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**जनार्दन मिश्रा***
   

      क्या है बिहारीपन? इसे जानने के पहले बिहार प्रदेश एवं बिहार के बारे में जानना अतिआवश्यक है। आज से पचपन वर्ष पहले स्कूली पढ़ाई के दौरान सामान्य ज्ञान की पुस्तक में पढ़ा था कि बौद्ध भिक्षुओं के मठ को बौद्ध विहार कहते थे। विहार शब्द ही कालांतर में अपभ्रंश रूप में तब्दील होकर बिहार कहलाने लगा। ब्रिटिश शासन काल में लंबे समय तक बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आता था पर १९११ में बिहार उड़ीसा के साथ बंगाल से अलग हो गया और १९३६ में बिहार और उड़ीसा दो अलग-अलग राज्य में विभक्त हो गए। अब उड़ीसा का नया नाम ओडिशा रखा गया है।
     जो जहां का रहने वाला है उसे उस नाम से जाना जाता है। ऐसे में बिहारी का स्वाभाविक अर्थ बनता है वह व्यक्ति जो बिहार का रहने वाला है और बिहारीपन का अर्थ है बिहारियों सा आचार व्यवहार। बिहारीपन अलग से दिखे उसके लिए एक कारक नहीं, कई कारक हैं मसलन खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, पूजा-पाठ, शादी-ब्याह, रूप रंग, नाच-गान, बोलचाल, टोना-टोटका आदि।
खान-पान
     बिहारी दाल-भात, चोखा बड़े चाव से खाते हैं। इस समवेत खाद्य पदार्थ के मिलने से आम बिहारी जन की तृप्ति हो जाती है। भारत के प्रथम पुरुष राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जो पढ़ाई में सदा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होते थे, उनका मनपसंद भोजन था-दाल, भात, आलू की भुजिया। कहते हैं कि उसके साथ हरे आम एवं पुदीने की चटनी मिल जाए तो सोने पे सुहागा।
    फुटेहरी यानी लिट्टी (सत्तू भरी) और चोखा तो बिहारियों का प्रिय भोजन है। उसके साथ भैंस या गाय का घी, दही, आम का अचार मिल जाए तो क्या कहने। अन्न रूप में विश्व का पहला भोजन सत्तू आज भी बिहार में बड़े चाव के साथ खाया जाता है। बिहार में पूआ (पूरी की तरह का मीठा पकवान), फुलौरा (दही-बड़ा) कढ़ी को तो आत्मीयजन को प्रीतिभोज में बड़े सम्मान के साथ परोसा जाता है। मिठाइयों में खाजा, अनारसा, पपड़ी, पेड़ा आदि वहां की विशेष पहचान है। प्रीतिभोज के बाद मीठा पान खिलाने का भी रिवाज है। सुबह के नाश्ते में चूड़ा-दही मिल जाए तो अति उत्तम। शाम के चार बजे के आसपास बच्चे और जवान चबेना जरूर खोजते हैं। घर की औरतें चबेना पहले से तैयार रखती हैं। यहां तक कि घर के बुजुर्गों के लिए जिनके दांत चबेना चबाने में सक्षम नहीं होते उनकी रुचि के अनुसार ओखली में कूटकर चबेना गुड़ या नमक-हरी मिर्च के साथ देती हैं ताकि मन फेर हो सके।
वेशभूषा
    करीब-करीब हर प्रदेश की वेशभूषा अलग-अलग होती है। जहां तक बिहार की बात है आज भी वहां पुरुषों के पहनावे में धोती कुर्तेकी खास अहमियत है। शादी के बाद लड़कियां साड़ी-कुर्ती (ब्लाउज) पहनती हैं। आमतौर पर पुरुष अपने पास अंगोछा जरूर रखते हैं। अंगोछा ऐसा वस्त्र है जो मुंह पोंछने से लेकर जमीन झाड़कर बैठने तक के काम आ जाता है। उसे बिछाकर लोग बैठ जाते हैं और अपने पहने हुए कपड़े को धूल-गर्द से बचा लेते हैं।
रीति-रिवाज
     रीति-रिवाज का अर्थ होता है रस रिवाज, परंपरागत नियम सिद्धांत। अपने देश में तो बिहारी अपने रीति-रिवाज का बखूबी पालन करते ही हैं। परदेस में रहकर भी अपने रीति-रिवाज से दूर नहीं होते। जहां भी रहते हैं अपने रीति-रिवाज से शादी-ब्याह करते हैं, व्रत रखते हैं। अब तो छठ ने दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में महापर्व का रूप ले लिया है। छठ पर्व पर पूरी दिल्ली एवं मुंबई छठ के गीतों से सराबोर हो जाती है। मॉरिशस, त्रिनिदाद जहां भी अंग्रेजों के समय मजदूर रूप में बिहारियों को भेजा गया, वहां आज भी अपने रीति-रिवाज का पालन किया जाता है। वहां भी उनका बिहारीपन अलग से नजर आता है।
     शादी-ब्याह में गाए जाने वाले गीत विदेश में रहने वाले बिहारियों के शादी-ब्याह में भी गाए जाते हैं। जनेऊ, मुंडन संस्कार का वे विदेशों में भी पालन करते हैं। अपने रीति-रिवाज को बिहारी अपने बिहारीपन का अहम हिस्सा मानते हैं।
तीज-त्योहार
     तीज-त्योहार की बात करें तो बिहार में छठ पर्व, होली, दीवाली, तीज, जिउतिया (जीवित पुत्रिका) अनंत पर्व, दशहरा, भैया दूज, रक्षा बंधन, सत्तुआन आदि पर्व हिंदू बड़े धूमधाम से मनाते हैं। मुस्लिम ईद और मोहर्रम मनाते हैं। होली और छठ के मौके पर बिहारी लोग पूरी कोशिश करते हैं कि अपने गांव जाएं और अपने परिवार एवं गांव वालों के साथ मिलकर इस त्योहार को मनाएं। दूर प्रदेश में रहने के कारण हर पर्व त्योहार पर जाना तो संभव नहीं है। तीज व्रत सुहागन औरतें अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं और मां अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए जिउतिया व्रत रखती हैं। भैया-दूज, रक्षा-बंधन, गोवर्धन हर पर्व का किसी न किसी रूप में महत्व है। बिहारी लोग दूर प्रदेश में रहकर भी अपने पर्व-त्योहार से अलग रहकर सुकून के साथ नहीं जी सकते।
पूजा-पाठ
      

बिहारी लोग पूजा-पाठ में ज्यादा विश्वास करते हैं। मंदिर, ठाकुरवाड़ी जाने की भरपूर कोशिश करते हैं। गांव-देहात में किसान दोपहर को भी तलाब में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हुए नजर आ जाएंगे। हनुमान चालीसा एवं रामचरित मानस की कुछ चौपाइयां एवं दोहे तो करीब हर हिंदू के मुंह से आप सुन सकते हैं।
शादी-ब्याह
     शादी-ब्याह में बेटे वालों का रुतबा बड़ा होता है। तिलक-दहेज की प्रथा समाप्त होने के बजाय और बढ़ रही है।
रूप-रंग
     हर प्रदेश के लोगों के रूप-रंग में थोड़ा बहुत अंतर होता है। बिहार के लोगों की लंबाई औसत दर्जेकी होती है। वही बात लड़कियों की भी है। रंग की बात करें तो अधिकांश लोग आपको गेहुंए रंग के, सांवले रंग के मिलेंगे। किसी-किसी परिवार में लंबाई की दृष्टि से भी कोई सदस्य इन मान्यताओं से अलग मिल जाएंगे यानी अति लंबा, गोरा, काला आदि। जहां तक नाक-नक्श की बात है तो बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की नाक-नक्श एक जैसी होती है।
नाच-गान-वाद्य
     बिहारीपन के साथ नाच-गान का गहरा ताल्लुक है। फाग, चैता, ठुमरी, कजरी आदि का प्रसारण आकाशवाणी पटना के साथ-साथ देश के कई आकाशवाणियों से समय-समय पर होता रहता है। भोजपुरी फिल्मों का रुतबा बढ़ रहा है। मैथिली कवि विद्यापति के गीत तो विश्व प्रसिद्ध हैं। एक बार हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा था कि अभी तक गीत के क्षेत्र में विद्यापति के कद के बराबर कोई अन्य नहीं पहुंचा है।
बोलचाल
   मुख्य तौर पर बिहार में भोजपुरी, मैथिली, मगधी बोली जाती है। मैथिली भाषा में रचित कई कृतियां साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हो चुकी हैं। भोजपुरी को बड़ी तरजीह देते थे।
    जो जहां का रहने वाला है उसे उस नाम से जाना जाता है। ऐसे में बिहारी का स्वाभाविक अर्थ बनता है वह व्यक्ति जो बिहार का रहने वाला है और बिहारीपन का अर्थ है वह व्यक्ति जिसमें बिहार से जुड़े गुण-दोष विद्यमान हों। जैसे किसी युवक से यह कहा जाए कि तुम्हारे अंदर लड़के वाले गुण-दोष शामिल हैं।
     कई शब्दों के अर्थ समय के अनुसार बदलते रहते हैं। कभी ‘नेता जी’ शब्द का बड़ा सम्मान था, क्योंकि यह शब्द महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस के नाम के साथ जुड़ा था। वे ऐसे वीर स्वाभिमानी थे जो देश की शान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिए पर विगत कुछ दशकों से सत्ता से जुड़े नेताओं के लिए यह शब्द प्रयोग किया जाता है। इन नेताओं के घृणित कर्मों के कारण यह शब्द अपना सम्मान, गरिमा, खो चुका है। बिहार के साथ भी यही बात है। यदि अतीत के संदर्भों को कुछ देर के लिए परे कर दिया जाए तो बिहारीपन शब्द यदि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दौर में कहा गया होता तो उसका अर्थ होता ऐसा व्यक्तित्व जो सादा जीवन उच्च विचार का स्वामी है। लालू युग में वह शब्द भ्रष्टाचार से जुड़े व्यक्ति के लिए प्रयोग होने लगा। राबड़ी देवी जिस काल में बिहार की मुख्यमंत्री थीं उस काल में बिहारीपन का मतलब था निपट गंवार, निरक्षर, दब्बू व्यक्ति। इन दोनों के शासन काल में बिहारीपन का मतलब था ऐसा व्यक्ति जो अपने प्रदेश में रोजगार न पाने के कारण दूसरे राज्यों में काम की तलाश में इधर-उधर भटक रहा है।
    

 बिहारीपन के साथ कई अच्छाइयां जुड़ी हैं तो कई बुराइयां भी हैं। मसलन वहां अभी भी अधिकांश लोग तंबाकू, खैनी, बीड़ी, सिगरेट का सेवन करते हैं। बेवजह जमीन जायदाद को लेकर कचहरी का चक्कर लगाते हैं। छोटी-छोटी बातों को लेकर एक-दूसरे पर मुकदमा करना आम बात है। जिस दिन बिहारी अपनी बुराइयों का त्याग कर देंगे उनके अंदर मानवीय गुण इतने अधिक हैं कि उनकी गिनती आदर्श मनुष्यों में होने लगेगी।

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