राजनाथ सिंह: संघ से लेकर बीजेपी के संकट मोचक बनने की कहानी

Rajnath Singh - Defence Minister


राजनाथ सिंह को अगर याद करते है तो मन में धोती और कुर्ते वाला व्यक्तित्व नजर आता है। बहुत ही सहजता से अपनी बात को रखना और जरुरत के अनुसार आवाज़ को ऊंचा करने की कला भी राजनाथ सिंह में बखूबी देखने को मिलती है। राजनाथ सिंह फिलहाल मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विदेश मंत्री है जबकि पहले कार्यकाल के दौरान वह गृह मंत्री थे। उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले राजनाथ सिंह का राजनीतिक करियर काफी सफल रहा है लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह कि राजनीति में इनके दुश्मन करीब ना के बराबर है और यह राजनीति में होना बहुत ही मुश्किल है।
मोदी सरकार में राजनाथ का ओहदा दूसरे नंबर का माना जाता है और उन्हे पीएम मोदी के करीबीयों में गिना जाता है। अक्सर ऐसा देखा गया है जब मोदी अपनी विदेश यात्रा पर जाते है तो वह उससे पहले राजनाथ सिंह से मुलाकात जरुर करते है और गोपनीय चर्चा दोनों लोगों के बीच होती है। राजनाथ सिंह को पार्टी का संकट मोचक भी कहा जाता है क्योंकि उन्होने कई बार पार्टी को मुसीबत से निकाला है। हाल ही में मोदी सरकार कृषि बिल को लेकर विरोध झेल रही है। विपक्ष लगातार बिल को किसानों के खिलाफ बता रहा है और पूरे देश में इसका विरोध हो रहा है। ऐसे समय में एक बार फिर से मोदी सरकार ने राजनाथ सिंह पर भरोसा जताते हुए उन्हे आगे किया और राजनाथ सिंह ने सरकार का दमदार पक्ष रखा। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है जब सरकार ने राजनाथ सिंह पर भरोसा जाताया है इससे पहले भी चीन के साथ हुई हिंसक घटना, जम्मू कश्मीर हिंसा, और जाट आरक्षण के दौरान राजनाथ सिंह ने बतौर गृह मंत्री सरकार का मजबूती से पक्ष रखा था।


राजनाथ सिंह ना सिर्फ मोदी सरकार के विश्वास पात्र है बल्कि इससे पहले वह अटल सरकार में भी अहम किरदार निभा चुके है। शायद इसलिए ही राजनाथ सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जोड़ कर देखा जाता है क्योंकि वह शांत स्वाभाव के है और उनका फैसला लेने का अंदाज भी बिल्कुल सबसे अलग है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी सहजता और सरल स्वभाव के चलते विपक्ष के साथ तालमेल मिला कर रखते थे इसलिए विपक्ष ने कई बार भरोसा कर अटल बिहारी वाजपेयी को कई अहम काम भी सौंपे थे। राजनाथ सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी की परंपरा के साथ जोड़कर देखा जाता है क्योंकि राजनीति में राजनाथ सिंह का भी कोई शत्रु नही है और मुसीबत के समय उन्हे रास्ता निकालना आता है।
राजनाथ सिंह हाल ही में रुस दौरे पर थे और वहां से आधुनिक हथियारों की डील कर वापस लौटे है जबकि पिछले कुछ समय से रुस भारत से नाराज चल रहा था क्योंकि जिस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रा पर आये थे उस दौरान उनका जोरदार स्वागत किया गया था। ट्रंप की यात्रा को लेकर भारत में एक उत्सव जैसा माहौल हो गया था जिससे स्वाभाविक है कि रुस को बुरा लगा था क्योंकि अमेरिका और रुस के बीच संबंध ठीक नही है लेकिन भारत और चीन के बीच जैसे ही तनाव पूर्ण माहौल बना राजनाथ सिंह को रुस भेजा गया जहां उन्होने फिर से रिश्ते को सुधारा और रुस के साथ हथियारों की डील कर वापस लौटे।

rajnath singh

हाल ही में देश को लंबित पड़े राफेल विमानों की पहली खेप मिल गयी और यह ऐसे समय में आया जब भारत और चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए है। राफेल विमान के शुभारंभ के दौरान राजनाथ सिंह ने भारतीय परंपरा अनुसार राफेल विमान पर ऊं बनाया और टायर के नीचे नींबू रख इसे सेना को सौंपा था जिस पर कुछ राजनीतिक दलों ने कटाक्षपूर्ण कमेंट किया और इसे अंधविश्वास बताया था लेकिन इस बार भी राजनाथ सिंह ने बड़ी सरलता से सभी का जवाब दिया और कहा कि यह अंधविश्वास नहीं बल्कि भारतीय परंपरा है।


भारतीय जनता पार्टी और संघ का भी काफी करीबी रिश्ता बताया जाता है तो यहां राजनाथ सिंह के राजनीतिक करियर पर नजर डालें तो यह भी संघ की ही शाखा से निकल कर आये हुए नेता है। राजनाथ सिंह बचपन से ही संघ से जुड़े थे और लम्बे समय तक संघ में सेवा दी है। सन 1975 में राजनाथ सिंह भारतीय जनसंघ से जुड़े और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। राजनाथ सिंह आपातकाल के दौरान 2 वर्ष तक जेल में रहे और फिर पहली बार सन 1977 में वह पहली बार विधायक बने। 68 वर्ष की उम्र तक राजनाथ सिंह प्रधानमंत्री का पद छोड़ बाकी सभी पदों पर रह चुके है। सन 2014 के दौरान वह खुद भी प्रधानमंत्री की रेस में थे लेकिन अपने स्वभाव और समय को देखते हुए राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी का नाम आगे किया था जिसके लिए उन्हे कई विरोध भी झेलने पड़े थे।


वर्ष 2004 जब लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और पार्टी को लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था और एक बार फिर से कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी थी इसी दौरान लालकृष्ण आडवाणी ने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ कर दी थी जिसके बाद उनकी पूरे देश में आलोचना होने लगी थी। बात यहां तक बिगड़ी की उन्हे राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ गया। जिसके बाद पार्टी के सबसे चर्चित चेहरे राजनाथ सिंह को अध्यक्ष का पद सौंपा गया जिसे राजनाथ सिंह ने 2009 तक निभाया लेकिन उसके बाद नीतिन गडकरी ने अध्यक्ष पद का संभाला लेकिन 2013 में विवाद में आने के बाद नितिन गडकरी को भी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा जिसके बाद यह पद फिर से राजनाथ सिंह को दिया गया। जिसके बाद सन 2014 में राजनाथ सिंह ने तमाम विरोध के बाद भी नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया और तब से पार्टी लगातार आगे ही बढ़ती जा रही है और राजनाथ सिंह मोदी के करीबी और पार्टी के संकट मोचक बनें हुए है।

आपकी प्रतिक्रिया...