गली गली में : राजधानी दिल्ली

दिल्ली तप ही रही थी शाहीन बाग से, विधान सभा चुनावों से, जेएनयू से, ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने से, निर्भया के न्याय से और कोरोना से। …ये तपिश धीरे-धीरे बढ़ती गई और पहुंचती गई दिल्ली से देश की हर गली तक।

दिल्ली हमारे देश की राजधानी है और राजधानी का सुर्खियों में बने रहना अपेक्षित ही होता है। यहां घटने वाली घटनाओं का कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। पिछले कुछ दिनों को याद कर दिल्ली को अगर देश की सबसे ‘हॉट सिटी’ कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि दिल्ली तप ही रही थी शाहीन बाग से, विधान सभा चुनावों से, जेएनयू से, ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने से, निर्भया के न्याय से और कोरोना से। इसका प्रभाव जो होना था वह हुआ भी। ये तपिश धीरे-धीरे बढ़ती गई और पहुंचती गई दिल्ली से देश की हर गली तक।

शाहीन बाग में बुर्काधारी महिलाओं और बच्चों को धरने पर बिठा कर मुसलमान मर्द दंगों की योजना बना रहे थे। ईंट, पत्थर, डंडे, पेट्रोल आदि सब का इंतजाम कर लिया गया था। शांतिपूर्वक प्रदर्शन की आड़ में कुछ दिनों में ही दिल्ली को हर तरह से अशांत करने की तैयारी हो चुकी थी। हालांकि यह साफ दिखाई दे रहा था कि यह प्रदर्शन केवल सीएए के विरोध तक का नहीं है बल्कि उन सभी निर्णयों के विरोध में हैं जो भारत को ‘गजवा-ए-हिंद’ बनाने के आड़े आ रहे हैं या भविष्य में आ सकते हैं।

यह प्रदर्शन तो अब भी चल रहा है, परंतु प्रदर्शनकारियों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। प्रदर्शनकारियों की यह मांग शुरू से ही रही है कि उन्हें मनाने-समझाने के लिए प्रधान मंत्री स्वयं आएं। प्रधान मंत्री भी इतने अडिग थे कि उन्होंने मगरमच्छ के आंसू रोने वाले इन प्रदर्शनकारियों की ओर देखा तक नहीं। हद तो यह हो गई कि अब ये जो गिने-चुने लोग वहां बैठे हैं, वे कोरोना से बचने के लिए सरकार से ही यह उम्मीद कर रहे हैं कि मास्क और सेनेटाइजर भी सरकार के द्वारा ही उन्हें दिए जाएं जैसे कि वे प्रदर्शनकारी न होकर सरकारी कर्मचारी हैं, जिन्हें सरकार ने ही प्रदर्शन करने के लिए बिठाया हो। इन विरोध प्रदर्शनों की देखादेखी उप्र और देश के अन्य राज्यों में भी कुछ प्रदर्शन हुए परंतु मुख्यमंत्री योगी के कड़े कदमों के कारण जल्द ही उन्हें रोक लिया गया। परंतु दिल्ली के प्रदर्शन से देश की गलियां प्रभावित तो हुई ही।

शाहीन बाग में चल रहे इस प्रदर्शन के दौरान ही दिल्ली के विधान सभा चुनाव भी आ गए। राजधानी के लोगों ने मुफ्त में बिजली, पानी बांटने वालों को फिर से सत्ता सौंप दी और तुरंत दिल्ली दंगों के रूप में इस गलती की सजा भी पा ली। शाहीन बाग और दंगों ने केजरीवाल सरकार की प्रबंधन शून्यता पर फिर मुहर लगा दी। देश की गलियों में फिर एक बार यह संदेश चला गया कि अगर सरकार केजरीवाल जैसी रही तो जो दिल्ली में हुआ वह कहीं भी हो सकता है।

दंगों के बाद दिल्ली में कुछ ठंडक पड़ ही रही थी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद फिर से राजनैतिक सरगर्मियां बढ़ने लगीं। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस में अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा था। अतः उन्होंने भाजपा का रुख कर लिया। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मिलने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आधिकारिक तौर पर भाजपा की सदस्यता ले ली। ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा उठाए गए इस कदम के कारण कांग्रेस के अन्य युवा नेताओं में खलबली मच गई है। सचिन पायलट तथा मिलिंद देवड़ा जैसे नेता भी क्या भाजपा की ओर रुख करेंगे, यहां कांग्रेस के लिए प्रश्नचिह्न बन गया है। अन्य प्रदेशों के युवा नेता भी नेतृत्व ना मिलने के कारण तथा पार्टी को अपनी सेवाएं देकर भी अपना स्थान ना बना पाने के कारण अगर रूठ जाते हैं तो इसका असर दिल्ली कांग्रेस से लेकर देशभर की कांग्रेस पर होगा।

दिल्ली की इस राजनीतिक गहमागहमी के बीच कोरोना अपने पांव पसार ही रहा था। देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली में विदेशों से हवाई यात्रा की जाती है। विदेशों से भारतीयों का तथा विदेशियों का आना-जाना लगा ही रहता है। अत: विदेशों से कोरोना के शिकार मरीजों के दिल्ली आने की संभावना बढ़ जाती है। यह लेख लिखने तक देशभर में कोरोना के कारण जिन चार लोगों की मृत्यु हुई है, उनमें भी दिल्ली के एक व्यक्ति का नाम है। 19 मार्च 2020 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना से बचने के लिए 9 सूत्र बताए। उन्होंने कोरोना से निपटने के लिए लोगों से 15 दिन मांगे। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि इस दौरान लोग कहीं पर एकत्रित ना हों, किसी सार्वजनिक कार्य में सम्मिलित ना हों, अधिक आवश्यकता ना हो तो ऑफिस बंद रखे जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा दिया गया अत्यंत मार्मिक तथा भावनात्मक संदेश देशभर के लोगों ने सुना तथा इस पर अमल करने की कोशिश की है। दिल्ली से मिले हुए इस संकेत का सकारात्मक परिणाम देश की हर गली में दिखाई दे रहा है। लोग अत्यधिक आवश्यकता होने पर ही मास्क लगाकर घर से बाहर निकल रहे हैं। लोगों को यह आशा है अगर सरकार की पूर्णत: मदद की जाए तो देश को कोरोना से लड़ने में सफल होगा।

एक ओर जहां इस आपदा से बचने के लिए देश के सभी लोग एकात्म भाव से लड़ने की तैयारी कर रहे थे वहीं जेएनयू अपनी आदत के अनुसार फिर से वामपंथी और विघटनकारी कार्यों को अंजाम दे रहा था। जेएनयू के कुछ रास्तों का नामकरण किया गया। उसमें से एक रास्ते को स्वातंत्र्यवीर सावरकर का नाम दिया गया था। वामपंथी विचारों के जेएनयू विद्यार्थियों को भला ये कैसे सुहाता? उन्होंने स्वातंत्र्यवीर सावरकर के नाम पर कालिख पोत दी। अपने विरोध के प्रदर्शन का यह तरीका तो भी गलत है, फिर भी इसे दरकिनार किया जा सकता है। परंतु स्वातंत्र्यवीर सावरकर के नाम की जगह मोहम्मद अली जिन्ना का पोस्टर लगा देना तो किसी भी तरह से मान्य नहीं किया जा सकता। यह तो सीधे-सीधे देशद्रोह ही है। जेएनयू तथा अन्य विश्वविद्यालयों में कोरोना के कारण क्लासेस बंद कर दी गईं हैं, जिसके कारण छात्र आंदोलन नहीं कर सकते अन्यथा इस मुद्दे पर फिर एक बार छात्रों द्वारा आंदोलन किया ही जाता। दिल्ली की जेएनयू फिर एक बार देश को यह संदेश दे रही है कि ऐसे विश्वविद्यालयों पर कडी प्रशासनिक कार्रवाई की जाए या फिर इन्हें बंद ही कर दिया जाए।

इतनी सारी नकारात्मक बातों के देश ने 20 मार्च की सुबह राहत की सांस ली। इसका कारण भी दिल्ली ही रही। विगत 7 सालों से लंबित निर्भया के केस में अंततः न्याय की विजय हुई। निर्भया के साथ बर्बरता करने वाले छ: में से से चार अपराधियों को दिल्ली की ही तिहाड़ जेल में 20 तारीख की सुबह 5:30 बजे फांसी पर लटकाया गया। ज्ञात हो कि 7 वर्ष पूर्व दिल्ली में निर्भया के साथ चलती बस में छ: लोगों द्वारा इस बर्बरता को अंजाम दिया गया था। उन छह आरोपियों में से एक ने आत्महत्या कर ली थी। एक को अल्पवयीन करार देते हुए न्यायालय ने बाल सुधार गृह भेजा था, जहां से 3 साल बाद वह  छूट गया। बचे हुए 4 लोगों को 7 साल के बाद 20 मार्च 2020 को सुबह 5:30 बजे फांसी दी गई। इन 7 सालों में दोषियों को बचाने के लिए उनके वकीलों ने हर तरह के हथकंडे अपनाए थे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा फांसी की सजा माफ करने की अर्जी ठुकराने के बाद भी दोषियों के वकील उनको बचाने की भरसक कोशिश करते रहे परंतु अंततः निर्भया तथा उसकी मां को न्याय मिल ही गया। हालांकि यह प्रश्न अभी भी जीवित है कि देश में आज भी बहुत सारी निर्भया हैं जिन्हें न्याय नहीं मिल पाया है। उन्हें न्याय कब मिलेगा? एक बार पुनः दिल्ली से यह सकारात्मक और कठोर संदेश देश को दिया गया कि न्याय मिलने में थोड़ा विलंब हो सकता है परंतु न्याय मिलता अवश्य है।

उपरोक्त सभी घटनाओं का केंद्र भले ही दिल्ली हो परंतु इन सभी का असर पूरे देश पर पड़ा है। सामाजिक, राजनैतिक, स्वास्थ्य, न्याय इन सभी पहलुओं पर विगत कुछ दिनों में दिल्ली में जो भी घटनाएं घटीं उन घटनाओं से सारा देश प्रभावित हुआ है।

 

आपकी प्रतिक्रिया...