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कभी परम्पराओं के नाम पर तो कभी रीति-रिवाज़ और ढकोसलों के चलते महिलाओं को अब तक बहुत छला गया है। परन्तु अब स्त्री जाति को इन वाहियात प्रथाओं से मुक्ति हेतु अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। उन्हें खुद ही घूंघट से बाहर निकलकर आगे बढ़ना होगा।

विभिन्न काल और संप्रदायों में बाहरी मर्दों और बड़ों के सामने पर्दा या सिर पर पल्लू करना, मुख्यत: स्त्रियों के संरक्षण और एक तरह से बड़ों का आदर, लिहाज़ करने को लेकर शुरू की गई थी, जिसने बाद में प्रथा का रूप ले लिया। विभिन्न धर्मों में पर्दा प्रथा काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही है। इस संबंध में भिन्न-भिन्न मत भी आते-जाते रहे हैं। प्रत्येक धर्म-सम्प्रदाय में इसे एक धार्मिक मान्यता तथा वैधता के अनुसार स्थापित किया है। एक ओर मुस्लिम धर्म की आयतें व पवित्र धार्मिक पुस्तकें इसको ज़रूरी बताती हैं, वहीं दूसरी ओर हिन्दू धर्म की धार्मिक पुस्तकों तथा विचारधाराओं में एक तरह से इसको गैर-ज़रूरी बताया गया है।

हिन्दू धर्म में महिलाएं घूंघट और पल्लू करती हैं। जबकि मुस्लिम धर्म में महिलाएं बुर्का पहनती हैं जो एक तरह से घूंघट का ही विस्तृत रूप है, जिसमें उनके ,शरीर के ज़्यादातर अ्रंग छिपे रहते हैं।

प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म, वैदिक आर्य धर्म तथा सनातन धर्म में पर्दा प्रथा का वर्णन नहीं मिलता। हमारे भारतीय समाज की मूल जातियों में भी पर्दा प्रथा नहीं थी। किसी वेद-ग्रंथोें-पुराण में भी इस तरह का कोई वर्णन नहीं मिलता है। इस प्रकार से यह माना जा सकता है कि भारत में घूंघट तथा पल्लू यानी पर्दा प्रथा प्राचीन काल में नहीं थी।

कुल मिलाकर इसे मुगल शासन की देन समझा जा सकता है। हमारे भारतीय समाज में घूंघट और पल्लू को अपनाते-अपनाते लोगों ने इसे एक परम्परा का रूप दे दिया है। विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार पर्दा प्रथा मुस्लिम शासन काल में मुस्लिम सैनिकों से स्त्रियों की रक्षा के लिए आरंभ हुई। प्राचीन काल में पारम्पारिक कपड़े, गहने तथा साज-सिंगार करना स्त्रियों के लिए बहुत ज़रूरी माना जाता था। इसी तरह से भारतीय परम्परा में घूंघट तथा पल्लू ने एक प्रथा के रूप में अपनी जगह बना ली। मुगल शासन में स्त्रियों से घूंघट तथा पल्लू स्वेच्छावश नहीं अपितु मजबूरीवश करवाया जाने लगा था पर धीरे-धीरे यह परम्परा तथा रिवाज ही बन गई और इस प्रथा ने अनेक धर्म और जातियों में गहरे तक अपनी जगह बना ली, जो आज आधुनिकता के बावजू़द विभिन्न प्रदेशों और जातियों में आज भी अपनी गहरी पैठ बनाए हुए हैं। देश के कुछ शहरी और पढ़े-लिखे क्षेत्रों में पर्दा प्रथा जहां पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है वहीं कुछ क्षेत्रों में विशेषकर, ग्रामीण क्षेत्रों में पर्दा प्रथा की जड़ें अभी भी अत्यंत गहरी हैं। विडम्बना यह भी है कि कुछ शहरी क्षेत्रों में कुछ हद तक सीमित होने के बावजूद अनेक परिवारों में इसका वजूद अभी भी देखा जा सकता है।

कुछ परिवारों में तो रीति-रिवाज तथा परम्पराओं के नाम पर महिलाओं पर पर्दा प्रथा अनावश्यक रूप से और जबरन थोप दी जाती है। समाज तथा परिवारों में पर्दा प्रथा देखते हुए लड़कियां भी यह सब अपने रीति-रिवाज व संस्कृति मानकर अपना लेती हैं। उन्हें भी पता होता है कि शादी के पश्चात उन्हें भी घूंघट में ही रहना पड़ेगा। घूंघट लेना एक तरह से महिला की विवशता ही है। पुरूष के वर्चस्व वाले समाज में इसके खिलाफ आवाज़ उठाना एक तरह से विद्रोह या मर्यादाहीनता की निशानी रही। इसी वजह से यह एक परम्परा के रूप में  पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलती रही। फिर चाहे महिला खेतों में काम कर रही हो या अपने कार्यालय में अथवा किसी शादी-ब्याह में उपस्थित हो, अधिकांशत: उसे विवशतावश घूंघट या सिर पर पल्लू लेना ही पड़ता है।

शहरों और कस्बों में नौकरी पर तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खेतों पर काम करने तो जा सकती हैं परन्तु घूंघट में ही। जबकि महिलाओं को घूंघट में बहुत सारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। जहां हमारे ग्रामीण पुरूष भीषण गर्मी में खुले बदन पेड़ की ठण्डी छांव में बैठ सकते हैं और कहीं भी घूमते रहते हैं, वहीं भीषण गर्मी में महिलाएं घर-बाहर, खेत-खलिहान से लेकर रसोईघर में खाना पकाते हुए भी घूंघट से छुटकारा नहीं पा पाती हैं।

सोचने वाली बात है कि घूंघट एक तरह से आंखों पर बंधी काली पट्टी या यूं कहिए कि मुंह पर बंधी एक पट्टी जैसा ही है। जब किसी की आंखें तथा मुंह बंद हों तो वह कैसे अपने मन-मस्तिष्क को विकसित कर सकता है? यही कारण है कि ऐसी महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ नहीं पाता है। वह अपने आपको पूर्ण रूप से असुरक्षित तथा असहाय महसूस करने लगती हैं। मानसिक रूप से कमजोर हो जाती हैं, उनमें हीन भावना पनपती है और वह अपनी सुरक्षा के लिए भी पूर्णतया अपने पति, भाई या पिता अथवा किसी अन्य रिश्तेदार पर आश्रित रह जाती हैं। कुछ परिवारों में रूढ़िवादी बुजुर्ग घूंघट को सम्मान, षर्म और लज्जा की ओढ़नी मान लेते हैं। यानी यदि कोई औरत घूंघट नहीं करेगी तो उनका मान-सम्मान कम हो जाएगा।

यदि आज इक्कीसवीं सदी में भी नारी शक्ति को पर्दे के पीछे सिमट कर विवश होकर रहना पड़े तो यह एक चिंता का विषय है। इन्हीं सब बुराइयों के चलते महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय ने पर्दा प्रथा का डट कर विरोध किया था। सच बात भी यही है कि यदि देश को विकास तथा उन्नति की ओर ले जाना है तो घूंघट प्रथा को अलविदा कहना ही होगा। ऐसा भी नहीं है कि महिलाओं ने इस प्रथा का कभी विरोध ही न किया हो। कुछ महिलाओं ने आज ही नहीं सदियों से घूंघट जैसी रूढ़िवादी परम्परा को दरकिनार करके बहुत से कारनामें कर दिखाए हैं।

अठारहवीं सदी में रानी झांसी लक्ष्मीबाई ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। और अनेक रानियों के किस्से भी इतिहास में दर्ज हैंं जिन्होंने अपने दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया। ज़रा सोचिए, यदि वे सभी सिर पर पल्लू या पर्दा करके युद्ध क्षेत्र में उतरतीं जो उनका क्या हश्र होता। या कल्पना करिए कि ऐसी महिलाएं घूंघट में रहकर क्या एक खास मुकाम तक पहुंच पातीं? आज की बात करें तो अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला, एशियाई खेलों में मुक्केबाजी में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला एम.सी. मैरी कोम, कान्स में जूरी सदस्य बनने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री ऐश्वर्या राय, ओलम्पिक खेलों में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पी.वी. सिंधु, ओलम्पिक के फाइनल में पहुंचने वाली प्रथम भारतीय महिला पी.टी. उषा, ओलम्पिक पदक जीतने वाली पहली बैडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल, ओलम्पिक पदक जीतने वाली भारतीय महिला पहलवान साक्षी मलिक, रियो ओलम्पिक में क्वालीफाई करने वाली पहली महिला जिम्नास्ट दीपा करमाकर, पहली ऑटो-रिक्शा चालक शीला दावरे (जिसने 1988 में रूढ़िवादी मान्यताओं को ठुकराते हुए ऑटो-रिक्शा चलाना शुरू किया), मास्टर शेफ इंडिया जीतने वाली भारतीय पहली महिला पंकज भदौरिया, माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बछेन्द्री पाल, मिस अर्थ का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला निकोल फारिया, पैरालम्पिक खेलों में पहला पदक जीतने वाली भारतीय महिला दीपा मलिक, पहली महिला भारतीय क्रिकेटर मिताली (जिन्होंने छह हजार रन बनाए), द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाजी जा चुकी पहली भारतीय महिला क्रिकेट कोच सुनीता शर्मा, नकद रहित भुगतान कम्पनी की नींव डालने वाली पहली महिला उपासना टाकू, भारतीय सेना की पहली पैराट्रुपर एएमसी लेफिटनेट कर्नल सेवानिवृत्त जे. फरीदा रेहाना 1964 में शाामिल हुईं थीं। ये सभी क्या पर्दे या घूंघट में रहकर अपने कामों को बेहतर अंजाम तक पहुंचा पातीं?

इन सबके लिए अपने-अपने समय में संघर्ष की ये इबारतें लिखना बहुत आसान न रहा होगा। इन बेटियों ने हमारे देश का नाम रोशन यूं ही नहीं किया होगा। यूं ही उपलब्धियां प्राप्त नहीं की होंगी। बेशक इनमें उनके परिवारों का भी योगदान रहा होगा और  उनके परिवार के सदस्यों ने उनके पैरों में रूढ़ियों और परम्पराओं की बेड़ियां नहीं डाली होंगी। ऐसा भी नहीं है कि इन सबका इस मुकाम तक पहुंचना बहुत आसान रहा होगा। हमारे समाज में लड़कियों तथा महिलाओं के रास्ते में घर न सही मोहल्ले और समाज के नाम पर भी अनेकानेक रोड़े अटकाने वाले मिलते हैं तथा इन्हें घर न सही बाहर भी बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन हमारी बेटियां उस बेल की तरह होती हैं जो पतली टहनी का भी सहारा पाते ही ऊपर चढ़ती चली जाती हैं।

यह एक अच्छी पहल है कि हरियाणा में पहली बार एक खाप पंचायत ने महिलाओं से कहा है कि घर हो या बाहर, वे दशकों पुरानी घूंघट प्रथा को त्याग दें। राज्य की सबसे बड़ी खाप पंचायतों में से खासा प्रभाव रखने वाली मलिक गाथवाला खाप ने सोनीपत के कस्बे गोहाना में अपने एक पूर्वज की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में यह फैसला लिया। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक मलिक गाथवाला खाप के 66 वर्षीय प्रमुख मलिक ने कहा- ‘अब समय आ गया कि एक पुरानी परम्परा का अंत कर दिया जाए, जैसा कि आज वह प्रासंगिक नहीं रह गई।’

भास्कर न्यूज के मुताबिक प्रदेश में पंचायती राज्य संस्थाओं में महिलाओं के लिए पचास फीसदी आरक्षण लागू करने से गांवों के शासन में महिलाओं का खासा दबदबा दिखाई दिया। अधिकांश पंचायतों की बागडोर महिलाओं के हाथ में है। जिला प्रमुख से लेकर प्रधान, सरपंच और वार्ड पंच पदों पर भी पचास फीसदी आरक्षण से अधिक महिलाएं, घूंघट की आड़ से निकलकर गांवों के प्रशासन में अपना सिक्का जमाया तथा महिला सशक्तिकरण की अनूठी मिसाल कायम की है।

यद्यपि हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों तथा विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक स्थानों की विचारधारा अभी भी जैसी की तैसी ही बनी हुई है। यह विडम्बना ही है कि वहां की महिलाएं जब घर से नौकरी करने निकलती हैं तो लम्बा घूंघट किए हुए निकलती हैं और जब वह गांव से काफी दूर पहुंचती हैं तो अपना घूंघट उतार देती हैंं। इस तरह ऐसे क्षेत्रों की महिलाएं दोहरी ज़िंदगी जीने पर मजबूर होती हैं।

हालांकि हाल ही में मुझे एक बात जानकर बहुत खुशी हुई जब मेरी छोटी बहन ने अपने छोटे से कस्बे की एक बात बताई। उसने बताया कि उसके कस्बे की महिलाएं घूंघट परम्परा को निभाते हुए भी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। एक बात और आश्चर्य की यह है कि उसने यह भी बताया कि कई परिवारों में उन महिलाओं के परिवार वाले उच्च शिक्षा के खिलाफ हैं या वे नहीं चाहते कि उनके परिवारों की महिलाएं आगे बढ़ें। इसके बावजू़द वहां की महिलाएं हर हाल में अपनी शिक्षा तथा तरक्की के रास्ते खुद-ब-खुद तलाश रही हैं। ऐसे में उन महिलाओं का साहस, आत्मविश्वास तथा लगन देखकर बहुत तसल्ली होती है कि इन कुरीतियों के बावजूद भी उनका निरंतर आगे बढ़ने का जज़्बा उनमें कायम है। ऐसे में कहा जा सकता है कि कभी परम्पराओं के नाम पर तो कभी रीति-रिवाज़ और ढकोसलों के चलते महिलाओं को अब तक बहुत छला गया है। परन्तु अब स्त्री जाति को इन वाहियात प्रथाओं से मुक्ति हेतु अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। वह जागरूक हैं और अपने बारे में कोई भी निर्णय लेने में सक्षम भी। अत: उन्हें खुद ही घूंघट से बाहर निकलकर आगे बढ़ना होगा

This Post Has 5 Comments

  1. लेख अच्छा बना है, वेद सदैव समयाचीन हैं, जो तथाकथित परंपराएं रूढ़ियाँ बन चुकी हैं उनसे छुटकारा पाना ही वैदिक परंपरा है।

  2. Uttam

  3. उत्तम लेख…।

  4. बढियां लिखा

  5. Well written very informative article

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