“स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा”

यह नारा देश के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने दिया था उन्होंने ब्रिटिश सरकार को पूरी तरह से देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। बाल गंगाधर तिलक एक प्रसिद्ध वकील, शिक्षक, समाजसुधारक और राष्ट्रवादी व्यक्ति थे बाद में लोगों ने उन्हे लोकमान्य की भी उपाधि दी। आज हम लोकमान्य गंगाधर तिलक को उनके जन्मोत्सव पर याद कर रहे हैं। लोकमान्य ही वह पहले नेता थे जिन्होने ब्रिटिश काल में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की थी और नारा दिया था कि “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा”। उनका यह नारा बहुत चर्चित हुआ और देश के युवाओं को आकर्षित भी किया जिसके बाद लाखो युवाओं ने इस नारे को हकीकत में बदला और देश को आजाद कराने में सफल हुए।
देश की आजादी में लाखों युवाओं ने अपनी जान कुर्बान की है इसमें से ही एक है बाल गंगाधर तिलक जिन्होंने देश की आजादी के लिए योगदान दिया है। 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में एक ब्राह्मण परिवार में इनका जन्म हुआ था। यह उन लोगों में शामिल हुए जिन्होंने आधुनिक शिक्षा ग्रहण की और देश की आजादी में बड़ा योगदान दिया इनकी उच्च शिक्षा ने अंग्रेजों को यह बता दिया था कि सिर्फ वह ही कानून के जानकार नहीं है। हालांकि इन्होने पूरे जीवन भर अंग्रेजी का विरोध किया और कहा कि यह भाषा हमें अनादर का पाठ पढ़ाती है।
देश में जब आजादी की लहर चल रही थी तो लोगों को इकट्ठा करना भी एक बड़ी चुनौती थी अंग्रेजी शासन की डर से लोग एक स्थान पर कम मिलते थे इसलिए गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव और शिव जन्मोत्सव का शुभारंभ किया जिससे लोग एक सप्ताह तक इकट्ठा होने लगे और उसी के माध्यम से लोगों में क्रांतिकारी भावनाएं जागृत की जाने लगी। आज पूरे महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश में गणपति का उत्सव पूरे धूमधाम से मनाया जाता है। धीरे धीरे देश में आजादी की लहर तेजी से बढ़ने लगी जिसके बाद तिलक ने लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए समाचार पत्रों का सहारा लिया और दो प्रमुख समाचार पत्रों की शुरुआत की, अंग्रेजी में मराठा दर्पण और मराठी में केसरी नाम से समाचार पत्र निकाले जाने लगे जिसमें बाल गंगाधर तिलक का एक विशेष पेज होता था। ब्रिटिश विरोधी अपने आलेखों की वजह से उन्हे कई बार जेल भी जाना पड़ा लेकिन उन्होने कभी भी हार नहीं मानी। समाचार पत्र केसरी में उन्होंने “देश का दुर्भाग्य” नाम से एक लेख लिखा था जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ था। अंग्रेजी सरकार ने बाल गंगाधर तिलक पर देशद्रोह का मुकदमा लगाकर उन्हें 6 वर्ष के लिए जेल में डाल दिया।
बाल गंगाधर तिलक ने 1890 में कांग्रेस का हाथ पकड़ा लेकिन वहां उनके विचार लोगों से नहीं मेल खा रहे थे। यह गरम दल के नेता थे जबकि कांग्रेस में नरम और गरम दल के नेता शामिल थे आखिरकार 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल के दो भागों में बंट गयी। गरम दल में लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल को शामिल किया गया जो बाद में लाल, बाल और पाल के नाम से प्रसिद्ध हुए। सन 1916 में होम रुल लीग की स्थापना को लेकर तिलक को बहुत प्रसिद्धि मिली और पूरे देश से लोग उनकी आजादी की लड़ाई में शामिल होने लगे। 1 अगस्त 1920 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया उनकी मृत्यु मुंबई में ही हुई थी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को भारतीय क्रांति का जनक कहा जाता है।

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