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“एक ओर तो मुझे अपराध-बोध हो रहा था कि मैं स्वयं सिद्धि और देव के लिए कुछ नहीं कर पाया; दूसरी ओर मेरा मन कह रहा था- धन्य हो करुणाकंद! आपने सिद्धि को वापस लाकर देव जैसे करोड़ों लोगों की आस्था को टूटने से बचाया है।”

देवदत्त भारद्वाज चौबीस वर्षीय सुंदर एवं तेजस्वी नवयुवक है। उसके पिता पं. चन्द्रदेव भारद्वाज मथुरा के प्रसिद्ध करुणाकंद मंदिर के पुजारी थे। वे देवदत्त को देव कहकर पुकारते थे। इसीलिए आज देवदत्त भारद्वाज नाम कहीं खो सा गया है। और देव ने अपनी विशेष पहचान बना ली है। वह मेधावी है। संस्कृत साहित्य से आचार्य करने के उपरांत वह ‘कालीदास के साहित्य में ॠतु वर्णन’ विषय पर पीएच.डी. कर रहा था। तभी मेरी मुलाकात आचार्य देवदत्त से हुई थी। मुझे भी संस्कृत साहित्य पर एक आलेख लिखना था। इसलिए अपने एक मित्र से पता पाकर मैं आचार्य देवदत्त के घर पहुंचा। दरवाजा खुला था। मैंने कमरे में प्रवेश किया। वह उस समय अकेला बैठा हुआ विचारमग्न था। खिड़की की ओर देखते हुए वह बहुत चिंतित लग रहा था। अचानक उसकी आंखों से आँसू गिरने लगे। कमरे में मेरी उपस्थिति होने का आभास भी उसे नहीं हुआ। उसके हाथों में एक तस्वीर थी।

इसकी ओर देखते ही वह सुबकते हुए बोला- “सिद्धि मेरी बहन! तुम्हें मैंने कहां-कहां नहीं खोजा लेकिन आज तक तुम्हारा कोई सुराग नहीं मिला।”

मैंने उसके एकाकी दर्द में प्रवेश करते हुए पूछा- “क्षमा करना! आचार्य देवदत्त आप ही हैं?”

उसने आंसू पोंछते हुए कहा-“हाँ! मैं ही हूं परन्तु आप कौन हैं?”

“राकेश” “राकेश अवस्थी नाम है मेरा; सुना है आप संस्कृत साहित्य से पीएच.डी. कर रहे हैं। मुझे भी एक आलेख लिखना है इसीलिए आया हूं।”

उसने कहा- “देखिए मेरी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।”

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “कोई बात नहीं दोस्त! लेकिन क्या मैं आपका दर्द जान सकता हूं। शायद मैं आपकी कोई मदद कर सकूं”

पहले टालने की कोशिश करने के बाद फिर उसने बताया- “यह तस्वीर! मेरी बहन सिद्धि की है। सिद्धि मुझसे छ: वर्ष छोटी थी। पिता जी के स्वर्गवास के बाद मैं और सिद्धि ही मां का सहारा थे। सिद्धि ने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। हम दोनों मां के साथ खुशी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहे थे। मां की इच्छा थी कुंभ-स्नान करने की। इसलिए कुंभ पर्व आते ही मां, मैं और सिद्धि कुंभ-स्नान के लिए तीर्थराज प्रयाग पहुंचे।

इस महापर्व पर प्रयाग में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर एक नया महानगर बस गया था। चारों तरफ श्रीमद्भगवद् की कथाएं चल रही थीं तो कहीं भजन-कीर्तन आदि हो रहे थे। कहीं दान, कहीं पूजा सब अद्भ्ाुत लग रहा था। जगह-जगह खोया-पाया केन्द्र तथा पुलिस चौकी भी बनाई गई थीं। ऐसा अद्भ्ाुत द़ृश्य मैंने और सिद्धि ने मथुरा में कभी नहीं देखा था। मां के साथ हम कुंभ में घ्ाूम-घ्ाूम कर आनंदित थे।

अचानक एक साधुओं की बहुत बड़ी मंडली आई और भजन-कीर्तन करते हुए चली गई। तभी हमने देखा कि हमारी सिद्धि हमारे साथ नहीं थी। मैं और मां दोनों ही अधीर हो गए। मां रोने लगी और मैं उसे छोड़कर सिद्धि की तलाश करने लगा। कई घंटे के बाद भी सिद्धि नहीं मिली तो मैं मां के पास वापस आया। मां मुझे देखते ही बोली- “सिद्धि… सिद्धि मिली देव?”

मैंने “नहीं” में सिर हिलाया ही था कि मां के प्राण पखेरू उड़ गए।

राकेश! सिद्धि के खोने और मां के निधन से दुखी मैंने संगम पर ही मां का अंतिम संस्कार किया। उसके बाद अगली सुबह मैंने पुलिस स्टेशन पहुंचकर सिद्धि के लापता होने की सूचना दी। एफ.आई.आर. दर्ज कर चौकी प्रभारी ने मुझसे सिद्धि को खोज निकालने का वादा किया।

इस तरह एक सप्ताह तक मैं पुलिस चौकी के चक्कर सुबह-शाम लगाता रहा पर सिद्धि का कोई पता नहीं लगा। पुलिस का वादा निष्फल रहा। एक दिन जब मैं पुलिस चौकी पहुंचा तो चौकी प्रभारी ने कहा- “देखिए! मि. देव! पुलिस अपना काम कर रही है। अभी आप मथुरा लौट जाइए। जैसे ही हमें सिद्धि के विषय में कोई जानकारी मिलेगी, हम आपको सूचित करेंगे।”

निराश और दुखी मन से मैं मथुरा लौट आया। बचपन से लेकर उस दिन तक की सिद्धि और मां के साथ की सभी स्मृतियां छाया सी उभर आईं मैं क्रोध और आत्मग्लानि से भर चुका था। मथुरा आते ही करुणाकंद के मंदिर पहुंचा और अपने क्रोध की प्रज्ज्वलित अग्नि में दहते हुए मैंने करुणाकंद से कहा- “लोग तुझे करुणाकंद कहते हैं, भगवान कहते हैं तुझे… लेकिन तू पत्थर से ज्यादा और कुछ नहीं है। बचपन में बाबू जी का साया मेरे सिर से उठा लिया और अब मेरी मां और सिद्धि को भी तूने… मुझसे छीन लिया। …अरे ! मेरा कसूर ही क्या था? यही कि तेरे ऊपर मेरी अंध श्रद्धा थी। मैं आज तक तेरे सामने घंटियां बजाता रहा, तेरी पूजा आरती करता रहा लेकिन आज के बाद तेरी चौखट पर भी कदम नहीं रखूंगा मैं।”

“उस दिन से मैंने मंदिर जाना भी छोड़ दिया है। पीएच.डी. अधूरी रह गई। …और अब मेरे जीवन का बस एक ही उद्देश्य है; किसी भी तरह अपनी सिद्धि की तलाश। इसलिए राकेश! मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।”

मैंने उसे दिलासा दी और कहा- “यदि तुम चाहो तो सिद्धि का कोई चित्र मुझे दे दो। मैं भी उसे खोजने की कोशिश करूंगा।”

इसके बाद सिद्धि का फोटो लेकर और अपना पता देव को देकर मैं वापस लौट आया। आज इस घटना को तीन साल हो चुके हैं। कार्य की व्यस्तता में मैं देव, सिद्धि और इस घटना को भ्ाूल चुका था, …लेकिन कल अचानक देव मेरे घर आया। उसे देखते ही मुझे पूरी घटना याद हो आई। मैं शर्मिंदा था क्योंकि मैंने सिद्धि को खोजने का प्रयास ही नहीं किया। …परन्तु एक बात बहुत खास लगी। कल उसके चहरे से प्रसन्नता टपक रही थी।

मैंने संयत होते हुए कहा- “अरे देव साहब! आप! …कैसे हैं?” मैं इतना ही कह पाया था कि देव ने मुझे गले लगाते हुए कहा- “मैं बहुत खुश हूं राकेश!”

इतना कहकर उसने अपने बैग से एक आमंत्रण पत्र निकालकर मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- “सिद्धि की शादी है राकेश …तुम्हें अवश्य आना है।”

मैंने हैरत से पूछा- “अरे वाह! कहां मिली सिद्धि …और कैसे?”

देव ने कहना आरंभ किया- “जिस दिन तुम मेरे घर आए थे, उसी दिन मेरे मित्र शरद का फोन आया। वह बोला- “देव! सिद्धि मिल गई है।”

मुझे तो मानो मुराद मिल गई थी, इसलिए पूछा- “शरद! कहां है सिद्धि?”

उसने उत्तर दिया- “देव! वह आगरा, सेब के बाजार में बिंदु बाई के कोठे पर है। आज जब मैं अपनी दुकान के लिए साडियां लेने सुभाष बाजार जा रहा था तो अचानक समय बचाने के लिए सेब के बाजार की गली से होकर निकलने का विचार मेरे मन में आया। …यह ईश्वर की कृपा है मेरे दोस्त, वरना तुम तो जानते हो कि मैं कभी उस रास्ते से नहीं गुजरा। वहां से जाते समय अचानक मेरी द़ृष्टि ऊपर चली गई। कुछ महिलाएं दूसरी मंजिल की खिड़कियों से झांक रही थीं। उन्हीं में एक सिद्धि थी, देव!”

“देव! उसने मुझे संकेत से बुलाया; मेरी बुद्धि ने मुझे उस ओर जाने से रोका परन्तु अगले ही पल मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा- “शरद! हो न हो यह अपनी सिद्धि है और तुझे ऊपर जाना ही होगा।”

मैं ऊपर चला गया। वह मुझे एक कमरे में ले गई। कमरा बंद करने के बाद वह फफक-फफक कर रो पड़ी; देव! उसने कहा- “ शरद भैया! आपको मेरी राखी की कसम। मुझे यहां से ले चलो भैया।”

मैंने उसके आंसू पोंछते हुए कहा- “सिद्धि मेरी बहन! मैं तुम्हें अवश्य ही इस नर्क से बाहर निकालूंगा। थोड़ा धैर्य रखो सिद्धि।”

इतना बताने के बाद शरद ने कहा- “देव! मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है। हम दोनों मित्र अपनी सिद्धि को वापस लाएंगे।”

मेरे अंदर का दर्द तो जैसे साहस में बदल गया था राकेश! मैं तुरन्त शरद के पास पहुंचा और तब सबसे पहले हमने सिद्धि से मिलने का निश्चय किया। हम दोनों ग्राहक बनकर वहां पहुंचे।

सिद्धि ने रो-रोकर बताया कि वहां उसके साथ बिंदुबाई और उसके ग्राहक जानवरों जैसा निर्मम व्यवहार करते थे। बिंदुबाई और उसके ग्राहकों की ज्यादती सहते-सहते तब वह थक गई तो उसने मरने का निश्चय कर ही लिया। इसके लिए भी बिंदुबाई का विश्वास जीतना पड़ा। यह बहुत बड़ा समझौता था राकेश! सिद्धि ने यह भी बताया कि जैसे ही उसे अवसर मिला, वह मरने के लिए खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई। वह खिड़की से कूदना चाहती थी। कि तभी वहां से गुजरते हुए शरद ने उसे देख लिया।

उस दिन सिद्धि से मिलने के बाद हम पुलिस की मदद लेने के लिए एस.एस.पी. ऑफिस पहुंचे। चपरासी को स्लिप देकर उनकी परमीशन पर अंदर पहुंचे और पूरा हाल उन्हें कह सुनाया।

एस.एस.पी. साहब ने कहा- “मैं आपका सहयोग करूंगा। आपकी बहन निश्चित ही उस नर्क से बाहर आएगी ये मेरा वादा है।”

और फिर उनकी योजना के अनुसार एक बार फिर हम एस.एस.पी. साहब के साथ ग्राहक बनकर ही बिंदुबाई के कोठे पर पहुंचे। कप्तान साहब ने पुलिस की ऐसी व्यवस्था की थी कि कोई समझ ही नहीं पाया। अवसर पाते ही उन्होंने खिड़की से झांकते हुए संकेत किया और सिविल ड्रेस में पुलिस दल ऊपर आ पहुंचा।

बिन्दुबाई को गिरफ्तार कर लिया गया। वहां पन्द्रह अन्य किशोरियां भी मिलीं। पूछताछ में उसने बताया कि सभी किशोरियों को उसके कोठे पर पहुंचाने वाला एक व्यक्ति है। जिसका नाम दुर्जन है। वही साधुओं के बीच में शामिल होकर सिद्धि को अगवा करके उसे बिंदुबाई के कोठे पर लाया था। प्रत्येक किशोरी के बदले बह बिंदुबाई से 50,000 रु. लेता था। एस.एस.पी. साहब के आदेश से वह भी पकडा गया।

मित्र! वहां से चलते समय जब हम एस.एस.पी. साहब को धन्यवाद देने पहुंचे तो उन्होंने सिद्धि से कहा- “अब सदा खुश रहना अपने परिवार के साथ।”

सिद्धि की आंखों में आंसू थे। वह बोली- “खुश कैसे रह सकती हूं सर! कोठे पर रह चुकी लड़की केवल अपने भाइयों पर बोझ बनकर रह सकती है।”

एस.एस.पी. साहब ने पूछा- “ऐसा क्यों सोचती हो तुम?”

वह बोली- “सच कह रही हूं मैं; कौन भरेगा मेरी मांग में सिंदूर?”

एस.एस.पी. साहब एक क्षण सोचकर बोले- “यदि तुम्हें और तुम्हारे भाइयों को ऐतराज न हो तो मैं एस.एस.पी. अमित शुक्ला तुमसे शादी करने को तैयार हूं …लेकिन निर्णय तुम्हें करना है क्योंकि मेरी मां को बहू चाहिए और मैं समाज की सेवा करने के लिए संकल्पित हूं।”

हमने सिद्धि की ओर देखा, उसकी आंखों में चमक थी और फिर एस.एस.पी. शुक्ला को सहमति दे दी।

इतना ही नहीं, उन्होंने हमें निर्देश दिया है कि शादी किसी रविवार को ही होगी और वह भी मंदिर में, बिना अधिक खर्च किए सादगी के साथ। शादी में खर्च होने वाला पैसा अनाथ बच्चों एवं परित्यक्त वृद्धजनों की सेवा में लगाया जाएगा।

मित्र! मुझे लगा जैसे स्वयं करुणाकंद मेरे सामने एस.एस.पी. शुक्ला के रूप में थे। मैंने मन ही मन करुणाकंद से क्षमा याचना की और संकल्प लिया कि सिद्धि की शादी के बाद पूरा जीवन करुणाकंद की सेवा में बिताऊंगा। परसों रविवार है इसलिए यह शादी परसों करुणाकंद के मंदिर में ही होगी।

मैं उसकी बात ध्यान से सुन रहा था। एक ओर तो मुझे अपराध-बोध हो रहा था कि मैं स्वयं सिद्धि और देव के लिए कुछ नहीं कर पाया; दूसरी ओर मेरा मन कह रहा था- “धन्य हो करुणाकंद! आपने सिद्धि को वापस लाकर देव जैसे करोड़ों लोगों की आस्था को टूटने से बचाया है। आप धन्य हैं।

 

 

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