हंसमुख चेहरा-मन विराट, ऐसे हैं भजन सम्राट

भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के हाथों इस वर्ष पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए भजन सम्राट अनूप जलोटा के बारे में यही कहा जा सकता है कि इनके गायन में जो मिठास है, वही मिठास इनके पूरे व्यक्तित्व में भी दिखाई देती है। मुस्कुराते चेहरे में जो विराट मन बसता है, उसमें राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी है, इसलिए गायन ही नहीं, सबके बीच कैसे घुल मिलकर रहना चाहिए, इसकी सीख उनके व्यक्तित्व की पड़ताल करने पर मिलती है। भगवान राम, कृष्ण, गणपति, शिव, साई बाबा, मीराबाई जैसे देवताओं तथा संतों पर अपनी सरस रूपी वाणी से जब वे संगीत की वर्षा करते हैं तो उनके भजन सम्राट होने की पुष्टि हो जाती है, लेकिन जब वे एक अपरिचित व्यक्ति से बड़ी आत्मीयता से मिलते हैं, तो उनके मिलनसार व्यक्तित्व का दर्शन होता है। जब वे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वरिष्ठ समाज सेवक अण्णा हजारे के आंदोलन में सहभागी होते हैं, तो यह पता लगता है कि वे सिर्फ गायन ही नहीं, राष्ट्र के बारे में भी अच्छी सोच रखते हैं, गायन क्षेत्र में सफलता की बुलंदियों पर आसीन होने के बावजूद हर मिलने वाले से प्रसन्नचित होकर मिलना ही उन्हेें भीड़ में एक अलग चेहरा बना देता है। हरी सब्जी, मसालेदार बैंगन, सेवई की खीर तथा घर में बनी गुझिया को बड़ी चाहत से खाने वाला यह संगीत पारखी हर राष्ट्रवादी भारतीय से हृदय से प्रेम करता है। भजन सम्राट का कहना है कि मेरा गायन जब दूसरों को आनंद प्रदान करता है, दूसरों के दु:खों को समाप्त करने का साधन बनता है, तब मुझे बहुत आनंद होता हैं। सुबह-सुबह हर घर में अगर मेरे भजन बजते हैं तो इसे मैं भगवान द्वारा मेरे ऊपर की गई असीम कृपा ही मानता हूँं। मैं तो यही चाहता हूँ कि देश का हर गरीब मेहनत से काम करे और कर्मशील व्यक्ति को भगवान कभी भूखा नहीं रखता और ऊँचे ओहदे पर पहुँचने के बावजूद जो व्यक्ति अहंकार नहीं करता, भगवान उस पर अपनी विशेष कृपा रखते हैं, जैसी उन्होंने मुझ पर की है।

अपनी संगीत यात्रा में पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने वाले अनूप जलोटा की गायकी आज भी जिस तरह लोगों के मन में रची बसी है, उसके आधार पर यह कहना गलत नहीं कि आने वाले चंद सालों में भजन सम्राट को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न अलंकरण से अलकृंत किया जाएगा। भीड़ में एक अलग चेहरा बनने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, कोई यूँ ही खास चेहरा नहीं बन जाता। भजन सम्राट अनूप जलोटा जी के बारे में भी कुछ ऐसी ही बात है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पले-बढ़े अनूप जलोटा जितने अच्छे गायक हैं, उतने ही अच्छे व्यक्ति भी हैं। गायन क्षीतिज में गगनचुंबी स्पर्श के बावजूद एक व्यक्ति के तौर पर यदि उन्हें रेखांकित किया जाए तो ज्ञात होगा कि अनूप जलोटा सभी को साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति हैं। भजन सम्राट के जीवन से जुड़े कई पहलुओं को जानने के लिए ‘हिंदी विवेक’ ने उनसे बातचीत की। इसी बातचीत को दीपावली विशेषांक में प्रस्तुत किया जा रहा है।

भजन सम्राट शब्द जैसी ही वाणी पर आता है, ‘ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन’ कीं पंक्ति के शब्द कानों में गूंजने लगते हैं। हर कोई भजन सम्राट अनूप जलोटा की संगीत साधना, उनके भजनों, उनकी गजलों या फिर उनके फिल्म निर्माण तक की बातें कहकर अपनी बात खत्म कर देता है। बात संगीत की हो और वह भी भजन सम्राट की तो उसमें गाने, बजाने का जिक्र होना स्वाभाविक ही है, पर जब कलाकार के व्यक्तित्व-कृतित्व की चर्चा की जाएगी तो उनके जीवन के प्रारंभ से लेकर अब तक की गतिविधियों का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है। अनूप जलोटा के भजन लगभग हर भारतीय परिवार का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सुबह-सुबह चिड़ियों की आवाज के बीच जब अनूप जलोटा के भजन बजते हैं, तो मन को जो आनंद प्राप्त होता है, उसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। अनूप जी से लंबी बातचीत से यह पता चला कि वे बचपन में बड़े नटखट थे, लखनऊ में जहाँ रहते थे, वहाँ के लोगों का कहना है कि हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि यह बच्चा बड़ा होकर इतना महान गायक बनेगा। जो लोग अनूप जलोटा को बचपन से जानते हैं, वे कहते हैं कि अनूप की शरारतें ऐसी होती कि सोचकर ही मन डर जाता है। अनूप जलोटा ने बातचीत के दौरान बताया कि लखनऊ के दुर्गापुरी इलाके में जहाँ मेरा पैतृक निवास है, वहाँ खेल का बड़ा मैदान है, इस मैदान के आस-पास के बच्चे अक्सर खेलने आया करते थे, एक दिन मेरे मन में एक शरारत सूझी कि मैदान के बिलकुल बीचों-बीच एक कील नोंक की तरफ से (उल्टी करके) रख देते हैं, बच्चे जब खेलने आएंगे तो वह कील किसी बच्चे के पैर में चुभेगी तो बड़ा मजा आएगा। दूसरे के पैर में कील चुभे इस नीयत से कील को मैदान में रखकर मैं भूल गया, थोड़ी देर बाद हर दिन मेरे घर फल देने वाले व्यक्ति ने आवाज लगाई कि फल ले लो, मैं फल वाले की आवाज सुनकर तेजी से उसकी ओर भागा और मैदान में रखी कील मेरे ही पैर में ग़ड़ गई, उस दिन जो दर्द मुझे हुआ, उसके बाद मैंने यह संकल्प ले लिया कि कभी किसी के साथ ऐसा बर्ताव नहीं करूंगा कि सामने वाले का मन व्यथित हो।

भातखंडे संगीत महाविद्यालय से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त अनूप जलोटा एक बड़े परंतु अनुशासित परिवार में पैदा हुए। भजन सम्राट की उपाधि से विभूषित अनूप जलोटा को संगीत की प्राथमिक शिक्षा उनके पिता पुरुषोत्तम जलोटा से मिली। अपने पिता के बारे में अनूप जलोटा बताते हैं कि वे बड़े ही अनुशासित थे। समय के पाबंद तथा आमंत्रित लोगों का आदर करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। संगीत के अध्ययन के बीच किसी भी तरह की लापरवाही को वे बर्दाश्त नहीं करते थे। पिता की ओर से दी गई सजा का जिक्र करते हुए अनूप जी ने बताया कि पिताजी लखनऊ में संगीत की कक्षाएं लेते थे, मैं भी उनके साथ संगीत सीखने के लिए बैठता था, एक दिन संगीत की कक्षा के समय मैं शरारत करने लगा, पिताजी के बार-बार समझाने के बावजूद जब मैंने अपनी शरारत बंद नहीं की तो पिताजी ने मुझे घर के एक कमरे में बंद कर दिया और कहा कि ‘सा’ गाते रहो और जब तक मैं संगीत बंद करने के लिए न कहूँ तब तक सिर्फ ‘सा’ ही गाना है। मैं जैसे ही ‘सा’ के आगे ‘रे’ गाने की कोशिश करता पिताजी जोर से डांट देते थे। मैं अपने पिताजी से डरता भी था, पर उतना ही उनका आदर भी करता था, आज भी मेरे कार्यालय में बाबू जी (पिताजी) की फोटो लगी है, जो मुझे सदैव अच्छा गाने, अच्छा कार्य करने तथा अतिथियों का आत्मीयता पूर्वक स्वागत करने का संबल प्रदान करती है। पिताजी से मिले अच्छे संस्कार के कारण ही मैं भजन सम्राट बन सका, अगर पिताजी ने मेरे संगीत गुण को नहीं पहचाना होता तो शायद मैं गायक नहीं बन पाता। जलोटा ने बताया कि मेरे पिताजी को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के. एम. मुंशी ने राज गायक की उपाधि से विभूषित किया था, इसलिए सरकारी समारोह के मौके पर उनके कार्यक्रम होते रहते थे, मैं भी अपने पिताजी के साथ जाया करता था और जब कभी मौका मिलता उनके साथ गाता भी था। संगीत साधना मेरे जीवन से कुछ इस तरह से जुड़ी कि उसे अलग नहीं कर सकता था।

सात साल की अल्प-आयु से संगीत के प्रति पूर्ण समर्पित अनूप जलोटा की गायकी का एक अनोखा अंदाज तो है ही, साथ ही वे एक सहज इंसान भी हैं, उनके बारे में यह कहा जाता है कि उनसे मिलने के लिए उनके घर जाने वाला अपरिचित व्यक्ति भी उनकी सहजता, सरलता देखकर चकित हो जाता है। सात भाषाओं में अब तक अपनी गायन प्रतिभा का परिचय कराने वाले अनूप जलोटा को इसी वर्ष पद्मश्री पुरस्कार से अलंकृत किया गया है। भजन सम्राट का कहना है कि दीप पर्व मुझे बहुत अच्छा लगता है, इस दिन बनने वाली मिठाइयां मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं कि माँ दीपावली पर्व के मौके पर जब मिठान्न बनाती थी, तो मैं मिठाई कब खाने को मिले, इसकी कोशिश करता था। पंजाबी परिवार से संबंध रखने वाला जलोटा परिवार भगवान श्रीकृष्ण का प्रमुख उपासक है। दादर स्थित शिवाजी पार्क क्षेत्र में स्थित ‘मोहन निवास’ में रहने वाले भजन सम्राट अनूप जलोटा के पूरे व्यक्तित्व को यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो इसमें एक बात स्पष्ट तौर पर दिखती है कि उसमें किसी भी तरह का अहंकार नहीं है। उनका स्नेही स्वभाव, तथा कार्य के प्रति उत्साही नजरिया उन्हें भीड़ में एक अलग चेहरा बना देता है। संगीत साधना की अब तक की लंबी पारी में अनूप जलोटा ने न जाने कितने पुरस्कार जीते हैं और आने वाले समय में उन्हें भारत रत्न जैसे पुरस्कार से भी विभूषित किया जा सकता है, पर इतनी महान उपलब्धियां अर्जित करने के बाद भी उनका यही कहना है, जो प्रगति करने के बारे में नहीं सोचना, मानो वह मृत है, इसलिए निरंतर अच्छी सोच और सकारात्मक, प्रगति की मंशा रखकर कार्य करने वाले व्यक्ति को जीवन में कभी निराश नहीं रहना पड़ता।

29 जुलाई, 1953 को उत्तर प्रदेश के नैनीताल में जन्मे अनूप जलोटा की संगीत यात्रा लखनऊ से शुरू हुई, आज वे गायन क्षेत्र के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में आपके समक्ष उपस्थित हैं। अनूप जी बताते हैं कि जब मुझे गाने के पारिश्रमक के तौर पर बीस रुपए मिले थे, उस समय जो प्रसन्नता मुझे मिली, वह दिन मेरे जीवन का सबसे अनमोल पल था, वह दिन आज भी मुझे याद है। लखनऊ का घर, आसपास के लोग, वह स्कूल जहां मैंने प्राथमिक स्तर की शिक्षा ली, वे सहपाठी, सभी कुछ याद है, जीवनचर्या तो चलती ही रहेगी, पर इस जीवनचर्या में जो लोग जिस भी रूप में मेरे लिए सहयोगी बने उसे मैं कभी भुला नहीं सकता। 1973 में लखनऊ छोड़कर जब अनूप जलोटा मुंबई आए, तो उनका, मन मुंबई में नहीं लगता था, वहां के लोग, वहां का रहन-सहन, वहां का खान-पान तथा वहां के दोस्त पल-पल याद आते रहे, पर सवाल करियर का था, वे कहते हैं कि अगर मैं अपनों के मोह में रहता तो जिस मुकाम पर हूं,कैसे पहुँचता? लखनऊ विश्वविद्यालय से बी. ए. की डिग्री प्राप्त करने के बाद अनूप जलोटा ने मायानगरी की ओर रुख किया और इसी शहर से अपना नाम कमाने की योजना बनाई। भातखंडे संगीत महाविद्यालय से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त करने के बाद मुंबई आए अनूप जलोटा जी ने संगीत में अपना स्थान बनाने के लिए आकाशवाणी मुंबई में स्वर परीक्षा दी, पहली बार उन्हें इस परीक्षा में असफलता मिली, पर जब दूसरी बार उन्होंने स्वर परीक्षा दी तो वे पास हो गए। इस तरह लखनऊ में पले-बढ़े पंजाबी घराने के युवक की संगीत यात्रा अधिकृत रूप से 1973 से शुरू हुई। श्री जलोटा से ‘हिंदी विवेक’ से हुई बातचीत में बताया कि मेरे पिताजी अच्छे भजन गायक थे, वे हरिओम शरण, सुधा मेहरोत्रा जैसे गायकों-गायिकाओं के साथ गाते थे, उनके गायन को मैं लगातार सुनता रहता था और गुनगुनाता रहता था। संगीत क्षेत्र में आने के बाद मैंने यह जाना कि यह क्षेत्र लोगों के बीच अपनी बात कहने का सबसे सुंदर माध्यम है। संगीत से मन शुद्ध होता है,जीवन में सुख आता है, तनाव से मुक्ति मिलती है, एक-दूसरे के प्रति आदर भाव बढ़ता है और सबसे बड़ी बात यह है कि संगीत सुनने से क्रोध दूर होता है और संगीत ने हमें यही दिया है, जब मैं युवावस्था में था, उस समय मुझे क्रोध बहुत आता था पर जैसे-जैसे गायन में मेरी रुचि बढ़ती गई मेरा क्रोध खत्म हो गया, अब किसी भी विपरीत परिस्थिति में मुझे क्रोध नहीं आता।

संगीत क्षेत्र में एक चर्चित चेहरा बने भजन सम्राट अगर गायक नहीं होते तो क्रिकेटर होते, क्योंकि अनूप जलोटा को क्रिकेट बहुत पसंद है। बचपन में कानपुर के ग्रीन पार्क मैदान में होने वाले किसी भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच को देखना अनूप जी कभी नहीं भूले। संगीत समारोह का खास चेहरा बनने वाले, अनूप जलोटा का कहना हैं कि अगर मैं गायक नहीं बनता तो देशवासी मुझे क्रिकेटर के रूप में देखते। लखनऊ से कानपुर की दूरी बहुत ज्यादा नहीं थी, इसलिए जब भी कोई एक दिवसीय मैच या टेस्ट मैच होता था तो अनूप जलोटा वह मैच देखने के लिए निकल पड़ते थे, उनके साथ होते थे उनके दो चार दोस्त। क्रिकेट के बारे में अपनी याद ताजा करते हुए अनूप जलोटा ने बताया कि कानपुर के ग्रीन पार्क मैदान में एक मैच होने वाला था, इस मैच में भारत की ओर से एक नया बल्लेबाज खेलने वाला था। बिलकुल सुनील गावस्कर की तरह की कद काठी वाले इस बल्लेबाज को देखते ही मैंने कहा कि यह बल्लेबाज तो शतक बनाएगा, मेरे साथी इस बात को स्वीकार करने के लिए जरा भी तैयार नहीं थे, मैं उम्मीद लगाए बैठा था, जैसे ही यह बल्लेबाज मैदान में उतरा, मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गइर्ं, एक दो शॉट अच्छे खेलने पर मुझे भरोसा हो गया कि यह बल्लेबाज शतक बना देगा और जैसे ही मेरी बात पूरी हुई, वह बल्लेबाज शून्य पर आउट हो गया। गुडप्पा विश्वनाथ नामक यह बल्लेबाज जैसे ही शून्य पर आउट हुआ, मेरे साथी मुझे चिढ़ाने लगे, मैंने कहा अभी दूसरी पारी बाकी है, दूसरी पारी में जब गुडप्पा विश्वनाथ ने शतक बनाया तो मेरी जान में जान आई। संगीत व क्रिकेट दोनो में रुचि होने के कारण अक्सर मेरे मन में यह विचार आता था कि करियर के रूप में किसका चुनाव करूं संगीत का या फिर क्रिकेट का, क्रिकेट खेलना था तो संगीत के राग मन में गूंजते थे और जब संगीत समारोह में होता तो क्रिकेट का बल्ला दिखाई देता था, पर जब एक दिन संगीत तथा क्रिकेट दोनों में अपनी दक्षता तथा सुख-संतोष पर चिंतन करते हुए बैठा तो मन ने कहा कि संगीत मेरी पहली साधना है, इसलिए संगीत को करियर के रूप में चुना और क्रिकेट को शौक के रूप में स्वीकार किया। लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर, हरफनमौला कपिल देव, दिलीप वेंगसरकर तथा भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व मैनेजर राज सिंह डुंगरपुर से काफी आत्मीय संबंध रखने वाले अनूप जलोटा का कहना है कि हर व्यक्ति को अपने गुणों के आधार पर अपना कार्य का चुनना चाहिए, पर हर क्षेत्र का ज्ञान रखना चाहिए। सुनील गावस्कर, कपिलदेव के साथ अच्छी मित्रता के कारण अनूप जलोटा अच्छे क्रिकेटर तो बन जाते, पर क्रिकेट सम्राट की उपाधि उन्हें नहीं मिल पाती, गायन क्षेत्र में आये, अपनी गायन प्रतिभा का जौहर दिखाया और आज अनूप जलोटा हम सब के बीच ‘भजन सम्राट’ के रूप में उपस्थित हैं, ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि संगीत अनूप जलोटा का विशेष गुण है और इसी विशेष गुण के कारण वे गायन क्षेत्र में मील का पत्थर बने हुए हैं। अनूप जी की तरह ही उनके पुत्र अर्यमन को भी क्रिकेट के प्रति खास लगाव है, वे अपनी कॉलेज की टीम के कप्तान हैं और एक अच्छे गेंदबाज के रूप में उनकी पहचान है। अनूप जलोटा फख्र के साथ कहते हैं कि लगता हैं मेरा बेटा मेरा सपना पूरा कर देगा, मैं क्रिकेटर नहीं बन पाया तो क्या हुआ, मेरा बेटा अच्छा क्रिकेटर बनेगा और मुझे भरोसा है कि एक दिन वह भारतीय क्रिकेट को पेशे के रूप में अंगीकार न करने के बावजूद अनूप जलोटा को क्रिकेट के बारे में बहुत कुछ जानने-समझने की उत्सुकता रही है। लिटिल मास्टर सुनील गावसकर से जब भी उनकी मुलाकात होती है तो वे सुनील गावसकर से क्रिकेट की बारीकियों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं और सुनील गावसकर अनूप जी से संगीत के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। इस तरह संगीत-क्रिकेट की यह जुगलबंदी बड़ी अनोखी लगती है। गावसकर की तरह ही अनूप जलोटा की विश्वकप क्रिकेट में भारत को पहला विश्वकप दिलाने वाले कपिलदेव से भी अच्छी मित्रता है। कपिलदेव जब भी मुंबई आते हैं, तो अनूप जलोटा से उनकी मुलाकात होती हैं और अनूप जलोटा जब हरियाणा जाते हैं तो वे कपिलदेव से मुलाकात करते हैं, इस तरह संगीत-क्रिकेट की यह जुगलबंदी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कपिलदेव तथा अनूप जलोटा मिलकर समय-समय पर समाज के गरीब तथा उपेक्षित बच्चों के उत्थान के लिए कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। ‘खुशी’ नामक संस्था के बैनर तले होने वाले इस कार्यक्रम के माध्यम से जितनी भी धनराशि, जमा होती है, उसे गरीबों के उत्थान में खर्च किया जाता है। कपिलदेव की देख-रेख में चलने वाली इस संस्था ने अब तक कई बच्चों के जीवन में उजाला लाया है। दीप पर्व के पावन अवसर पर हिंदी विवेक के प्रकाशित होने वाले दीपावली विशेषांक के माध्यम से अनूप जलोटा के देशवासियों से अपील की कि जो लोग गरीब, उपेक्षित बच्चों के उत्थान के लिए कुछ करना चाहते हैं तो वे कपिलदेव की ‘खुशी’ नामक संस्था के माध्यम से इन लोगों की मदद कर सकते हैं। शीर्ष पर पहुँचने के बाद भी अगर आज भी अनूप जलोटा के मन में गरीब बच्चों के उत्थान के बारे में इतनी अच्छी सोच है तो जाहिर है कि उनके व्यक्तित्व से सभी प्रभावित होंगे। देश भर के अग्रणी कलाकारों को एक साथ एक मंच पर लाकर ‘खजाना’ संस्था के माध्यम से होने वाले संगीत पर आधारित कार्यक्रमों से प्राप्त धनराशि का एक हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई, उनके जीवन स्तर को सुधारने के काम आता है, जब ऐसे उदात्त विचार होंगे तो किसी कलाकार को जनता का प्यार मिलना स्वाभाविक ही है।

गायन ही नहीं, अभिनय का भी दिखाया है हुनर-

आमतौर पर अनूप जलोटा का नाम सुनते ही लोग उनके भजनों की चर्चा करते रहते हैं, पर यह बहुत कम लोगों को पता है कि अनूप जलोटा एक अच्छे अभिनेता भी हैं। कई भाषाओं में गायन की तरह उन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया है। सत्य साई बाबा के प्रभावित जलोटा जी ‘सत्य साईबाबा’ फिल्म में बाबा का किरदार अदा करते हुए शीघ्र ही दिखाई देंगे। जलोटा परिवार की बाबा के प्रति आस्था बहुत वर्षों से रही है। बाबा जब जीवित थे, तब से इस परिवार का उनके सत्संग में जाने का सिलसिला शुरू हुआ था। ‘बाबा’ का किरदार निभाने के संदर्भ में अनूप जलोटा ने ‘हिंदी विवेक’ को बताया कि बचपन में मैं अपने पिताजी के साथ जब ‘बाबा’ से पहली बार मिला था तो बाबा ने मुझसे कहा था- बेटा तेरी शक्ल तो मुझसे मिलती है, मैं मुस्कुरा देता था। जब मैंने ‘बाबा’ के किरदार को निभाते वक्त उस गेट-अप में आता हूँ तो लोग चकमा खा जाते हैं। ‘बाबा’ का किरदार निभाना मेरे जीवन का स्वर्णिम पल है। फिल्मों में अभिनय के साथ-साथ फिल्म निर्माण क्षेत्र में भी अनूप जलोटा काफी सालों से कार्य कर रहें हैं, अब तक जलोटा जी ने 100 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण किया है, जिनमें सबसे ज्यादा भोजपुरी भाषा में है। आज की तुलना में पुराने दौर के गाने ज्यादा अच्छे होते थे, उनको सुनने पर एक अलग तरह का आनंद होता था, उनमें एक मिठास होती थी, अब पहले जैसी बात नहीं रही, अब तो सिर्फ व्यावसायिकता ही सबसे बड़ा आधार बन गई है। आज के गानों की आयु बहुत घट गई है, क्योंकि उनमें भाव शेष नहीं रहा। सच तो यह है कि आज के गाने भी आज की फिल्मों की तरह अल्पायु वाले हो गए हैं। ‘मुन्नी बदनाम हुई’ जैसे गाने इसीलिए फिल्मों का हिस्सा बनते हैं, क्योंकि फिल्मों की पटकथा, में कोई खास दम नहीं होता। फिल्म बनाने वालों को यह अच्छी तरह पता है कि दर्शक क्या चाहते हैं। युवा दर्शकों को केंद्र में रखकर ज्यादातर फिल्में बनाने के कारण उसकी गुणवत्ता की ओर कम, उसमें ज्यादा से ज्यादा बल्गर बातें डालकर उसे दर्शकों के समक्ष रखा जाता है, ताकि दर्शक उसें देखने के लिए टूट पड़े। अनूप जी का मानना है कि आज के दौर में ‘ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन’ जैसे भजन सुनने वाले श्रोता बहुत कम रह गए हैं, जो दर्शक इसे सुनकर गुनगानाते हैं, वे ही सच्चे संगीत प्रेमी श्रोता हैं, इन्हीं श्रोताओं के कारण संगीत का मूलतत्त्व आज भी टिका हुआ है। भजनों में शालीनता, भक्त का भगवान के प्रति भाव तथा भजनों के बोल को अपने अंतस्थ से निकलता हुआ मानने वाले ही भजनों का आस्वाद ले पाते हैं। मुन्नी बदनाम हुई, जैसे गाने क्षणिक आनंद भले ही देते हों, पर सर्वज्ञ रूप से ऐसे गानों को सामाजिक सम्मान का दर्जा नहीं मिलता। कृष्ण आराधना की प्रतीक मीरा बाई, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, सबका मालिक एक के रूप में मान्यता प्राप्त साईबाबा और कर्म प्रधान भगवान श्रीकृष्ण की बातें जब भजन के तौर पर सुबह-सुबह सुनने वालों के कानों में पड़ती है, तो उनकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है। संगीत तो पानी की लहरों की तरह है। नदी, समुद्र के अथाह जल के बीच निकलने वाली लहरें विभिन्न रागों की तरह होती है, मैं हर लहरों में रागों की तलाश करता हूँ और उसी के अनुरूप अपनी संगीत साधना को लगातार प्रखर बना रहा हूँ।

हर दिन मने दीपावली-

पर्वो के देश भारत में हर माह कोई न कोई पर्व होता है, लेकिन दीपावली पर्व का आनंद ही कुछ और है। असत्य पर सत्य की जीत, पुण्य की पाप पर जीत के रूप में देश भर में इस पर्व को मनाया जाता है, पर मेरा मानना यह है कि दीपावली हर दिन मनानी चाहिए, यह दीपावली आपस में प्रेम, सौहार्द बढ़ाने वाली, एक दूसरे के मन में व्याप्त द्वेष, छल-कपट को दूर करने वाली, ऊँच-नीच को खत्म करने वाली सभी ओर सच्चाई की जीत का संदेश वाली होनी चाहिए, मन का तम जिस दिन होगा खत्म उसी दिन सच्चे अर्थों में मनाएंगे दीपावली हम, ऐसा संदेश देते हुए भजन सम्राट ने कहा कि दीपावली के दीप से प्रसारित होने वाला ‘प्रकाश’ मर्यादा पुरुषोत्तम राम के उदात्त चरित्र का परिचायक है, इसलिए दीपावली के अवसर पर हर घर के सामने प्रज्ज्वलित होते दीप अपने प्रकाश के माध्यम से यही संदेश प्रसारित करते हैं कि इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही संदेश हमारा। भजन सम्राट का यह संदेश अगर हर भारतीय व्यक्ति अच्छी तरह से जान गया तो हर घर में हर दिन मनेगी दीपावली।

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