं पर सच ये है कि दुनिया में बुद्ध से अधिक व्याप राम का और रामकथा का है. भगवान बुद्ध तो बहुत बाद के कालखंड में अवतरित हुए पर उनसे काफी पहले से दुनिया को श्रीराम का नाम और उनकी पावन रामकथा ने परस्पर जोड़े रखा था और चूँकि भारत-भूमि को श्रीराम अवतरण का सौभाग्य प्राप्त था इसलिये भारत उनके लिये पुण्य-भूमि थी. राम भारत भूमि को उत्तर से दक्षिण तक एक करने के कारण राष्ट्र-नायक भी हैं.

” भारत को दुनिया में जितना सम्मान राम और रामकथा ने दिलवाया है, इतिहास में उनके सिवा और कौन दूसरा है जो इस गौरव का शतांश हासिल करने योग्य भी है ? ”

आज जो लोग राम को छोड़कर भारत को विश्वगुरु बनाने का स्वप्न संजोये बैठे हैं उनसे सीधा प्रश्न है राम के बिना कैसा भारत और कैसी गुरुता ? राम को छोड़कर किस आदर्श-राज्य की बात ? राम की अयोध्या को पददलित और उपेक्षित कर भारत के कल्याण की कैसी कामना ? राम का नाम छोड़कर वंचितों और वनवासियों के उद्धार का कैसा स्वप्न ?

स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण को एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। उन्होंने जो 11 से 27 सितम्बर 1893 के बीच के अपने भाषणों में कहा, उसे हर वर्ष याद कर ही लिया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये “मान लिया जाता है” कि इन्हीं भाषणों से हिंदुत्व का पश्चिमी देशों में परिचय हुआ था। हालाँकि दूसरे कई मिथकों की ही तरह इस सेक्युलर मान्यता का भी जमीनी सच्चाई से कोई लेना देना नहीं है। इससे कई वर्षों पहले से ही पत्र-पत्रिकाओं और अख़बारों में भारत और हिन्दुओं के बारे में छपता रहा था।

जैसा कि अपेक्षित ही था, इसमें से कुछ भी हिन्दुओं के पक्ष नहीं जाता था। अधिकांश ऐसे प्रकाशनों में हिन्दुओं को पिछड़ा हुआ, कुत्सित मानसिकता का गिरा हुआ प्राणी ही घोषित किया जाता था। इसलिए अगर स्वामी विवेकानंद के भाषण को महत्वपूर्ण कहना ही हो तो उसे इस वजह से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है कि पहली बार किसी बड़े मंच से एक हिन्दू स्वयं हिन्दुओं के पक्ष में बोल रहा था। ये वो दौर था जब आज सुनाई देने वाला “हिन्दूफोबिया” शब्द प्रचलन में आ चुका था। जी हाँ, हिन्दू-फोबिया कोई आज का शब्द नहीं है, इसके पास करीब डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास है।

जहाँ तक उस दौर में हिन्दुओं के बारे में लिखे-छापे गए का सवाल है, उसमें से काफी कुछ “हीदेन, हिन्दू, हिन्दू: अमेरिकन रिप्रजेंटेशन्स ऑफ़ इंडिया”  में संकलित मिल जाता है। ये आश्चर्य का विषय हो सकता है कि हिन्दुफोबिया शब्द के जन्म के इतने वर्षों बाद भी इस विषय पर कम किताबें क्यों लिखी गयीं। संभवतः इसका एक कारण इस विषय पर किताबों के लिखे जाने पर भी प्रकाशित न होना रहा होगा। कभी-कभी प्रचार न मिलने के कारण भी ऐसा लेखन समय के साथ भुला दिया जाता है। इन सब के अलावा इतिहास को लिखित रूप में रखने की आदत हिन्दुओं में हाल के दौर में कम हो गयी है।

– आनन्द कुमार

आपकी प्रतिक्रिया...