हमारे त्यौहारों में छिपा गहन विज्ञान

त्यौहारों को मनाने के पीछे गहन विज्ञान है। इसका उद्देश्य मौसम बदलने पर स्वास्थ्य की देखभाल, पर्यावरण को स्वच्छ रखना, लोगों के जीवन में खुशियां लाकर, मिलजुलकर भाईचारा बनाए रखना है। इनके वैज्ञानिक कारणों पर हमें गौर करना चाहिए।

हमारा भारत पर्वों और त्यौहारों का देश है और इन्हें हर्षोल्लास से मनाने की परंपरा है। हमारे देश मे अनेक राज्य हैं और उनके इतने त्यौहार हैं, कि यदि कोई चाहे तो हर महीने त्यौहार मना सकता है।

भारत में मौसम और जलवायु परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन से लोगों के शरीर और मन में काफी बदलाव आता है। इसलिए त्यौहार, व्रत और उपवास, हमारे रहन सहन और खानपान को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए हैं।

हिंदू धर्म में चार्तुमास का विशेष महत्व है। यह आषाढ़ शुक्ल एकादशी से, कार्तिक शुक्ल एकादशी तक 4 महीनों का होता है। इन दिनों पूजा पाठ, व्रत, उपवास का विशेष महत्त्व है। चार्तुमास में 1 समय के भोजन का विधान है। इसमें गरिष्ठ और मासांहारी भोजन का त्याग कर, सादा सात्विक सुपाच्य भोजन किया जाता है। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि चार्तुमास मुख्यत: बारिश का मौसम होता है। धूप नहीं निकलती इससे अनेक प्रकार के कीड़े-मकौड़े और बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं। इस मौसम में शरीर की पाचन शक्ति भी मंद हो जाती है।  इससे पित्त और आम्ल प्रधान चीजें नुकसान करती हैं, इन सबसे बचने के लिए खानपान में सावधानी होना जरूरी है, तभी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है अन्यथा हम बीमार हो सकते हैं। इसीलिए चार्तुमास में उपवास, परहेज और संयम बताया है। अनेक चीजों जैसे दूध, दही, घी, हरी पत्तेदार सब्जियों ना खाने का विधान है। कहा गया है कि ऐसा करने से शत्रुनाश, ज्ञान व बुद्धि की वृद्धि और स्वास्थ्य लाभ होगा। चूंकि सामान्य जन लाभ की बात समझते हैं और नियमों का कठोरता से पालन करते हैं, इसीलिए शायद पुराणों में ऐसा कहा गया होगा।

विज्ञान के अनुसार इन दिनों वात, पित्त और कफ की बीमारियां बढती हैं। यदि ऊपर बताए गए पदार्थ खाए गए तो संक्रमण (इन्फेक्शन) हो सकता है। शायद इसीलिए इन दिनों दूध त्याग कर, शिव जी पर चढ़ाने की परंपरा है।

हमारे ॠषि-मुनियों ने प्रकृति को बहुत महत्व दिया है। पेड़-पौधों, पशु-पक्षी सभी को पूजा में स्थान दिया है। वृक्षों में देवताओं का वास बताया है। इसके पीछे वृक्षों के संरक्षण की भावना है। श्रावण मास में मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा के कुछ इलाकों में ’हरियाली अमावस्या’ पर्व मनाया जाता है। इसमें पीपल के वृक्ष की पूजा परिक्रमा कर, मालपुए का भोग लगाया जाता है और एक पौधे का रोपण किया जाता है। इस त्यौहार में वृक्षारोपण का अधिक महत्व है। पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने के लिए ’हरियाली अमावस्या’ जैसे त्यौहारों की रचना की, इसके पीछे हमारे ॠर्षि-मुनियों की वैज्ञानिक सोच ही है। ग्लोबल वार्मिग की समस्या से हम सभी परिचित हैं और जानते हैं कि वृक्षारोपण ही इसका हल है। इसलिए ऐसे त्यौहार देशभर में मनाए जाने चाहिए।

श्रावण मास में ’कांवड यात्रा’ का भी विशेष महत्व है। इसमें श्रद्धालू पानी की कांवड उठाकर पैदल यात्रा करते हैं। इसके पीछे भी विज्ञान है। पैदल यात्रा से स्वास्थ्य लाभ होता है। बारिश में चलते हुए पैरों के दर्द, चुभन की परवाह न करते हुए निरंतर आगे बढ़ना सहनशीलता बढ़ाता है। इनका एक ही लक्ष्य है शिव जी पर जल चढ़ाना। इससें इच्छाशक्ति दृढ़ होती है। श्रद्धालुओं के आपसी मेलजोल से सामाजिकता बढ़ती है।

श्रावण माह में छत्तीसगढ़ के अंदरूनी गावों में एक अनोखा त्यौहार मनाया जाता हैैं। ’इतवारी’ खेतों की जुताई, बुवाई और रोपाई के बाद गाववाले निश्चित करते हैं कि किस इतवार से किस इतवार तक यानि 3, 5 या 7 दिन इतवारी मनाया जाय। इस निश्चित अवधि में खेतों में काम करने की मनाही होती है। इसका वैज्ञानिक कारण यह होता है कि जुताई, बुवाई और रोपाई में काम करते समय मनुष्य के पैर लगातार मिट्टी और  पानी में धंसे रहते हैं, जिससे पैरों की उंगलियों में घाव और गलन होने लगती है। इसलिए पैरों को सूखा रखना, उनका इलाज करना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होता था। इस त्यौहार की रचना हमारे पूर्वजों की दूरगामी सोच की परिचायक है। अब यह त्यौहार लुप्तप्राय सा हो गया है।

श्रावण में ’पोला’ का त्यौहार आता है। यह प्रमुखत: बैलों का त्यौहार है। आजकल टैक्टर आ गए हैं परंतु खेती के कामों में बैलों की ही मदद ली जाती थी, जिससे वे थक जाते हैं। इसलिए इस दिन उनकी तेल से मालिश कर नहला धुलाकर सजाया जाता है। खाने के लिए नैवेद्य देकर खेती का कोई काम नहीं करवाया जाता, हमारी संस्कृति में पशुओं का भी कितना ध्यान रखा जाता है; यह त्यौहार उसका उदाहरण है।

’नागपंचमी’ के त्यौहार में नाग की पूजा करना शुभ माना जाता है। वैज्ञानिक रूप से देखें तो नाग या सांप हमारे इको सिस्टम की सबसे मजबूत कड़ी है। यह किसानों का मित्र है। लेकिन इसे खतरनाक समझकर लोग भय से इसे देखते ही मार देते हैं। शायद इसी कारण इसे धर्म से जोड़ा गया ताकि लोग इन्हें मारने की बजाय इनकी पूजा करें और हमारा इको सिस्टम बना रहें। नागपंचमी में नाग की पूजा कर दूध पिलाया जाता है। परंतु लोग जागरूक हो गए हैं, जानते हैं सांप दूध नहीं पीता और संपेरों द्वारा उन्हें पिटारे में बंद करना गलत है। इसीलिए आजकल महिलाएं नागपंचमी में मिट्टी के नाग लाकर उनकी पूजा करती हैं और उसे तुलसी के पौधे में रख देती हैं। धीरे- धीरे वह मिट्टी में मिल जाता है। इससे परंपरा भी बनी रहती है और पर्यावरण भी।

कुछ दिनों के बाद करवाचौथ, रक्षाबंधन, तीज और गणेश चतुर्थी जैसे त्यौहार आने वाले हैं। रक्षाबंधन में आज की बहनें अपने भाई की पढ़ाई और करियर में मदद कर उसके भविष्य की रक्षा करने लगी हैं। करवाचौथ में पत्नी ही उपवास नहीं रखती पति भी साथ में उपवास रखकर उसका हौसला बढ़ाता है। परंपरा निभाते हुए रिश्तोें में प्यार और भी बढ़ जाता है।

पहले जमाने में गणेशजी की मूर्ति चिकनी मिट्टी से बनाई जाती थी। उनकी प्रतिमा को हल्दी, कुमकुम, चंदन और फूलों के रंगों से रंगा जाता था। विसर्जन के समय चिकनी मिट्टी पानी में घुल जाती थी। हल्दी, कुमकुम, चंदन और फूलों के रंग सब मिलकर नदी, तालाब और पोखर में जमा हुए बारिश के पानी को शुद्ध करते थे। अत: गणपति विसर्जन के पीछे पर्यावरण को शुद्ध करने का वैज्ञानिक कारण था। अब इन सबकी जगह प्लास्टर ऑफ पॅरिस और रासायनिक रंगों ने ले ली है, जिससे फायदे की बजाये नुकसान हो रहा है।

इस तरह हमने देखा कि त्यौहारों को मनाने के पीछे गहन विज्ञान है। इसका उद्देश्य मौसम बदलने पर स्वास्थ्य की देखभाल, पर्यावरण को स्वच्छ रखना, लोगों के जीवन में खुशियां लाकर, मिलजुलकर भाईचारा बनाए रखना है। इसके अलावा हमारे त्यौहार और उत्सव प्रकृति और ईश्वर के प्रति धन्यवाद देने का एक जरिया है। इन त्यौहारों का हमारे दैनिक विकास से गहरा संबंध है। हमें इनके वैज्ञानिक महत्त्व को समझना होगा, तभी हमारी पौराणिक परंपरा को बनाए रखते हुए अपने परिवार समाज और देश को समस्याहीन सुखमय समृद्धिवान और शांतिमय रख सकते हैं।

 

 

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