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सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर के भौगोलिक एवं सभ्यता की दृष्टि से वर्तमान में चार भाग हैं- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख व पाक- अधिक्रांत कश्मीर। वैसे तो चीन-अधिक्रांत लद्दाख भी जम्मू-कश्मीर का एक भू-भाग है। इन सब क्षेत्रों की परिस्थितियां, रचना व समाज-जीवन भिन्न है। समस्या का रूप भी भिन्न है। इसलिए निदान भी वहां की आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए और होगा।

आतंकवाद का समाधान
समस्या समाधान के लिए कुछ सिध्दांत, जो अलग-अलग क्षेत्र की परिस्थिति में से उभरते हैं- एक-आतंकवाद के पीछे कौन हैं, कैसी उनकी सोच व योजनाएं हैं यह स्पष्ट होना आवश्यक है। दो-आम समाज की आतंकवादियों से दूरी अर्थात जनता से उसे प्रश्रय न मिले। तीन- आम समाज की आतंकवादियों से सुरक्षा का भाव। चार- आर्थिक क्षतिपूर्ति की पर्याप्त व्यवस्था। पांच- देश भर में एकता व अखण्डता को बनाए रखने हेतु संघर्ष व बलिदान का भाव। छह- दुष्ट व दुश्मन को सरकार की राजनैतिक दृढ़ इच्छाशक्ति की स्पष्ट झलक होना अर्थात उसकी मारक-क्षमता व भय। सात- विदेशियों की चाल को नंगा करना। आठ- दण्ड व वार्ता दोनों का उद्देश्य आतंकवाद व अलगाववाद में फंसे युवकों को राष्ट्र के विकास, शांति व सुरक्षा की मुख्य धारा में लाना। नौ- वोट-बैंक राजनीति के दलदल से नेताओं को ऊपर उठाना। ऐसी अनेक बातों को ध्यान में रख कर अनेक पर्यायी योजनाओं व कार्यक्रमों ने जन्म लिया।

तीर्थाटन
आतंकवाद की समस्या का समाधान केवल सरकार-आश्रित नहीं; वरन समाज-आश्रित भी है। समाज के गैर-राजनीतिक नेतृत्व की यह सोच होना महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर प्रांत में जो महत्वपूर्ण धार्मिक व ऐतिहासिक स्थल हैं, उनकी यात्राओं का प्रारूप बना जाति, दल, पंथ, मजहब, भाषा व प्रांत से ऊपर उठ कर इन तीर्थों व यात्राओं को देशव्यापी राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया जाए। इसके अंतर्गत पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में कृष्णगंगा किनारे स्थित मां शारदा तीर्थ, कश्मीर घाटी में बाबा अमरनाथ-यात्रा व क्षीरभवानी मेला, लद्दाख में सिंधु नदी का स्नान व मेला, जम्मू-क्षेत्र के राजौरी-पुंछ में बूढ़ा अमरनाथ तथा डोडा जिले में मचेल माता, श्री सरथल मां के साथ-साथ माता वैष्णो देवी व आसपास के तीर्थों की यात्राओं को अधिकाधिक प्रभावी बनाया जाए। कुछ तीर्थ पहले से ही प्रसिध्द एवं जाग्रत हैं; कुछ को देश-भर में जाग्रत करना होना। तीर्थ यात्राओं का प्रारूप बना और उस योजना पर कार्य करने से जो प्रभावी एवं चमत्कारी परिणाम प्राप्त हुए, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
बाबा अमरनाथ-यात्रा
सैकडों वर्षों से यह यात्रा प्रचलित है। ज्येष्ठ पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा अर्थात रक्षाबंधन तक इस यात्रा का दो मास तक का प्रभावी समय है। सन १९९६ में प्रारंभ भयानक आतंकवाद के समय यह यात्रा, सन १९९४ तक लाखों यात्रियों से घटते-घटते पन्द्रह-बीस हजार में बदल गई। कश्मीर घाटी में भी पर्यटक-संख्या इन वर्षों में लाखों से घट कर हजारों में रह गई। कारण स्पष्ट था, ‘सुरक्षा’ का घोर संकट। प्रति दिन ही खून की होली खेली जा रही थी। घाटी हिन्दूविहीन हो रही थी। लगने लगा था कि अब यात्रा भी दम तोड़ देगी तथा बाबा अमरनाथ तीर्थ कहीं पराया तो नहीं हो जाएगा? छड़ी मुबारक के कश्मीर घाटी के श्रीनगर में स्थित दशनामी अखाड़े व प्रत्यक्ष तीर्थयात्रियों पर आतंकी हमले हो चुके थे। इस आतंक व अंधकार को दूर करने हेतु बाबा अमरनाथ-यात्रा में आशा की किरण दिखाई दी। इस यात्रा द्वारा कश्मीर में पर्यटक बढ़ाने, स्थानीय जनता की बिगड़ती आर्थिक स्थिति सुधारने, देश की जनता में कश्मीर के एक-एक इंच के लिए जूझने का भाव, आतंकियों व उनके पीछे की ताकतों को स्पष्ट संकेत- ‘‘जान देंगे जमीन नहीं देंगे’’ का संकल्प, सन १९९९ में विहिंप की युवा शाखा बजरंग दल ने लिया और देश भर का आवाहन किया ‘चलो अमरनाथ’। ‘जय बाबा’, ‘जय अमरनाथ’ के नारे गूंज उठे। लोग लाखों की संख्या में जाति, दल, सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर मातृभूमि व प्रभु भक्ति से ओतप्रोत मौत की परवाह न करते हुए चल पड़े। उस समय प्रकृति ने भी बर्फानी तूफान के साथ भक्तों की परीक्षा ली। कहते हैं ‘प्रकृति भगवान है, भगवान प्रकृति में हैं।’ अजीब उमंग थी। युवक, बुजुर्ग, महिला, पुरुष सब चले हैं साक्षात मौत को ललकारते, आतंकवादियों के हमले-धमकियां, सरकार की ढीली-ढाली मनोशक्ति, समाज यानी यात्रियों का निहत्थे होना, तथाकथित सेक्युलरिस्ट व मानवाधिकारी दलों द्वारा इस आव्हान का विरोध करना; परंतु संघ-परिवार के साथ-साथ सेना के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों को इस यात्रा के आव्हान में एक नया सवेरा नजर आया।
कश्मीर में सर्वसाधारण मुसलमानों को भी लगा कि रोटी, रोजगार एवं खुशियां लौट सकती हैं। हिन्दू समाज को लगा पलायन रुकेगा तथा आतंकवाद मरेगा। आई.एस.आई. पाकिस्तान का सात वर्ष की बर्बादी का समय सबके सामने था। योजना बनी, प्रशासन व सेना पर सुरक्षा एवं व्यवस्था के लिए दबाव बना। संघ-परिवार में से विशेष रूप से विहिंप व उसकी युवा शाखा बजरंग दल के साथ-साथ धर्मयात्रा महासंघ के प्रमुख श्री मांगेराम जी आदि लोग जम्मू व काश्मीर घाटी पहुंच गए। सरकारी तंत्र से वार्ताओं के दौर चले। अन्य अनेक राजनैतिक दलों के विरोध के बावजूद भाजपा यात्रा के साथ डट कर खड़ी रही।
समाज व सेना के प्रयत्नों से धीरे-धीरे आतंकवाद दम तोड़ रहा है। कश्मीर घाटी में जनता के मन में शांति व खुशहाली की ललक बढ़ी है। देश की जनता की इच्छशक्ति, राजनीति को भी ताकत देने वाली सिध्द हुई। कश्मीर में पर्यटक बढ़ने लगे। रात्रि में डल के किनारे पुन: जगमगाने लगे। कश्मीर में जीने की इच्छा दिखाई देने लगी। जिस हिन्दुस्थान, भारत, इण्डिया पर कीचड़ पोत दिया गया था, वह फिर चमकने लगा। इसके कारण कश्मीर घाटी में करोड़ों का व्यापार पुन: लौट आया। आज इस यात्रा में भक्तों की संख्या ४-५ लाख से अधिक हो गई है। काश्मीर घाटी में पुन: पर्यटक-संख्या ६-७ लाख से अधिक हो गई है। आम आदमी को रोटी-रोजगार मिलने लगा। बाबा अमरनाथ रोटी व मुस्कराहट दे रहे हैं। आतंकी व पाकिस्तान रोटी व खुशियां छीन रहे हैं। यह दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। देखने के लिए चश्मा व नजर ठीक चाहिए। कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को पुन: लौटने की आशा पनपने लगी।
क्षीर भवानी मेला
ज्येष्ठ मास की अष्टमी पर श्रीनगर से ३० कि.मी. दूर तूलमुल में स्थित मां क्षीर भवानी का मेला लगता है। स्वामी विवेकानंद के जीवन के अंतिम पड़ाव की मार्गदर्शिका, जहां स्वामी जी को मां के लिए सर्वस्व अर्पण अर्थात उसकी रक्षा नहीं; बल्कि वह तो पालक, रक्षक व जननी है, उसके मार्ग पर चल, दुष्ट-दलन के ज्ञान का प्रकाश मिला।
संक्षिप्त में मां की कश्मीर में आने की कथा इस प्रकार से है। रामायण काल में लंका शासन में व्याप्त व्यभिचार व आतंकी वातावरण के कारण लंका की रक्षा छोड़ मां ने कश्मीर में स्थापित होने का कार्य स्वयं हनुमान जी से सम्पन्न करवाया था। ऐसा है यह मां का ऊर्जावान स्थान। हजारों-लाखों कश्मीरी पण्डितों के साथ-साथ अन्य प्रांतों के भी सैकड़ों-हजारों लोग इस स्थान पर एकत्र होते हैं। आतंकयादी हमलों से नृशंस हत्याएं प्रत्यक्ष तीर्थ पर हमला, जिसके कारण से प्राय: कश्मीरी पण्डितों के साथ-साथ भारतपंथी जनता का लाखों में कश्मीर घाटी से पलायन हो चुका था। सन १९९० के पश्चात एक बार ऐसा लगने लगा था कि कश्मीर घाटी हिन्दूविहीन हो गई है। ऐसे घोर संकट के समय संघ व समाज के प्रयत्नों के कारण विवेकानन्द केन्द्र (कन्याकुमारी) अनंतनाग, संजीवनी शारदा केंन्द्र, जम्मू (कश्मीरी विस्थापित संस्था), कश्मीर घाटी में प्रदेश सरकार में सरकारी कश्मीर हिन्दू संस्था व अर्ध्दसैनिक बल के मन में इस तीर्थ को पुन:जाग्रत करने का भाव पैदा हुआ। सन १९९० से १९९९ तक क्षीर भवानी मेले में जाने वालों की संख्या सैकड़ों में रह गई थी। लेखक को अपने साथियों के साथ कश्मीर घाटी में आतंकवाद के क्रूर समय में पुन:सन १९९५ में मां के दर्शन व पूजा का सौभाग्य मिला।
अर्ध्दसैनिक बलों द्वारा ही नित्य के सभी कर्म किए जा रहे थे। उस समय वहां की विस्तृत जानकारी मिली और १९९७-९८ में प्रशासन द्वारा ऊपर वर्णित सभी संस्थाओं का सहयोग करते हुए, संघ ने भी ज्येष्ठ अष्टमी पर ‘क्षीर भवानी मां के दर्शन-पूजन हेतु श्रीनगर (कश्मीर) चलो’ यह प्रचार विशेष रूप से देश-भर में बिखरे कश्मीरी पण्डितों ने किया। अनेक कठिनाइयां सामने आईं। कश्मीरी पण्डित भी स्वाभाविक रूप से असमंजस में थे; परन्तु उनमें कश्मीर घाटी में जाने, देखने व मां के चरणों की पूजा कर अपने कर्तव्य को करने की इच्छा बलवती थी। इन संस्थाओं नें लंगर लगाए। प्रशासन व अर्ध्दसैनिक बलों ने व्यवस्था व प्रचार भी किया। अपने चेहरे को लोकतंत्रवादी दिखाने के लिए राजनैतिक कट्टरपंथियों ने भी कश्मीरी पण्डितों को मेले व पूजा के लिए आने हेतु आव्हान किया। स्थानीय मुस्लिमों को मेले के कारण कमाई होगी व पड़ोसियों की रक्षा न कर सकने का दाग मिटेगा- यह एहसास हुआ। आज देश भर से हजारों कश्मीरी व अन्य लोग एक दिन के लिए नहीं; बल्कि अनेक दिनों के लिए मां क्षीर भवानी जाने लगे हैं। वर्ष भर में हिन्दू पर्यटकों का भी अब क्षीर भवानी दर्शनार्थ जाना होने लगा है। स्थानीय जनता के चेहरे पर खुशियां लौटीं, कश्मीरी पण्डितों में यह पहले से था ही- ‘कश्मीर जाना है।’ अब एक कदम आगे बढ़ा व घाटी आने-जाने लगे तथा अपने घरों को देखने लगे। केन्द्र व प्रदेश सरकार इस अनबूझ पहेली का कि कश्मीरी पण्डितों, डोगरो व सिखों सहित सभी हिन्दुओं को घाटी में बसाने का कैसे समाधान करेगी? इस यात्रा व मेले के सतत विस्तृत होते स्वरूप से षड्यंत्रकारी ताकतों को ध्यान में आ गया है कि कश्मीर हिन्दुस्थान में था, है और रहेगा। कश्मीरी पण्डित के बिना कश्मीरियत अधूरी है ।

सिंधु दर्शन, पूजन व स्नान यात्रा
संघ अधिकारियों का पिछले ३५-४० वर्षों से लद्दाख में जाना जारी था। सन १९८३ में जम्मू-कश्मीर का दायित्व आने के पश्चात लेखक का सन १९८७ से प्रत्येक वर्ष लद्दाख पहुंचना, लद्दाखियों से संवाद व लद्दाख के अध्ययन का रहा है। ध्यान में आया सैकड़ों वर्ष पूर्व वहां का जनजीवन धीरे-धीरे शैव मतावलम्बी से बौध्द मतावलम्बी हो गया। उसके पश्चात खाड़ी देशों से उठी इस्ताम मजहब की आंधी ने आज से ६००-८०० वर्ष पूर्व हिमालय में पांव पसारने प्रारंभ किए, तब लद्दाख की एक बड़ी जनसंख्या इस्लाम के रंग में रंग गई। आज लद्दाख के दो जिलों में से करगिल मुस्लिम-बहुत है, लेह-बौध्द-बहुल है, इसमें आज भी कुछ जनसंख्या शैव मत वालों व प्रकृति पूजा वालों की भी मिलती है। सिंधु नदी के उद्गम स्थल को ‘सिंधे’ कहते हैं।
सन १९४७ के विभाजन व जम्मू-काश्मीर के ४९ प्रतिशत भू-भाग पर पाक कब्जे के बावजूद १५० कि.मी. से अधिक सिंधु नदी भारत में ही बह रही है। सिंधु से ही इस भारतवर्ष की पहचान हिन्दुस्तान व हिन्दू मानी जाती है। लद्दाख अति दुर्गम क्षेत्र है, जिसका एक बड़ा भाग बर्फ से ढंका रहता है। यह ७,००० से २४,००० फीट की ऊंचाई के बीच प्राणवायु की कमी का क्षेत्र है। सन १९६२ में चीन ने आक्रमण कर ३७,५५५ वर्ग कि.मी. के लगभग अक्साई चिन के नाम से लद्दाख के भूभाग पर कब्जा कर लिया है। लद्दाख के लोग दूर दुर्गम क्षेत्र में, जहां पहुंचने में कई दिन और महीने लगते थे, राष्ट्रीय मुख्य धारा के साथ जुड़ने को लालायित रहे हैं। उनकी देशभक्ति असंदिग्ध रही है। सन १९५०-५१ में स्वतंत्र भारत के संविधान में जम्मू-कश्मीर प्रदेश को अलगाववादी अनुच्छेद ३७० के अंतर्गत विशेष दर्जा व सुविधाएं दी जा रही थीं। उस समय से लद्दाक के बौध्दों ने सन १९५४ में एलबीए के तत्वावधान में तत्कालीन प्रधान मंत्री पं.नेहरू को पत्र लिखा था कि नवजात बालक चिल्ला-चिल्ला कर आंखों में आंसू भर मां को निहार रहा है और कह रहा है कि मां मुझे गोद में ले लो; परंतु लद्दाख का भारत में पूर्ण विलय करने की बजाय भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लद्दाख को कश्मीर की कट्टरपंथी व अलगाववादी भट्ठी में झोंक दिया और लद्दाख उस घोर पीड़ा को आज भी सह रहा है; परंतु इस अपमानपूर्ण पीड़ा के बावजूद लद्दाखियों में दिल्ली के प्रति अलगाववाद व हिंसा का स्वर नहीं उभरा।
वर्तमान में लद्दाख का क्षेत्रफल ५९-६० हजार वर्ग कि. मी. व जनसंख्या २ लाख ७५ हजार के लगभग है। लद्दाख में विदेशी-पर्यटक तो बहुत आते हैं; परंतु भारतीय पर्यटक नगण्य ही हैं। लद्दाख में सिंधु नदी बह रही हैं, इसके बारे में स्वयं भारत के उप प्रधान मंत्री रहे श्री लालकृष्ण आडवाणी कहते हैं कि जब चुनाब के सिलसिले में मैं लद्दाख में ठहरा, तब गेस्ट हाउस के पीछे बहती नदी के बारे में पूछने पर पता चला कि यह सिंधु नदी है और वे नंगे पांव ही प्रणाम करने व जल छूने के लिए दौड़ पड़े। यह इस बात का द्योतक है कि आम भारतीय को अपनी मुख्य पहचान जिससे है, उसके बारे में कितना ज्ञान होगा? लद्दाखी चेहरे व वेश-भूषा को दिल्ली व अन्य प्रांतों में देखा वहां के लोग कई बार यह तक समझ बैठते हैं कि यह चीनी है। कश्मीरी शासकों के भेदभावपूर्ण रवैये में लद्दाखी बुरी तरह पिस रहा है। लद्दाख वर्तमान में चीन, पाक व यूरोप की गुप्तचर एजेंसियों का अड्डा बन रहा है। सिंधु हिन्दुस्तान में है, सिंधु हिन्दुस्तान में थी; सिंधु आज भी भारत के राष्ट्रगान में है और यही सिंधु लद्दाख की जीवन रेखा है। सिंधुकेन्द्रित दर्शन व मेले का एक प्रारूप जम्मू-कश्मीर के कार्यकर्ताओं ने तैयार किया, जिसका उद्देश्य था मतान्तरण रोकना, लद्दाखियों एवं शेष भारतीयों का एक-दूसरे से समरस होना, लद्दाख की समृध्दि देश भर में एक-एक इंच भूमि के प्रति प्यार जागे, वैदिक-बौध्द समन्वय आदि ऐसा बहुउद्देशीय प्रारूप तैयार किया गया।
सन १९९९ जुलाई मास में अंततोगत्वा बौध्दों को यह समझाने में हमें प्रत्यक्ष सफलता मिली कि यात्रा के कारण लाखों करोड़ों का व्यापार बढ़ा है। वैदिक बौध्द समन्वय विचार सम्मेलनों ने नई ऊर्जा प्रदान की है। लद्दाखियों को अखिल भारतीय दृश्य में स्थान मिला है। करगिल युध्द के क्षेत्रों में हुतात्मा सैनिकों व परिवारों को अद्वितीय सम्मान मिला। सेना द्वारा व्यवस्था से सैनिकों को गौरव प्राप्त हुआ है। बौध्द पहचान सुरक्षित है, उसको लेशमात्र भी चोट नहीं पहुंची। देश में एकता मजबूत हो रही है। लेह व आसपास के क्षेत्रों में विकास कार्य प्रारंभ हो गए हैं। गोम्पाओं में भारतीय दर्शनार्थी श्रध्दा से जाने लगे। तत्कालीन पू. सरसंघचालक सुदर्शन जी (अब दिवंगत) मा. मोहन भागवत, रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाण्डीज, स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी, स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी, संत युधिष्ठिरलाल जी, श्री प्रेम कुमार धूमल, डॉ. फारुख अब्दुल्ला, राष्ट्र सेविका समिति संचालिका प्रमिला ताई, श्रीमती वसुंधरा राजे व देश के अनेक मूर्धन्य नाम इस यात्रा को शोभायमान कर चुके हैं। अनेक बौध्द, सिक्ख विद्वान भी इस यात्रा में भागीदारी कर चुके हैं।
सन २००४ आया, राष्ट्रीय जनतांत्रिक के गठबंधन से सरकारी बदल गई। यूपीए के रूप में कांग्रेस कम्युनिस्टों के सहयोग से सत्तासीन हुई। उन्हें अर्थात केन्द्र की नई सरकार को इस यात्रा में राजनैतिक द्वेष के कारण साम्प्रदायिकता की दुर्गंध आने लगी। उन्होंने सन २००५ में लगभग इस यात्रा का गला घोंट दिया और यात्रा अवरुध्द होकर मृतप्राय होने जा रही थी। सच है कि राजनीति तोड़ती है, संस्कृति जोड़ती है, यह कहावत यथार्थ दिखने लगी। स्वयं लद्दाख के लोग केन्द्र सरकार के रवैये से सख्य नाराज थे। सिंधी समाज व हिमालय परिवार ने मिलकर तुरंत सिंधु दर्शन यात्रा समिति का गठन किया। धर्मयात्री महासंघ ने अपना समर्थन दिया। गैरसरकारी आधार पर ही यात्राएं विकसित होने की दबी इच्छा प्रकट की। लेखक निर्णय-प्रक्रिया में सम्मिलित हुआ। सिंधी समाज को हौसला व हिम्मत दी और मृतप्राय होती यात्रा जीवंत हो उठी। १८ जून, २००५ को श्री मुरलीधर मखीजा एवं भूपेन्द्र कंसल के नेतृत्व में दिल्ली से बसों तथा छोटी गाड़ियों व हवाई मार्ग से यात्री सिंधु-दर्शन व स्नान हेतु लेह पहुंच गए। समाज ने निर्णय किया कि इस वर्ष से यहां यात्रा समाज व धर्म के नाते गैरसरकारी रूप में प्रति वर्ष २३-२४-२५ जून को होगी। तीन दिन का सिंधु-उत्सव (मेला व स्नान) का कार्यक्रम रहेगा। प्रति वर्ष लेह प्रशासन, धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं ने यात्रियों का भरपूर स्वागत व सहयोग किया। केन्द्र सरकार के द्वारा सतत बाधा पहुंचाने तथा प्रदेश सरकार की उपेक्षा के बावजूद यह यात्रा सफलता की ऊंचाइयों को छूने लगी। सरकार ने तो सरकारी ‘सिंधे रुब्ब’ नाम से मेले का अलग से जून मास में आयोजन भी प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे सरकारी आयोजन फलने-फूलने लगा। अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त हो रहा है। अब तो मिशन के रूप में विशाल ‘सिंधु भवन’ साकार रूप ले रहा है। यह जनता की भरपूर मदद से संभव हुआ है।

बूढ़ा अमरनाथ (पुंछ-राजौरी) यात्रा
जम्मू प्रदेश के राजौरी, पुंछ जिले पाकिस्तान से सटे हैं तथा पीरपंजाल पर्वत श्रेणी पार करते ही कश्मीर घाटी है। पुंछ ८८ प्रतिशत व राजौरी की पुंछ जिले से लगती दो तहसीलें ६२ प्रतिशतं मुस्लिम-बहुत है। जम्मू से सड़क मार्ग से राजौरी शहर पार करने के पश्चात राजौरी से पुंछ तक लगभग ६० कि.मी. लम्बा मार्ग (जबकि जम्मू से राजौरी तक का १५० कि.मी लम्बा मार्ग हिन्दू-बहुत क्षेत्र है) दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है, पानी (नदी नाले) होने के कारण हरा-भरा है; परन्तु इस समय घोर आतंकवाद-ग्रस्त है। अनेक सामूहिक अमानवीय हिंसा की घटनाओं (आंखें निकालना, स्तन काटना, गला रेत कर मारना आदि) को आतंकवादी साकार रूप दे चुके थे। १०-१२ प्रतिशत हिन्दू इस क्रूर आतंकवाद और भयग्रस्त माहौल में भी डट कर रहने की मानसिकता में हैं; परंतु धीरे-धीरे माहौल में पलायन का भाव घर करने लगा। मुसलमानों में भी कुछ संख्या ऐसी दिखाई देने लगी जो बहू-बेटी की इज्जत व स्वयं की रक्षा हेतु पलायन करने लगा। जीवन जीना दूभर होने लगा। ऐसे में भगवान शिव ने भक्तों को संकेत किया और संघ परिवार के कार्यकर्ताओं को पुंछ जिले के ग्राम मण्डी लोरन में स्थित बूढ़ा अमरनाथ में आशा की किरण दिखाई दी। इस तीर्थ की देखभाल पुंछ की सनातन धर्म सभा के साथ वर्तमान में सेना भी कर रही है। स्थानीय हिन्दू भारी संख्या में तथा कुछ-कुछ स्थानीय मुस्लिम भी पूजा हेतु मंदिर में जाते हैं; परंतु कुछ कट्टरपंथियों के निशाने पर यह तीर्थ है, ऐसे समाचार भी मिलते रहते थे।
पुंछ, महाबली रावण के नाती पुलस्त्य ऋषि की साधना व शोध-स्थली मानी जाती है। पुलस्त्य का अपभ्रंश धीरे-धीरे पुंछ बोला जाने लगा। पुलस्त्य ऋषि प्रति मास बाबा अमरनाथ के दर्शन व जलाभिषेक हेतु जाते थे। जब वे वृध्द हो गए तथा बाबा अमरनाथ गुफा तक जाना कठिन होने लगा, तब उन्होंने जीवनपर्यंत पूजा हेतु भगवान शिव से अपने पास आने की प्रार्थना की। लोककथा है कि भगवान शिव वर्तमान मंदिर के स्थान पर पुंछ के इलाके में प्रकट हुए। आज उसी को ‘बूढ़ा अमरनाथ’ पुकारने लगे हैं। जम्मू-क्षेत्र में इस तीर्थ का प्रचार प्रत्यक्ष स्वयंसेवकों के साथ-साथ सनातन धर्मसभा, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल व संघ-परिवार के विविध कार्यों ने करना प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी। सेना व प्रशासन ने व्यवस्थाओं को बढ़ाना व अच्छा करना प्रारंभ कर दिया।
सन २००५ में बजरंग दल के आव्हान पर अगस्त मास में २५ से ३० हजार के लगभग प्रदेश व देश भर से यात्री बूढ़ा अमरनाथ के दर्शनार्थ गए। इस वर्ष से इस यात्रा को भी अखिल भारतीय स्वरूप मिल गया। जमीन से जुड़ी जानकारी मिली कि पिछले १५ वर्ष में पाकिस्तान व आतंकवाद ने राजौरी, पुंछ के इस इलाके के निवासियों को मौत का भय, गरीबी दी, उनसे तो अच्छे भगवान शिव व हिन्दू हैं, जिन्होंने इस दलदल में से निकलने का मार्ग दिखाया। प्रशासन के हौसले बुलन्द हुए। सेना में ताजगी आई। आतंकी का भय जनता में टूटा। एक नई आशा दिखाई देने लगी। जम्मू से सात-आठ घण्टे की सड़क यात्रा की दूरी पर यह तीर्थ स्थित है। अब तो पूरा वर्ष यात्री जाने लगे हैं। पूरा क्षेत्र शिव के जयघोष से गूंजने लगा है। जम्मू से पुंछ जाते समय मार्ग के तीर्थ अखनूर, मंगला माता, पीर बडेसर आदि दूरस्थ क्षेंत्रों में भी यात्री जाने लगे हैं।

मां वैष्णों के आसपास के तीर्थों का विकास
श्री जगमोहन प्रथम बार १९८६ तथा दूसरी बार जनवरी १९९० में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बन कर आए। उन्होंने मां वैष्णो देवी तीर्थ का अधिग्रहण कर उसके विकास की योजना ही बनाई; बल्कि उसे अति व्यवस्थित धार्मिक स्वरूप प्रदान किया। यात्रियों की संख्या बढ़ी। ऊधमपुर जिले की रियासी तहसील में कटरा कस्बे से १३ कि.मी. पैदाल चल कर त्रिकूट पर्वत पर मां अपने भव्य रूप में विराजती हैं। यह क्षेत्र भी दो ओर से आतंकवादी गतिविधियों के अति निकट है और उनके निशाने पर भी है।
लेखक तथा अन्य अनेक बंधुओं ने श्री जगमोहन से मां के भवन से ६०-७० कि.मी. तक की दूरी तक चारों ओर के कई ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों के विकास के बारे में व्यापक रूप में उभरी। जगमोहन जी की दूरदृष्टि ने सब कुछ भोप लिया और कुछ ही समय में कटरा में शंकराचार्य पहाड़ी, देवा माई, बाबा जितो, रियासी में जनरल जोरावर सिंह का किला, शिव खोड़ी अर्थात भगवान शिव गुफा, ऊधमपुर में देवका, चनैनी से आगे शुध्दमहादेव व मानतलाई, जम्मू का मोहमाया आदि मंदिरों ने भव्य स्वरूप प्राप्त कर लिया। मॉं वैष्णों के दर्शनार्थ आने वाले लाखों यात्रियों में से हजारों से बढ़ते-बढ़ते कुछ लाख अब इन सभी तीर्थों पर भी जाने लगे हैं। ये सभी तीर्थ प्राय: हिन्दू-बहुल क्षेत्र में हैं। इन तीर्थों के विकास के कारण इन क्षेत्रों पर-विभिन्न प्रकार से क्या प्रभाव पड़ा है, यह अध्ययन करने की आवश्यकता है।
माता वैष्णो यात्रा तो जम्मू क्षेत्र की आत्मा है, जीवन रेखा है। प्रति वर्ष अरबों-खरबों का व्यापार देती है। सुरक्षा व संवर्ध्दन प्रदान करती है। सच कहा है ‘भक्ति में शक्ति है।’ कटरा में संघ-प्रेरणा से ‘माता वैष्णो लोक संस्थान’ द्वारा केशव आश्रम धर्मशाला का निर्माण मां के भक्तों द्वारा हो चुका है और अब जम्मू में ‘त्रिकुटा यात्री निवास’ का निर्माण हो रहा है। अनेक सेवा व धर्मकार्यों में यह संस्थान सहयोग कर रहा है। इस सारे क्षेत्र में ‘‘हम अलग-अलग पंथ के लोग साझे पूर्वजों की संतान’’ का सत्य गूंजने लगा है। आज भी अनेक मुस्लिम परिवारों के लिए मां वैष्णो कुलदेवी है।
मां शारदा तीर्थ
इस तीर्थ की महिमा अनंत है। कृष्णगंगा के संगम पर मुजफ्फराबाद जिले में स्थित यह स्थान कभी विशाल विश्वविद्यालय रहा है। इतिहास व धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है। समुद्र-मंथन से निकले चौदह रत्नों में एक अमृत-कलश था। अमृत का देवताओं में वितरण हुआ। एक राक्षस ने धोखे से अमृत पान किया। वह सुदर्शन-चक्र की महिमा के कारण राहु-केतु में बदल गया। उस अमृत कलश को लेकर देव-दानव में सतत संघर्ष को समाप्त करने के लिए प्रभु याने त्रिदेव देवी उत्पत्ति की, जिसे मां शारदा के नाम से जानते हैं। मां ने ‘अमृत कलश’ धारण किया और प्रत्यक्ष में सदैव के लिए लोप हो गई। इसी स्थान को ज्ञान-तीर्थ कहते हैं; क्योंकि अमरता का एक प्रतीक ज्ञान है ।
विश्व भर से छात्र नाना विषयों के अध्ययन व शोध के लिए यहां आते थे। कालक्रम में इसका लोप हुआ; परंतु कश्मीर वासी ही नहीं, भारत व पृथ्वी वासी इस तीर्थ पर रहते थे। राष्ट्र के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन को समाप्त कर अखण्डता को प्राप्त करना तथा तीर्थ को पुन:जाग्रत करने के मां के संकेत ने जम्मू-कश्मीर विचार मंच, संजीवनी शारदा केन्द्र, राष्ट्र सेविका समिति व अन्य संस्थाओं को प्रेरित किया। मां शारदा तीर्थ पर साहित्य तैयार हुआ। तीर्थ-मुक्ति हेतु समिति का गठन हुआ। हजारों-लाखों के हस्ताक्षर हुए। साहित्य वितरित हुआ। पू, स्वामी राजराजेश्वरम, श्री आचार्य गिरिराज किशोर, स्वयं लेखक व अन्य धार्मिक महापुरुषों के नेतृत्व में सन २००० में जम्मू नगर में एक विशाल कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

 

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