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***सुरेश रूपचंदानी ***
      

 सिंधी लोकनृत्य भारत के अन्य नृत्यों से काफी मेल खानेवाले हैं। रामलीला, रासलीला, गरबा आदि लोकनृत्यों का उनके ऊपर बडा प्रभाव पाया जाता है। वैसे बदलते स्थानों के अनुरूप उनमें ऐसा साम्य होना सहज ही है। सिंधी लोकनृत्यों में विशेष रूप से तीन प्रकार के नृत्य हैं। वे हैं- छेज, टपरी और झुमरी।
      ‘छेज’ नृत्य में आम तौर पर पुरुष ही सम्मिलित होते हैं। वे नृत्य करते के समय धोती, लंबे चोगे समान कोट और सिर पर साफा पहनते हैं। यह पूरी पोशाक सफेद रंग की होती है। ऐसी पोशाक पहनकर पुरुष गोल बनाकर खड़े होते हैं। हर किसी के हाथ में डंडा होता है। ढोल के ठेके पर गोलाकार घूमते हुए अलट-पलट कर एक दूसरे के डंडे पर डंडा बजाया जाता है। कभी-कभी इस नृत्य के साथ शहनाई भी बजाई जाती है। ढोल के ठेके पर डंडे बजने से वातावरण उल्लासमय बन जाता है और दर्शक भी डोलने लगते हैं। शादी के अवसर पर यह नृत्य होता है। नृत्य की गति तेज हो इस हेतु बीच बीच में सुरों को खींचते हुए जोर से ‘आयो लाल चओ झूले ऽऽ लाल’ का घोष करतेै हैं। ढोल के साथ तालियां या झांझ बजाने से गति और भी तेज हो जाती है।
      टपरी नृत्य केवल महिलाएं ही करती हैं। होली की चांदनी रात को घर के कामों से निबट कर महिलाएं इकट्ठा होती हैं। नृत्य करनेवाली लगभग सभी युवतियां होने से नृत्य में यौवन झलकता है। नृत्य करते समय पैरों में बंधे नूपुर तथा तालियां इनकी तालबद्ध ध्वनि से नृत्य की रमणीय एकाग्रता भावविभोर करा देती है। टपरी नृत्य करते समय होली पर आधारित कोई लोकगीत भी गया जाता है।
    सिंधी लोकनृत्यों में ‘झुमरी’ नामक नृत्य भरतनाट्यम् जैसा ही होता है। झुमरी नृत्य प्राय: अकेली महिला ही करती है। ढोलक अथवा थालियों के ठेके पर हाथ-पैरों तथा आंखों की पुतलियों और भौहों की हलचल करते यह नृत्य पेश किया जाता है। ढोलक बजाने वाला अपने हाथ में घुंघरु जैसा छल्ला बांधता है। उससे नर्तकी के पांवों के नूपुर, ढोलक और छल्ला इनकी तालबद्ध ध्वनि मन को मोहित करती है।
लोकगीत
      ‘आओ, आओ, बरखा आओ’ जैसे गीत छोटे बच्चों के प्यारे होते हैं। ऐसे गीत आसानी से याद हो जाते हैं और आगे चलकर कभी उनका स्मरण हुआ तो अपना बचपन आंखों के सामने उभर आता है। दिल की कली खिल उठती है।
‘पैसो लधुमि पटतां, पैसे वरतुमि गाहु,
गाहु डिनुमि गांइ, गांइ डिनो खीर
खीर डिनुमि अमांखे, अमां डिनी लोली,
लोली डिनुमि कांवगे, कांव डिनो खंबु,
खंबी डिनुमि राजागे, राजा डिनी घोडी
चढी घुमां, चढी घुमां’
(अर्थ : रास्ते में मिला टका, टके से खरीदी घास, घास खिलाई गाय को, गाय ने दिया दूध, दूध दिया मां को, मां ने दी रोटी, रोटी दे दी कौए को, कौए ने दिये पर, पर दिये राजा को, राजा ने बहाल की घोडी, सवार होकर घूमुंगा-घूमुंगा।)
यह गीत मानस को कैसे मोहित करता है, वह तो देखने लायक है। इस तरह के कितने ही सिंधी लोकगीत पाये जाते हैं।
मायके से कोई हरकारा अगर आया, तो मन उससे कितनी सारी बातें पूछना चाहता है। सिंधी समाज में ऐसा संदेशा लानेवाले को या क्षेमकुशल पूछने जानेवाले को मायके से कुछ मिठाई ‘बिदरी’ के रूप में भेजने का रिवाज है। मकान की छत पर या आंगन में कौआ काव-काव करने लगा, तो वह मायके से कोई संदेशा लेकर ही आया है, ऐसी सिंधियों में आम धारणा होती है। एक लोकगीत में उसका वर्णन ऐसा-
‘माडीअते थो कांव लंवे, बस कयो री भेन्रीयू,
त बुधी बोल्यू कांग जूं, कांग लवें थो मिठडी लात,
बुधाए अबाणन, सांगी अडरिजू बात
माडीअते थो कांग लंवे, भायल बार बिदरीन जा
भरे खारा आणींदो मेवनजा, माडीअते थो कांग लंवे’
(अर्थ : अटारी पर से कौआ पुकार रहा है। मेरी बहनों, जरा शांति तो रखो, कि मैं कौए के बोल सुन पाऊंगी। आज कौए के बोल मधुर हैं। मायके के और बचपन के दोस्त-सहेलियों के किस्से वह सुना रहा है। मेरा भैया सौगात का बोझ खुद लाएगा। फूलों-फलों की टोकरियां भरकर लाएगा।)
सिंध में दहेज प्रथा का अस्तित्व अतृप्त आत्मा के भूतपिशाच जैसा हुआ करता था। मायके के लोगों ने दहेज देने में या मानसम्मान करने में कोताही की, तो उसका गुस्सा बेचारी नई दुल्हन पर उतारा जाता था। दुल्हन भगवान से प्रार्थना करती थी कि हमें वे अच्छे दिन दिखा, जब हमारा मिलन होगा। बानगी देखिए-
‘मां जिन लाय थी जागां, इहे शाल ईदा,
वाधायूं वराए, डिसण वारा डींदा
जिन लाय थी जीअमें, जायूं संवारियां,
अंगणखे अखिनसां, बुहारियूं बुहारियां,
डिसी हाल हीणो, निधर साणू नींदा’
(अर्थ : जिनके लिए मैं सारी रात जाग रही हूं, वे जरूर आएंगे। हमें उस अवसर पर साथ-साथ देखनेवाले मुझे बधाई देंगे। मैंने जिनके लिए अपने दिल में महल सजाया है, आंगन आंखों जैसा साफ रखा है, उनका दिल मेरी ऐसी असहायता देख, पसीज उठेगा।)
विवाह समारोह के दौरान दूल्हे के चेहरे पर से पैसे, नारियल जैसी चीजें वारकर बिखेर दी जाती हैं। ऐसे किसी नजारे पर आधारित लोकगीत में बड़ा ही उल्लासभरा वर्णन किया गया है-
‘हलंदा हलो मुहजे अदलता जांई,
अदलजा जांई भायलजा जांओ
नोट हथनमें, खुर्दा खीसनमे
नाणो विरहाईंदा हलो’
इस गीत में बारात का निर्देश कर विवाह के जुलूस में हर्ष-उल्लास से सम्मिलित होने कहा गया है। हाथों में नोटों के बंडल और जेब में सिक्कों की रेजगारी लेकर बारातियों चलिए, अपने लाडले दूल्हे पर वारते हुए ये सिक्के बिखेरते चलिए, बांटते चलिए।
सिंधी लोकगीतों में सबसे लोकप्रिय गीत ‘होजमालो’ है।
‘होजमालो…होजमालो, जमालो जतनसां, होजमालो।
खटी आयुम खैर सां, होजमालो
जमालो रे सरत्यूं, जहिंखे साओ लकुण हथमे, होजमालो।
जमालो रे सख्यूं, जहिंखे सोनी मुंडी चीचमें, होजमालो’
सिंधी लोकगीतों में विवाह समारोह में गाये जाने वाले विभिन्न प्रसंगों के गीत बड़े ही लोकप्रिय होते हैं। ऐसे गीतों को ‘लाडा’ कहा जाता है। ‘लाडा’ यह गीत प्रकार हिंदी लोकगीतोंे में और खासकर पंजाबी लोकगीतों में भी पाया जाता है।

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