भौगोलिक रचना,  वनस्पति एवं आयुर्वेद

भारत के उत्तर क्षेत्र में स्थित देवभूमि उत्तराखंड लगभग साढ़े त्रेपन हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ देश का सांस्कृतिक, पौराणिक, संगठनात्मक तथा वैदिक दृष्टि से संपन्न प्रदेश है। उत्तराखंड का क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का मात्र 1.7% होने पर भी उत्तराखंड का योगदान भारत में अहितीम है। देवभूमि उत्तराखंड का 85% से भी अधिक भूभाग पर्वतीय है, इसी विशेषता के कारण उत्तराखंड अपनी वन संपदा तथा आयुर्वेद के प्रति योगदान में अग्रणी राज्य है। आयुर्वेद के महाऋषि आचार्य चरक द्वारा लगभग 2000 वर्ष पूर्व चरक संहिता में कहा गया था।

“हिमवान औषधि भूमिनां श्रेष्ठम॥”

अर्थात औषधियों (जड़ी बूडी) हेतु हिमालय की भूमि सर्वश्रेष्ठ है।

9 नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन केफलस्वरुप उत्तराखंड की स्थापना हुई थी। प्रारंभ में इसका नाम उत्तराचंल था। ऊंचाई की दृष्टि से उत्तराखंड के हिमालयी वनों को निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है-

उष्णकटिबंधी प्रदेश- यह देहरादून एवं शिवालिक वनखंड का क्षेत्र है, जिसमें पर्वतीय एवं मैदानी दोनों ही प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं। यहां की प्राकृतिक सुंदरता अद्भुत है। इस क्षेत्र में मुख्य रुप से कांचनार, हरीतकी, विभीतकी, आमलकी, वासा, हरसिंगार, आवर्तकी (मुरुडफल्ली), मंजिष्ठा और कटफल (काफंल) आदि पाये जाते हैं। यह क्षेत्र 1500 मीटर तक की ऊंचाई का क्षेत्र है।

शीतोष्ण कटिबंधी प्रदेश- इन क्षेत्रों में तापमान उष्णकटिबंधी प्रदेश से कम रहता है तथा ऊंचाई अधिक रहती है। इस क्षेत्र में जलवायु के प्रभाव से अनेक वृक्ष सालभर हरे तथा पत्तों से आच्छादित रहते हैं और ऐसा लगता है कि इन वृक्षों में पतझड आती ही नहीं। यही कारण है कि इस क्षेत्र की जलवायु को अनेक प्रकार के क्षय रोगों की अवस्थाओं के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस क्षेत्र में मुख्य रुप से कटफल, मोरु, कैल, राई, बुरांस (राज्य वृक्ष), देवदार, तेजपत्र, दारुहरिद्रा तथा तालीसपत्र आदि वनस्पतियां पायी जाती हैं।

हिमाद्रि एवं उपहिमाद्रि- हिमाद्रि प्रदेश अधिक ऊंचाई वाले होते हैं। इन क्षेत्रों में अनेक प्रकार की रंगबिरंगी तथा सुगधित वनस्पतियों सहित जटामांसी, भूर्ज, सिमरु, ढेलू, गोगल, कोठया आदि वनस्पतियां मुख्य रुप से पायी जाती हैं। अधिक ऊंचाई पर ब्रम्हकमल, फेन कमल, जोगीपानशाह आदि प्रजाति की वनस्पतियां पायी जाती हैं। यहां के वनों में कस्तुरी मृग पाये जाते हैं। नर कस्तुरी मृगों की नाभी से सुगंधित ‘मृगमद’ निकलती है, जिसे कस्तुरी कहा जाता है। यह कस्तुरी मृग उत्तराखंड का राज्य पशु है, तथा ब्रम्हकमल को राज्य पुष्प के रूप में मान्यता प्राप्त है।

महाऋषि सुश्रत द्वारा हजारों वर्ष पूर्व बतायी गयी स्वास्थ्य की परिभाषा स्वास्थ को परिभाषित करते हुए कहती है कि दोषों का सम होना, शरीरस्थ अग्नि का सम होना, धातु तथा मल क्रिया का सम होना तथा आत्मा, इंद्रिय व मन का प्रसन्नता की अवस्था में रहना ‘स्वस्थ’ होने के लक्षण हैं। सुश्रुत द्वारा वर्णित यह परिभाषा आज भी सटीक प्रतीत होती है। उत्तराखंड के कोटद्वार में स्थित “चरेख डांडा” महार्षि चरक की कर्म स्थली है, इस दिव्य स्थान पर आचार्य चरक ने आयुर्वेद ज्ञान से परिपूर्ण ग्रंथ की रचना की थी।

उत्तराखंड राज्य में उत्पन्न होने वाली कुछ आयुर्वेद वनस्पतियां:-

कांचनार :- इसका स्थानिक नाम गुरयाल है। इसके हृदयाकार पत्र होते हैं। इसके छाल, पुष्प व बीज प्राय: उपयोग में लाये जाते हैं। यह मुख्यत: टिहरी वनखंड, घनसाली, देवप्रयाग, उत्तरकाशी, कोटद्वार आदि स्थानों पर प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती है।

हरितकी:- इसको हरड नाम से भी जाना जाता है। इसके फल, फलमज्जा तथा बीज तैल का औषधीय उपयोग सर्वाधिक होता है। इसका फल काल प्राय: वसंत ऋतु में होता है। यह टिहरी, वनखंड, घनसाली, उत्तरकाशी, कुण्ड, जौनसार, श्रीनगर आदि में बहुतायत से पाया जाता है। यह त्रिफला का घटक द्रव्य हैं।

 आमलकी:- इसका स्थानिक नाम आंवला है। यह पंच रस युक्त (खट्टा, मीठा, तीखा, डवा, कसैला) द्रव्य शीत वीर्य होता है। इसका फल उत्तम माना गया है। यह द्रव्य प्रमेह में अत्यंत लाभप्रद जरा को टालने वाला उत्तम रसायन है।

 वासा:- यह तिक्त (कडवा) रसात्मक द्रव्य कम ऊंचाई पर बहुतायत में उपलब्ध है। यह वीर्य में शीतल, हृदय तथा श्वास सम्बंधी विकारों में अतिलाभप्रद होता है। इसको अडूसा नाम से भी जाना जाता है।

आवर्तकी:- इसका स्थानिक नाम भिमल्या है। इसके वृक्ष आकार में छोटे होते हैं, तथा इसका प्रयोज्यांग फल तथा मूल होते हैं। यह उदर विकारों में अत्यंत लाभप्रद तथा शीघ्र फलदायी होता है। इसके शीतकाल में फल लगते हैं।

 शिरीष:- इसका स्थानिक नाम सिरस है। इसके वृक्ष बड़े आकार के होते हैं, इसका प्रयोज्यांग छाल तथा बीज हैं। यह द्रव्य त्रिदोष शामक तथा विष की चिकित्सा में उपयोगी है। त्वचा के लिए लाभ प्रद यह द्रव्य न ही उष्ण और न ही शीत अर्थात अनुष्णाशीत है।

 ज्योतिष्मती:- इसका स्थानिक नाम मालकौंणी अथवा मालकांगनी है। यह द्रव्य मेधा वृद्धिकर रसायन है, यह स्मृतिवर्धक, अग्नि को बल देनेवाला तथा उष्ण वीर्य है। यह उत्तराखंड में 1200 मीटर की ऊंचाई तक छोटी इंद्रोला, टिहरी वनखंड, नरेन्द्रनगर आदि स्थानों पर मिलता है। इसके बीज व उनका तैल नैत्रविकार तथा मानसिक विकारों में अत्यंत लाभप्रद है।

 मंजिष्ठा:- इसका स्थानीयनाम मंजीठ व ल्यचकुरो है। इसके रक्तवर्णी मूल तथा काण्ड इसके उत्तम प्रयोज्यांग हैं। यह रक्त विकारों, नैत्ररोगों तथा स्त्री प्रजनजांग के रोग में अत्यंत उपयोगी है। यह उत्तराखंड में 1200 से 2100 मीटर की ऊंचाई तक भागीरथी घाटी, जमुना घाटी चकराता, हरकीदून, मंसूरी, नैनीताल, अल्मोडा आदि स्थानों पर प्राप्त होता है।

 कम्पिल्लक:- यह रीणों तथा कमीला नाम से उत्तराखंड में जाना जाता है। यह उत्तराखंड के उष्ण भागों में 900 मीटर की ऊंचाई तक प्राय: सभी घाटियों में पाया जाता है। यह व्रणों के रोपण में लाभप्रद तथा मल के रेचन में सहायक औषधी है।

 देवदार :- इसका संस्कृत नाम देवदारु है, इसके सदाहरित वृक्ष, शाखाएं फैली हुई तथा त्रिकोण युक्त पत्र होते हैं। यह व्रण शोधक, अग्निदीपक, आमवात तथा पक्षाधातू में उपयोगी है। यह उत्तराखंड में 2700 मीटर से 3600 मीटर की ऊंचाई तक मिलता है।

दारुहरिद्रा :- इसका स्थानिक नाम किंगोड है। इसकी शाखाएं अंदर से पीतवर्ण की होती है। इसका प्रयोज्यांग इसका कांड है। इसका वीर्य उष्ण है। यह स्तन्य शोधक, पाचक, व्रणों मे लाभप्रद तथा प्रमेह में हितकर होता है। यह उत्तराखंड में 900 मीटर से 3600 मीटर की ऊंचाई तक मिलता है।

तेज पत्र :- इसको दालचीनी व घिरवैल्डु नाम से जाना जाता है। यह द्रव्य रुचिकर, कण्ठ शोधक, अर्दू, हृदरोग, कृत्रिरोग, मुखरोग, कण्ठरोग में लाभप्रद है। यह तासीर मे गरम (उष्ण वीर्य) है। इसका प्रयोज्यांग इसका पत्र व छाल हैं। यह उत्तराखंड में 1200 से 1800 मीटर की ऊंचाई तक प्राय: भिलंगना घाटी, भागीरथी घाटी, मंदाकिनी घाटी, घोन्टी, इंद्रोला, चकराता आदि में पाया जाता है। इसके छाल व पत्रों का संग्रह किया जाता है।

 जठामांसी :- इसका स्थानिक नाम मांसी है। इसका सुगन्धित, बहुवर्षी शाक, सघन, आवरण मुक्त तथा जटाकार होता है। यह शीत वीर्यात्मक द्रव्य मेध्य, वर्ण प्रसादकर, निद्राजनक, ज्वरनाशक, दाह नाशक आदि गुणों से मुक्त होता है। यह उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में 3000 से 3800 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है।

 वचा :- इसको वच या बालवच नाम से भी जाना जाता है। यह बुद्धि वर्धक, अग्नि दीपक, कणठ के लिए हितकर, मेधा वर्धक, मूत्र को स्वच्छ करने वाला होता है। इसका उपयोग मिर्गी में भी किया जाता है तथा जिन बालकों को बचपन में बोलने मे देर होती हो व स्वर स्पष्ट न हो उनमें लाभप्रद होता है।

 अतिविषा :- इसका स्थानिक नाम अतीस या पतीस है। इसका प्रयोज्याग मूलकन्द है। यह 2700 से 3800 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह रस में कड़वा तथा वीर्य में उष्ण होता है। यह विष चिकित्सा, कास, जवर, अर्श, कृमि में लाभ प्रद होता है। बालकों में दांत निकलते समय होने वाले कष्टों में इसका उपयोग किया जाता है।

 

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