विद्यालयों में नेचर क्लब

प्रकृति मानव की सुरम्य स्थली है। प्रकृति से मानव को सभी प्रकार की सुख सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। प्राकृतिक वातावरण में रहनेवाले व्यक्ति स्वस्थ और हृष्ट पुष्ट होते हैं। ज्यों-ज्यों हम प्रकृति से दूर जाते हैं हमारा जीवन उतना ही कष्टमय होता जा रहा है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा है- प्रकृति वह मां है जिसकी गोद में ही बालक शोभा पाता है। अतएव प्रकृति को प्रदूषण से रहित बनाये रखना अत्यन्त आवश्यक है। प्रकृति के बीच रहकर प्रकृति को हानि पहुंचाना स्वयं की हानि है। विद्यालयों को आचरणालय बनाना है तो हर स्कूल में ‘नेचर क्लब’ शुरू करें।

नेचर क्लबों में पांच बातें विशेष रूप से समझाएं।

(1) प्रकृति की रक्षा करो।
(2) पेड़ लगओ, पेड़ बचाओ, जंगल मत काटो, बिजली बचाओ।
(3) यह भूमि पवित्र है इस पर थूक कर अपवित्र मत बनाओ। कागज कूड़ा-कचरा जमीन पर मत फेंको।
(4) पानी की हर बूंद की रक्षा करो, पानी ही जीवन है।
(5) शांति बनाए रखो। शोर मत करो।

ये पांच बातें नेचर क्लब में आसानी से समझायी जा सकती हैं।

बच्चों को प्रकृति में रहने का सच्चा अर्थ समझाया जाय। प्रकृति में रहने का अर्थ है जीवन में समाए हुए वैषम्य, प्रमाद, विरोध, वैर, हिंसाभाव क्रूरता आदि विकारों से परे होकर समता, अप्रमाद, मैत्रीभाव, अहिंसा, दया आदि मूल गुणों को स्वीकार करना। प्रकृति सुन्दर ही नहीं प्रेरक भी होती है। प्रकृति का हर तेवर काम का है। लू का अपना उपयोग, धूप का अपना उपयोग, सर्दी और बारिश का भी अपना-अपना उपयोग है। सर्दी गर्मी बारिश न हो तो प्रकृति से अनेक आपदाओं का स्त्रोत खुल पड़ेगा। जब से मानव प्रकृति का दोहन कर पदार्थ की ऊर्जा में अपना हस्तक्षेप कर रहा है, उसी दिन से मनुष्य का अस्तित्व विनाश के कगार पर खड़ा है।

मुंबई के एक स्कूल में नेचर क्लब स्कूल की सफाई पर विशेष ध्यान देता है। स्कूल में सब से जादा कचरा कागज के टुकड़े, चॉकलेट, गोलियों के आवरण के कागज, प्लास्टिक की थैलियां हैं। उस स्कूल ने एक टाइम टेबल बनाया। सोमवार से शनिवार तक हर रोज दिन में तीन बार पांच-पांच छात्रों के छ: दल पूरे स्कूल में पड़े कागज, प्लास्टिक, सूखे पत्ते डस्टबिन में जमा करते हैं। यह काम स्कूल प्रारंभ होने से पहले, बीच की छुट्टी में और स्कूल छूटने पर होता है। पांच-पांच मिनटों में पूरा स्कूल साफ सुंदर होता है। छात्र सफाई की महत्ता समझे। कागज फाड़ना, फेंकना, गोली चॉकलेट के आवरण फेंकना बंद हो गया। नेचर क्लब के उपक्रमों द्वारा स्कूल प्रकृति का रक्षक बन गया।

नेचर क्लब के कारण इको फ्रेंडली उत्सव मनाये जाने लगे। होली में रंग खेलना बंद हुआ। दिवाली में शोर करने वाले फटाखे बंद हो गये। गणेशोत्सव में गणेशजी की मूर्तियां मिट्टी की बनने लगीं। डीजे बजाकर हंगामा करना अपने आप बंद हुआ। सच्चे अर्थ में नेचर क्लब ने पर्यावरण की रक्षा की। हाजी मलंग रोड पर गुरुकुल द डे स्कूल, टिटवाला रोड़ पर इको फ्रेंडली स्कूल आदर्श हैं। ‘कागज बचाओ’ का नारा इन स्कूलों ने सिखाया। कागज का वायुयान बनाकर फेंकना बंद हो गया। बेंच पर कंपास से लिखना, चित्र बनाना बंद हुआ। टॉयलेट में दीवारों पर भद्दे शब्दों में लिखना बंद हुआ। नोटबुक का अंतिम पन्ना भी साफ-सुथरा रहने लगा। पाठ्य पुस्तकों मे लेखकों की तस्वीरों को दाढ़ी मूंछें लगना बंद हुआ। ऊर्जा, स्याही, रंग, कागज और समय की बचत तो हुई और छात्र ‘संयम’ सीख गये। साल खत्म होने पर नोटबुक के कोरे कागज जमा कर, बाइंडिंग कर फिर नोट बुक बनाकर कागज का पुनर्उपयोग शुरू हुआ।

जलचक्र अनियमित हो रहा है। कहा जाता है तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। विद्यालय के नेचर क्लब में ‘पानी ही जीवन है’ यह बात समझायी जाये। स्काऊट-गाईड अर्थात बालवीर और वीरबालाओं के प्रशिक्षण में ये बातें आसानी से समझायी जा सकती हैं। अध्यापक बुलेटिन पीरियेड का उपयोग भी पर्यावरण रक्षा की महत्ता समझाने के लिए करें तो परिवर्तन संभव है। पेड़ से हमें ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है। नेचर क्लब हर साल जुलाई महीने में पहले रविवार को ‘वृक्ष दिंडी’ का आयोजन करता है। पेड़ लगाओ, पेड़ बचाओ का नारा होता है। दस साल का एक पेड़ पांच लोगों के लिए ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है। मुंबई की आबादी 1 करोड़ 30 लाख है। करीब 26 लाख पेड़ हमें मुंबई में लगाने होंगे। नेचर क्लब आसानी से यह काम कर सकता है।

भारत कृषिप्रधान देश है। भारत की जमीन उपजाऊ है। सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता है ‘यह धरती कितना देती है’। अच्छी सिंचाई, उन्नत बीज, उन्नत खाद और उन्नत ढंग, उन्नत कृषि की उपादेयता समझनी और दिखानी चाहिये। सफाई की योजना का महत्व उदाहरण देकर दिखाना चाहिए। नेचर क्लब द्वारा पेड़ पौधे, पशु-पंछी, नदी-तालाब, झरने, पहाडियां, बांध, सूरज, आसमान सभी की महत्ता छात्र जीवन में समझायी जा सकती है। अब तो 9 वीं और 10 वीं कक्षाओं मे पर्यावरण विषय भी अनिवार्य रूप से है। नेचर क्लब छात्रों में प्रकृति प्रेम समझाये। मकान की एक ईंट को इधर-उधर कर देने से मकान को खतरा हो सकता है। इसी प्रकार जगत् की सह व्यवस्था में एक पदार्थ को भी इधर उधर कर देने से समूची वैश्विक व्यवस्था प्रभावित होती है फिर चाहे वह पदार्थ पानी, पृथ्वी या वनस्पति कोई भी हो। मनुष्य का मन और मस्तिष्क शुद्ध रहेगा तो पर्यावरण अशुद्ध हो ही नहीं सकता।

पर्यावरण के बिगड़ने से मुनष्य के सिर पर जितने खतरे मंडराने लगे हैं उनसे बचने का एक ही उपाय है- संयम। बिना मतलब किसी वृक्ष की डाली तो क्या पत्ता भी तोड़ना पर्यावरण को असंतुलित करता है। पर्यावरण की दृष्टि से हर पदार्थ का सृष्टि संतुलन में अपना योगदान है- यह सीख ‘यंगेस्ट इंडिया’ के बीस करोड़ छात्रों को नेचर क्लब के जरिये समाझायें और प्रकृति और मानवता की रक्षा करें।
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