ब्रज की होली

ब्रज में होली की मस्ती में धुलेंडी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक जगह- जगह चरकुला नृत्य, हल नृत्य, हुक्का नृत्य, चांभर नृत्य एवं झूला नृत्य आदि अत्यंत मनोहारी नृत्य भी होते हैं। चैत्र कृष्ण तृतीया से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक निरंतर सात दिनों तक ब्रज के प्रायः समस्त मंदिरों में फूलडोल की छटा छाई रहती है। इस दौरान मंदिरों में विराजित श्री विग्रहों के विभिन्न प्रकार के फूलों द्वारा नयनाभिराम शृंगार होते हैं। इस अवसर पर उत्कृष्ट होरियो का गायन भी होता है। अनेक स्थानों पर फूल डोह के मेले भी लगते हैं।

रंग-गुलाल का अनूठा पर्व होली अपने देश में अंत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, परंतु ब्रज की होली अपनी अनूठी परंपराओं के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां होली का रंग वसंत पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक पूरे पचास दिनों तक छाया रहता है।
समूचे ब्रज-मंडल में होली की शुरुआत वसंत पंचमी से ही हो जाती है। इस दिन से ब्रज के सभी मंदिरों में ठाकुर जी के नित्य-प्रति के शृंगार में गुलाल का प्रयोग होने लगता है। इसके अलावा होलिका दहन स्थलों पर होली के प्रतीक के रूप में होली के ढांडे गाढ़ दिए जाते हैं। शिवरात्रि से ढ़ोल और ढ़प के साथ रसिया गान भी शुरु हो जाता है। हुरिहारे भांग और ठंडाई की मस्ती में गा उठते हैं।

आजु बिरज में होरी रे रसिया, होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया
आजु बिरज में होरी रे रसिया, कौन के हाथ कनक पिचकारी
ं कौन के हाथ कमोरी रे रसिया।

ब्रज में होली की विधिवत शुरूआत फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मथुरा से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मानसरोवर गांव में लगने वाले राधारानी के मेले से होती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल नवमी को बरसाना में नंदगांव के हुरिहारों (पुरुषों) और बरसाना की गोपिकाओं (स्त्रियों) के बीच विश्व प्रसिद्ध लठ्ठमार होली होती है। बरसाना, दिल्ली-आगरा राजमार्ग पर स्थित कोसीकलां से 7 किलोमीटर और मथुरा से 47 किलेमीटर की दूरी पर स्थित है। इस होली में नंदगांव के गुसाई अपने को भगवान श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि मानकर राधारानी के प्रतीक के रूप में बरसाना के गुसाईयों को और बरसाना के गुसाई अपने को राधा-रानी का प्रतिनिधि मानकर नंदगांव के गुसाईयों को रंग की बौछारों के मध्य क्षेत्रीय भाषा में टिप्पणी करते हैं। साथ ही श्रंगार रस से परिपूर्ण हंसी-मजाक भी करते हैं, जबाब में बरसाना की गोपिकाएं घुंघट की आड़ से नंदगांव के हुरिहारों (युवकों) पर लाठियों से प्रहार करती हैं। इन प्रहारों को नंदगांव के हुरिहारे रसिया गा-गाकर अपनी ढालों पर रोकते हैं। गोपिकाओं की लाठियों के प्रहारों से नंदगांव के हुरिहरों की ढ़ाले देखते ही देखते छलनी हो जाती हैं।

अगले दिन यानि फाल्गुन शुक्ल दशमी को इसी प्रकार की लठ्ठमार होली नंदगांव में खेली जाती है। इस होली में नंदगांव की गोपिकाएं बरसाना के गुसाइयों पर लाठियां बरसाती हैं।

नंदगांव भी होली होने के अगले दिन समूचे ब्रज में रंग भरी एकादशी का पर्व बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन ब्रज के प्रायः सभी मंदिरों में ठाकुर जी के समक्ष रंग-गुलाल, इत्र-केवड़ा और गुलाब जल आदि की होली होती है। कुछ मंदिरों से राधा और कृष्ण के स्वरूपों की झाकियों के साथ बहुत बड़ी मात्रा में रंग-अबीर रूपी कृपा प्रसाद साथ चलता है। यह कृपा प्रसाद लोगों पर इस कदर उलीचा जाता है कि देखते ही देखते ब्रज का प्रत्येक कोना इंद्रघनुषी हो जाता है। फाल्गुन शुक्ल एकादशी से फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी तक पूरे पांच दिन वृंदावन के ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में सुबह शाम गुलाब-टेसु के रंग और इत्र व गुलाब जल आदि से होली खेली जाती है। इस अवसर पर लड्डू और जलेबी की होली भी होती है।

ब्रज में वन-उपवनों एवं उद्यान वाटिकाओं की भरमार है, जिनमें शीत ऋतु के बाद सुहानी वसंत ऋतु के आने पर नाना प्रकार के फूल खिलते हैं। अतः ब्रज में होली पर रंग-बिरंगे, कोमल-मृदुल, महकते- मुस्कुराते फूलों से भी होली खेली जाती है। फूलों की यह होली वृंदावन में रास-लीलाओं के दौरान राधा व उनकी सखियाँ तथा कृष्ण व उनके सखा फूलों से एक-दूसरे के साथ इस तरह होली खेलते हैं कि राधा-कृष्ण फूलों की वर्षा से उसके अंदर दब- ढ़क जाते हैं और लीला स्थल पर फूलों का एक विशाल ढ़ेर बन जाता है। इस ढेर में से निकलते हुए राधा-कृष्ण जब इन फूलों को अपने दोनों हाथों से उछालते हैं तो बड़ा ही मनोरम दृश्य उत्पन्न होता है।

हुरंगा देखने उमड़ती है भीड़

मथुरा से 50 किलोमीटर दूर जाव गांव में भी अत्यंत रसपूर्ण हुरंगा होता है। इस हुरंगे में निकटवर्ती ग्राम बठैन के पुरुष श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम के रूप में जाव ग्राम की राधारानी रूपी स्त्रियों के साथ होली खेलते हैं। इस हुरंगे में जाव गांव की सभी स्त्रियां अपने जेठ के रूप में आये बठैन के पुरुषों से लाज मारकर उसी तरह होली खेलती हैं, जिस प्रकार कि दाऊजी के हुरंगे में होली खेली जाती है।

चैत्र कृष्ण तृतीया को बठैन में लठ्ठमार हुरंगा होता है। इस हुरंगे में राधा-रानी रूपी हुरिहारिनें बलराम रूपी हुरिहरों पर लाठियों से प्रहार करती हैं, जिन्हें बलराम रूपी हुरिहारे अपनी ढ़ालों पर रोकते हैं। अंत में यह हुरंगा हार-जीत का फैसला हुए बगैर दोनों पक्षों की जय-जयकार के साथ समाप्त हो जाता है।

फाल्गुन शुक्ल पुर्णिमा को होलिका दहन होता है। इस दिन मथुरा के फालैन और जटवारी ग्राम में जिस प्रकार की होली जलाई जाती है, वह अप्रतिम है।

फालैन मथुरा से 53 किलोमीटर और कोसीकलां से 1 किलोमीटर दूर छाता तहसील का एक छोटा सा गांव है। यहां फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी को विशालकाय होली सजाई जाती है। इस होली को यहां के प्रल्हाद मंदिर का पंडा प्रल्हाद कुंड में स्नान करने के बाद प्रज्जवलित करता है तथा इस होली को उसकी ऊंची- ऊंची लपटों के मध्य में से नंगे पांव पार करता है, परंतु उसको आग की लपटें अपनी चपेट में नहीं लेतीं। मथुरा से लगभग 52 किलोमीटर दूर स्थित छाता तहसील के जटवारी गांव में भी होलिका दहन के दिन एक पंडा जलती हुई होली की विशालकाय तेज लपटों से नंगे पांव सकुशल बाहर निकलता है। होलिकादहन के अगले दिन यानि धुलेंडी को समूचे ब्रज में रंग और गुलाल की बड़ी ही विकट होली खेली जाती है। धुलेंडी के दिन सारे देश में होली समाप्त हो जाती है, परंतु ब्रज में इसके लिए दस दिन बाद तक भी होली किसी न किसी रूप में निरंतर चलती रहती है। धुलेंडी के दिन चार दिन बाद तक समूचे ब्रज में तानों के गायन का क्रम चलता है।
खिलते हैं। अतः ब्रज में होली पर रंग-बिरंगे, कोमल-मृदुल, महकते- मुस्कुराते फूलों से भी होली खेली जाती है। फूलों की यह होली वृंदावन में रास-लीलाओं के दौरान राधा व उनकी सखियाँ तथा कृष्ण व उनके सखा फूलों से एक-दूसरे के साथ इस तरह होली खेलते हैं कि राधा-कृष्ण फूलों की वर्षा से उसके अंदर दब- ढ़क जाते हैं और लीला स्थल पर फूलों का एक विशाल ढ़ेर बन जाता है। इस ढेर में से निकलते हुए राधा-कृष्ण जब इन फूलों को अपने दोनों हाथों से उछालते हैं तो बड़ा ही मनोरम दृश्य उत्पन्न होता है।

फाल्गुन शुक्ल पुर्णिमा को होलिका दहन होता है। इस दिन मथुरा के फालैन और जटवारी ग्राम में जिस प्रकार की होली जलाई जाती है, वह अप्रतिम है।

फालैन मथुरा से 53 किलोमीटर और कोसीकलां से 1 किलोमीटर दूर छाता तहसील का एक छोटा सा गांव है। यहां फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी को विशालकाय होली सजाई जाती है। इस होली को यहां के प्रल्हाद मंदिर का पंडा प्रल्हाद कुंड में स्नान करने के बाद प्रज्जवलित करता है तथा इस होली को उसकी ऊंची- ऊंची लपटों के मध्य में से नंगे पांव पार करता है, परंतु उसको आग की लपटें अपनी चपेट में नहीं लेतीं। मथुरा से लगभग 52 किलोमीटर दूर स्थित छाता तहसील के जटवारी गांव में भी होलिका दहन के दिन एक पंडा जलती हुई होली की विशालकाय तेज लपटों से नंगे पांव सकुशल बाहर निकलता है। होलिकादहन के अगले दिन यानि धुलेंडी को समूचे ब्रज में रंग और गुलाल की बड़ी ही विकट होली खेली जाती है। धुलेंडी के दिन सारे देश में होली समाप्त हो जाती है, परंतु ब्रज में इसके लिए दस दिन बाद तक भी होली किसी न किसी रूप में निरंतर चलती रहती है। धुलेंडी के दिन चार दिन बाद तक समूचे ब्रज में तानों के गायन का क्रम चलता है।
खिलते हैं। अतः ब्रज में होली पर रंग-बिरंगे, कोमल-मृदुल, महकते- मुस्कुराते फूलों से भी होली खेली जाती है। फूलों की यह होली वृंदावन में रास-लीलाओं के दौरान राधा व उनकी सखियाँ तथा कृष्ण व उनके सखा फूलों से एक-दूसरे के साथ इस तरह होली खेलते हैं कि राधा-कृष्ण फूलों की वर्षा से उसके अंदर दब- ढ़क जाते हैं और लीला स्थल पर फूलों का एक विशाल ढ़ेर बन जाता है। इस ढेर में से निकलते हुए राधा-कृष्ण जब इन फूलों को अपने दोनों हाथों से उछालते हैं तो बड़ा ही मनोरम दृश्य उत्पन्न होता है।

फाल्गुन शुक्ल पुर्णिमा को होलिका दहन होता है। इस दिन मथुरा के फालैन और जटवारी ग्राम में जिस प्रकार की होली जलाई जाती है, वह अप्रतिम है।

फालैन मथुरा से 53 किलोमीटर और कोसीकलां से 1 किलोमीटर दूर छाता तहसील का एक छोटा सा गांव है। यहां फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी को विशालकाय होली सजाई जाती है। इस होली को यहां के प्रल्हाद मंदिर का पंडा प्रल्हाद कुंड में स्नान करने के बाद प्रज्जवलित करता है तथा इस होली को उसकी ऊंची- ऊंची लपटों के मध्य में से नंगे पांव पार करता है, परंतु उसको आग की लपटें अपनी चपेट में नहीं लेतीं। मथुरा से लगभग 52 किलोमीटर दूर स्थित छाता तहसील के जटवारी गांव में भी होलिका दहन के दिन एक पंडा जलती हुई होली की विशालकाय तेज लपटों से नंगे पांव सकुशल बाहर निकलता है। होलिकादहन के अगले दिन यानि धुलेंडी को समूचे ब्रज में रंग और गुलाल की बड़ी ही विकट होली खेली जाती है। धुलेंडी के दिन सारे देश में होली समाप्त हो जाती है, परंतु ब्रज में इसके लिए दस दिन बाद तक भी होली किसी न किसी रूप में निरंतर चलती रहती है। धुलेंडी के दिन चार दिन बाद तक समूचे ब्रज में तानों के गायन का क्रम चलता है।
यह ब्रज की एक विशेष समूह गायन शैली है। अपने देश में ब्रज के अलावा कहीं भी तान-गायकी सुनने को नहीं मिलती है।

चैत्र कृष्ण द्वितीया को मथुरा से 22 किलोमीटर दूर बलदेव (दाऊजी) के डा. दाऊदयाल मंदिर में दाऊजी का हुरंगा होता है, जो कि अत्यधिक लोकप्रिय है। इसे बड़ा फाग भी कहा जाता है। इस हुरंगे में गुसाई समाज के हुरिहरे (पुरुष) तथा हुरिहारनें ( स्त्रियां), गोप तथा गोपिका के स्वरूप में होली खेलते हैं। दाऊजी मंदिर के प्रांगण में घुटनों तक भरे पानी एवं रंग-गुलाल की इंद्रधनुषी छटा में होने वाले इस अनूठे हुरंगे में होली खेलने आई हुरिहारिनें, हुरिहारों के शरीर से उनके कपड़े फाड़ती हैं। तत्पश्चात वे इन फटे हुए कपड़ों से कोड़ा बनाकर हुरिहरों की जमकर पिटाई करती है। इसके जबाब में ब्रज के ये वीर हुरिहारे मंदिर में बने हुए कुंड से पिचकारियों व बाल्टियों में रंग भर-भर कर हुरिहारिनों को रंग से सराबोर कर देते हैं।

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