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फिल्में, यद्यपि आती जाती रहती हैं फिर भी समाज से फैशन का रिश्ता कायम रहता है। समाज उसमें भी कुछ नया ढूंढ़ने की कोशिश करता है। फैशन को बढ़ाने में फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान है।

शादी की तैयारियों में सबसे महत्वपूर्ण काम याने कपड़ों की खरीददारी। शादी के दोनों पक्षों में यह चर्चा होती रहती है कि कपड़े कहां से खरीदना, नए फैशन के कौन से कपड़े बाजार में उपलब्ध हैं, वर्तमान में कौनसा ट्रेन्ड चल रहा है इ. इ.। और फिर किसी अच्छे मुहूर्त पर खरीददारी के लिए दुकान में पहुंचते ही विक्रेता आप पर जैसे तोप दागता है, ये देखिये ‘पद्माला’ स्टाइल, आजकल चलन में है, ‘ठग्स ऑफ हिन्दुस्थान’ ड्रेस की बहुत डिमांड है। आपको यदि मराठी सिनेमा अथवा सीरियल्स की फैशन चाहिए तो वह मटेरियल भी हमारे पास है। ‘ललित 205’ शीर्षक मराठी सीरियल की भैरवी की ड्रेस की बहुत डिमांड है… इ.इ.।

विक्रेता के मुंह से प्रकार की बातें सुनना किसी के लिए “कल्चरल शॉक” हो सकता है, तो किसी के लिए यह ‘अपेक्षित’ भी हो सकता है। सिनेमा (विशेषत: हिंदी) तथा उसके माध्यम से समाज में प्रचलित फैशन का बहुत पुराना रिश्ता है। समाज में वह इतना रूढ़ हो चुका है कि वह कल्पनाशक्ति के बाहर का लगता है।

सिनेमा के जन्म के साथ ही इस रिश्ते ने कब आकार ले लिया यह पता ही नहीं चला। सिनेमा के शुरूआती दौर में अधिकतर फिल्मों की कहानियां पौराणिक, ऐतिहासिक, संतों का जीवन-चरित्र एवं सामाजिक ढांचे पर आधारित हुआ करती थी। वैसे ही उस समय सिनेमा समाज को मनोरंजन के अलावा अन्य क्या-क्या दे रहा है इसका आकलन भी नहीं होता था। दिलीप कुमार, देवानंद तथा राज कपूर के बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव के कारण समाज भी अपने पसंदीदा हीरो का अंधानुकरण करने लगा। देव आनंद की हेयर स्टाइल, लोगों को ज्यादा आकर्षित करती थी। उस समय सहज एवं सस्ती फैशन वही थी। राज कपूर की ढ़ीली-ढाली पैंट तथा दिलीप कुमार की फुल शर्ट का आकर्षण भी लोगों में था। फिर भी उस समय तक फैशन के लिए सिनेमा देखने की मानसिकता नहीं थी। परंतु सलून में उस काल के सितारों की फोटो लगाने की पध्दति रूढ़ हो गई। ‘इस हीरो जैसी केशरचना की जाती है’ शायद यह संदेश फोटो लगाने के पीछे हुआ करता था। प्रसार माध्यमों के द्वारा कलाकारों की अभिनय प्रतिभा की खूब चर्चा होती थी।

राजेश खन्ना जब सुपर स्टार बने तब उनकी हेयर स्टाइल से लेकर उनके गुरू शर्ट तक समाज में रूढ़ हुए। प्रेक्षक उनकी फिल्में बार-बार देखने लगे ताकि यह देखा जा सके कि अभिनय के अलावा उनकी और किन-किन अदाओं को आत्मसात किया जा सकता है। उस पीढ़ी का राजेश खन्ना से बहुत लगाव था। परंतु अब कलाकारों के मूल्यांकन का तरीका भी बदल गया है।

1973 में बॉबी के प्रदर्शन के बाद सिनेमा की फैशन तथा समाज बहुत पास आ गए। राज कपूर ने रीलीज के पूर्व ‘बॉबी’ के प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी। बॉबी के पटकथा लेखक वसंत साठे और फिल्म के प्रचार प्रमुख ने ‘केम्पेन’ की तैयारी करते समय ही तात्कालिका नई पीढ़ी के लिए नया फैशन फंडा रूढ़ किया। उन्होंने ‘बाबी’ के नाम से कंघी से लेकर सभी प्रकार के सौंदर्य प्रसाधन एवं कपड़े बाजार में उपलब्ध कराए। इसमें भी ‘बाबी’ गर्ल डिम्पल कपाडिया के फिल्मों में पहने परिधानों की नकल भी बाजार में बहुत थी। फिल्म सुपर हिट होने के बाद तो बॉबी की फैशन रूढ़ होती गई और एक नया ट्रेंड सेट हो गया।

इसी काल में सिनेमा एवं फैशन को पूरक और कुछ कारणों से यह रिश्ता और आगे बढ़ा। ‘ये अभिनेत्रियां नहीं वरन् मॉडर्ल्स हैं” ऐसा मजाक में कहें या प्रशंसा में कहे ऐसी ज़ीनत अमान, परवीन बॉबी जैसी अभिनेत्रियां सिनेमा सृष्टि में आई एवं सफल हुई। प्रेक्षकों ने शायद यह तय ही कर लिया था कि फिल्म की कथा वस्त्र से लेकर संगीत तक सब में फैशन होनी ही चाहिए।

फिल्म एवं फैशन के रिश्तों का यह विलक्षण विस्तार था। रेखा इन सब में आयडल बनी।

रेखा ने घर, खुबसूरत, उमरावजान, आस्था जैसी अनेक फिल्मों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। परंतु इसी के साथ-साथ दर्शकों ने विविध फिल्मों में एवं पत्रिकाओं में उसके फोटो सेशन दोनों में उसका आकर्षक चेहरा भी देखा और बडे पैमाने पर उसे फॉलो भी किया। विशेषत: साड़ी और विविध प्रकार के मेकअप के सकारात्मक उपयोग के कारण उसके चाहने वालों की संख्या बेशुमार हो गई। अभिनय के साथ-साथ फैशन के लिए भी रेखा की फिल्में देखे जाते थे। विशेषत: महिलाओं में रेखा का विलक्षण ‘क्रेज़’ था और वह कायम रहा। उस क्रेज़ के कारण फैशन के चहेते हमेशा रेखा के दीवाने रहे। रेखा का ‘फिटनेस फंडा’ क्या था इसकी जानकारी कभी नहीं मिल सकी।

70 के दशक में हिंदी सिनेमा सृष्टि में अनेक परिवर्तनों मेें से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन याने फिल्मी रसिक फिल्मी सितारों की फैशन के अधिक करीब जाने लगे। फैशन से संबधित मासिक पत्रिकाएं निकलने लगीं। उनमें फिल्मी सितारों की फैशन पर उनके साथ इंटरव्यू प्रकाशित होने लगे। अब तो मॉडलिंग से सिने सृष्टि में भी आना शुरू हो गया था। आज का या आज की मॉडल कल की सिनेमा स्टार होगी यह बात समाज में रू़ढ़ हो गई। और इन सबके कारण ही सारा समाज इन मनोरंजन के माध्यमों एवं व्यावसायिक फैशन के साथ अधिक एकरूप हुआ।

स्टाइलिश चप्पल से लेकर कार तक फैशन आत्मसात की जाने लगी। फिल्में फैशन की गाइडलाइन बनने लगीं। वैसे यह सरल भी था। दर्शक वर्ग को अनिल कपूर की छोटे बालों की केशरचना या श्रॉफ की दाढ़ी की फैशन भी अच्छी लगने लगी। श्रीदेवी की बिंदिया या जयाप्रदा की साड़ी की फैशन तुरंत स्वीकार ली गई। राजश्री प्रोडक्शन के हम आपके हैं कौन (1994) की रिलीज के बाद तो पारिवारिक मनोरंजन का मानो भंडार ही खुल गया।

हमारे देश में वैश्वीकरण एवं खुली अर्थव्यवस्था की हवा बिलकुल नई थी। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वातावरण में बदलाव हो रहे थे एवं फैशन की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही थी। और, ठीक उसी समय “हम आपके हैं कौन” रिलीज हुई। पहले वह ‘लिबर्टी’ थिएयर में प्रदर्शित हुई। थिएटर की सजावट में इस सिनेमा में माधुरी द्वारा पहनी गई ओपन बॅक चोली से लेकर चूड़ियों तक अनेक वस्तुओं का समावेश था। मेरे जैसे समीक्षक जो परदे पर दिखाई जाने वाली विषय-वस्तु को अधिक महत्व देते हैं, यह बदलाव नकार नहीं सकते थे। फिल्में फैशन भी दिखाती है यह अच्छी तरह अधोरेखित हो रहा था। इस फिल्म की अपार सफलता के कारण फिल्मों में दिखाई गई अनेक बातों की फैशन समाज में स्वीकार की गई।

इस फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है किे इसने हमारी शादी परंपरा में अभूतपूर्व बदलाव कराया। शादी हमारे यहां की दीर्घकालीन परंपरा, संस्कृति की वाहक है। परंतु इस सिनेमा में उसने ‘ग्लैमर’ का तड़का लगाया। प्रारंभ में अमीर और ऊँचे तबके की युवतियों ने ओपन बॅक चोली की फैशन स्वीकार की। शादी समारोह में इस प्रकार के ड्रेस पहनने का रिवाज प्रारंभ हो गया। यह फैशन क्रेज बाद में मध्यम वर्ग ने भी स्वीकार की। इसके कारण सामाजिक डर भी कम हो गया। सिनेमा के फैशन को समाज ने कैसे स्वीकार किया इसका यदि चिंतन किया जाए तो ऐसे अनेक संदर्भ ध्यान में आते हैं।

नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में सभी प्रकार के फैशन को गति एवं प्रतिष्ठा प्रदान करने योग्य दो बडी घटनाएं हुई। ऐश्वर्या राय ‘मिसवर्ल्ड’ एवं सुष्मिता सेन ‘मिस यूनिवर्स’ चुनी गई। भारत भी विश्व के ये खिताब जीत सकता है, इस प्रकार की ब्यूटी हमारे देश में भी है, इसका प्रमाण मिला। फैशन समाज में दूर तक पहुंचने लगी। ऐश्वर्या राय एवं सुष्मिता सेन फिल्मों में भी आईं और ऐसा लगने लगा मानो फैशन भी सिनेमा में आ गया।

समाज में ‘गुड़ लुकिंग’ को बहुत महत्व है। पुरूषों को भी लगने लगा कि उनकी ‘बॉडी’ सलमान खान जैसी होना चाहिए। यह भी एक प्रकार से फैशन ही है। अब फैशन याने केवल कई प्रकार से बालों के श्रृंगार तक सीमित न रह कर जूतों से लेकर नई कार तक बहुत कुछ है, ऐसा समाज का ‘माइंड सेट’ डेवलप होता गया। लारा दत्ता, प्रियंका चोपड़ा, युक्ता मुखी, सेलिना जेटली भी विश्व सुंदरी  चुनी गईं एवं समाज बड़ी तेजी से फैशनोन्मुख होता गया। ये युवतियां भी फिल्मों मे आईं एवं जैसे फैशन को सपोर्ट सिस्टम मिल गया।

सभी स्तरों पर फिल्में एवं फैशन साथ-साथ चलने लगे। अमिताभ बच्चन से लेकर रणवीर कपूर तक लगभग सभी सुपर स्टार  विज्ञापनों में दिखाई देने लगे। सुभाष घई की ‘यादें’ में पटकथा के माध्यम से साइकिल इ. की ब्रांडिंग होने लगी। समाज को अनेक माध्यमों से फैशन प्राप्त होने लगी। समाप्त ने दीपिका पादुकोण के फैशनेबल ड्रेसेस की फैशन को स्वीकार कर लिया।

इधर, फिल्मों में भी कुछ बदलाव हुए। पचास एवं साठ के दशक हमें फिल्मों के टायटल्स में ‘ड्रेस डिपार्टमेंट’ देखने को मिलता था अर्थात कलाकारों के कपड़े सिलने वालों का विभाग। अब क्या देखने को मिलता है? फिल्मों का ड्रेस डिजाइनर तो होता ही है परंतु इसके अतिरिक्त बडे अभिनेताओं के खुद के ड्रेस डिजाइनर भी होते हैं। उसका काम उस अभिनेता के व्यक्तित्व और उस फिल्म में उसकी भूमिका में तालमेल बिठाना होता है। ‘राजा हिन्दुस्थानी’ (1996) में करिश्मा कपूर से यह ट्रेंड शुरू हुआ और जल्द ही रूढ़ हो गया।

जाने-अनजाने दर्शकों तक यह बातें पहुंचती ही रहती हैं। फिल्म देखते समय अनेक दर्शकों का ध्यान इस ओर रहता है कि इस फिल्म से कौनसी नई फैशन आत्मसात की जा सकती है, जैसे कि यहां उनकी मानसिक या भावात्मक जरूरत ही हो गई हो। ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘बाहुबली’, ‘पद्मावत’ जैसी महामनोरंजक फिल्में उसके लिए भरपूर फैशन खाद्य उपलब्ध कराते हैं। फिल्मों का इतिहास मालूम करते समय अनेक प्रकार के संदर्भ एवं अन्य बातें हम ध्यान में लेते हैं उसमें फैशन का एक बड़ा विश्व भी समाहित है। फिल्में, यद्यपि आती जाती रहती हैं फिर भी समाज से फैशन का रिश्ता कायम रहता है। समाज उसमें भी कुछ नया ढूंढ़ने की कोशिश करता है।

 

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